तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। कर्मदेव देवताओंके जो सौ आनन्द
हैं वही देवताओंका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त
है। देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही इन्द्रका एक आनन्द है ॥ ३ ॥
तथा वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। इन्द्रके जो सौ आनन्द हैं
वही बृहस्पतिका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी
प्राप्त है। बृहस्पतिके जो सौ आनन्द हैं वही प्रजापतिका एक आनन्द
है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। प्रजापतिके जो सौ
आनन्द हैं वही ब्रह्माका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको
भी प्राप्त है ॥ ४ ॥
भीषा भयेनास्माद्वातः पवते । इसकी भीति अर्थात् भयसे वायु
चलता है, इसीकी भीतिसे सूर्य
भीषोदेति सूर्यः
ब्रह्मानुशासनम् उदित होता है और इसके भयसे
भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च ही अग्नि, इन्द्र तथा पाँचवाँ¹ मृत्यु
मृत्युर्धावति पञ्चम इति । वाता- दौड़ता है । वायु आदि देवगण
परमपूजनीय और स्वयं समर्थ होने-
दयो हि महार्हाः स्वयमीश्वराः पर भी अत्यन्त श्रमसाध्य चलने
सन्तः पवनादिकार्येष्वनायासबहु- आदिके कार्यमें नियमानुसार प्रवृत्त
हो रहे हैं । यह बात उनका कोई
लेषु नियताः प्रवर्तन्ते । तद्युक्तं शासक होनेपर ही सम्भव है ।
प्रशास्तरि सति; यस्मान्नियमेन क्योंकि उनकी नियमसे प्रवृत्ति होती
है इसलिये उनके भयका कारण और
तेषां प्रवर्तनम् । तस्मादस्ति भय- उनपर शासन करनेवाला ब्रह्म है ।
कारणं तेषां प्रशास्तृ ब्रह्म । जिस प्रकार राजाके भयसे सेवक
लोग अपने-अपने कामोंमें लगे रहते
यतस्ते भृत्या इव राज्ञोऽस्मा- हैं उसी प्रकार वे इस ब्रह्मके भयसे
द्ब्रह्मणो भयेन प्रवर्तन्ते । तच्च प्रवृत्त होते हैं, वह उनके भयका
भयकारणमानन्दं ब्रह्म । कारण ब्रह्म आनन्दस्वरूप है ।
१. पूर्वोक्त वायु आदिके क्रमसे गणना किये जानेपर पाँचवाँ होनेके कारण मृत्युको पाँचवाँ कहा है ।
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
तस्यास्य ब्रह्मण आनन्दस्यैषा | उस इस ब्रह्मके आनन्दकी यह
ब्रह्मानन्दा-लोचनम् मीमांसा विचारणा | मीमांसा—विचारणा है । उस
भवति । किमान- | आनन्दकी क्या बात विचारणीय है,
न्दस्य मीमांस्यमित्युच्यते । | इसपर कहते हैं—‘क्या वह
किमानन्दो विषयविषयिसंबन्ध- | आनन्द लौकिक सुखकी भाँति
जनितो लौकिकानन्दवदाहोस्चित् | विषय और विषयको ग्रहण करने-
स्वाभाविक इत्येवमेषानन्दस्य | वालेके सम्बन्धसे होनेवाला है अथवा
स्वाभाविक ही है ?’ इस प्रकार यही
मीमांसा । | उस आनन्दकी मीमांसा है ।
तत्र लौकिक आनन्दो बाह्या- | उसमें जो लौकिक आनन्द बाह्य
ध्यात्मिकसाधनसंपत्तिनिमित्त | और शारीरिक साधन-सम्पत्तिके
कारण उत्कृष्ट गिना जाता है
उत्कृष्टः । स य एष निर्दिश्यते | ब्रह्मानन्दके ज्ञानके लिये यहाँ
ब्रह्मानन्दानुगमार्थम् । अनेन हि | उसीका निर्देश किया जाता है ।
प्रसिद्धेनानन्देन व्यावृत्तविषय- | इस प्रसिद्ध आनन्दके द्वारा ही
जिसकी बुद्धि विषयोंसे हटी हुई
बुद्धिगम्य आनन्दोऽनुगन्तुं | है उस ब्रह्मवेत्ताको अनुभव होनेवाले
शक्यते । | आनन्दका ज्ञान हो सकता है ।
लौकिकोऽप्यानन्दो ब्रह्मानन्द- | लौकिक आनन्द भी ब्रह्मानन्दका
स्यैव मात्रा अविद्या तिरस्क्रिय- | ही अंश है । अविद्यासे विज्ञानके
माणे विज्ञान उत्कृष्यमाणायां | तिरस्कृत हो जानेपर और अविद्याका
चाविद्यायां ब्रह्मादिभिः कर्म- | उत्कर्ष होनेपर प्राक्तन कर्मवश
विषयादि साधनोंके सम्बन्धसे ब्रह्मा
वशाद्यथाविज्ञानं विषयादिसा- | आदि जीवोंद्वारा अपने-अपने विज्ञाना-
धनसंबन्धवशाच्च विभाव्यमानश्च | नुसार भावना किया जानेके कारण
लोकेऽनवस्थितो लौकिकः संप- | ही वह लोकमें अस्थिर और लौकिक