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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

एतस्मादित्युक्तार्थम् । आनन्द- | इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा
मय इति कार्यात्मप्रतीतिरधि- | जा चुका है। 'आनन्दमय' इस शब्दसे कार्यात्माकी प्रतीति होती
कारान्मयट्शब्दाच्च । अन्नादि- | है; क्योंकि यहाँ उसीका अधिकार (प्रसङ्ग) है और आनन्दके साथ
मया हि कार्यात्मानो भौतिका | 'मयट्' शब्दका प्रयोग किया गया है। यहाँ अन्नमय आदि भौतिक
इहाधिकृताः । तदधिकारपतित- | कार्यात्माओंका अधिकार है; उन्हींके अन्तर्गत यह आनन्दमय भी है।
श्चायमानन्दमयः, मयट् चात्र वि- | 'मयट्' प्रत्यय भी यहाँ विकारके अर्थमें देखा गया है; जैसा कि
कारार्थे दृष्टो यथान्नमय इत्यत्र । | 'अन्नमय' इस शब्दमें है। अतः आनन्दमय कार्यात्मा है—ऐसा
तस्मात्कार्यात्मानन्दमयः प्रत्ये- | जानना चाहिये ।
तव्यः । | संक्रमणके कारण भी यही बात
संक्रमणाच्च; आनन्दमयमा- | सिद्ध होती है। 'वह आनन्दमय आत्माके प्रति संक्रमण करता है
त्मानमुपसंक्रामतीति वक्ष्यति । | [अर्थात् आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है]' ऐसा आगे (अष्टम
कार्यात्मनां च संक्रमणमनात्मनां | अनुवाकमें) कहेंगे । अन्नमयादि अनात्मा कार्यात्माओंका ही संक्रमण
दृष्टम् । संक्रमणकर्मत्वेन चा- | होता देखा गया है। और संक्रमणके कर्मरूपसे आनन्दमय आत्माका
नन्दमय आत्मा श्रूयते । यथान्न- | श्रवण होता है, जैसे कि 'यह अन्नमय आत्माके प्रति संक्रमण
मयमात्मानमुपसंक्रामतीति । न | (गमन) करता है' [इस वाक्यमें देखा जाता है]। स्वयं आत्माका
चात्मन एवोपसंक्रमणम् । अधि- | ही संक्रमण होना सम्भव है नहीं; क्योंकि इससे उस प्रसङ्गमें विरोध
कारविरोधादसंभवाच्च । न ह्या- | आता है और ऐसा होना सम्भव भी नहीं है। आत्माका आत्माक

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

त्मनैवात्मन उपसंक्रमणं संभ- | ही प्राप्त होना कभी सम्भव नहीं
वति । स्वात्मनि भेदाभावात् । | है; क्योंकि अपने आत्मामें भेदका
आत्मभूतं च ब्रह्म सङ्क्रमितुः । | सर्वथा अभाव है और ब्रह्म भी
| संक्रमण करनेवालेका आत्मा ही है ।
शिरआदिकल्पनानुपपत्तेश्च । | [ आत्मामें ] शिर आदिकी
न हि यथोक्तलक्षण आकाशादि- | कल्पना असम्भव होनेके कारण भी
कारणेऽकार्यपतिते शिरआद्यवयव- | [ आनन्दमय कार्यात्मा ही है ] ।
रूपकल्पनोपपद्यते । "अदृश्ये- | आकाशादिके कारण और कार्यवर्गके
ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० | अन्तर्गत न आनेवाले उपर्युक्त
उ० २ । ७ । १) "अस्थूल- | लक्षणविशिष्ट आत्मामें शिर आदि
मनणु" (बृ० उ० ३ । ८ । ८) | अवयवरूप कल्पनाका होना संगत
"नेति नेत्यात्मा" (बृ० उ० ३। ९ । | नहीं है । आत्मामें विशेष धर्मोंका
२६) इत्यादिविशेषापोहश्रुति- | बाध करनेवाली "अदृश्य, अशरीर,
भ्यश्च । | अनिर्वचनीय और अनाश्रयमें" "स्थूल
| और सूक्ष्मसे रहित" "आत्मा यह
| नहीं है यह नहीं है" इत्यादि श्रुतियोंसे
| भी यही बात सिद्ध होती है ।
मन्त्रोदाहरणानुपपत्तेश्च । न | [ आनन्दमयको यदि आत्मा
हि प्रियशिरआद्यवयवविशिष्टे | माना जाय तो ] आगे कहे हुए
प्रत्यक्षतोऽनुभूयमान आनन्दमय | मन्त्रका उदाहरण देना भी नहीं
आत्मनि ब्रह्मणि नास्ति ब्रह्मेत्या- | बनता । शिर आदि अवयवोंसे युक्त
शङ्काभावात् "असन्नेव स | आनन्दमय आत्मारूप ब्रह्मके प्रत्यक्ष
भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत्" | अनुभव होनेपर तो ऐसी शंका ही
(तै० उ० २ । ६ । १) इति | नहीं हो सकती कि ब्रह्म नहीं है,
| जिससे कि [ उस शंकाकी निवृत्ति-
| के लिये ] "जो पुरुष, ब्रह्म नहीं
| है—ऐसा जानता है वह असद्रूप
तै० उ० १९-२०—