आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Ashvalayana Grihyasutra Hindi
महर्षि आश्वलायन (टीकाकार: हरदत्त आचार्य) द्वारा
स्रोत: Asvalayana Grihya Sutram with Anavila Commentary by Haradatta (उद्गम)
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इस ग्रन्थ के बारे में
आश्वलायन गृह्यसूत्र ऋग्वेद से सम्बद्ध गृह्यसूत्र है, जो आश्वलायन कल्पसूत्र का भाग है। गृह्यसूत्रों में घर में किए जाने वाले संस्कारों और अनुष्ठानों के नियम होते हैं, और यह ग्रन्थ ऋग्वेदी परिवारों के लिए इन विधियों का प्रमुख आधार रहा है। यह चार अध्यायों में बँटा है और प्रत्येक अध्याय खण्डों में।
इसमें गृह्य अग्नि की स्थापना, पाकयज्ञ, विवाह की विधि, गर्भाधान से सम्बद्ध संस्कार, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, तीसरे वर्ष में चौल (मुण्डन), उपनयन, बारह वर्ष के वेदाध्ययन-ब्रह्मचर्य, समावर्तन, गृह-निर्माण, श्राद्ध और अन्त्येष्टि जैसे विषयों के सूत्र हैं। प्राचीन भारत के पारिवारिक जीवन और कर्मकाण्ड को समझने के लिए यह एक मूल स्रोत है।
स्कैन किए गए पृष्ठों के अनुसार इस संस्करण में सूत्रों के साथ हरदत्ताचार्य मिश्र की संस्कृत वृत्ति 'अनाविला' दी गई है। इसका सम्पादन महामहोपाध्याय टी. गणपति शास्त्री ने किया, जो त्रिवेन्द्रम में संस्कृत पाण्डुलिपि-प्रकाशन विभाग के क्यूरेटर थे। यह त्रिवेन्द्रम संस्कृत सीरीज़ का ७८वाँ ग्रन्थ है, जो त्रावणकोर के महाराजा की सरकार के अधिकार से १९२३ में छपा। प्रति लखनऊ के राज्य संग्रहालय पुस्तकालय की है और इसमें २९२ पृष्ठ हैं।
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