तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
निरूपण करनेवाला है। आगेका समस्त ग्रन्थ इस सूत्रभूत मन्त्रकी ही
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वाक्य है—'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया
जाय तो यह सूत्रभूत वाक्य ही सम्पूर्ण ब्रह्मविद्याका बीज है। ब्रह्म और
ब्रह्मवित्के स्वरूपका विचार ही तो ब्रह्मविद्या है और ब्रह्मवेत्ताकी परप्राप्ति
ही उसका फल है; अतः निःसन्देह यह वाक्य फलसहित ब्रह्मविद्याका
निरूपण करनेवाला है। आगेका समस्त ग्रन्थ इस सूत्रभूत मन्त्रकी ही
व्याख्या है। उसमें सबसे पहिले 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा
श्रुति ब्रह्मका लक्षण करती है। इससे ब्रह्मके स्वरूपका निश्चय हो जानेपर
उसकी उपलब्धिके लिये पञ्चकोशका विवेक करनेके अभिप्रायसे उसने
पक्षीके रूपकद्वारा पाँचों कोशोंका वर्णन किया है और उन सबके आधार-
रूपसे सर्वान्तरतम परब्रह्मका 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इस वाक्यद्वारा निर्णय
किया है। इसके पश्चात् ब्रह्मकी असत्ता माननेवाले पुरुषकी निन्दा करते
हुए उसका अस्तित्व स्वीकार करनेवाले पुरुषकी प्रशंसा की है और उसे
'सत्' बतलाया है। फिर ब्रह्मका सर्वात्म्य प्रतिपादन करनेके लिये
'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेय' इत्यादि वाक्यद्वारा उसीको जगत्का
अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बतलाया है।
इस प्रकार सत्संज्ञक ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति दिखलाकर फिर सप्तम
अनुवाकमें असत्से ही सत्की उत्पत्ति बतलायी है। किन्तु यहाँ 'असत्'
का अर्थ अभाव न समझकर अव्याकृत ब्रह्म समझना चाहिये और 'सत्'का
व्याकृत जगत् ; क्योंकि अत्यन्ताभावसे किसी भावपदार्थकी उत्पत्ति नहीं हो
सकती और उत्पत्तिसे पूर्व सारे पदार्थ अव्यक्त थे ही। इसलिये 'असत्'
शब्द अव्याकृत ब्रह्मका ही वाचक है। वह ब्रह्म रसस्वरूप है; उस रसकी
प्राप्ति होनेपर यह जीव रसमय—आनन्दमय हो जाता है। उस रसके
लेशसे ही सारा संसार सजीव देखा जाता है। जिस समय साधनाका
परिपाक होनेपर पुरुष इस अदृश्य अशरीर अनिर्वाच्य और अनाश्रय
परमात्मामें स्थिति लाभ करता है उस समय वह सर्वथा निर्भय हो जाता
है; और जो उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे भय प्राप्त होता है।
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अतः ब्रह्ममें स्थित होना ही जीवकी अभयस्थिति है; क्योंकि वहाँ भेदका
सर्वथा अभाव है और भय भेदमें ही होता है 'द्वितीयाद्वै भयं भवति' ।
इस प्रकार ब्रह्मनिष्ठकी अभयप्राप्तिका निरूपण कर ब्रह्मके सर्वान्तर्यामित्व
और सर्वशासकत्वका वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताके आनन्दकी सर्वोत्कृष्टता
दिखलायी है। वहाँ मनुष्य, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, पितृगण, आजानज-
देव, कर्मदेव, देव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति और ब्रह्मा—इन सबके
आनन्दोंको उत्तरोत्तर शतगुण बतलाते हुए यह दिखलाया है कि निष्काम
ब्रह्मवेत्ताको वे सभी आनन्द प्राप्त हैं। क्यों न हो ? सबके अधिष्ठानभूत
परब्रह्मसे अभिन्न होनेके कारण क्या वह इन सभीका आत्मा नहीं है ।
अतः सर्वरूपसे वही तो सारे आनन्दोंका भोक्ता है। भोक्ता ही क्यों,
सर्व-आनन्दस्वरूप भी तो वही है, सारे आनन्द उसीके स्वरूपभूत
आनन्द-महोदधिके क्षुद्रातिक्षुद्र कण ही तो हैं।
इसके पश्चात् हृदयपुण्डरीकस्थ पुरुषका आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके
साथ अभेद करते हुए यह बतलाया है कि जो इन दोनोंका अभेद जानता
है वह इस लोक अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूहसे निवृत्त होकर इस
समष्टि अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय आत्माको
प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सारा प्रपञ्च उसका अपना शरीर हो
जाता है—उसके लिये अपनेसे भिन्न कुछ भी नहीं रहता। उस निर्भय
और अनिर्वाच्य स्वात्मतत्त्वकी जिसे प्राप्ति हो जाती है, उसे न तो किसीका
भय रहता है और न किसी कृत या अकृतका अनुताप ही। जब अपनेसे
भिन्न कुछ है ही नहीं तो भय किसका और क्रिया कैसी ? क्रिया तो
देश, काल या वस्तुका परिच्छेद होनेपर ही होती है; उस एक, अखण्ड,
अमर्यादित, अद्वितीय वस्तुमें किसी प्रकारकी क्रियाका प्रवेश कैसे हो
सकता है ?
इस प्रकार ब्रह्मानन्दवल्लीमें ब्रह्मविद्याका निरूपण कर भृगुवल्लीमें
उसकी प्राप्तिका मुख्य साधन पञ्चकोश-विवेक दिखलानेके लिये वरुण
और भृगुका आख्यान दिया गया है। आत्मतत्त्वका जिज्ञासु भृगु अपने
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पिता वरुणके पास जाता है और उससे प्रश्न करता है कि जिससे ये
सब भूत उत्पन्न हुए हैं, जिससे उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और
अन्तमें जिसमें ये लीन हो जाते हैं उस तत्त्वका मुझे उपदेश कीजिये ।
इसपर वरुणने अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाणी--ये ब्रह्मोपलब्धिके
छः मार्ग बतलाकर उसे तप करनेका आदेश किया और कहा कि
'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्म'--तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर,
तप ही ब्रह्म है । भृगुने जाकर मनःसमाधानरूप तप किया और इन
सबमें अन्नको ही ब्रह्म जाना । किन्तु फिर उसमें सन्देह हो जानेपर
उसने फिर वरुणके पास आकर वही प्रश्न किया और वरुणने भी फिर
वही उत्तर दिया । इसके पश्चात् उसने प्राणको ब्रह्म जाना और इसी
प्रकार पुनः-पुनः सन्देह होने और पुनः-पुनः वरुणके वही आदेश
देनेपर अन्तमें उसने आनन्दको ही ब्रह्म निश्चय किया ।
यहाँ ब्रह्मज्ञानका प्रथम द्वार अन्न था । इसीसे श्रुति यह आदेश
करती है कि अन्नकी निन्दा न करे-यह नियम है, अन्नका तिरस्कार न
करे-यह नियम है और खूब अन्नसंग्रह करे-यह भी नियम है ।
यदि कोई अपने निवासस्थानपर आवे तो उसकी उपेक्षा न करे;
सामर्थ्यानुसार अन्न, जल एवं आसनादिसे उसका अवश्य सत्कार करे ।
ऐसा करनेसे वह अन्नवान्, कीर्तिमान् तथा प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजसे
सम्पन्न होता है। इस प्रकार अन्नकी महिमाका वर्णन कर भिन्न-भिन्न
आश्रयोंमें भिन्न-भिन्न रूपसे उसकी उपासनाका विधान किया गया है।
उस उपासनाके द्वारा जब उसे अपने सर्वात्म्यका अनुभव होता है
उस समय उस लोकोत्तर आनन्दसे उन्मत्त होकर वह अपनी कृतकृत्यताको
व्यक्त करते हुए अत्यन्त विस्मयपूर्वक गा उठता है--"अहमन्नमहमन्नम-
हमन्नम् । अहमन्नादो ३ऽहमन्नादो ३ऽहमन्नादः ! अहꣳश्लोककृदहꣳश्लोक-
कृदहꣳश्लोककृद्" इत्यादि । उसकी यह उन्मत्तोक्ति उसके कृतकृत्य
हृदयका उद्गार है, यह उसका अनुभव है और यही है उसके आध्यात्मिक
संग्रामके अयत्नसाध्य भगवत्कृपालभ्य विजयका उद्घोष ।
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इस प्रकार हम देखते हैं कि इस उपनिषद्का प्रधान लक्ष्य ब्रह्म-
ज्ञान ही है। इसकी वर्णन-शैली बड़ी ही मर्मस्पर्शिनी और शृङ्खलाबद्ध
है। भगवान् शङ्कराचार्यने इसके ऊपर जो भाष्य लिखा है वह भी बहुत
विचारपूर्ण है। आशा है, विज्ञजन उससे यथेष्ट लाभ उठानेका प्रयत्न करेंगे।
इस उपनिषद्के प्रकाशनके साथ प्रथम आठ उपनिषदोंके
प्रकाशनका कार्य समाप्त हो जाता है। हमें इनके अनुवादमें श्रीविष्णु-
वापटशास्त्रीकृत मराठी-अनुवाद, श्रीदुर्गाचरण मजूमदारकृत बंगला-
अनुवाद, ब्रह्मनिष्ठ पं० श्रीपीताम्बरजीकृत हिन्दी-अनुवाद और महा-
महोपाध्याय डा० श्रीगंगानाथजी झा एवं पं० श्रीसीतारामजी शास्त्रीकृत
अंग्रेजी अनुवादसे यथेष्ट सहायता मिली है। अतः हम इन सभी महानुभावोंके
अत्यन्त कृतज्ञ हैं। फिर भी हमारी अल्पज्ञताके कारण इनमें बहुत-सी
त्रुटियाँ रह जानी स्वाभाविक हैं। उनके लिये हम कृपालु पाठकोंसे सविनय
क्षमा-प्रार्थना करते हैं और आशा करते हैं कि वे उनकी सूचना देकर
हमें अनुगृहीत करेंगे, जिससे कि हम अगले संस्करणमें उनके संशोधनका
प्रयत्न कर सकें। हमारी इच्छा है कि हम शीघ्र ही छान्दोग्य और
बृहदारण्यक भी हिन्दी-संसारके सामने रख सकें। यदि विचारशील
वाचकवृन्दने हमें प्रोत्साहित किया तो बहुत सम्भव है कि हम इस
सेवामें शीघ्र ही सफल हो सकें।
अनुवादक