तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
न च कर्महेतूनां कामानां │ इसके सिवा कर्मकी हेतुभूत
ज्ञानाभावे निवृत्त्यसंभवादशेष- │ कामनाओंकी निवृत्ति भी ज्ञानके
│ अभावमें असम्भव होनेके कारण
कर्मक्षयोपपत्तिः । अनात्मविदो │ उन (नित्यकर्मों) के द्वारा सम्पूर्ण
│ कर्मोंका क्षय होना सम्भव नहीं है;
हि कामोऽनात्मफलविषयत्वात् । │ क्योंकि अनात्मफलविषयिणी होनेके
│ कारण कामना अनात्मवेत्ताको ही
स्वात्मनि च कामानुपपत्तिर्नित्य- │ हुआ करती है । आत्मामें तो कामना-
│ का होना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि
प्राप्तत्वात् । स्वयं चात्मा परं │ वह नित्यप्राप्त है । और यह तो कहा
│ ही जा चुका है कि स्वयं आत्मा ही
ब्रह्मेत्युक्तम् । │ परब्रह्म है ।
नित्यानां चाकरणमभावस्ततः │ तथा नित्यकर्मोंका न करना तो
│ अभावरूप है, उससे प्रत्यवाय होना
प्रत्यवायानुपपत्तिरिति । अतः │ असम्भव है । अतः नित्यकर्मोंका न
पूर्वोपचितदुरितेभ्यः प्राप्यमाणा- │ करना यह पूर्वसञ्चित पापोंसे प्राप्त
│ होनेवाली प्रत्यवायक्रियाका ही
याः प्रत्यवायक्रियाया नित्याकरणं │ लक्षण है । इसलिये “अकुर्वन्
लक्षणमिति “अकुर्वन्विहितं कर्म” │ विहितं कर्म” इस वाक्यके
│ ‘अकुर्वन्’ पदमें ‘शतृ’ प्रत्ययका
(मनु० ११।४४) इति शतृ- │ होना अनुचित नहीं है । अन्यथा
│ अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध होने-
र्नानुपपत्तिः । अन्यथाभावाद्भा- │ के कारण सभी प्रमाणोंसे विरोध हो
वोत्पत्तिरिति सर्वप्रमाणव्याकोप │ जायगा । अतः ऐसा मानना सर्वथा
│ अयुक्त है कि [ कर्मानुष्ठानसे ]
इति । अतोऽयत्नतः स्वात्मन्य- │ अनायास ही आत्मस्वरूपमें स्थिति
वस्थानमित्यनुपपन्नम् । │ हो जाती है ।
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
यच्चोक्तं निरतिशयप्रीतेः स्वर्ग-
शब्दवाच्यायाः कर्मनिमित्तत्वा-
त्कर्मारब्ध एव मोक्ष इति, तन्न;
नित्यत्वान्मोक्षस्य । न हि नित्यं
किञ्चिदारभ्यते लोके यदारब्धं
तदनित्यमिति । अतो न कर्मा-
रब्धो मोक्षः ।
विद्यासहितानां कर्मणां नि-
त्यारम्भसामर्थ्यमिति चेत् ?
न; विरोधात् । नित्यं चा-
रभ्यत इति विरुद्धम् ।
यद्विनष्टं तदेव नोत्पद्यत इति ।
प्रध्वंसाभाववन्नित्योऽपि मोक्ष
आरभ्य एवेति चेत् ?
न; मोक्षस्य भावरूपत्वात् ।
प्रध्वंसाभावोऽप्यारभ्यत इति
न संभवति; अभावस्य
विशेषाभावाद्विकल्पमात्रमेतत् ।
और यह जो कहा कि 'स्वर्ग'
शब्दसे कही जानेवाली निरतिशय
प्रीति कर्मनिमित्तक होनेके कारण
मोक्ष कर्मसे ही आरम्भ होनेवाला है;
सो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि
मोक्ष नित्य है और किसी भी नित्य
वस्तुका आरम्भ नहीं किया जाता;
लोकमें जिस वस्तुका भी आरम्भ
होता है वह अनित्य हुआ करती
है; इसलिये मोक्ष कर्मारब्ध नहीं है ।
पूर्व०-ज्ञानसहित कर्मोंमें तो
नित्य मोक्षके आरम्भ करनेकी भी
सामर्थ्य है ही ?
सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि ऐसा
माननेसे विरोध आता है, मोक्ष नित्य
है और उसका आरम्भ किया जाता
है-ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है।
पूर्व०-जो वस्तु नष्ट हो जाती
है वही फिर उत्पन्न नहीं हुआ
करती, अतः प्रध्वंसाभावके समान
नित्य होनेपर भी मोक्षका आरम्भ
किया ही जाता है। ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि मोक्ष
तो भावरूप है । प्रध्वंसाभाव भी
आरम्भ किया जाता है यह
संभव नहीं; क्योंकि अभावमें
कोई विशेषता न होनेके कारण यह
तो केवल विकल्प ही है। भावका
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