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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

धम्मट्ठ ] . ३६६

इसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
सुखं जीवितरूपोस्मि रट्ठा विब्भनमागतो,
सो एकको अरञ्ञस्मि रुक्खमूले;
कपणो विय झायामि सतं धम्मं अनुस्सरं ॥
[ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला हूँ। जनाकीर्ण स्थान से निर्जन
स्थान मे आया हूँ। अरण्य में, वृक्ष के नीचे अकेला ही कृपण की तरह श्रेष्ठ
पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ ध्यान लगा रहा हूँ । ]
सतं धम्म अनुस्सरं, मित्र, यह सत्य ही है कि मै सुख पूर्वक जीवन व्यतीत
करने वाला जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान मे आया हूँ। मै इस जगल मे
.वृक्ष के नीचे अकेला ही बैठकर कृपण की तरह ध्यान करता हूँ। जो तू पूछता
है कि क्या सोच रहा हूँ, वह कहता हूँ। मैं श्रेष्ठ (पुरुषो के) धर्म को स्मरण
करता हुआ यहाँ बैठा हूँ। सतं धम्मं बुद्ध, पच्चेक बुद्ध, श्रावको का, श्रेष्ठ
सत्पुरुषो का, पण्डितो का धर्म—लाभ, हानि, अपकीर्ति, कीर्ति, निन्दा, प्रशंसा,
सुख, दुख, यह आठ प्रकार का लोक-धर्म है। इनसे आघात पाने पर सत्पुरुष
कांपते नही हैं, चंचल नही होते हैं। यह न कांपना सत्पुरुषो का धर्म है। इस
सत्पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ बैठा हूँ—यही प्रकट करता है।
शक्र ने पूछा—ब्राह्मण ! ऐसा है तो इस जगह क्यो बैठा है ?
“राजा चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल मंगवाता है। वैसा नही मिल
सकता है। सो मैं यह सोचकर कि किसीके हाथ से मरने से क्या लाभ, जगल में.
प्रविष्ट हो अनाथ की तरह मरूँगा, (इसलिए) यहाँ आकर बैठा हूँ।”
“ब्राह्मण ! मैं देवराज शक्र हूँ। मैने तेरे लिए उद्यान आदि बनाए।
चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना सकता। तुम्हारे राजा के वालो को
सजानेवाला छत्तपाणी नाम का नाई है। चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल की
आवश्यकता होने पर, उसे उद्यानपाल बनाने के लिए कहना।”

  • शक्र बोधिसत्त्व को यह उपदेश दे, 'डर मत' कह आश्वासन दे, अपने
    देवनगर को गया।
    ऽ४