तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧
चरदनृतमित्युच्यते। अतः वि- | व्यभिचरित होनेपर वह मिथ्या कहा
कारोऽनृतम्। "वाचारम्भणं | जाता है। इसलिये विकार मिथ्या
विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव | है। "विकार केवल वाणीसे आरम्भ होनेवाला और नाममात्र है, बस,
सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) | मृत्तिका ही सत्य है" इस प्रकार
एवं सदेव सत्यमित्यवधारणात्। | निश्चय किया जानेके कारण सत्
अतः सत्यं ब्रह्मेति ब्रह्म विका- | ही सत्य है। अतः 'सत्यं ब्रह्म'
रान्निवर्तयति। | यह वाक्य ब्रह्मको विकारमात्रसे निवृत्त करता है।
अतः कारणत्वं प्राप्तं ब्रह्मणः। | इससे ब्रह्मका कारणत्व प्राप्त
[ज्ञानमित्यस्य तात्पर्यम्] कारणस्य च कार- | होता है, और वस्तुरूप होनेसे
कत्वं वस्तुत्वान्मृद्व- | कारणमें कारकत्व रहा करता है।
[ज्ञानकर्तृत्वभाव-निरूपणं च] दचिद्रूपता च प्रा- | अतः मृत्तिकाके समान उसकी जड-
प्ता त इदमुच्यते | रूपताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। इसीसे 'ज्ञानं ब्रह्म' ऐसा कहा
ज्ञानं ब्रह्मेति। ज्ञानं ज्ञप्तिरव- | है। 'ज्ञान' ज्ञप्ति यानी अवबोधको
बोधः, भावसाधनो ज्ञानशब्दो | कहते हैं। 'ज्ञान' शब्द भाववाचक
न तु ज्ञानकर्तृ ब्रह्मविशेषण- | है; 'सत्य' और 'अनन्त' के साथ ब्रह्मका विशेषण होनेके कारण
त्वात्सत्यानन्ताभ्यां सह। न | उसका अर्थ 'ज्ञानकर्ता' नहीं हो सकता। उसका ज्ञानकर्तृत्व स्वीकार
हि सत्यतानन्तता च ज्ञान- | करनेपर ब्रह्मकी सत्यता और
कर्तृत्वे सत्युपपद्यते। ज्ञान- | अनन्तता सम्भव नहीं है। ज्ञान-
कर्तृत्वेन हि विक्रियमाणं कथं | कर्तारूपसे विकारको प्राप्त होनेवाला होकर ब्रह्म सत्य और अनन्त कैसे
सत्यं भवेदनन्तं च। यद्धि न | हो सकता है? जो किसीसे भी
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
कुतश्चित्प्रविभज्यते तदनन्तम् । | विभक्त नहीं होता वही अनन्त हो
ज्ञानकर्तृत्वे च ज्ञेयज्ञानाभ्यां | सकता है । ज्ञानकर्ता होनेपर तो
प्रविभक्तमित्यनन्तता न स्यात् । | वह ज्ञेय और ज्ञानसे विभक्त होगा;
“यत्र नान्यद्विजानाति स भूमा | इसलिये उसकी अनन्तता सिद्ध नहीं
अथ यत्रान्यद्विजानाति तदल्पम्” | हो सकेगी । “जहाँ किसी दूसरेको
( छा० उ० ७ । २४ । १ ) इति | नहीं जानता वह भूमा है और जहाँ
श्रुत्यन्तरात् । | किसी दूसरेको जानता है वह अल्प
| है” इस एक दूसरी श्रुतिसे यही
| सिद्ध होता है ।
नान्यद्विजानातीति विशेष- | इस श्रुतिमें ‘दूसरेको नहीं
| जानता’ इस प्रकार विशेषका
प्रतिषेधादात्मानं विजानातीति | प्रतिषेध होनेके कारण वह स्वयं
| अपनेको ही जानता है-ऐसी यदि
चेन्न; भूमलक्षणविधिपरत्वाद्वा- | कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं;
| क्योंकि यह वाक्य भूमाके लक्षणका
क्यस्य । यत्र नान्यत्पश्यतीत्यादि | विधान करनेमें प्रवृत्त है । ‘यत्र
| नान्यत्पश्यति’ इत्यादि वाक्य भूमाके
भूम्नो लक्षणविधिपरं वाक्यम् । | लक्षणका विधान करनेमें तत्पर है ।
| अन्य अन्यको देखता है—इस लोक-
यथा प्रसिद्धमेवान्योऽन्यत्पश्य- | प्रसिद्ध वस्तुस्थितिको स्वीकार कर
| ‘जहाँ ऐसा नहीं है वह भूमा है’—इस
तीत्येतदुपादाय यत्र तन्नास्ति | प्रकार उसके द्वारा भूमाके स्वरूपका
| बोध कराया जाता है । ‘अन्य’
स भूमेति भूमस्वरूपं तत्र ज्ञाप्य- | शब्दका ग्रहण तो यथाप्राप्त द्वैतका
| प्रतिषेध करनेके लिये है; अतः यह
ते। अन्यग्रहणस्य प्राप्तप्रतिषेधार्थ- | वाक्य अपनेमें क्रियाका अस्तित्व
| प्रतिपादन करनेके लिये नहीं है ।
त्वान्न स्वात्मनि क्रियास्तित्वपरं | और स्वात्मामें तो भेदका अभाव
वाक्यम् । स्वात्मनि च भेदा- | होनेके कारण उसका विज्ञान होना
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri