तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
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मोक्ष-साधनकी मीमांसा
अत्रैतच्चिन्त्यते विद्याकर्मणो- | अब विद्या और कर्मका विवेक
र्विवेक़ार्थं किं कर्म- [मोक्षकारण-मीमांसायां चत्वारो विकल्पाः] | [ अर्थात् इन दोनोंका फल भिन्न-
भ्य एव केवलेभ्यः | भिन्न है—इसका निश्चय ] करनेके
परं श्रेय उत वि- | लिये यह विचार किया जाता है
द्यासव्यपेक्षेभ्य आहोस्विद्विद्या- | कि ( १ ) क्या परम श्रेयकी प्राप्ति
कर्मभ्यां संहताभ्यां विद्याया वा | केवल कर्मसे होती है, ( २ ) अथवा
कर्मापेक्षाया उत केवलाया एव | विद्याकी अपेक्षायुक्त कर्मसे, ( ३ )
विद्याया इति ? | किंवा परस्पर मिले हुए विद्या और
| कर्म दोनोंसे, ( ४ ) अथवा कर्मकी
| अपेक्षा रखनेवाली विद्यासे, ( ५ )
| या केवल विद्यासे ही ?
तत्र केवलेभ्य एव कर्मभ्यः | उनमें [ पहला पक्ष यह है कि ]
स्यात् । समस्तवे- [कर्मणां मोक्ष-साधनत्वनिरासः] | केवल कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति
दार्थज्ञानवतः कर्मा- | हो सकती है; क्योंकि “द्विजातिको
धिकारात् । “वेदः कृत्स्नोऽधि- | रहस्यके सहित सम्पूर्ण वेदका ज्ञान
गन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना” | प्राप्त करना चाहिये” ऐसी स्मृति
इति स्मरणात् । अधिगमश्च | होनेसे सम्पूर्ण वेदका ज्ञान रखने-
सहोपनिषदर्थेनात्मज्ञानादिना । | वालेको ही कर्मका अधिकार है और
“विद्वान्यजते” “विद्वान्याज- | वेदका ज्ञान उपनिषद्के अर्थभूत
यति” इति च विदुष एव कर्म- | आत्मज्ञानादिके सहित ही हो
ण्यधिकारः प्रदर्श्यते सर्वत्र | सकता है । “विद्वान् यज्ञ करता
“ज्ञात्वा चानुष्ठानम्” इति च । | है” “विद्वान् यज्ञ कराता है”
| इत्यादि वाक्योंसे सर्वत्र विद्वान्का ही
| कर्ममें अधिकार दिखलाया गया
| है; तथा “जानकर कर्मानुष्ठान
| करे” ऐसा भी कहा है । कोई-कोई
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
[अनु० ११] \qquad शाङ्करभाष्यार्थ \qquad ७९
[संस्कृत-मूल]
कृत्स्नश्च वेदः कर्मार्थ इति हि
मन्यन्ते केचित् । कर्मभ्यश्चेत्परं
श्रेयो नावाप्यते वेदोऽनर्थकः
स्यात् ।
न; नित्यत्वान्मोक्षस्य, नित्यो
हि मोक्ष इष्यते । कर्मकार्य-
स्यानित्यत्वं प्रसिद्धं लोके ।
कर्मभ्यश्चेच्छ्रेयो नित्यं स्यात्तच्चा-
निष्टम् । "तद्यथेह कर्मचितो
लोकः क्षीयते" (छा० उ० ८ ।
१ । ६) इति न्यायानुगृहीत-
श्रुतिविरोधात् ।
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा-
दारब्धस्य च कर्मण उपभोगेन
क्षयान्नित्यानुष्ठानाच्च तत्प्रत्यवा-
यानुत्पत्तेर्ज्ञाननिरपेक्ष एव मोक्ष
इति चेत् ?
तच्च न; शेषकर्मसंभवात्तन्नि-
मित्तशरीरान्तरोत्पत्तिः प्राप्नो-
[हिन्दी-अनुवाद]
ऐसा भी मानते हैं कि सम्पूर्ण वेद कर्मके ही लिये हैं; और यदि कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति न हुई तो वेद भी व्यर्थ ही हो जायगा ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि मोक्षका नित्यत्व है—मोक्ष नित्य ही माना गया है । और जो वस्तु कर्मका कार्य है उसकी अनित्यता लोकमें प्रसिद्ध है । यदि नित्य श्रेय कर्मोंसे होता है ऐसा मानें तो इष्ट नहीं है; क्योंकि इसका "जिस प्रकार यह कर्मोपार्जित लोक क्षीण होता है [उसी प्रकार पुण्यार्जित परलोक भी क्षीण हो जाता है]" इस न्याययुक्ता श्रुतिसे विरोध है ।
पूर्व०—काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मोंका आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मोंका भोगसे ही क्षय हो जानेसे तथा नित्य कर्मोंके अनुष्ठानके कारण प्रत्यवायकी उत्पत्ति न होनेसे मोक्ष ज्ञानकी अपेक्षासे रहित ही है—यदि ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती—ऐसी बात भी नहीं है; शेष (सञ्चित) कर्मोंके रह जानेसे उनके कारण अन्य शरीरकी उत्पत्ति सिद्ध होती है—इस प्रकार