तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
कथं पुनः सर्वानन्यत्वं ब्रह्मण
[ब्रह्मणः सर्वात्म्यं निरूप्यते] इत्युच्यते—सर्व-
वस्तुकारणत्वात् ।
सर्वेषां हि वस्तूनां कालाकाशा-
दीनां कारणं ब्रह्म । कार्यापेक्षया
वस्तुतोऽन्तवत्त्वमिति चेन्न;
अनृतत्वात्कार्यवस्तुनः । न हि
कारणव्यतिरेकेण कार्यं नाम
वस्तुतोऽस्ति यतः कारणबुद्धि-
र्विनिवर्तेत । “वाचारम्भणं वि-
कारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव
सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ ।
४) एवं सदेव सत्यमिति श्रुत्य-
न्तरात् ।
तस्मादाकाशादिकारणत्वाद्दे-
शतस्तावदनन्तं ब्रह्म । आकाशो
ह्यनन्त इति प्रसिद्धं देशतः,
तस्येदं कारणं तस्मात्सिद्धं देशत
आत्मन आनन्त्यम् । न ह्यसर्व-
गतात्सर्वगतमुत्पद्यमानं लोके
किंचिद् दृश्यते । अतो निरति-
शयमात्मन आनन्त्यं देशतस्तथा-
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
किन्तु ब्रह्मकी सबसे अभिन्नता किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं—
क्योंकि वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कारण है—ब्रह्म काल-आकाश आदि
सभी वस्तुओंका कारण है । यदि कहो कि अपने कार्यकी अपेक्षासे
तो उसका वस्तुसे अन्तवत्त्व हो ही जायगा, तो ऐसा कहना
ठीक नहीं; क्योंकि कार्यरूप वस्तु तो मिथ्या है—वस्तुतः कारणसे भिन्न
कार्य है ही नहीं जिससे कि कारणबुद्धिकी निवृत्ति हो “वाणीसे आरम्भ
होनेवाला विकार केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इसी
प्रकार “सत् ही सत्य है”—ऐसा एक अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध होता है ।
अतः आकाशादिका कारण होनेसे ब्रह्म देशसे भी अनन्त है ।
आकाश देशतः अनन्त है—यह तो प्रसिद्ध ही है, और यह उसका
कारण है; अतः आत्माका देशतः अनन्तत्व सिद्ध ही है; क्योंकि
लोकमें असर्वगत वस्तुसे कोई सर्वगत वस्तु उत्पन्न होती नहीं देखी जाती ।
इसलिये आत्माका देशतः अनन्तत्व निरतिशय है [ अर्थात् उससे बड़ा
और कोई नहीं है ] । इसी प्रकार
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९
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कार्यत्वात्कालतः, तद्भिन्नवस्त्व- | किसीका कार्य न होनेके कारण वह
| कालतः और उससे भिन्न पदार्थका
न्तराभावाच्च वस्तुतः । अत एव | सर्वथा अभाव होनेके कारण वस्तुतः
| भी अनन्त है । इसलिये आत्माका
निरतिशयसत्यत्वम् । | सबसे बढ़कर सत्यत्व है । *
|
तस्मादिति मूलवाक्यसूत्रितं | [ मन्त्रमें ] 'तस्मात्' ( उससे )
ब्रह्म परामृश्यते । | इस पदद्वारा मूलवाक्यमेंसे सूत्र-
सृष्टिक्रमः | रूपसे कहे हुए 'ब्रह्म' पदका
एतस्मादितिमन्त्र- | परामर्श किया जाता है । तथा इसके
| अनन्तर 'एतस्मात्' इत्यादि मन्त्र-
वाक्येनानन्तरं यथालक्षितम् । | वाक्यसे भी पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्मका ही
| उल्लेख किया गया है । [ तात्पर्य यह
यद्ब्रह्मादौ ब्राह्मणवाक्येन सूत्रितं | है— ] जिस ब्रह्मका पहले ब्राह्मण-
| वाक्यद्वारा सूत्ररूपसे उल्लेख किया
यच्च सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्य- | गया है और जो उसके पश्चात्
| 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस प्रकार
नन्तरमेव लक्षितं तस्मादेतस्मा- | लक्षित किया गया है उस इस ब्रह्म
| —आत्मासे, अर्थात् 'आत्मा' शब्द-
द्व्रह्मण आत्मन आत्म- | वाच्य ब्रह्मसे—क्योंकि “तत् सत्यं स
| आत्मा” इत्यादि एक अन्य श्रुतिके
शब्दवाच्यात् । आत्मा हि | अनुसार वह सबका आत्मा है; अतः
तत्सर्वस्य “तत्सत्यं स आत्मा” | यहाँ ब्रह्म ही आत्मा है—उस इस
( छा० उ० ६ । ८–१६ ) इति | आत्मस्वरूप ब्रह्मसे आकाश संभूत—
श्रुत्यन्तरादतो ब्रह्मात्मा । तस्मा- | उत्पन्न हुआ ।
देतस्माद्ब्रह्मण आत्मस्वरूपादाका- |
शः संभूतः समुत्पन्नः । |
आकाशो नाम शब्दगुणोऽव- | जो शब्द-गुणवाला और समस्त
| मूर्त्त पदार्थोंको अवकाश देनेवाला है
काशकरो मूर्तद्रव्याणाम् । तस्माद् | उसे 'आकाश' कहते हैं । उस
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- क्योंकि जो वस्तु अनन्त होती है वही सत्य होती है, परिच्छिन्न पदार्थ कभी सत्य नहीं हो सकता ।
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