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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

३५२ [ २७.२१६

एतम्पि दिस्वा यह बात भी देखकर मरुविरिय रोद्ध नरो में श्रेष्ठ-वीर्य्यं ।
उत्तसवीर्य्यं राजवर ! वाचं पमुञ्चे कुसलं नातियेतं सत्यादि से युक्त कुशल
वाणी ही पण्डित आदमी बोले; वह भी हियाकर समयानुकूल । समय (की
सीमा) लांघ कर असीम वाणी न बोले। पस्ससि प्रत्यक्ष देखना है बहुभानेन
अधिक बोलने से कच्छपं व्यसनं गतं, यह कछुआ मर गया ।


'राजा ने 'मेरे लिए यह कहा है' सोच पूछा—पण्डित ! मेरे बारे में कह
रहा है ?
बोधिसत्त्व—महाराज ! चाहे आप हो, चाहे कोई और हो, जो कोई
सीमा लांघ कर बोलता है वह इसी प्रकार दु ख भोगता है। यह स्पष्ट करके
कहा ।
उस समय से राजा संयम कर मितभाषी हो गया । शास्ता ने यह धर्म-
देशना ला जातक का मेल बैठाया ।
उस समय कछुवा कोकालिक था। दो हंस-बच्चे दो महास्थविर ।
राजा आनन्द । अमात्य पण्डित तो मैं ही था।

२१६. मच्छ जातक¹
"न मायमग्गि तपित " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
पूर्व-भार्या के आकर्षण के बारे में कही।


¹देखो मच्छ जातक (१. ४. ३४)

क. वर्तमान कथा

' मच्छ ] ३५३
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उसे पूछा—भिक्षु ! क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “भन्ते,
सचमुच” कहने पर शास्ता ने पूछा—“किसने उत्कण्ठित किया ?” जवाब
दिया—पूर्व-भार्या ने । शास्ता ने “भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अनर्थ करने वाली
है। पहले भी तू इसके कारण कांटे से बींधा जाकर, अङ्गारो पर पकाया जाकर
खाया जाने वाला था। पण्डित की सहायता से जान बची” कह पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसके पुरोहित हुए। एक दिन मछुए जाल में फँसे मच्छ को निकाल कर,
गर्म-बालू पर डाल, ‘उसे अङ्गारो में पकाकर खाएँगे’ सोच शूल तराशने लगे।
मच्छ ने मछली के बारे में रोने हुए यह गाथा कही—
न मायमग्गि तपति न सूलो साधु तच्छितो,
यञ्च मं मञ्जति मच्छी अञ्ज सो रतिया गतो ॥
सो मं दहति रागग्गि चित्तं बूपतपेति मं,
जालिनो मुञ्चयथिरं मं न कामे हञ्जते क्वचि ॥
[न मुझे, अग्नि तपाती है, न अच्छी तरह से छीला हुआ शूल ही। यह जो
मुझे मछली समझेगी कि रति के कारण यह दूसरी मछली के पास चला गया—
इसीका मुझे शोक है। मुझे वह रागाग्नि जला रही है। मेर चित्त को तपाती
है। हे मछुओ, मुझे छोड़ दो। कामी कही नही मारा जाता ।]
न मायमग्गि तपति, न मुझे यह आग जलाती है, न तपाती है, अर्थ है
शोक नही है। न सूलो यह शूल भी साधुतच्छितो न मुझे ताप देता है, न
शोक उत्पन्न करता है। यञ्च मं मञ्जति, जो मुझे मछली ऐसा कहेगी कि
वह पञ्च कामगुणो से प्रेरित हो दूसरी मछली के पास चला गया, यही मुझे
तपाता है, यही शोक उत्पन्न करता है।
२३

३५४ [ २.७२१७
सो मं दहति, जो यह रागाग्नि है यह मुझे जलाती है। चित्तं धूपतपेति मं,
रागयुक्त मेरा चित्त ही मुझे तपाता है, कष्ट देता है, पीडा देता है। जासिनो
कैवर्त्तो (मछुओ) को सम्बोधन करता हूँ। यह जाल के अर्थी होने से जासिनो
कहलाते हैं। मुञ्चययिरा मं, स्वामी मुझे छोड़ दें, यही याचना करता हूँ
न कामे हञ्ञते क्वचि, काम मे प्रतिष्ठित, काम में बहता हुआ प्राणी कहीं नहीं
मारा जाता; तुम्हारे जैसो को उसे मारना योग्य नहीं। अथवा कामे हेतु के
अर्थ में सप्तमी का प्रयोग है। काम-हेतु से मछली के पीछे पीछे चलने वाला
वही भी तुम्हारे जैसो से नहीं मारा जाता।
उसी समय बोधिसत्त्व ने नदी किनारे जा उस मच्छ का रोना सुन, मछुओ
के पास पहुँच उस मच्छ को छुड़ाया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल
में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय मछली पूर्व-भार्या थी। उत्कण्ठित भिक्षु मच्छ था। पुरोहित
मैं ही था।
२१७. सेग्गु जातक
“सब्बो लोको....” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक
तरकारी बेचन वाले उपासक के बारे मे कही।

क. वर्तमान कथा

सेग्गु ] ३५५
क. वर्तमान कथा
यह कथा पहले परिच्छेद में आ ही चुकी है।१ इस कथा में शास्ता ने
पूछा—उपासक ! क्यो देर करके आया है ?
"भन्ते ! मेरी लडकी सदैव हँसमुख रहती थी। मैने उसकी परीक्षा कर
उसे एक तरुण को दिया।" सो यह करने से आपके दर्शन के लिए आने का
समय नहीं मिला।"
"उपासक ! वह अब ही सदाचारिणी नही है। पहले भी सदाचारिणी
थी। तूने न केवल अभी उसकी परीक्षा की है, पहले भी की ही थी।"
इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वं काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
वृक्ष-देवता हुए। उस समय उसी तरकारी बेचने वाले उपासक ने लडकी की
'परीक्षा करने के लिए' उसे जगल में ले जा काम-भोग चाहने वाले की
तरह उसे हाथ से पकडा। वह रोने लगी। उसे यह पहली गाथा कही—
सब्बो लोको अत्तमना अहॉसि,
अकोविदा गामधम्मस्स सेग्गु ॥
कोमारि कोनाम तवज्ज धम्मो,
य त्व गहिता पवने परोदसि ॥
[ सारा लोक (इससे) आनन्दित (होता) है। सेग्गु तू इस ग्राम्य-धर्म
से अपरिचित है। कुमारी ! यह तेरा क्या धर्म है कि तू बन मे पकडने पर
रोती है। ]
सव्यो लोको अत्तमना अहॉसि, धम्म ! सारे प्राणी इस कामभोग के
१ पण्णिक जातक (१०२)

३५६ [ २७.२१७
सेवन से सन्तुष्ट (होते) हैं। अकोविदो गामधम्मस्स सेग्गु, सेग्गु, उसका नाम
है। सो धम्म सेग्गु । तू इस ग्राम्य धर्म में, इस चाण्डाल-कर्म में दक्ष नही है।
कोमारि को नाम सवज्ज धम्मो, धम्म कुमारी । यह आज तेरा क्या स्वभाव
है ? य त्व गहिता पवने परोदसि, जो तू मेरे द्वारा इस वन में कामभोग के लिए
पकड़ी जाने पर रोती है। स्वीकार नहीं करती। यह तेरा क्या स्वभाव है ?
क्या तू कुमारी ही है ? —पूछता है।
इसे सुन कुमारी ने कहा—हाँ तात ! मैं कुमारी ही हूँ। मैं मैथुन धर्म को
नहीं जानती हूँ। ऐसा कह, रोती हुई दूसरी गाथा बोली—
यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताणं,
सो मे पिता दूभि वने करोति ॥
सर कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे,
यो तायिता सो सहसा करोति ॥
अर्थ उपरोक्त प्रकार¹ से ही है।
तब वह तरकारी बेचने वाला उस लड़की की परीक्षा कर, घर ले जा,
तरुण को दे यथा-कर्म सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन कर जातक का मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर तरकारी बेचने वाला श्रोतापत्ति फल में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय लड़की (अब की) लड़की ही थी। पिता पिता ही हुआ।
उस बात को प्रत्यक्ष करने वाला वृक्ष देवता मैं ही था।
¹पण्णिक जातक (१०२)

२१८. कूटवाणिज जातक

कूटवाणिज ] ३५७
२१८. कूटवाणिज जातक
"साठस्स साठेय्यमिद...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक कूट व्यापारी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कूट व्यापारी और पण्डित व्यापारी दो श्रावस्तीनिवासी व्यापारियों ने
साझा व्यापार करना आरम्भ करके, सामान की पाँच सौ गाड़ियाँ भरीं।
ये पूर्व से पश्चिम घूमते हुए व्यापार कर बहुत मुनाफा कमा श्रावस्ती लौटे।
पण्डित व्यापारी ने कूट व्यापारी को कहा—दोस्त ! सामान बाँट लें।
कूट व्यापारी ने सोचा—यह बहुत दिनों तक आराम से सोना तथा अच्छा
भोजन न मिलने के कारण थका हुआ अपने घर जाकर नाना प्रकार के अच्छे
अच्छे भोजा खाएगा, बदहजमी से मरेगा। तब यह सारा सामान मेरा ही
हो जाएगा। इस लिए वह 'आज नक्षत्र अच्छा नहीं, कल देगें', 'आज दिन
अच्छा नहीं, कल देंगे' करता हुआ समय बिताने लगा।
पण्डित व्यापारी ने उसे मजबूर कर सामान बँटवाया। फिर गन्धमाला
से शास्ता के पास जा, पूजा-वन्दना कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा—
कब आया ?
"भन्ते ! मुझे आए आधा महीना हुआ।"
"तो इस प्रकार देर करके क्यो बुद्ध की सेवा में आया है ?"
उसने यह हाल कहा। शास्ता ने 'उपासक ! यह केवल अभी ठग
व्यापारी नहीं है, पहले भी ठग व्यापारी ही था' कह उसके प्रार्थना करने पर
पूर्व-जन्म की कथा कही—

कूटवाणिज ] ३५१

बोधिसत्त्व ने दूसरे से पूछा—
“क्या यह सच है ?”
"स्वामी ! मैं उसे लेकर गया। चिड़िया के उसे ले जाने की बात सच
ही है।”
“क्या इस दुनिया में चिड़ियाँ बच्चो को ले जाती हैं ?”
“स्वामी ! मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ कि चिड़ियाँ तो बच्चों को
लेकर आकाश में नहीं उड़ सकती, तो क्या चूहे लोहे के फाल खा सकते हैं ?”
“इसका क्या मतलब है ?”
“स्वामी ! मैंने इसके घर में पाँच सौ फाल रक्खे। यह कहता है कि तेरे
फालो को चूहे खा गए और ‘यह तेरे फालो को खाने वाले चूहों की मेंगनी है’
वह मेंगनी दिखाता है। स्वामी ! यदि चूहे फालें खाते हैं, तो चिड़ियाँ भी
बच्चे ले जाती हैं। यदि नहीं खाते हैं, तो बाज तब भी नहीं ले जा सकते हैं।
यह कहता है कि तेरे फाला को चूहं खा गए। उन्होंने खाए, या नहीं खाए—
इसकी परीक्षा करें। मेरे मुकदमे का फैसला करें।”
बोधिसत्त्व ने सोचा—इसने शठ के प्रति शठता का व्यवहार करके जीतने
की बात सोची होगी। उसने कहा—तूने ठीक सोचा है। और यह गाथा
कही—
सठस्स साठेय्यमिदं सुचिन्तित,
पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट ।
फालञ्चे खादेय्यु मूसिका,
कस्मा कुमारं कुलला नो हरेय्यु ॥
कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा,
भवति चापि निकतिनो निकत्या ।
देहि पुत्तकट्ठ फालनट्ठस्स फाल,
मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो ॥
[ शठ के प्रति शठता, यह अच्छा सोचा है। कुटिल के प्रति कुटिलता
का जाल फैलाया है। यदि चूहे फाल खा जाएँगे, तो चिड़ियाँ बच्चे को क्यों
नहीं ले जाएँगी।

कुटिल के प्रति कुटिलता का व्यवहार करने वाले हैं। ठग को भी ठगने
वाले होते हैं। हे पुत्र-नष्ट ! जिसकी फाल खोई गई है उसकी फाल दे। तेरे
पुत्र को जिसकी फाल नष्ट हुई है, वह न ले जाए।]
सठस्स, शठता से, धोखे से कोई ढंग निकाल कर दूसरे का माल खाना
चाहिए, ऐसा समझने वाले शठ के प्रति। साठेय्यमिवं सुचिन्तितं, जो यह
शठता का व्यवहार सोचा है, सो तूने ठीक सोचा है। पच्चोड्डितं पतिकूटस्स
कूट, कुटिल आदमी के प्रति तूने कुटिलता का जाल ठीक फैलाया, उसकी चाल
का जवाब दे जाल फैलाने सा ही किया—यही अर्थ है। फालञ्चे अदेय्युं
मूसिका, यदि चूहे फाल खाएं। कस्मा कुमारं कुळला नो हरेय्युं, जब चूहे फाल
खा जाते हैं तो चिड़ियां क्यो बच्चो को नही ले जाएँगी ?
कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा, तू समझता है कि मै ही चूहो को फाल खिला
देने वाला कुटिल पुरुष हूँ; तेरे जैसे कुटिल पुरुष के साथ कुटिलता करने वाले
इस लोक मे बहुत कुटिल है। कुटिल के (भी) कुटिल यह कुटिल के प्रति
कुटिलता करने वालो का नाम है। यही कहा गया है कि कुटिल के प्रति कुटि-
लता करने वाले है। भवन्ति चापि निकतिनो निकत्या, ठगने वाले को ठगने वाला
भी दूसरा आदमी होता है। देहि पुत्तनट्ठ फालनट्ठस्स फालं, भो पुत्र नष्ट-पुरुष !
जिसकी फाल नष्ट हुई है उसकी फाल दे। मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो, यदि
इसकी फाल नही देगा, तो यह तेरे पुत्र को ले जाएगा। जिससे यह न ले जाए,
इसलिए इसकी फाल दे।
“स्वामी ! मैं इसकी फाल देता हूँ। यदि यह मेरा पुत्र दे।"
“स्वामी ! मैं देता हूँ यदि यह मेरे फाल दे।”
इस प्रकार जिसका पुत्र खोया गया था उसने पुत्र पाया। जिसकी फाल
खोई गई थी उसने फाल पाई। दोनो कर्मानुसार गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना सुना जातक का मेल बैठाया। उस समय का
कुटिल व्यापारी ही कुटिल व्यापारी था। पण्डित व्यापारी ही पण्डित
व्यापारी था।
मुकद्दमा फैसला करने वाला अमात्य मैं ही था।

२१६. गरहित जातक

गरहित ] ३६१
२१६. गरहित जातक
“हिरञ्ञम्मे सुवण्णम्मे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक भिक्षु के बारे में कही, जिसका मन बुद्ध-शासन में नहीं था, जो
उत्कण्ठित था।
क. वर्तमान कथा
इस (भिक्षु) का ध्यान किसी भी बात मे एकाग्र नही होता था। इस
अन्यमनस्क हो जीवन बिताते हुए को शास्ता के पास लाए। शास्ता ने पूछा—
क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“हाँ, सचमुच ।”
“किस कारण से ।”
“कामासक्ति के कारण ।”
“भिक्षु, कामासक्ति की पूर्व समय में पशुओ ने भी निन्दा की है। तू
इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित हो, जिन कामभोगो की पशुओ तक ने निन्दा
की है, उनके कारण क्यो उत्कण्ठित हुआ है ?”
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हिमालय में बानर की योनि में पैदा हुए।
एक बनचर ने उसे पकड लाकर राजा को दिया। वह चिरकाल तक
राजभवन में रहने के कारण सभ्यता सीख गया। राजा ने उसके सभ्य-व्यवहार
से प्रसन्न हो बनचर को बुलाकर आज्ञा दी—इस बानर को जहाँ से पकड़ा है,
वही छोड़ आओ। उसने वैसा ही किया।

३६२ [ २.७.२१६
बानरो ने जब सुना कि बोधिसत्त्व आया है, तो उसे देखने के लिए महान्
शिला-तल पर इकट्ठे हुए। उन्होने बोधिसत्त्व से कुशल-समाचार की बात
कर पूछा—"मित्र, इतने दिन तक कहाँ रहे ?"
"वाराणसी मे, राजभवन में।"
"कैसे छूटे ?"
"राजा ने मुझे खेल करने वाला बन्दर बना, मेरे करतबो से प्रसन्न हो
मुझे छोड दिया।"
"आप मनुष्य लोको का बरताव जानते हैं। हमें भी कहें। हम सुनना
चाहते हैं।"
"मनुष्यो की करनी मुझसे मत पूछो।"
"कहें। हम सुनना चाहते हैं।"
बोधिसत्व ने, "मनुष्य चाहे क्षत्रिय हो, चाहे ब्राह्मण हो, सभी मेरा मेरा
करते हैं। वस्तुएँ अस्तित्व में आकर विनष्ट हो जाती हैं, इस अनित्यता को वे
नही जानते। अब उन अन्धे मूर्खों की बात सुनो" कह यह गाथाएँ कही—
हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे ऐसा रत्तिन्दिवा कथा,
दुम्मेधानं मनुस्सानं अरियधम्मं अपस्सतं ॥
द्वे द्वे गहपतयो गेहे एको तत्थ अमस्सुको,
लम्बत्थनो वेणिकतो अथो अङ्कितकण्णको;
कीतो धनेन बहुना सो तं वितुदते जनं ॥
[ प्रार्यधर्म को न जानने वाले मूर्ख मनुष्य दिन रात यही बातचीत करते
रहते हैं—मेरा हिरण्य, मेरा सोना।
घर में दो दो जने रहते हैं। एक को मूंछ नही होती। उसके लम्बे
स्तन होते हैं, वेणि होती है और कानो में छेद होते हैं। उसे बहुत धन से खरीदा
होता है। वह सब जनो को कष्ट देता है।]
हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे, यह दीपकमात्र है। इन दो पदो से दसो तरह के
रत्न, अगली-पिछली फसल, सब द्विपद तथा चतुष्पदो का ग्रहण कर 'यह मेरा
यह मेरा' कहा गया है। ऐसा रत्तिन्दिवा कथा, मनुष्य-लोग रात दिन यही

गरहित ] ३६३
बातचीत करते रहते हैं। ये पञ्च स्कन्ध अनित्य हैं, उत्पन्न होकर विनष्ट
हो जाते हैं आदि नहीं जानते हैं। इस प्रकार राने हुए भटकते हैं। दुम्मेधानं
अज्ञानियों की अरियधम्म अपस्सतं, बुद्धादि आर्य्यों के धर्म को न देखते हुए
लोगो की अथवा नौ प्रकार के निर्दोष लोकोत्तर आर्य धर्म¹ को न देखते हुए
लोगों की यही बातचीत होती है, अन्य अनित्यता या दुख की बातचीत उनकी
नहीं होती।
गहपतयो घर के मालिक। एको तत्थ उन दो घर के मालिकों में से एक
अर्थात् स्त्री। वेणिकतो कृतवेणि, नाना प्रकार से जिसने अपने बालों को
क्रम से गठिया रक्खा है। अथो भञ्जितकण्णको, वह ही बिंधे हुए कानो वाला,
या छिदे हुए कानो वाला। लम्बे कानो के बारे में कहा। कीतो धनेन बहुना,
यह मूछ विरहित, लम्बे स्तन वाला, वेणियारी, छिदे कान वाला माना पिता
को बहुत धन देकर खरीदा गया, सजा कर, गहने पहना कर, गाडी में बिठा
बडी शान-शौकत से घर में लाया गया। सो तं वितुदते जन, यह गृहस्वामी
(स्वामिनी) जिस समय रो आता है उस समय से दासो, मजदूरा आदि को
'अरे दुष्ट दास यह नहीं करता है, अरी दुष्ट दासी यह नहीं करती हैं' आदि
वचन-रूपी मुखशक्ति से बीधता है। स्वामी की तरह से व्यवहार करता है।
इस प्रकार मनुष्यलोक में बहुत अनुचित है—मनुष्यलोक की निन्दा की।
यह सुन सभी बन्दरो ने दोनो हाथो से अपने कान जोर से बन्द कर लिए—
मत कहें। मत कहे। न सुनने योग्य बात हमने सुनी। इस स्थान पर हमने
अनुचित बात सुनी। इसलिए उस स्थान की भी निन्दा कर अन्यत्र चले गए।
उस पाषाण-शिला का नाम निन्दित-पाषाण शिला हो गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया।
सत्यों के प्रकाशन के अन्त में वह भिक्षु सोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय के बानर-गण बुद्ध परिषद थी। बानरेन्द्र तो मैं ही था।
¹ चार लोकोत्तर मार्ग + चार लोकोत्तर फल + निर्वाण ।

१२०. धम्मद्ध जातक

३६४ [ २७.२२०
१२०. धम्मद्ध जातक
“सुख जीवितरुप्पोसि,....” यह शास्ता ने वेणुवन में विहार करते
समय बध का प्रयत्न करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने ‘भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने मेरे बध के लिए प्रयत्न
किया है, पहले भी किया है, लेकिन त्रासमात्र भी पैदा नहीं कर सका’ कह
पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में बाराणसी में पायासिपाणी नामका राजा राज्य करता था।
काळक नाम का उसका सेनापति था। उस समय बोधिसत्त्व उसीके पुरोहित
थे। नाम था धम्मध्वज। राजा के सिर को अलङ्कृत करने वाले नाई का
नाम था छत्तपाणी।
राजा धर्म-पूर्वक राज्य करता था, लेकिन उसका सेनापति मुकद्दमा का
फैसला करता हुआ रिश्वत खाता था। चुगल-खोर रिश्वत लेकर स्वामी को
अस्वामी कर देता था।
एक दिन मुकद्दमे में हारे हुए आदमी ने बाहें पकड कर रोते हुए, अदालत
से निकल राज-सेवा में जात हुए बोधिसत्त्व को देखा। उसने उसके पाँव में
गिरकर कहा—‘स्वामी ! तुम्हारे सदृश राजा के अर्थधर्मानुशासक के होते हुए
काळक सेनापति रिश्वत लेकर अस्वामी को स्वामी बना देता है, और अपने
मुकद्दमे हारने की बात कही।

धम्मट्ठ ] ३६५
बोधिसत्त्व ने मन में करुणा का भाव ला कर कहा—अरे, आ तेरे मुकद्दमे
का फैसला करूँगा। यह उसे लेकर मुकद्दमे की जगह गए। जन-समूह इकट्ठा
हो गया। बोधिसत्त्व ने उस मुकद्दमे के फैसले को उलटते हुए फिर स्वामी
को ही स्वामी बना दिया। जन-समूह ने 'वाह वाह' की। बडा शोर हुआ।
राजा ने सुनकर पूछा—यह क्या आवाज है ?
'देव ! धर्मध्वज पण्डित ने एक ऐसे मुकद्दमे का जिसका ठीक फैसला
नहीं हुआ था, ठीक फैसला किया है। उसीमें यह 'वाह वाह' हो रही है।"
राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को बुलाकर पूछा—'आचार्य ! तुमने
मुकद्दमे का फैसला किया ?
'हाँ महाराज ! काळक ने जिस मुकद्दमे का ठीक फैसला नहीं किया,
उसका फैसला किया।"
"अब से तुम ही मुकद्दमे का फैसला किया करो। मेरे कानो को सुख
मिलेगा। जनता की उन्नति होगी।"
उसके इच्छा न करने पर भी राजा ने 'प्राणियो पर दया करने के लिए
न्याय की गद्दी पर बैठें' प्रार्थना कर राजी किया। तब से बोधिसत्त्व न्याय
की गद्दी पर बैठने लगे। स्वामी को ही स्वामी बनाते।
उसके बाद से जब काळक को रिशवत न मिलने के कारण लाभ की हानि
हुई तो उसने "महाराज ! धर्मध्वज पण्डित आपका राज्य चाहता है" कह
राजा और बोधिसत्त्व में भेद पैदा करने की कोशिश की।
राजा ने अविश्वास करते हुए मना किया—ऐसा मत कहो। वह बोला—
यदि मेरा विश्वास नहीं करते तो उसके आने के समय झरोखे से देखें। तब
देखेंगे कि इसने सारे नगर को अपने हाथ में कर लिया है। राजा ने उसके
पास मुकद्दमे के लिए आए लोगो को उसीके आदमी समझ विश्वास कर पूछा—
सेनापति ! क्या करें।
"देव ! इसे मार डालना चाहिए।"
"कोई बडा दोष दिखाई न देने पर कैसे मारें ?"
"एक उपाय है।"
"कौन सा उपाय ?"

३६६ [ २.७.२२०
"इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने
पर, उस दोष पर दोषी बता मारेंगे।"
"कौन सा असम्भव कार्य्य ।"
"महाराज, खरगेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान तो चार
साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाओ। यह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध
के कारण मार देंगे।"
राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—'पण्डित ! पुराने उद्यान में हम
बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाएं। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।"
बोधिसत्त्व समझ गए कि कालक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा
को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो दूंगा" कह कर
जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो
गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने
जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश में खड़े हो पूछा—पण्डित
क्या चिन्ता कर रहे हो ?
"तू कौन है ?"
"मैं शक्र हूँ।"
"राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।"
'पण्डित, चिन्ता न कर। मैं तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान
बना दूंगा। किस जगह पर बनाऊँ ?"
"अमुक स्थान पर बना।"
शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को
प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा—
महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेले।
राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनोशिलावर्ण की दीवार से
घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार
के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने कालक से पूछा—पण्डित ने हमारा
कहना किया। अब क्या करें ?

धम्मद्ध ] ३६७
“महाराज, जो एक रात मँ उद्यान बना सकता है। वह राज्य ले सकता
है वा नही ?”
“अब क्या करे ?”
“उससे दूसरा असम्भव कार्य्य कराएँ।”
“ कौनसा काम ?”
“सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनवाएँ ।”
राजा ने 'अच्छा' कह बोधिसत्व को बुलाकर कहा—
“आचार्य्य ! तुमने उद्यान तो बना दिया। अब इसके योग्य सात रत्नो
वाली पुष्करिणी बनाएँ। यदि नही बना सकोगे तो तुम्हारी जान जाएगी।”
बोधिसत्व ने कहा—महाराज, अच्छा। बना सकेगे तो बनाएँगे।
शक्र ने सुन्दर, सौ तीर्थों वाली, हज़ार जगह से मुड़ी, पाँच प्रकार के
कमलो से ढकी नन्दन पुष्करिणी¹ सदृश पुष्करिणी बना दी ! बोधिसत्त्व ने
उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा से जाकर कहा—देव, पुष्करिणी बना दी।
राजा ने उसे देख काळक से पूछा—अब क्या करे ? 'देव, उद्यान के योग्य
घर बनाने को कहे।' राजा ने बोधिसत्व को बुलवाकर कहा—आचार्य्य,
इस उद्यान और पुष्करिणी के अनुकूल एक ऐसा घर बनाएँ जो सारा का सारा
हाथी दाँत का हो। यदि नही बनाएँगे तो तुम्हारी जान न रहेगी।
शक्र ने उसका घर भी बना दिया। अगले दिन बोधिसत्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने उसे भी देख काळक से पूछा—अब
क्या करें ? 'महाराज, घर के योग्य मणि बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्त्व
को बुलाकर कहा—पण्डित, इस हाथीदांत के घर के अनुकूल मणि बनाओ।
मणि के प्रकाश में घूमेंगे। यदि नही बना सकोगे, तो तुम्हारी जान जाएगी।
शक्र ने उसकी मणि भी बना दी। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने देखकर पूछा—अब क्या करें ? "महाराज !
मालूम होता है कि ऐसा देवता है जो धम्मध्वज ब्राह्मण को जो जो वह चाहता
है, देता है। अब जिसे देवता भी न बना सके, ऐसी आज्ञा दें। चारो अङ्गों²
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¹ सिहल में 'नन्दा पोक्खरणि' पाठ है। ² चार गुणो ।

३६६ [ २.७.२२०
"इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने
पर, उस दोष का दोषी बना मारेंगे।"
"कौन सा असम्भव कार्य्य।"
"महाराज, जरखेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान दो चार
साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाओ। वह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध
के कारण मार देंगे।"
राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—पण्डित ! पुराने उद्यान में हम
बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे।
हमारे लिए उद्यान बनाएँ। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।"
बोधिसत्त्व समझ गए कि काळक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा
को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो देखूँगा" कह घर
जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो
गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने
जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश मे खडे हो पूछा—पण्डित
क्या चिन्ता कर रहे हो ?
"तू कौन है ?"
"मैं शक्र हूँ।"
"राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।"
"पण्डित, चिन्ता न कर। मै तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान
बना दूँगा। किस जगह पर बनाऊँ ?"
"अमुक स्थान पर बना।"
शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को
प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा—
महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेलें।
राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनःशिलावर्ण की दीवार से
घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार
के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने काळक से पूछा—पण्डित ने हमारा
कहना किया। अब क्या करें ?

धम्मद्ध ] ३६७
“महाराज, जो एक रात म उद्यान बना सकता है। वह राज्य ले सकता
है या नही ?”
“अब क्या करें ?”
“उससे दूसरा असम्भव कार्य्य कराएँ।”
“कौनसा काम ?”
“सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनवाएँ।”
राजा ने 'अच्छा' कह बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—
“आचार्य्य ! तुमने उद्यान तो बना दिया। अब इसके योग्य सात रत्नो
वाली पुष्करिणी बनाएँ। यदि नही बना सकोगे तो तुम्हारी जान जाएगी।”
बोधिसत्त्व ने कहा—महाराज, अच्छा। बना सकेंगे तो बनाएँगे।
शक्र ने सुन्दर, सौ तीर्थों वाली, हज़ार जगह से मुड़ी, पाँच प्रकार के
कमलो से ढकी नन्दन पुष्करिणी¹ सदृश पुष्करिणी बना दी। बोधिसत्त्व ने
उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा से जाकर कहा—देव, पुष्करिणी बना दी।
राजा ने उसे देख काळक से पूछा—अब क्या करे ? 'देव, उद्यान के योग्य
घर बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्व को बुलवाकर कहा—आचार्य्य,
इस उद्यान और पुष्करिणी के अनुकूल एक ऐसा घर बनाएँ जो सारा का सारा
हाथी दांत का हो। यदि नही बनाएँगे तो तुम्हारी जान न रहेगी।
शक्र ने उसका घर भी बना दिया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने उसे भी देख काळक से पूछा—अब
क्या करें ? 'महाराज, घर के योग्य मणि बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्त्व
को बुलाकर कहा—पण्डित, इस हाथीदांत के घर के अनुकूल मणि बनाओ।
मणि के प्रकाश में घूमेंगे। यदि नही बना सकोगे, तो तुम्हारी जान जाएगी।
शक्र ने उसकी मणि भी बना दी। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी
प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने देखकर पूछा—अब क्या करें ? “महाराज!
मालूम होता है कि ऐसा देवता है जो धम्मध्वज ब्राह्मण को जो जो वह चाहता
है, देता है। अब जिसे देवता भी न बना सके, ऐसी आज्ञा दें। चारो अङ्गो²
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¹ सिहल में 'नन्दा पोक्खरणि' पाठ है। ² चार गुणों।

३६८ [ २७.२२०
से युक्त मनुष्य को देवता भी नही बना सकता। इसलिए उसे कहें कि
मुझे चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल बनाकर दे।
राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर कहा—आचार्य्य, तूने हमारे लिए उद्यान,
पुष्करिणी, हाथी-दांत का प्रासाद, उसमें प्रकाश करने के लिए मणि-रत्न
बनाया। अब मेरे उद्यान की रक्षा करने वाला चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल
बनाएं। यदि नही बनाएंगे, तो तुम्हारी जान न रहेगी।
बोधिसत्त्व 'होवे, मिलने पर दूंगा' कह, घर जा प्रणीत भोजन खा, सोकर
जब प्रात काल उठा तो शय्या पर बैठ कर सोचने लगा—देवराज शक्र ने जो
स्वय बना सकता था, बनाया। वह चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना
सकता। ऐसा होने पर दूसरो के हाथ से मरने की अपेक्षा जगल में अनाथ की
तरह मरना ही अच्छा है।
वह बिना किसीसे कहे, प्रासाद से उतर, मुख्यद्वार से ही नगर से निकल,
जगल में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे बैठ सत्पुरुषो के धर्म का ध्यान करने लगा।
शक्र को जब यह पता लगा तो उसने एक वनचर की शक्ल बना बोधिसत्त्व के
पास जा पूछा—'ब्राह्मण ! तू सुकुमार है। तूने पहले दुख नही देखा सा है।
तू इस अरण्य में दाखिल हो बैठा क्या कर रहा है?' यह पूछते हुए पहली
गाथा कही—
सुखं जीवितरूपोसि रट्ठा विवनमागतो,
सो एकको अरण्यस्मिं रुक्खमूले कृपणो विय झायसि ॥
[तू सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले सा है। जनाकीर्ण स्थान से
निर्जन स्थान में आया है। त जगल में वृक्ष के नीचे अकेला बैठ कृपण की तरह
(क्या) सोचता है ?]
सुखं जीवितरूपोसि, तू सुख से जीने वाले, सुख से रहने वाले, सुख से
पालन हुए की तरह है। रट्ठा जनाकीर्ण स्थान से। विवनमागतो जलरहित
स्थान जगल में दाखिल हुआ। रुक्खमूले, वृक्ष के पास। कृपणो विय झायसि,
कृपण की तरह अकेला बैठा हुआ ध्यान करता है, विषण्ण ध्यान करता है।
तू यह क्या सोच रहा है ?—यही पृच्छा।

धम्मट्ठ ] . ३६६

इसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
सुखं जीवितरूपोस्मि रट्ठा विब्भनमागतो,
सो एकको अरञ्ञस्मि रुक्खमूले;
कपणो विय झायामि सतं धम्मं अनुस्सरं ॥
[ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला हूँ। जनाकीर्ण स्थान से निर्जन
स्थान मे आया हूँ। अरण्य में, वृक्ष के नीचे अकेला ही कृपण की तरह श्रेष्ठ
पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ ध्यान लगा रहा हूँ । ]
सतं धम्म अनुस्सरं, मित्र, यह सत्य ही है कि मै सुख पूर्वक जीवन व्यतीत
करने वाला जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान मे आया हूँ। मै इस जगल मे
.वृक्ष के नीचे अकेला ही बैठकर कृपण की तरह ध्यान करता हूँ। जो तू पूछता
है कि क्या सोच रहा हूँ, वह कहता हूँ। मैं श्रेष्ठ (पुरुषो के) धर्म को स्मरण
करता हुआ यहाँ बैठा हूँ। सतं धम्मं बुद्ध, पच्चेक बुद्ध, श्रावको का, श्रेष्ठ
सत्पुरुषो का, पण्डितो का धर्म—लाभ, हानि, अपकीर्ति, कीर्ति, निन्दा, प्रशंसा,
सुख, दुख, यह आठ प्रकार का लोक-धर्म है। इनसे आघात पाने पर सत्पुरुष
कांपते नही हैं, चंचल नही होते हैं। यह न कांपना सत्पुरुषो का धर्म है। इस
सत्पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ बैठा हूँ—यही प्रकट करता है।
शक्र ने पूछा—ब्राह्मण ! ऐसा है तो इस जगह क्यो बैठा है ?
“राजा चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल मंगवाता है। वैसा नही मिल
सकता है। सो मैं यह सोचकर कि किसीके हाथ से मरने से क्या लाभ, जगल में.
प्रविष्ट हो अनाथ की तरह मरूँगा, (इसलिए) यहाँ आकर बैठा हूँ।”
“ब्राह्मण ! मैं देवराज शक्र हूँ। मैने तेरे लिए उद्यान आदि बनाए।
चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना सकता। तुम्हारे राजा के वालो को
सजानेवाला छत्तपाणी नाम का नाई है। चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल की
आवश्यकता होने पर, उसे उद्यानपाल बनाने के लिए कहना।”

  • शक्र बोधिसत्त्व को यह उपदेश दे, 'डर मत' कह आश्वासन दे, अपने
    देवनगर को गया।
    ऽ४

३७० [ २.७ २२०

बोधिसत्व प्रात काल का भोजन कर राजद्वार गया। वही छत्तपाणी
को देख हाथ से पकड पूछा-मित्र, क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ?
"तुझे किसने कहा है कि मै चारो अङ्गो से युक्त हूँ ?"
"देवराज शक्र ने।"
"किस कारण से कहा ?"
"इस कारण से ' कह सब कहा। वह बोला-हाँ, मैं चारो अङ्गो से
युक्त हूँ।
बोधिसत्व उसे हाथ से पकडे ही पकडे राजा के पास ले जाकर बोला-
महाराज, यह छत्तपाणी चारो अङ्गो से युक्त है। उद्यानपाल की आवश्यकता
होने पर इसे उद्यानपाल बनावें।
राजा ने उसे पूछा-क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? हां महाराज।
'किन चारो अङ्गो से ?" उत्तर दिया-
"अनुसुय्यको अह देव अमज्जपायको अहं,
निस्नेहको अह देव अक्कोधन अधिद्वितो ॥
महाराज ! मुझ म ईर्ष्या नही है। मैने कभी शराब नही पी है। देव !
मुझ में दूसरो के प्रति न स्नेह है, न कोष है। मैं इन चारो अङ्गो से युक्त हूँ।
राजा ने पूछा-छत्तपाणी ! तू अपने आपको ईर्ष्या रहित कहता है ?
'-हाँ देव ! मै ईर्ष्या रहित हूँ।
'किस बात को देखकर ईर्ष्या रहित हुआ ?"
'देव ! सुने' कह अपने ईर्ष्या रहित होने का कारण बताते हुए यह गाथा
कही-
इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहित,
सो म अत्ये निवेसेसि तस्माह अनुसुय्यको ॥
[ राजन ! स्त्री के कारण मैने पुरोहित को बँधवाया। उसने मुझे सदर्थ
में लगाया। इसलिए मै ईर्ष्या रहित हूँ।]

इसका अर्थ है कि देव ! मैं पहले इसी वाराणसी नगर में तुम्हारे जैसा
ही राजा था। मैने स्त्री के लिए पुरोहित को बँधवाया।