तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
ध्यात्मम् । इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता
व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसे-
नान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४ ॥
हम [ शिष्य और आचार्य ] दोनोंको साथ-साथ यश प्राप्त हो
और हमें साथ-साथ ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो । [ क्योंकि जिन पुरुषोंकी
बुद्धि शास्त्राध्ययनद्वारा परिमार्जित हो गयी है वे भी परमार्थतत्त्वको समझनेमें
सहसा समर्थ नहीं होते, इसलिये ] अब हम पाँच अधिकरणोंमें
संहिताकी * उपनिषद् [ अर्थात् संहितासम्बन्धिनी उपासना ] की
व्याख्या करेंगे । अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और
अध्यात्म—ये ही पाँच अधिकरण हैं । पण्डितजन उन्हें महासंहिता
कहकर पुकारते हैं । अब अधिलोक ( लोकसम्बन्धी ) दर्शन ( उपासना )
का वर्णन किया जाता है—संहिताका प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण
द्युलोक है, मध्यभाग आकाश है ॥ १ ॥ और वायु सन्धान ( उनका
परस्पर सम्बन्ध करनेवाला ) है [ अधिलोक-उपासकको संहितामें इस
प्रकार दृष्टि करनी चाहिये ]—यह अधिलोक दर्शन कहा गया । इसके
अनन्तर अधिज्योतिष दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण
अग्नि है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, मध्यभाग आप ( जल ) है और विद्युत्
सन्धान है [ अधिज्योतिष-उपासकको संहितामें ऐसी दृष्टि करनी
चाहिये ]—यह अधिज्योतिष दर्शन कहा गया । इसके पश्चात् अधिविद्य
दर्शन कहा जाता है—इसकी संहिताका प्रथम वर्ण आचार्य
है ॥ २ ॥ अन्तिम वर्ण शिष्य है, विद्या सन्धि है और प्रवचन ( प्रश्नोत्तर-
रूपसे निरूपण करना ) सन्धान है [—ऐसी अधिविद्य-उपासकको दृष्टि
- 'संहिता' शब्दका अर्थ सन्धि या वर्णोंका सामीप्य है । भिन्न-भिन्न
वर्णोंके मिलनेपर ही शब्द बनते हैं; उनमें जब एक वर्णका दूसरे वर्णसे योग होता
है तो उन पूर्वोत्तर वर्णोंके योगको 'सन्धि' कहते हैं और जिस शब्दोच्चारण-सम्बन्धी
प्रयत्नके योगसे सन्धि होती है उसे 'सन्धान' कहा जाता है ।
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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
करनी चाहिये ] । यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया । इससे आगे
अधिप्रज दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण माता है,
अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा ( सन्तान ) सन्धि है और प्रजनन ( ऋतु-
कालमें भार्यागमन ) सन्धान है [—अधिप्रज-उपासकको ऐसी दृष्टि करनी
चाहिये ] । यह प्रजासम्बन्धी उपासनाका वर्णन किया गया ॥ ३ ॥
इसके पश्चात् अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—इसमें संहिताका प्रथम
वर्ण नीचेका हनु ( नीचेके होठसे ठोडीतकका भाग ) है, अन्तिम वर्ण
ऊपरका हनु ( ऊपरके होठसे नासिकातकका भाग ) है, वाणी सन्धि है
और जिह्वा सन्धान है [—ऐसी अध्यात्म-उपासकको दृष्टि करनी चाहिये ] ।
यह अध्यात्मदर्शन कहा गया । इस प्रकार ये महासंहिताएँ कहलाती हैं ।
जो पुरुष इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओंको जानता है
[ अर्थात् इस प्रकार उपासना करता है ] वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज,
अन्न और स्वर्गलोकसे संयुक्त किया जाता है । [ अर्थात् उसे इन सबकी
प्राप्ति होती है ] ॥ ४ ॥
तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञा- | उस संहितादि उपनिषद्
[ अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी
ननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्ना- | उपासना ] के परिज्ञानके कारण
जिस यशकी याचना की जाती है
वावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवा- | वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको
साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा
स्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं | उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है
तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्य- | वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही
मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्य-
वचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थ- | का वाक्य है; क्योंकि अकृतार्थ
होनेके कारण शिष्यके लिये ही
त्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । | प्रार्थना करना सम्भव भी है—
आचार्यके लिये नहीं; क्योंकि वह
कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो | कृतार्थ होता है । जो पुरुष कृतार्थ
होता है वही आचार्य कहलाता है ।
नाम भवति । |
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