आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Ashvalayana Grihyasutra Hindi
महर्षि आश्वलायन (टीकाकार: हरदत्त आचार्य) द्वारा
स्रोत: Asvalayana Grihya Sutram with Anavila Commentary by Haradatta (उद्गम)
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इस ग्रन्थ के बारे में
आश्वलायन गृह्यसूत्र ऋग्वेद से सम्बद्ध गृह्यसूत्र है, जो आश्वलायन कल्पसूत्र का भाग है। गृह्यसूत्रों में घर में किए जाने वाले संस्कारों और अनुष्ठानों के नियम होते हैं, और यह ग्रन्थ ऋग्वेदी परिवारों के लिए इन विधियों का प्रमुख आधार रहा है। यह चार अध्यायों में बँटा है और प्रत्येक अध्याय खण्डों में।
इसमें गृह्य अग्नि की स्थापना, पाकयज्ञ, विवाह की विधि, गर्भाधान से सम्बद्ध संस्कार, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, तीसरे वर्ष में चौल (मुण्डन), उपनयन, बारह वर्ष के वेदाध्ययन-ब्रह्मचर्य, समावर्तन, गृह-निर्माण, श्राद्ध और अन्त्येष्टि जैसे विषयों के सूत्र हैं। प्राचीन भारत के पारिवारिक जीवन और कर्मकाण्ड को समझने के लिए यह एक मूल स्रोत है।
स्कैन किए गए पृष्ठों के अनुसार इस संस्करण में सूत्रों के साथ हरदत्ताचार्य मिश्र की संस्कृत वृत्ति 'अनाविला' दी गई है। इसका सम्पादन महामहोपाध्याय टी. गणपति शास्त्री ने किया, जो त्रिवेन्द्रम में संस्कृत पाण्डुलिपि-प्रकाशन विभाग के क्यूरेटर थे। यह त्रिवेन्द्रम संस्कृत सीरीज़ का ७८वाँ ग्रन्थ है, जो त्रावणकोर के महाराजा की सरकार के अधिकार से १९२३ में छपा। प्रति लखनऊ के राज्य संग्रहालय पुस्तकालय की है और इसमें २९२ पृष्ठ हैं।
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| अस्तमिते ब्रह्मौदन | ८४ | आ षोडशाद् ब्राह्म | ७३ |
| अस्तमिते स्थाली | १०३ | आसंचनवन्ति पृष | १८० |
| अस्माकमुत्तमं कृ | १२६ | आहवनीयश्चेत् पू | १८३ |
| अहं वर्ष्म सजातानां | ९७ | आहिताग्निश्चेद्वु | १७२ |
| अहिरिव भोगैः | १६९ | इतरेषु | १८७ |
| अहीनस्य | ९३ | इत्यनुपेतपूर्वस्य | ८७ |
| आक्रम्य वा पादौ | ९७ | इदं वत्स्यावो भो | १६४ |
| आगावीयमेके | १३६ | इध्मचितिं चिनो | १७७ |
| आग्नेयीमेके | ११४ | इध्मबर्हिषोश्च | ३६ |
| आचान्तेष्वेके | २०६ | इमं तस्मै बलिं | ५२ |
| आचान्तोदकाय | १०० | इममग्ने चमसं | १८२ |
| आचार्यः समन्वार | ८४ | इमं जीवेभ्यः | १९३ |
| आचार्यान् पितॄंश्च | १५२ | इममश्मानमारोहा | २५ |
| आचार्यश्वशुरपितृ | ९६ | इमे जीवा विष्ट | १८४ |
| आजमन्नाद्यका | ६४ | इमा नारीरविध | १९४ |
| आज्यभागौ हुत्वाज्या | १४७ | इरिणादधन्या | २० |
| आज्यशेषेण वानक्ति | ३२ | इष्ट्वान्यमुत्सृजे | २१५ |
| आत्मनि मन्त्रान् सं | १६० | इह प्रियं प्रजायां | ३१ |
| आत्वाहार्षमन्तरे | १६८ | उक्तं गृहप्रपदनम् | १३१ |
| आदित्यमीक्षयेद् | ७८ | उक्तं वृषले | १७८ |
| आदित्यो मेऽध्वर्यु | ९१ | उक्तानि वैतानिकानि | १ |
| आनडुहं गोमयं | ६६ | उत्तरतः पत्नीं | १७७ |
| आपूर्यमाणपक्षे | ५८ | उत्तरतोऽग्नेर्दभै | २१३ |
| आप्लुत्य वाग्यतः | ७१ | उत्तरतोऽग्नेर्ब्रीहि | ६६ |
| आयतचतुरश्रं वा | १३१ | उत्तरतोऽग्नेः शामि | ४४ |
| आयतीर्यासामू | १३६ | उत्तरपुरस्तात् | ४१ |
| आयुष्यमिति सू | १६२ | उत्तरपुरस्तादा | १८४ |
| आर्द्रया | २०८ | उत्तरमाग्नेयं दक्षिणं | ४० |
| आद्र्रामन्नाद्यका | १५९ | उत्तरया धनुः | १६८ |
| आवृत्तैव कुमार्यै | ६४, १५, ७० | उत्तरया पांसूनव | १८९ |
| आवृत्तैव पर्यग्निकृत्वो | ४६ | उत्तरां वाचयेत् | १६८ |
| आवृत्तैव हृदय | ५० | उत्तरामुत्तरया | २८ |
| आशंसन्त एनं | १७२ | उत्तरार्धात् सौवि | ४२ |
| आश्वयुज्यामाश्व | १०६ | उत्तरेणोत्क्रमयेत् | ३० |
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| उदगयन आपूर्यमाण | १५ | एताश्चैव देवता | १५२ |
| उदरं वैश्यः | १६१ | एतेन गोदानं | ७० |
| उदरे पात्रीं समव | १८० | एतेनं माध्यावर्षं | १२१ |
| उदिते सौर्याणि | १९६ | एतेन वापनादि | ८७ |
| उद्धृत्य घृताक्त | २०४ | एतेनाग्ने ब्रह्मणा | ९५ |
| उपनिपदि गर्भ | ५४ | एवं त्रीन् प्रस्तृ | ५६ |
| उपरतेषु शब्देषु | १९२ | एवं प्रातः प्राङ्मुख | १५६ |
| उपरि समिधं कृत्वा | १५९ | एवं विद्व यजमा | २१४ |
| उपश्वास्य पृथि | १७० | एवमतिसृष्टस्य | १६५ |
| उपस्थं स्त्री | १६१ | एवमनाहिताग्नि | ९५ |
| उपस्थे शम्याम् अर | १८० | एवमितरे यथादे | ९२ |
| उभय।मुभयकामः | १५९ | एवमुत्तरतस्त्रिः | ६९ |
| उभयोः सन्निधाय | २९ | एपोऽवदानधर्मः | २५ |
| उरसि ध्रुवां शि | १७९ | एपोऽवभृथः पा | ४३ |
| ऊरू सरणर्जावि | १६१ | एषा मेऽष्टकेति | ११४ |
| ऊर्णास्तुके केश | २८ | ओंपूर्वा व्याहृतयः | १४१ |
| ऋचो यजूंषि सा | १४१ | ओंपूर्वा व्याहृतयः | १४९ |
| ऋतुदेवतामे | ११५ | ओदनं कृसरं | ११३ |
| ऋत्विजे वितते कर्म | २१ | ओप्योप्य हैके | २७ |
| ऋत्विजो वृणीते | ८९ | ओषधिवनस्पति | १२७ |
| ऋत्विजो वृत्वा मधु | ९५ | ओषधीनां प्रादु | १४७ |
| ऋषभं मा समाना | १२६ | कण्टकिक्षीरिण | १२७ |
| ऋषिभ्यस्तृतीयम् | ८५ | कण्टकिक्षीरिणस्त्विव | १७४ |
| एकक्षीरकेण | १६० | कपोतश्चेद्गा | १५६ |
| एकबर्हिरिध्मराज्य | १५ | कर्णयोः प्राशित्र | १८० |
| एकस्यां वा | ११२ | कर्णयोरुपनिधाय | ६१ |
| एकादश पशोरव | ४९ | कर्तारं यजमानः | ४७ |
| एकादशे क्षत्रियम् | ७२ | कर्ता नृपले जपेत् | १७८ |
| एकैकस्यावदानस्य | ५० | कर्तृष्ववकाः शीफाल | १३२ |
| एतत् तन्त्रम् | ४३ | कर्तृष्वेके द्वयोः | १२० |
| एतदुत्सर्जंनम् | १५२ | कलशात् सक्तूनां | १०४ |
| एतान्यान्यपि | १२५ | कल्मापमित्येके | २०८ |
| एतस्मिन्नेवाग्नौ | ४८ | कल्याणेपु देशवृक्ष | ३० |
| एतस्मिन् काले ग | २०४ | कल्याणैः सह सम्प्र | ९४ |
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| कस्य ब्रह्मचार्यसि | ७८ | चतुर्थं संहाय सौ | १११ |
| कामं कृष्णमारो | २०९ | चतुर्थे गर्भमासे | ५७ |
| कामं तु व्रीहियव | ३५ | चतुर्भिः सूक्तैश्चत | २१२ |
| काम्या इतराः | ३७ | चतुष्पथाद् विप्र | २० |
| कालश्च | ८८ | चन्द्रमा मे ब्रह्मा | ९१ |
| किं पिबसि किं पिब | ५५ | चन्द्रमास्ते ब्रह्मा | ९२ |
| कुमारं जातं पुरा | ६० | चरवः | १५२ |
| कुलमग्रे परीक्षेत | १८ | चरितव्रतः सूर्याविदे | ३२ |
| कृताकृतं केशवं | ८८ | चरितव्रताय मेधा | ८६ |
| कृताकृतमाज्य | १३ | चैत्ययज्ञे प्राक् | ५१ |
| केशशब्दे तु इम | ७० | छित्त्वा वैकम् | १८० |
| केशश्मश्रुलोम | ७१ | जपित्वामिष्टे होता | ९१ |
| केशश्मश्रुलोम | १७४ | जानुमात्रं कर्तं खा | १२९ |
| क्षीरोदकेन शमी | १८८ | जायोपेयेत्येके | १५० |
| क्षुत्वा जृम्भित्वा | १५४ | जीमूतस्येव भव | १६८ |
| क्षुरतेजो निमृजेद् | ६९ | जीवं रुदन्तीति | ३० |
| क्षेत्रं प्रकर्षयेदुत्त | १३५ | ज्ञातौ चासपिण्डे | १८७ |
| क्षेत्रस्यानुवातं | १३५ | ज्यायान् ज्यायान् वान | ११० |
| क्षेत्राच्चेदुभयतः स | १९ | तं चतुष्पथे न्युप्य | ११० |
| गणानासामुपति- | १३६ | तं वह्यमानमनु | १८४ |
| गर्भाष्टमे वा | ७२ | तं दीपयमाना | १९२ |
| गाः प्रतिष्ठमाना | १३६ | तं पन्नदतं वृषी | २०९ |
| गार्हपत्यश्चेत् पूर्वे | १८३ | तच्छमीशाखयो | १३१ |
| गुरवे प्रसक्ष्यमा | १६४ | तत् सर्वसमृद्धम् | १२८ |
| गुरुणाभिमृष्टा अ | १९० | तत्स॑वितुर्वृ॑णीमह | ८८ |
| गुरौ चासपिण्डे | १८६ | तत् सहस्रसीतं | १३१ |
| गोमिथुनं दक्षिणा | ७१ | तथाज्यभागौ | १३ |
| गोमिथुनं दत्त्वोपय | २१ | तथोत्तमे आहुती | २७ |
| गोष्ठात् पशुमती | १९ | तथोत्सर्गे | १५० |
| ग्रहणान्तं वा | ८२ | तदाचार्याय वेद | ८४ |
| ग्रामकामा अन्नय | १७२ | तदेपाभियज्ञ | ९५ |
| घृतौदनं तेजस्कामः | ६५ | तद्वरन्ते सर्पीः | २१३ |
| घोषवदाद्यन्तर | ६२ | तद्यदग्नौ जुहोति | १३८ |
| चतसृषु चतसृषु | २११ | तद्दो दिवो दुहि | १२६ |
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| तन्मावतु तन्मा वि | ९२ | दक्षिणमग्ने ब्राह्म | ९७ |
| तस्मिन् बर्हिरास्ती | १७७ | दक्षिणाप्रवणे | ११८ |
| तस्य दर्शपूर्ण | ३६ | दक्षिणाप्रवणे स | १२८ |
| तस्य पुरस्तादुल्मु | ४७ | दक्षिणे केशपक्षे | ६८ |
| तस्य वाससा पाणि | ८१ | दक्षिणे पार्श्वे स्फ्यं | १७९ |
| तस्यां जातो द्वादशाव | २१ | दक्षिणे हस्ते जुहूम् | " |
| तस्यामग्निहोत्रेण | ३४ | दधनि मध्वानीय | ९६ |
| तस्याध्यक्षंसौ पाणी | ७८ | दध्यन्यत्र सर्पिरा | १७४ |
| तस्यै तस्यै देवतायै | ३७ | दधिमधुघृतमि | ६५ |
| तस्यैतानि व्रता | १६३ | दशावरान् दश परान् | २१ |
| तस्यैव मांसस्य प्र | ११८ | दानाध्ययने वर्ज | १८६ |
| तां हैके वैश्वदेवीं | ११४ | दुर्ज्ञेयानि लक्षणानि | १९ |
| ताः प्रतिग्राहयि | २०२ | दृश्यमाने प्रविशे | १८५ |
| तानेतान् यज्ञान | १३८ | देवताश्रोपांशुया | ३६ |
| तानेव कामाना | १५३ | देवतास्तर्पयति | १४३ |
| तामुत्थापयेद् | १७८ | देवानां प्रतिष्ठे स्थः | १६१ |
| तासां गृहीत्वा नव | ६७ | देवनात् कितवी | २० |
| तासां पाययित्वा | ४६ | देवयज्ञो ब्रह्मयज्ञो | १३८ |
| तुषान् फलीकरणं | २१२ | देवस्य त्वा सवितुः | ९८ |
| तूष्णीमाघारावाघा | ४० | द्वादशरात्रं वा | १८६ |
| तूष्णीं वै प्रजाप | ७९ | द्वादशवर्षाणि वे | ८२ |
| तृतीये वर्षे चौलम् | ६६ | द्वादशे वैश्यम् | ७२ |
| तृप्तान् ज्ञात्वा मधु | २०६ | द्व्यक्षरं प्रतिष्ठाका | ६२ |
| तेजसा ह्येवात्मानं | ८० | धनुश्च क्षत्रियाय | १७८ |
| तेषां दण्डाः पालाशो | ७६ | धनुर्हस्तादाददानो | " |
| तेषां पुरस्ताच्चतस्र | १६ | धनेनोपतोप्यो | २२ |
| तेषां मेखला मौञ्जी | ७६ | धन्वन्तरियज्ञे | ५३ |
| तैत्तिरं ब्रह्मवर्चस | ६४ | ध्रुवमरुन्धतीं | २९ |
| त्रयः पाकयज्ञाः | २ | ध्रुवान्ते परिददा | १०५ |
| त्रिरात्रमक्षारालव | १८६ | ध्रुवासुं ते ध्रुवासुं | " |
| त्रिर्जामदग्नानाम् | २५ | नक्षत्रदेवतामेके | ११५ |
| त्वमर्यमा भवसि | १८ | न तृप्तिं गच्छेत् | ९९ |
| दक्षिणपूर्वं उद्धता | १७७ | न त्वेवानष्टकः | ११४ |
| दक्षिणपूर्वाभ्या | १२४ | न नक्तं छायात् न | १६३ |
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| नमः शौनकाय | २१६ | पवित्रे अन्तर्धाय | ३७ |
| न मांसमश्नीयुर्न | ९४ | पशुकल्पेन पशुं | १९५ |
| न मालोक्ताम् | १६१ | पशूनामुपताए | २१५ |
| नमो ब्रह्मणे नमो | १४३ | पश्चाच्छामित्रस्य | ४७ |
| नवरथेन यश | १२५ | पश्चात्तारयिष्यमाणस्या | ६७ |
| नवान् मणिकान् कु | १९१ | पश्चात् कारयिष्यमाणो | ६६ |
| नवावरान् भोज | १२२ | पश्चादग्नेः स्वस्तरः | ११० |
| न सर्वम् | ९९ | पश्चादग्नेर्हृपद | २३ |
| न हार्पशुभर्वती | २१५ | पाणिग्रहणादि | ३३ |
| न हास्य दाहुकं | १३२ | पात्र्या पलाशेन | २११ |
| नात्र सौविष्टकृत् | १०९ | पादौ पूर्वं शिर | १८८ |
| नात्र हवींषि प्रत्य | ४२ | पिङ्गलोऽनड्वानव्रणः | १९५ |
| नापितं शिष्याच्छी | ६९ | पिण्डपितृयज्ञ | ११९ |
| नाम चास्मै दद्युः | ६२ | पिण्ड्यौ चैके | १८१ |
| नामांसो मधुपर्को | १०१ | पितृदेवतामेके | ११५ |
| नाभ्या चेन्नद्यन्तरा | ५३ | पितृभ्योऽयुक्षु प्र | १२१ |
| नासिकयोः स्रुवौ | १७९ | पीठचक्रेण गोयु | १७५ |
| नास्य प्राश्नीयुर्ना | २१४ | पीतं वैश्यस्य | १३१ |
| नित्यानुगृहीतः | ३४ | पुरस्तात् प्रत्य | ७७ |
| नियोगात् तु प्राक्षी | २१५ | पुरोदयादग्निं | १९० |
| निवेशनं पुनर्न | १०९ | पूर्वासु पितृभ्यो | १२० |
| निवेशनमलङ्कृ | १०७ | पूर्वेद्युः पितृभ्यो | ७७२ |
| नीचदक्षिणस्य | ९३ | पृषातकमञ्जालि | १०७ |
| नैके काञ्चन | १८ | प्रकीर्याङ्गमपर्वी | २०६ |
| नैतस्यां रात्र्यामन्नं | १८५ | प्रक्षालितपादोऽर्घ्यं | ९७ |
| नैनमन्तरा व्यवेयु | १०६ | प्रच्छिनत्ति येनाव | ६८ |
| नैनानुपनयेन्ना | ७३ | प्रच्छिद्य प्रच्छिद्य | ,, |
| नोद्धरेत् प्रथमं पा | २०३ | प्रजापतिर्ब्रह्मा | १४४ |
| न्यस्तमृत्विज्य | ९३ | प्रजावज्जीवपुत्राभ्यां | ५६ |
| न्यूने गर्हितम् | १३० | प्रतिदिशं त्वादेश | २१२ |
| पञ्चमीमुरसि | १८२ | प्रतिपुरुषं पितॄं | १४५ |
| पञ्चम्येषुधिं प्र | १६९ | प्रतिभयं चेदन्तरा | ५३ |
| परिणीय परिणीया | २४ | प्रत्तासु च स्त्रीष्व | १८७ |
| पलाशदूतेन | ५२ | प्रत्यक्षरं वा | ४१ |
| वित्राभ्यामाज्य | ११ | प्रत्यभिघार्य हवि | २५ |
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| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| प्रत्यभ्यनुज्ञा क्रिय | २०४ | ब्रह्मणमेव प्रथमं | ८९ |
| प्र त्वा मुञ्चामि वरु | २८ | ब्रह्मा वैतानि धार | ६७ |
| प्रदक्षिणं परीत्य | १०५ | ब्राह्मणान् भोज | ८५ |
| प्रदक्षिणमग्नि | २४ | ब्राह्मणान् भोज | ११७ |
| प्रदक्षिणमुपचा | १२३ | ब्राह्मणान् श्रुतशी | १९८ |
| प्रधारयन्तु मधु | १७० | ब्राह्मणायोदकुङ्कु | १०० |
| प्रयाण उपपद्यमाने | २९ | ब्राह्मण्यश्च वृद्धा | ६० |
| प्रवासादेत्य | ६३ | भिक्षां भवान् ददा | ८३ |
| प्रसङ्ख्याय हैके | १०६ | भित्त्वा वैकम् | १७९ |
| प्रसव्येनेतर | २०१ | भूतेभ्यस्त्वेति म | ९९ |
| प्रसृष्टास्वनुमन्त्र | २०२ | भोगं चर्मणा कु | २१३ |
| प्राग्वोदग्वा ग्रामा | १३९ | मधुपर्कमाह्रियमा | ९८ |
| प्राक्संस्थान्युदक्सं | ४१ | मध्यमस्थूणायाः | १३३ |
| प्राचीनावीती सु | १४५ | मध्यमाष्टकाया | १५१ |
| प्राजापत्यं तत् | १५१ | मध्यात् पूर्वार्द्धाच्च | ४१ |
| प्राजापत्यस्य स्थाली | ५७ | मध्यात् पूर्वार्द्धात् प | ४२ |
| प्राजापत्यामेके | ११५ | मध्येऽगारस्य स्थाली | १३४ |
| प्राणापानयोरुपं | १६४ | मध्ये हवींषि | ४१ |
| प्राणापानयोरुह | १६५ | मन्त्रविदो मन्त्रान् | ११० |
| प्रादुष्करणहोम | ३५ | मन्त्रेण हैके | ७९ |
| प्राप्यासदन्मइमा | १८५ | ममाग्ने वर्च इति | १६२ |
| प्राप्यैतं भूमिभा | १७६ | मयि दोहः पद्यायै | ९९ |
| प्रेष्यति युगपद् | १८३ | मयि मेधां मयि प्र | ८० |
| प्रोक्षणादि समा | २१० | महद्वै भूतं स्नातको | १६३ |
| बर्हिराज्यं चानु | २१६ | माता रुद्राणां दु | १०१ |
| बर्हिषि पूर्णपात्रं | ४३ | मातुः पिता दक्षि | ६७ |
| बहुलोपाधिकम् | १७४ | मानो अग्नेऽवसृ | १०३ |
| बह्वन्नं ह भवति | १२८ | मार्गशीर्ष्या प्रत्यव | १०८ |
| बाहू राजन्यः | १६१ | मालेति चेद् ब्रूयुः | १६१ |
| बीजवतो गृहान् | १३५ | मासि मासि चैवम् | १२१ |
| बुद्धिमते कन्यां | १८ | मिथः समयं | २० |
| बुद्धिरूपशील | ,, | मृत्स्नो वा | १७७ |
| ब्रह्मवर्चसकाम | १५९ | मेखलामाबध्य द | ८२ |
| ब्रह्मा च धन्वन्तरि | १४ | यज्ञपात्राणि च | १७५ |
९
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| यज्ञोपवीती नि | १५५ | युवतयः पृथक् पा | १९४ |
| यत्तु समानं तद् वक्ष्य। | २२ | युवान ऋत्विजो | ८९ |
| यत्र बाणाः संपतन्ति | १७१ | युवानस्तस्यां कि | १२९ |
| यत्र वेत्थ वनस्पत | ५२ | युवा सुवासाः परि | ७८ |
| यत्र सर्वत आपः | १७४ | येन धाता बृहस्प | ६८ |
| यत्र सर्वत्र आपः | १२९ | यो मे राजन्युज्यो | १५४ |
| यत्र सर्वत्रापो | १२८ | रथमारोक्ष्यन्नाना | १२३ |
| यत्रैनं पूजयिष्य | १६२ | रश्मीन् संगृह्णेद | १२४ |
| यत्रोदकमवहं | १८४ | राज्ञे च | ९६ |
| यथाकुलधर्मं के | ७० | रात्रिदेवतामेके | ११५ |
| यथाकुलधर्मं वा | ६६ | रात्स्यत्यसावमुत्रै | १८३ |
| यथान्यायमितरे | १५० | रुद्राय महादेवाय | २०९ |
| यथावकाशमितरे | ११० | रुद्राय स्वाहेति | २११ |
| यथाशक्ति वाच | ८१ | रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन | ९८ |
| यदस्य कर्मणो | ४२ | लक्षणे कुम्भे पुमां | १८८ |
| यदि तूपशाम्येत् | ३४ | लोहितं क्षत्रियस्य | १३० |
| यदि नाधीयात् | ५४ | लौहायसं च कौ | १८० |
| यदि नाना श्रपयेद् | ३८ | वंशमाधीयमान | १३३ |
| यदि पाणिष्वाचा | २०५ | वंशान्तरेषु शरणा | १३२ |
| यदि वासांसि व | ७३ | वध्वोऽञ्जला उपस्तीर्य | २५ |
| यदृचोऽधीते पय आ | १४२ | वपाश्रपणीभ्यां | ४७ |
| यदृचोऽधीते पयसः | ,, | वयमद्येन्द्रस्य | १२६ |
| यद्यद्यात ऊर्ध्वं | ८५ | वयसु त्वा पथस्प | १५७ |
| यद्युभयोर्न विन्दे | १५९ | वयसाममनोज्ञां | १६६ |
| यद्यु वै विदेशस्थम् | ५१ | वामदेव्यमक्ष | १२४ |
| यद्यु वै समोप्य | ३८ | वार्षिकमित्येतदा | १५१ |
| यवैस्तिलार्थः | १२३ | वासे वासे सुमङ्गली | ३१ |
| यस्मिन् कुशवीर | १२७ | विगुल्फं बर्हिराज्यं | १७४ |
| यस्या दिशो बिभी | १६६ | विज्ञायते चक्षुषी वा | ४० |
| यां नदीमुपावसि | ५९ | विज्ञायते तस्य | १४६ |
| या देवेषु तन्वा | १३६ | विद्यान्ते गुरुमर्थै | १६३ |
| युगपत् प्रासौ परा | १८३ | विराजो दोहमशी | ९९ |
| युग्मानि त्वेव पुंसाम् | ६२ | विवाहाग्निमग्रतो | ३० |
| युग्मान् वृद्धिपूर्तें | १२२ | विवाहाग्निमुपसमा | ३१ |
१०
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| विष्टरः पाचमर्घ्य | ९६ | संशिष्याद्वा संशि | १७१ |
| विशेषान् वक्ष्यामः | २११ | संहाय अतो देवा | १११ |
| वीणागाथिनौ सं | ५९ | स एवं विद्वा दह्य | १८४ |
| वृक्कयावच्चार इ | १८१ | स एष शूलगवो | २१५ |
| वृक्कयावुद्धृत्य पाण्यो | ,, | स कर्मणामुप | ९० |
| वृषभो दक्षिणा | ६० | सङ्ग्रामे समुपोल्हे | १६८ |
| वेणुरासि वानस्प | १६१ | सङ्कर्त्तृभिः सङ् | १०७ |
| वेदपुरीषाद् ब्रह्म | २० | सञ्चयनमूर्ध्वं द् | १८७ |
| व्याधितस्यातुर | ९४ | सत्यं यशः श्रीर्म | १०० |
| व्रीहियमवतीभिरद्भिः पु | ४५ | सदस्यं सप्तदशं | ५० |
| व्रीहियमवतीभिरद्भिर | २०९ | सद्दुर्वासु चतसृषु | १३४ |
| शं नो भवन्तु वा | १०४ | सप्तम्याश्वान् | १४९ |
| शतर्चिनो माध्यं | १४४ | सप्तावरान् सप्त परान् | २१ |
| शान्तातीयं जपन् गृ | २१५ | समन्वारब्धे | ७७ |
| शान्तातीयं जपन् प | २१६ | समवस्त्रवे भक्त | १२८ |
| शरदि वसन्ते वा | २०८ | समाप्य ओं प्राक् | १६५ |
| शामित्र एष भव | ४७ | समिधं त्वाहरे | १५९ |
| शुन्धि शिरो मुखं | ७१ | समिधमेवापि | ४ |
| शृतानि हवींष्यभि | ३९ | समुच्चयमेके | १७ |
| श्मशानात् पतिघ्नी | २० | समे वर्तम् | १३० |
| श्मश्रूणीहोन्दति | ७१ | समोप्य वा | ३८ |
| श्रावणस्य पञ्च | १४७ | सम्पन्नं पृष्ट्वा यद्य | २०६ |
| श्रावण्यां पौर्णमास्यां | १०२ | स यावन्मन्येत | १४३ |
| श्रेष्ठं स्वस्य यूथ | २०८ | सर्पदेवजनेभ्यः स्वा | १०६ |
| श्वेतं मधुरास्त्रावं | १३० | सर्वे वा | १०० |
| षड्भिर्वोत्तरैः | २११ | सर्वतो भयादनाज्ञा | १६७ |
| षण्मासानधीयी | १५० | सर्वरुद्रयज्ञेषु | २१२ |
| षष्ठे मास्यन्नप्राशनम् | ६४ | सर्वो यथाङ्गं वि | १८१ |
| संपूषन्नध्वन इति | १५७ | सर्वाङ्गेभ्योऽवदाय | ४९ |
| संपूषन् विदुषेति | ,, | सर्वाणि ह वा अ | २१३ |
| संवत्सरमादिशेत् | ७२ | सर्वा दिशोऽनुपरी | १७० |
| संसदमुपयायात् | १२६ | सर्वान् वा येऽही | ८९ |
| संस्थिते भूमिभागं | १७३ | सर्वे वा तेषाम् | ७६ |
| संस्रवान् समवनी | २०३ | सर्वैर्मन्त्रैश्चतु | ६९ |
११
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| सविता ते हस्त | ७७ | सौर्यामेके | ११५ |
| स वृतो जपेद् मह | ९१ | सौविष्टकृतं चतु | ८५ |
| सव्यं जान्वाच्य दक्षि | १८२ | सौविष्टकृत्यष्ट | ११७ |
| सव्यं शूद्राय | ९७ | स्तुहि श्रुत गर्त | १६६ |
| सव्य उपभृतम् | १७९ | स्त्रीभ्यश्च | ११९ |
| सव्ये बाहौ बद्ध्वानु | १७६ | स्थालीपाकं सर्व | २१६ |
| स समिधमाधाय | ८० | स्थिरौ गावौ भव | १२५ |
| सह धर्मं चरतम् | २१ | स्नातकायोपस्थि | ९५ |
| सायम्प्रातः समिध | ८३ | स्वधा पितृभ्य | ९ |
| सायम्प्रातर्भिक्षे | ,, | स्वमप्रमनोज्ञं | १५३ |
| सार्वकालमेके | १६ | स्वयं चतुर्थीं जपे | १६९ |
| सावित्रीं च चतु | १४९ | हतो मे पाप्मा पा | १०१ |
| सावित्रीमन्वाह | १४१ | हत्वा भित्त्वा च शीर्षा | २२ |
| सावित्र्या द्वितीयम् | ८४ | हराय कृपाय श | २११ |
| सुत्रामाणं पृथ्वि | १२५ | हविरुच्छिष्टं दक्षि | ४४ |
| सुप्तानां प्रमत्तानां | २२ | हिरण्यमवधाय | १३४ |
| सुरामाक्षाममि | १२० | हुता अग्नौ | २ |
| सुसंहितं सन्निध | १८९ | हुत्वा मधुमन्थ | ११९ |
| सृष्टं दत्तमार्नु | २०५ | हृदये हृदयम् - | १८१ |
| सोदके प्रशस्तमा | १३० | हेमन्तशिशिरयोः | ११२ |
| सोमं राजानं | ५९ | होतारमेव प्रय | ९० |
| सोमप्रवाकं परि | ९४ | होम्यं च मांसवर्जम् | ३५ |
| सोमो नो राजाव | ५९ |
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|---|
भक्तिमञ्जरी (Stuti) by H. H. Svâti Srî Râma Varma Mahârâjah. — 1 0 0
स्यानानन्दूरपुरवर्णनप्रबन्धः (Kavya) Syânandûrapuravarnanaprabandha by H. H. Svâti Sri Râma Varma Mahârâjah, with the commentary Sundarī of Râjarâja Varma Koil Tampurân. — 2 0 0
Trivandrum Sanskrit Series.
| No. | Title & Description | RS. | AS. | P. |
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| No. 1 | —दैवम् (Vyâkaraṇa) by Deva with Purushakâra of Krishnalîlâsukamuni. | 1 | 0 | 0 |
| No. 2 | —अभिनवकौस्तुभमाला-दक्षिणामूर्तिस्तवौ by Krishnalîlâsukamuni. | 0 | 2 | 0 |
| No. 3 | —नलाभ्युदयः (Kâvya) by Vâmana Bhatta Bâna (Second Edition). | 0 | 4 | 0 |
| No. 4 | —शिवलीलाणर्वः (Kâvya) by Nîlakantha Dîkshita. | 2 | 0 | 0 |
| No. 5 | —व्यक्तिविवेकः (Alankâra) by Mahima Bhatta with commentary | 2 | 12 | 0 |
| No. 6 | —दुर्घटवृत्तिः (Vyâkaraṇa) by Saranadeva. | 2 | 0 | 0 |
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| No. 9 | —विरूपाक्षपञ्चाशिका (Vedânta) by Virûpâkshanâtha with the commentary of Vidyâchakravartin. | 0 | 8 | 0 |
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| No. 11 | —तपतीसंवरणम् (Nâtaka) by Kulasekhara Varma with the commentary of Sivarâma | 2 | 4 | 0 |
| No. 12 | —परमार्थसारम् (Vedânta) by Bhagavad Âdisesha with the commentary of Râghavânanda. | 0 | 8 | 0 |
| No. 13 | —सुभद्राधनञ्जयम् (Nâtaka) by Kulasekhara Varma with the commentary of Sivarâma. | 2 | 0 | 0 |
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No. 14—नीतिसार: (Nîti) by Kâmandaka, with the commentary of Sankarârya. 3 8 0
No. 15—स्वप्नवासवदत्तम् (Nâtaka) by Bhâsa. (Second Edition). 1 8 0
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No. 20—अविमारकम् (Nâtaka) by Bhâsa. 1 8 0
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No. 23—नानार्थार्णवसंक्षेप: (Kosa) by Kesavaswâmin (Part I. 1st & 2nd Kândas). 1 12 0
No. 24—जानकीपरिणय: (Kâvya) by Chakra kavi. 1 0 0
No. 25—काणादसिद्धान्तचन्द्रिका (Nyâya) by Gangâdharasûri. 0 12 0
No. 26—अभिषेकनाटकम् (Nâtaka) by Bhâsa. 0 12 0
No. 27—कुमारसम्भव: (Kâvya) by Kâlidâsa with the two commentaries, Prakâsikâ of Arunagirinâtha and Vivarana of Nârâyana Pandita (Part I. 1st & 2nd Sargas). 1 12 0
No. 28—वैखानसधर्मप्रश्न: (Dharmasûtra) by Vikhanas. 0 8 0
No. 29—नानार्थार्णवसंक्षेप: (Kosa) by Kesavaswâmin (Part II. 3rd Kânda). 2 4 0
No. 30—वास्तुविद्या (Silpa). 0 12 0
No. 31—नानार्थार्णवसंक्षेप: (Kosa) by Kesavaswâmin (Part III. 4th, 5th & 6th Kândas). 1 0 0
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No. 32—कुमारसम्भवः (Kâvya) by Kâlidâsa with the two commentaries, Prakâsikâ of Arunagirinâtha and Vivarana of Nârâyana Pandita (Part II, 3rd, 4th & 5th Sargas) 2 8 0
No. 33—वाररुचसंग्रहः (Vyâkarana) with the commentary Dîpaprabhâ of Nârâyana. 0 8 0
No. 34—मणिदर्पणः (शब्दपरिच्छेदः) (Nyâya) by Râja chûdâmanimakhin. 1 4 0
No. 35—मणिसारः (अनुमानखण्डः) (Nyâya) by Gopînâtha. 1 8 0
No. 36—कुमारसम्भवः (Kâvya) by Kâlidâsa with the two commentaries, Prakâsikâ of Arunagirinâtha and Vivarana of Nârâyana Pandita (Part III. 6th, 7th & 8th Sargas). 3 0 0
No. 37—आशौचाष्टकम् (Smriti) by Vararuchi with commentary. 0 4 0
No. 38—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the commentary Tîkâsarvasva of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part I. 1st Kânda). 2 0 0
No. 39—चारुदत्तम् (Nâtaka) by Bhâsa. 0 12 0
No. 40—अलङ्कारसूत्रम् (Alankâra) by Râjânaka Srî Ruyyaka with the Alankârasarvaswa of Srî Mankhuka and its commentary by Samudrabandha. 2 8 0
No. 41—अध्यात्मपटलम् (Kalpa) by Âpastamba with Vivarana of Srî Sankara Bhagavat Pâda. 0 4 0
No. 42—प्रतिमानाटकम् (Nâtaka) by Bhâsa. 1 8 0
No. 43—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the two commentaries, Amarakosodghâtana of Kshîraswamin and Tîkâsarvaswa of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part II. 2nd Kânda 1—6 Vargas). 2 8 0
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No. 44—तन्त्रशुद्धम् (Tantra) by Bhattâraka Srî Vedottama. 0 4 0
No. 45—प्रपञ्चहृदयम् (Prapanchahridaya). 1 0 0
No. 46—परिभाषावृत्तिः (Vyâkarana) by Nîlakantha Dîkshita. 0 8 0
No. 47—सिद्धान्तसिद्धाञ्जनम् (Vedânta) by Srî Krishnânanda Sarasvatî. (Part I.) 1 12 0
No. 48— Do. Do. (Part II.) 2 0 0
No. 49—गोलदीपिका (Jyotisha) by Parameswara. 0 4 0
No. 50—रसार्णवसुधाकरः ( Alankâra ) by Singa Bhûpâla. 3 0 0
No. 51—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the two commentaries, Amarakosodghâtana of Kshîraswâmin and Tîkâsarvaswa of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part III. 2nd Kânda 7—10 Vargas) 2 0 0
No. 52—नामलिङ्गानुशासनम् (Kosa) by Amarasimha with the commentary Tîkâsarvaswa of Vandyaghatîya Sarvânanda (Part IV. 3rd Kânda) 1 8 0
No. 53—शाब्दनिर्णयः (Vedânta) by Prakâsâtmayatîndra 0 12 0
No. 54—स्फोटसिद्धिन्यायविचारः (Vyâkarana) 0 4 0
No. 55—मत्तविलासप्रहसनम् (Nâtaka) by Srî Mahendravikramavarman. 0 8 0
No. 56—मनुष्यालयचन्द्रिका (Silpa). 0 8 0
No. 57—रघुवीरचरितम् (Kâvya). 1 4 0
No. 58—सिद्धान्तसिद्धाञ्जनम् (Vedânta) by Srî Krishnânanda Saraswatî (Part III.) 2 0 0
No. 59—नागानन्दम् (Nâtaka) by Srîharshadeva with the commentary Nâgânandavimarsinî of Sivarâma. 3 4 0
No. 60—लघुस्तुतिः (Stuti) by Srî Laghubhattâraka with the commentary of Srî Râghavânanda 0 8 0
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|---|---|---|---|
| No. 61—सिद्धान्तसिद्धाञ्जनम् (Vedânta) by Srî Krishnânanda Sarasvatî (Part IV.) | 1 | 8 | 0 |
| No. 62—सर्वमतसंग्रहः (Sarvamatasangraha). | 0 | 8 | 0 |
| No. 63—किरातार्जुनीयम् (Kâvya) by Bhâravi with the commentary Sabdârthadîpikâ of Chitrabhânu (1, 2 and 3 Sargas). | 2 | 8 | 0 |
| No. 64—मेघसन्देशः (Kâvya) by Kâlidâsa with the commentary Pradîpa of Dakshinâvartanâtha. | 1 | 0 | 0 |
| No. 65—मयमतम् (Silpa) by Mayamuni. | 3 | 8 | 0 |
| No. 66—महार्थमञ्जरी (Darsana) with the commentary Parimala of Maheswarânanda. | 2 | 8 | 0 |
| No. 67—तन्त्रसमुच्चयः (Tantra) by Nârâyana with the commentary Vimarsini of Sankara. (Part I. 1–6 Patalas) | 3 | 4 | 0 |
| No. 68—तत्त्वप्रकाशः (Agama) by Sri Bhojadeva with the commentary Tâtparyadîpikâ of Srî Kumâra. | 2 | 0 | 0 |
| No. 69—ईशानशिवगुरुदेवपद्धतिः (Tantra) by Isânasivagurudevamisra (Part I. Sâmânyapâda). | 1 | 8 | 0 |
| No. 70—आर्यमञ्जुश्रीमूलकल्पः (Part I). | 2 | 8 | 0 |
| No. 71—तन्त्रसमुच्चयः (Tantra) by Nârâyana with the commentary Vimarsini of Sankara (Part II. 7—12 Patalas). | 3 | 8 | 0 |
| No. 72—ईशानशिवगुरुदेवपद्धतिः (Tantra) by Isanasivagurudevamisra (Part II. Mantrapada) | 4 | 0 | 0 |
| No. 73—ईश्वरप्रतिपत्तिप्रकाशः (Vedanta) by Sri Madhusudanasarasvati | 0 | 4 | 0 |
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| RS. | AS. | P. | |
|---|---|---|---|
| No. 74— श्रीयाज्ञवल्क्यस्मृतिः (Dharmasâstra) with the commentary Bâlakrîdâ of Visvarûpâchârya. (Part I—Âchâra and Vyavahâra Adhyâyas) | 4 | 0 | 0 |
| No. 75—शिल्परत्नम् (Silpa) by Srîkumâra (Part I). | 3 | 4 | 0 |
| No. 76—आर्यमञ्जुश्रीमूलकल्पः (Part II). | 3 | 4 | 0 |
| No. 77—ईशानशिवगुरुदेवपद्धतिः by Isanasivagurudavamisra (Part III. Kriyapada 1—30 Patalas). | 3 | 4 | 0 |
| No. 78—आश्वलायनगृह्यसूत्रम् with the commentary Anavila of Haradattacharya. | 5 | 0 | 0 |
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- Manjusrimûlakalpa. (Part III.)
- Kâvyaprakâsa (Alankâra) with the commentary Sampradâyaprakâsinî of Srî Vidyâchakravartin and the Sâhityachûḍâmaṇi of Bhaṭṭagopâla.
- Îsânasivagurudevapaddhati (Tantra) by Îsânasivagurudevamisra. (Part IV. Kriyâpâda).
- Yâjñavalkyasmṛiti with the commentary Bâlakrîdâ of Visvarûpâchârya (Part II.) Prâyaschittâdhyâya.
- Nâtyaveda of Bharatamuni with the commentary Abhinavabhâratî of Abhinavaguptâchârya.
- Arthasâstra of Kautalya with commentary.
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- Âsvalâyanagṛihya with Devasvâmin's Bhâshya.
- Ashṭângahṛidaya (Vaidyaka) with the commentary Hṛidayabodika of Srîdâsa Paṇḍita.
- Sarasvatîkaṇṭhâbharaṇa (Vyâkaraṇa) of Bhoja with the Vṛitti of Nârâyaṇa.
- Vishṇusamhitâ (Âgama).
- Rasavaiseshika (Vaidyaka) with Bhashya.
- Slokavartika (Mîmâmsâ) with the Kâsikâtîka of Sucharitamiśra.
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