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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
यस्मादनात्म्यं तस्मादनिरुक्तम् । | अशरीर है इसलिये अनिरुक्त है ।
विशेषो हि निरुच्यते विशेषश्च | निरूपण विशेषका ही किया जाता
विकारः । अविकारं च ब्रह्म, | है और विशेष विकार ही होता है;
सर्वविकारहेतुत्वात्तस्मादनिरुक्तम्। | किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण विकारका कारण
यत एवं तस्मादनिलयनं | होनेसे स्वयं अविकार ही है, इसलिये
निलयनं नीड आश्रयो न | वह अनिरुक्त है । क्योंकि ऐसा है
इसलिये वह अनिलयन है; निलयन
निलयनमनिलयनमनाधारं तस्मि- | आश्रयको कहते हैं; जिसका निलयन
न्नेतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते- | न हो वह अनिलयन यानी अनाश्रय
ऽनिलयने सर्वकार्यधर्मविलक्षणे | है । उस इस अदृश्य, अनात्म्य,
ब्रह्मणीति वाक्यार्थः । अभयमिति | अनिरुक्त और अनिलयन अर्थात्
क्रियाविशेषणम् । अभयामिति वा | सम्पूर्ण कार्यधर्मोंसे विलक्षण ब्रह्ममें
लिङ्गान्तरं परिणम्यते । प्रतिष्ठां | अभय प्रतिष्ठा-स्थिति यानी आत्म-
स्थितिमात्मभावं विन्दते लभते । | भावको प्राप्त करता है । उस समय
अथ तदा स तस्मिन्नानात्वस्य | उसमें भयके हेतुभूत नानात्वको न
देखनेके कारण अभयको प्राप्त हो
भयहेतोरविद्याकृतस्यादर्शनाद- | जाता है । मूलमें 'अभयम्' यह
भयं गतो भवति । | क्रियाविशेषण है* अथवा इसे
| 'अभयाम्' इस प्रकार अन्य (स्त्री)
| लिङ्गके रूपमें परिणत कर लेना
| चाहिये ।
स्वरूपप्रतिष्ठो ह्यसौ यदा | जिस समय यह अपने स्वरूपमें
भवति तदा नान्यत्पश्यति ना- | स्थित हो जाता है उस समय यह

  • अर्थात् अभयरूपसे प्रतिष्ठा-स्थिति यानी आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri