तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
शिक्षावल्ली
शिक्षावल्ली
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प्रथम अनुवाक
सम्बन्ध-भाष्य
यस्माज्जातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव प्रलीयते ।
येनेदं धार्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ १ ॥
जिससे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें ही यह लीन होता है
और जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है उस ज्ञानस्वरूपको मेरा
नमस्कार है ।
यैरिमे गुरुभिः पूर्वं पदवाक्यप्रमाणतः ।
व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥
पूर्वकालमें जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक
इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है उन्हें मैं सर्वदा
नमस्कार करता हूँ ।
तैत्तिरीयकसारस्य मयाचार्यप्रसादतः ।
विस्पष्टार्थरुचीनां हि व्याख्येयं संप्रणीयते ॥ ३ ॥
जो स्पष्ट अर्थ जाननेके इच्छुक हैं उन पुरुषोंके लिये मैं श्रीआचार्यकी
कृपासे तैत्तिरीयशाखाके सारभूत इस उपनिषद्की व्याख्या करता हूँ ।
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
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नित्यान्यधिगतानि कर्माण्यु- | सञ्चित पापोंका क्षय ही जिनका
उपक्रमः पात्तदुरितक्षयार्था- | मुख्य प्रयोजन है ऐसे नित्यकर्मोंका
नि, काम्यानि च | तथा सकाम पुरुषोंके लिये विहित
फलार्थिनां पूर्वस्मिन्ग्रन्थे । इदानीं | काम्यकर्मोंका इससे पूर्ववर्ती ग्रन्थमें
[ अर्थात् कर्मकाण्डमें ] परिज्ञान हो
कर्मोपादानहेतुपरिहाराय ब्रह्म- | चुका है । अब कर्मानुष्ठानके
कारणकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मविद्याका
विद्या प्रस्तूयते । | आरम्भ किया जाता है ।
कर्महेतुः कामः स्यात् । | कामना ही कर्मकी कारण हो
आत्मविदेवाप्त- प्रवर्तकत्वात् । आ- | सकती है; क्योंकि वही उसकी
कामो भवति प्रवर्तक है । जो लोग पूर्णकाम हैं
सकामानां हि कामा- | उनकी कामनाओंका अभाव होनेपर
भावे स्वात्मन्यवस्थानात् प्रवृत्त्य- | स्वरूपमें स्थिति हो जानेसे कर्ममें
प्रवृत्ति होनी असम्भव है । आत्म-
नुपपत्तिः । आत्मकामित्वे चाप्त- | दर्शनकी कामना पूर्ण होनेपर
कामता; आत्मा हि ब्रह्म; | ही पूर्णकामता [ की सिद्धि ] होती
है; क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है और
तद्विदो हि परप्राप्तिं वक्ष्यति । | ब्रह्मवेत्ताको ही परमात्माकी प्राप्ति
अतोऽविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्य- | होती है ऐसा आगे [ श्रुति ]
वस्थानं परप्राप्तिः । “अभयं | बतलायेगी । अतः अविद्याकी निवृत्ति
होनेपर अपने आत्मामें स्थित हो
प्रतिष्ठां विन्दते” ( तै० उ० २ । | जाना ही परमात्माकी प्राप्ति है;
७ । १) “एतमानन्दमयमात्मा- | जैसा कि “अभय पद प्राप्त कर लेता
है” “[ उस समय ] इस आनन्द-
नमुपसंक्रामति” ( तै० उ० २ । | मय आत्माको प्राप्त हो जाता है”
८ । १२) इत्यादिश्रुतेः । | इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।
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