सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

दशमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने दशमोऽध्यायः ३६७

दशमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने दशमोऽध्यायः ३६७

एवं स्वयंवरं परिसमाप्याऽधुना कन्यादानविषय एवाऽऽशङ्कानिवृत्त्यर्थमन्यदुच्यते—

बलाच्चेत्प्रहृता कन्या मन्त्रैर्यदि न संस्कृता ।
अन्यस्मै विधिवद्देया यथा कन्या तथैव सा ॥ १७ ॥

अनु०— यदि कोई कन्या बलपूर्वक भगायी गयी हो और उससे मन्त्रों के साथ विधिवत् विवाह न किया गया हो तो, उसका विवाह विधिपूर्वक दूसरे पुरुष के साथ किया जा सकता है। वह कुमारी कन्या के समान ही होती है ॥ १७ ॥

प्रहरणं मैथुनार्थमाकर्षणम् । न तु क्षतयोनित्वापादनम् , तथा च सति संस्कार एव नाऽस्ति ॥ १७ ॥

निसृष्टायां हुते वाऽपि यस्यै भर्त्ता म्रियेत सः ।
सा चेदक्षतयोनिस्याद्गतप्रत्यागता सती ॥
पौनर्भवेन विधिना पुनस्संस्कारमर्हति ॥ १८ ॥

अनु०— यदि कन्या का संकल्पपूर्वक विवाह में दान कर दिया गया हो और वैवाहिक होम कर्म संपन्न हो गया हो और उसके बाद पति की मृत्यु हो जाय और उस कन्या का पति के साथ मैथुन संबन्ध न हुआ हो तो पति के घर जाकर भी वहाँ से पुनः पिता के घर आने पर उसका पुनर्भू (दूसरी बार विवाह करने वाली स्त्री) के विवाह की विधि से विवाह हो ॥ १८ ॥

निसृष्टा उदकपूर्वं प्रदत्ता । हुते वाऽपि होमेऽपि निर्वृत्ते भर्ता वोढा यदि म्रियेत, सा चेत् भार्या अक्षतयोनिः अस्पृष्टमैथुना स्यात् गतप्रत्यागता ॥ १८ ॥

भर्तृविषय एव किञ्चिदुच्यते—

त्रीणि वर्षाण्यृतुमतीं यो भार्यां नाऽधिगच्छति ।
स तुल्यं भ्रूणहत्यायै दोषमृच्छत्यसंशयम् ॥ १९ ॥

अनु०— जो व्यक्ति ऋतुमती पत्नी से तीन वर्ष तक मैथुन नहीं करता वह भ्रूणहत्या के पाप का भागी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ १९ ॥

यथा गर्भप्रध्वंसने भ्रूणहत्या भवति तथा तत्प्रागभावेऽपि, अविशेषादित्यभिप्रायः ॥ १९ ॥

ऋतुस्नातां तु यो भार्यां सन्निधौ नोपगच्छति ।
पितरस्तस्य तन्मासं तस्मिन् रजसि शेरते ॥ २० ॥

३६८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ ऋतुगमनातिक्रमनिन्दा

अनु०—जो पुरुष ऋतुस्नान करने वाली पत्नी के निकट रहते हुए भी उससे मैथुन रत नहीं होता उसके पूर्वज उस मास में उसकी पत्नी के रजस्राव में ही पड़े रहते हैं ॥ २० ॥

ऋतुगमनातिक्रमनिन्दैषा ॥ २० ॥

ऋतौ नोपैति यो भार्यामनृतौ यश्च गच्छति ।
तुल्यमाहुस्तयोर्दोषमयोनौ यश्च सिञ्चति ॥ २१ ॥

अनु०—जो पुरुष ऋतुकाल में पत्नी से मैथुन नहीं करता, जो ऋतुकाल से भिन्न समय में पत्नी से मैथुन करता है, और जो पत्नी की योनि से भिन्न स्थान में अप्राकृतिक मैथुन द्वारा वीर्यपात करता है, इन सभी के दोष समान रूप से घोर होते हैं ॥ २१ ॥

त्रयाणामपि भ्रूणहत्यादोषस्तुल्यः सत्पुत्रोत्पत्तिनिरोधात् ॥ २१ ॥

भर्तुः प्रतिनिवेशेन या भार्या स्कन्दयेदृतुम् ।
तां ग्राममध्ये विख्याप्य भ्रूणघ्नीं निर्धमेदगृहात् ॥ २२ ॥

अनु०—जो पत्नी पति की इच्छा होने पर भी मैथुन से विरत रहती है और (ओषधि आदि द्वारा $^१$ रजोहानि कर सन्तानोत्पत्ति में बाधा पहुँचाती है, उसे गाँव के लोगों के समक्ष भ्रूणघ्नी घोषित कर घर से निकाल दे ॥ २२ ॥

प्रतिनिवेशः प्रतिकूलता अनिच्छा वा । स्कन्दयेत् गमयेत् शोषयेद्वा भर्तुर्द्वेषाद्रज औषधादिभिश्चाशोषयन्तीमित्यर्थः । ग्राममध्ये जनसन्निधौ निर्धमेत् प्रस्थापयेत् त्यजेत् । ऋत्वतिक्रमे भर्तुर्यथा भ्रूणहत्या तथाऽस्या अपीति निन्दैषा ॥ २२ ॥

ऋतुगमनातिक्रमे प्रायश्चित्तमाह—

ऋतुस्नातां न चेद्गच्छेन्नियतां धर्मचारिणीम् ।
नियमातिक्रमे तस्य प्राणायामशतं स्मृतम् ॥ २३ ॥

अनु०—जो पति मासिक धर्म के बाद स्नान करने वाली और धर्म पूर्ण आचरण करने वाली पत्नी से मैथुन के नियम का उल्लंघन करता है, उसके लिए प्रायश्चित्त के लिए सो प्राणायाम करने का विधान है ॥ २३ ॥

नियमातिक्रमः ऋतुगमनातिक्रमः । ऋत्वतिक्रमो वा । ऋज्वन्यत् ॥ २३ ॥


१. एतत्प्रकरणस्थानि १७–१८, २०, २३ सूत्राणि मानववासिष्ठैः संवदन्ति ।