तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
त्ताद्यपेक्षत्वम् । किं तर्हि स्वात्म- | नहीं होती । तो ब्रह्मकी कामनाएँ
| कैसी होती हैं ? वे स्वात्मासे
नोऽनन्याः । | अभिन्न होती हैं ।
तदेतदाह सोऽकामयत स | उसीके विषयमें श्रुति कहती है—
ब्रह्मणो आत्मायस्मादाकाशः | उसने कामना की—उस आत्माने,
बहुभवनसङ्कल्पः संभूतोऽकामयत | जिससे कि आकाश उत्पन्न हुआ
| है, कामना की । किस प्रकार
कामितवान् । कथम् ? बहु स्यां | कामना की ? मैं बहुत-अधिक
बहु प्रभूतं स्यां भवेयम् । कथमे- | रूपमें हो जाऊँ। अन्य पदार्थमें प्रवेश
| किये बिना ही एक वस्तुकी बहुलता
कस्यार्थान्तराननुप्रवेशे बहुत्वं | कैसे हो सकती है ? इसपर कहते
स्यादित्युच्यते । प्रजायेयोत्पद्येय । | हैं—'प्रजायेय' अर्थात् उत्पन्न होऊँ ।
न हि पुत्रोत्पत्त्येवार्थान्तरविषयं | यह ब्रह्मका बहुत होना पुत्रकी
| उत्पत्तिके समान अन्य वस्तुविषयक
बहुभवनम्, कथं तर्हि ? आत्म- | नहीं है । तो फिर कैसा है ? अपने-
स्थानाभिव्यक्तनामरूपाभिव्य- | में अव्यक्तरूपसे स्थित नाम-रूपोंकी
| अभिव्यक्तिके द्वारा ही [ यह अनेक
क्त्या । यदात्मस्थे अनभि- | रूप होना है ] । जिस समय
व्यक्ते नामरूपे व्याक्रियेते तदा | आत्मामें स्थित अव्यक्त नाम और
नामरूपे आत्मस्वरूपापरित्यागे- | रूपोंको व्यक्त किया जाता है उस
| समय वे अपने स्वरूपका त्याग किये
नैव ब्रह्मणाप्रविभक्तदेशकाले | बिना ही समस्त अवस्थाओंमें ब्रह्मसे
सर्वावस्थासु व्याक्रियेते तदा | अभिन्न देश और कालमें ही व्यक्त
| किये जाते हैं । यह नाम-रूपका
तन्नामरूपव्याकरणं ब्रह्मणो बहु- | व्यक्त करना ही ब्रह्मका बहुत होना
भवनम् । नान्यथा निरवयवस्य | है । इसके सिवा और किसी प्रकार
| निरवयव ब्रह्मका बहुत अथवा अल्प
ब्रह्मणो बहुत्वपत्तिरुपपद्यतेऽल्प- | होना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
त्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहु- | कि आकाशका अल्पत्व और बहुत्व
| भी अन्य वस्तुके ही अधीन है
त्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्त- | [उसी प्रकार ब्रह्मका भी है] । अतः
| उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म
द्द्वारेणैवात्मा बहु भवति । | बहुत हो जाता है ।
न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं | आत्मासे भिन्न अनात्मभूत, तथा
| उससे भिन्न देश-कालमें रहनेवाली
तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यव- | कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली),
| दूरस्थ, अथवा भूत, वर्तमान या भविष्यकालीन
हितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा | वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण
वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे | अवस्थाओंसे सम्बन्धित नाम और
सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न | रूप ब्रह्मसे ही आत्मवान् हैं, किन्तु
ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्या- | ब्रह्म तद्रूप नहीं है । ब्रह्मका निषेध
ख्याने न स्त एवेति तदात्मके | करनेपर वे रह ही नहीं सकते,
| इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन
उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां | उपाधियोंसे ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और
| ज्ञान-इन शब्दोंका तथा इनके अर्थ
ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसं- | आदि सब प्रकारके व्यवहारका पात्र
व्यवहारभाग्ब्रह्म । | बनता है ।
स आत्मैवंकामः संस्तपो- | उस आत्माने ऐसी कामनावाला
ऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । | होकर तप किया । 'तप' शब्दसे
| यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि
“यस्य ज्ञानमयं तपः” ( मु० उ० | “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य
१ । १ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । | श्रुतिसे सिद्ध होता है । आप्तकाम
| होनेके कारण आत्माके लिये अन्य
आप्तकामताच्चेतरस्यासंभव एव | तप तो असम्भव ही हैं । 'उसने
तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । | तप किया' इसका तात्पर्य यह है
तै० उ० २१-२२-
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