ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.
This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.
The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.
विशाल दीप्ति वाले, यज्ञों में निचुड़ते हुए हरितवर्ण सोम अपने-आप हमारे पास आवें.
हमें अन्न न देने वाले एवं शत्रु नष्ट हों. देवगण हमारे कर्मों को स्वीकार करें. (१)
प्र णो धन्वन्त्विन्दवो मदच्युतो धना वा येभिर्वतो जुनीमसि.
तिरो मर्तस्य कस्य चित्परिह्वृतिं वयं धनानि विश्वधा भरेमहि.. (२)
मद टपकाने वाले सोम एवं धन हमारे पास आवें. इनकी सहायता से हम शक्तिशाली
शत्रुओं को जीतें एवं प्रत्येक मनुष्य की बाधा को पार करके सदा धन प्राप्त करें. (२)
उत स्वस्या अरात्या अरिहिं ष उतान्यस्या अरात्या वृको हि ष:.
धन्वन्न तृष्णा समरीत ताँ अभि सोम जहि पवमान दुराध्य:.. (३)
वे सोम अपने शत्रु के हननकर्त्ता और हमारे शत्रु के नाशक हैं. जैसे मरुस्थल में लोगों
को प्यास घेरे रहती है, वैसे ही सोम शत्रुओं को घेरते हैं. हे सोम! इन दोनों प्रकार के शत्रुओं
को मारो. (३)
दिवि ते नाभा परमो य आददे पृथिव्यास्ते रुरुहुः सानवि क्षिप:.
अद्रयस्त्वा बप्सति गोरधि त्वच्य१प्सु त्वा हस्तैर्दुदुहुर्मनीषिण:.. (४)
हे सोम! तुम्हारे उत्तम अंश स्वर्ग में रहकर हव्य ग्रहण करते हैं एवं वहीं से धरती के ऊंचे
स्थानों पर गिरकर वृक्ष बन गए हैं. पत्थर तुम्हारा भक्षण करते हैं एवं बुद्धिमान् लोग गाय के
चमड़े पर हाथों से तुम्हारा रस निकालते हैं. (४)
एवा त इन्दो सुभ्वं सुपेशसं रसं तुञ्जन्ति प्रथमा अभिश्रियः.
निदंनिदं पवमान नि तारिष आविस्ते शुष्मो भवतु प्रियो मद:.. (५)
हे सोम! प्रमुख अध्वर्युजन इस समय शोभन एवं सुंदर रस को निचोड़ते हैं. हे पवमान
सोम! तुम हमारे प्रत्येक शत्रु को नष्ट करो. तुम्हारा शक्ति देने वाला, प्रिय एवं नशीला रस
प्रकट हो. (५)
सूक्त—८० देवता—पवमान सोम
सोमस्य धारा पवते नृचक्षस ऋतेन देवान्हवते दिवस्परि.
बृहस्पते रवथेना वि दिद्युते समुद्रासो न सवनानि विव्यचु:.. (१)
यजमानों को देखने वाले सोम की धारा टपकती है. सोम यज्ञ के द्वारा द्युलोक के ऊपर
वर्तमान देवों का हनन करते हैं. सोम स्तोता के शब्द से चमकते हैं एवं जिस तरह धरती को
सागर घेरे हुए है, उसी प्रकार वे तीनों सवनों को व्याप्त करते हैं. (१)
यं त्वा वाजिन्नघ्न्या अभ्यनूषतायोहतं योनिमा रोहसि द्युमान्.
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मघोनामायुः प्रतिरन्महि श्रव इन्द्राय सोम पवसे वृषा मदः.. (२)
हे अन्नयुक्त सोम! किसी के द्वारा नष्ट न होने वाली स्तुतियां तुम्हारी प्रशंसा करती हैं.
तुम दीप्तिशाली बनकर स्वर्णमय हाथों द्वारा संस्कृत स्थान की ओर बढ़ते हो. हे वर्षा करने
वाले एवं नशीले सोम! तुम हव्य वाले यजमानों की आयु एवं महान् अन्न बढ़ाते हुए इंद्र के हेतु
निचुड़ते हो. (२)
इन्द्रस्य कुक्षा पवते मदिन्तम ऊर्जं वसानः श्रवसे सुमङ्गलः.
प्रत्यङ् स विश्वा भुवनाभि पप्रथे क्रीळन्हरिरत्यः स्यन्दते वृषा.. (३)
अत्यधिक नशीले, शक्तिदाता रस को ढकते हुए व शोभन कल्याण देने वाले सोम
यजमान को अन्न देने के लिए इंद्र की कोख में निचुड़ते हैं. वे सभी प्राणियों को बढ़ाते हैं. वेदी
पर क्रीड़ा करते हुए हरितवर्ण, गतिशील एवं बरसने वाले सोम टपकते हैं. (३)
तं त्वा देवेभ्यो मधुमत्तमं नरः सहस्रधारं दुहते दश क्षिपः.
नृभिः सोम प्रच्युतो ग्रावभिः सुतो विश्वान्देवाँ आ पवस्वा सहस्रजित्.. (४)
हे सोम! मनुष्य एवं उनकी दस उंगलियां देवों के लिए अत्यंत मधुर एवं हजारों धाराओं
वाले सोम को दुहती हैं. हे सोम! तुम मनुष्यों द्वारा पत्थरों की सहायता से निचुड़कर एवं
हजारों धनों को जीतकर देवों को तृप्त करो. (४)
तं त्वा हस्तिनो मधुमन्तमद्रिभिर्दुहन्त्यप्सु वृषभं दश क्षिपः.
इन्द्रं सोम मादयन्दैव्यं जनं सिन्धोरिवोर्मिः पवमानो अर्षसि.. (५)
सुंदर हाथों वाले लोगों की दस उंगलियां पत्थरों की सहायता से मधुर रस वाले एवं
अभिलाषापूरक सोम को दुहती हैं. हे सोम! तुम निचुड़ते हुए तथा इंद्र एवं अन्य देवों को
प्रसन्न करते हुए सागर की लहरों के समान जाते हो. (५)
सूक्त—८१ देवता—पवमान सोम
प्र सोमस्य पवमानस्योर्मय इन्द्रस्य यन्ति जठरं सुपेशसः.
दध्ना यदिमुन्नीता यशसा गवां दानाय शूरमुदमन्दिषुः सुताः.. (१)
जब निचोड़े हुए सोम गायों की शक्तिरूप दही के साथ मिलकर यजमान की अभिलाषा
पूरी करने के लिए शूर इंद्र को उन्मत्त करते हैं, तब शुद्ध सोम की सुंदर लहरें इंद्र के पेट में
जाती हैं. (१)
अच्छा हि सोमः कलशाँ असिष्यददत्यो न वोळ्हा रघुवर्तनिर्वृषा.
अथा देवानामुभयस्य जन्मनो विद्वाँ अश्रोत्यमृत इतश्च यत्.. (२)
सोम रथ खींचने वाले घोड़े के समान द्रोणकलश के सामने जाते हैं. शीघ्रगति वाले एवं
अभिलाषापूरक सोम देवों के दोनों जन्मों को जानते हुए इस धरती एवं द्युलोक में यज्ञ को
व्याप्त करते हैं. (२)
आ नः सोम पवमानः किरा वस्विन्दो भव मघवा राधसो महः.
शिक्षा वयोधो वसवे सु चेतुना मा नो गयमारे अस्मत्परा सिचः.. (३)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमें गो आदि धन सब ओर से दो. हे दीप्तिशाली एवं धनी
सोम! तुम हमें महान् धन दो. हे धारण करने वाले सोम! मुझ सेवक के लिए अपने उत्तम ज्ञान
के द्वारा सुख दो एवं हमें देने योग्य धन हमसे दूर मत करो. (३)
आ नः पूषा पवमानः सुरातयो मित्रो गच्छन्तु वरुणः सजोषसः.
बृहस्पतिर्मरुतो वायुरश्विना त्वष्टा सविता सुयमा सरस्वती.. (४)
शोभन दान करने वाले पूषा, सोम, मित्र, वरुण, बृहस्पति, मरुत्, वायु, अश्विनीकुमार,
त्वष्टा, सविता एवं शोभन शरीर वाली सरस्वती मिलकर हमारे यज्ञ में आवें. (४)
अभे द्यावापृथिवी विश्वमिन्वे अर्यमा देवो अदितिर्विधाता.
भगो नृशंस उर्व१न्तरिक्षं विश्वे देवाः पवमानं जुषन्त.. (५)
सर्वव्यापक द्यावा-पृथिवी, अर्यमा देव, अदिति, विधाता, प्रशंसनीय भग, विस्तृत
अंतरिक्ष एवं विश्वेदेव निचुड़ते हुए सोम का सेवन करें. (५)
सूक्त-८२ देवता-पवमान सोम
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्.
पुनानो वारं पर्येत्यव्ययं श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदम्.. (१)
दीप्तिशाली, वर्षा करने वाले एवं हरितवर्ण सोम निचोड़े गए. राजा के समान दर्शनीय
सोम जल को लक्ष्य करके शब्द करते हैं. सोम शुद्ध होकर भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की
ओर ऐसे जाते हैं. जैसे बाज अपने घोंसले की ओर जाता है. सोम अपने जलपूर्ण स्थान की
ओर निचुड़ते हैं. (१)
कविर्वेधस्या पर्येषि माहिनमत्यो न मृष्टो अभि वाजमर्षसि.
अपसेधन्दुरिता सोम मृळय घृतं वसानः परि यासि निर्णिजम्.. (२)
हे क्रांतदर्शी सोम! तुम यज्ञ करने की इच्छा से पूजनीय दशापवित्र की ओर जाते हो एवं
जल से धुलकर युद्ध में जाने वाले घोड़े के समान चलते हो. हे सोम! तुम जल में मिलकर
दशापवित्र की ओर जाते हो. तुम हमारे सभी पापों को नष्ट करके हमें सुखी करो. (२)
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पर्जन्यः पिता महिषस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिषु क्षयं दधे.
स्वसार आपो अभि गा उतासरन्त्सं ग्रावभिर्नसते वीते अध्वरे.. (३)
महान् एवं पत्तों वाले सोम के पिता मेघ हैं. वे सोम धरती की नाभि के समान पर्वतों के
पत्थरों पर रहते हैं. उंगलियां गायों का दूध जल के पास ले जाती हैं. सोम शोभन यज्ञ में
पत्थरों के साथ मिलते हैं. (३)
जायेव पत्यावधि शेव मंहसे पज्ज्राया गर्भं शृणुहि ब्रवीमि ते.
अन्तर्वाणीषु प्र चरा सु जीवसेऽनिन्द्यो वृजने सोम जागृहि.. (४)
हे धरती के पुत्र सोम! मैं जो स्तुतियां बोलता हूं, उन्हें सुनो. पत्नी जैसे अपने पति को
सुख देती है, उसी प्रकार तुम यजमान को सुख देते हो. तुम हमारे जीवन के लिए हमारी
स्तुतियों के मध्य गतिशील बनो. हे स्तुति योग्य सोम! तुम हमारे शक्तिशाली शत्रुओं के प्रति
सावधान रहना. (४)
यथा पूर्वेभ्यः शतसा अमृध्रः सहस्रसाः पर्यया वाजमिन्दो.
एवा पवस्व सुविताय नव्यसे तव व्रतमन्वापः सचन्ते.. (५)
हे सोम! तुमने जिस प्रकार पूर्ववर्ती महर्षियों को सैकड़ों एवं हजारों संपत्तियां दी थीं,
उसी प्रकार इस समय हमारी नवीन उन्नति के लिए टपको. जल तुम्हारे कर्म के लिए तुमसे
मिलते हैं. (५)
सूक्त—८३ देवता—पवमान सोम
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः.
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदृहन्तस्तत्समाशत.. (१)
हे मंत्रों के स्वामी सोम! तुम्हारा पवित्र अंश सब जगह विस्तृत है. तुम प्रभु बनकर पीने
वाले के अंगों में फैल जाते हो. तुम्हारे पवित्र अंश को तपस्यारहित एवं अपरिपक्व व्यक्ति
प्राप्त नहीं कर सकता. परिपक्व एवं यज्ञ करने वाले लोग ही तुम्हारे पवित्र अंश को प्राप्त
करते हैं. (१)
तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे शोचन्तो अस्य तन्तवो व्यस्थिरन्.
अवन्त्यस्य पवीतारमाशवो दिवस्पृष्ठमधि तिष्ठन्ति चेतसा.. (२)
शत्रुओं को कष्ट देने वाले सोम का पवित्र अंश द्युलोक के ऊंचे स्थान पर विस्तृत है।
उसकी तेजस्वी किरणें विविध प्रकार से स्थित होती हैं. सोम का शीघ्रगामी रस यजमान की
रक्षा करता है. इसके बाद वह देवों के समीप जाने वाली बुद्धि से स्वर्ग के ऊंचे स्थान में
मिलता है. (२)
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अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा बिभर्ति भुवनानि वाजयुः.
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः.. (३)
सूर्य से संबंधित एवं प्रमुख सोम दीप्तिशाली बनते हैं. जल बरसाने वाले सोम अन्न की
इच्छा करते हुए प्राणियों को पुष्ट करते हैं. इन बुद्धिमान् सोम की बुद्धि द्वारा मनुष्यों को देखने
वाले देव संसार को बनाते हैं एवं पालक देव ओषधियों में गर्भ धारण करते हैं. (३)
गन्धर्व इत्था पदमस्य रक्षति पाति देवानां जनिमान्यद्भुतः.
गृभ्णाति रिपुं निधया निधापतिः सुकृत्तमा मधुनो भक्षमाशत.. (४)
जल के धारणकर्त्ता आदित्य सोम के स्थान की रक्षा करते हैं. अद्भुत सोम देवों के
जन्मों की रक्षा करते हैं एवं पाशों के स्वामी बनकर हमारे शत्रु को पाशों में जकड़ते हैं.
अतिशय पुण्यशाली लोग मधुर सोम का रस पान करते हैं. (४)
हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसानः परि यास्यध्वरम्.
राजा पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्रभृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत्.. (५)
हे जलयुक्त सोम! तुम जल को आच्छादित करते हुए विशाल यज्ञशाला में जाते हो. हे
पवित्र रथ वाले राजा सोम! तुम युद्ध में जाते हो. हे अपरिमित गमन वाले सोम! तुम हमारे
लिए बहुत सा अन्न जीतते हो. (५)
सूक्त—८४ देवता—पवमान सोम
पवस्व देवमादनो विचर्षणिर्प्स इन्द्राय वरुणाय वायवे.
कृधी नो अद्य वरिवः स्वस्तिमदुरुक्षितौ गृणीहि दैव्यं जनम्.. (१)
हे देवों को प्रसन्न करने वाले, विशेषद्रष्टा एवं जल देने वाले सोम! तुम इंद्र, वरुण एवं
वायु के लिए टपको, हमें विनाशरहित धन दो एवं इस विशाल धरती पर मुझे देवों का भक्त
कहकर पुकारो. (१)
आ यस्तस्थौ भुवनान्यमर्त्यो विश्वानि सोमः परि तान्यर्षति.
कृण्वन्त्सञ्चतं विचृतमभिष्टय इन्दुः सिषक्त्युषसं न सूर्यः.. (२)
जो मरणरहित सोम भुवनों में व्याप्त हैं एवं सभी लोकों की चारों ओर से रक्षा करते हैं,
वही सोम यज्ञ को फलयुक्त असुरों से विमुख करते हुए इस प्रकार उसी यज्ञ का सहारा लेते
हैं, जैसे सूर्य विश्व को प्रकाशित करके उसी का सहारा लेते हैं. (२)
आ यो गोभिः सृज्यत ओषधीष्वा देवानां सुम्न इषयन्नुपावसुः.
आ विद्युता पवते धारया सुत इन्द्रं सोमो मादयन्दैव्यं जनम्.. (३)
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जो देवों के सुख के निमित्त चंद्रकिरणों द्वारा ओषधियों में स्थापित किए जाते हैं, वे देवों
के समीप जाने के इच्छुक, शत्रुओं से धन प्राप्त करने वाले सोम सभी देवों के साथ इंद्र को
प्रसन्न करते हैं एवं दीप्तियुक्त धारा के साथ निचोड़ते हैं. (३)
एष स्य सोमः पवते सहस्रजिद्विन्वानो वाचमिषिरामुषर्बुधम्.
इन्दुः समुद्रमुदियर्ति वायुभिरेन्द्रस्य हार्दि कलशेषु सीदति.. (४)
हजारों धनों के नेता सोम स्तोत्रों के प्रति जाने वाली व प्रातःकाल प्रबुद्ध वाणी को प्रेरित
करते हुए पवित्र होते हैं एवं वायु द्वारा प्रेरित होकर इंद्र के प्रिय द्रोणकलश में जाते हैं. (४)
अभि त्यं गावः पयसा पयोवृधं सोमं श्रीणन्ति मतिभिः स्वर्विदम्.
धनञ्जयः पवते कृत्व्यो रसो विप्रः कविः काव्येना स्वर्र्चनाः.. (५)
दूध बढ़ाने वाले सोम को अपने दूध से भिगोने के लिए गाएं आती हैं. सोम स्तुतियां
सुनकर सब कुछ प्रदान करते हैं. कर्म करने में कुशल, रसयुक्त, मेधावी, कवि, अन्नयुक्त एवं
शत्रु का धन जीतने वाले सोम यज्ञकर्म द्वारा शुद्ध होते हैं. (५)
सूक्त—८५ देवता—पवमान सोम
इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्रवाऽपामीवा भवतु रक्षसा सह.
मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्त्विन्दवः.. (१)
हे सोम! तुम भली प्रकार निचोड़कर इंद्र के लिए सब ओर जाओ. राक्षसों के साथ-साथ
हमारे रोग भी दूर हों. पापी लोग तुम्हारा रस पीकर प्रमुदित न हों. इस यज्ञ में तुम्हारे रस
धनयुक्त हों. (१)
अस्मान्त्समर्ये पवमान चोदय दक्षो देवानामासि हि प्रियो मदः.
जहि शत्रूँरभया भन्दनायतः पिबेन्द्र सोममव नो मृधो जहि.. (२)
हे पवमान सोम! हमें संग्राम की ओर भेजो. तुम देवों में दक्ष, प्रिय एवं मदकारक हो.
हम तुम्हारी स्तुति के इच्छुक हैं. तुम हमारे शत्रुओं को मारो एवं हमारे पास आओ. हे इंद्र! तुम
सोमरस पिओ और हमारे शत्रुओं को मारो. (२)
अदब्ध इन्दो पवसे मदिन्तम आत्मेन्द्रस्य भवसि धासिरुत्तमः.
अभि स्वरन्ति बहवो मनीषिणो राजानमस्य भुवनस्य निसंते.. (३)
हे अहिंसित एवं अत्यंत नशीले सोम! तुम शुद्ध होते हो. तुम स्वयं ही उत्तम होकर इंद्र के
भक्ष्य बनते हो. बहुत से स्तोता इस संसार के राजा सोम की स्तुति करते हैं एवं उसके समीप
जाते हैं. (३)
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सहस्रणीथः शतधारो अद्भुत इन्द्रायेन्दुः पवते काम्यं मधु.
जयन्क्षेत्रमभ्यर्षा जयन्नप उरुं नो गातुं कृणु सोम मीढ्वः.. (४)
अनेक प्रकार की आंखों वाले, असीमित धाराओं से युक्त एवं अद्भुत सोम इंद्र के लिए
मनचाहा मधुर रस टपकाते हैं. हे सोम! तुम हमारे लिए खेत और जल को जीतकर दशापवित्र
की ओर आओ एवं जल बरसाने वाले बनकर हमारा मार्ग चौड़ा करो. (४)
कनिक्रदत्कलशे गोभिरज्यसे व्य१व्ययं समया वारमर्षसि.
मर्मृज्यमानो अत्यो न सानसिरिन्द्रस्य सोम जठरे समक्षरः.. (५)
हे शब्द करते हुए एवं द्रोणकलश में स्थित सोम! तुम गायों के दूध-दही में मिलाए जाते
हो एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र के पास जाते हो. मसले जाते हुए तुम घोड़े के समान
सेवा करने योग्य हो. तुम इंद्र के पेट में टपको. (५)
स्वादुः पवस्व दिव्याय जन्मने स्वादुरिन्द्राय सुहवीतुनाम्ने.
स्वादुर्मित्राय वरुणाय वायवे बृहस्पतये मधुमाँ अदाभ्यः.. (६)
हे स्वादयुक्त सोम! तुम दिव्य जन्म वाले देवों एवं शोभन नाम वाले इंद्र के लिए रस
टपकाओ. तुम मधुर रस वाले एवं दूसरों द्वारा अपराजेय हो. तुम मित्र, वरुण, वायु और
बृहस्पति के लिए रस बरसाओ. (६)
अत्यं मृजन्ति कलशे दश क्षिपः प्र विप्राणां मतयो वाच ईरते.
पवमाना अभ्यर्षन्ति सुष्टुतिमेन्द्रं विशन्ति मदिरास इन्दवः.. (७)
अध्वर्यु लोगों की दस उंगलियां घोड़े के समान गतिशील सोम को कलश में मसलती हैं.
ब्राह्मणों के बीच बैठे स्तोता स्तुतियां बोलते हैं. शुद्ध होते हुए सोम जाते हैं. नशीले सोम इंद्र
के उदर में प्रवेश करते हैं. (७)
पवमानो अभ्यर्षा सुवीर्यमुर्वी गव्यूतिं महि शर्म सप्रथः.
माकिर्नो अस्य परिभूतिरीशतेन्दो जयेम त्वया धनंधनम्.. (८)
हे सोम! तुम शुद्ध होते हुए हमें शोभन शक्ति, दो कोस धरती और विशाल घर दो. तुम
हमारे यज्ञकर्म से द्वेष करने वालों को हमारा स्वामी मत बनाओ. हम तुम्हारी कृपा से बहुत
धन जीतें. (८)
अधि द्यामस्थाद्वृषभो विचक्षणोऽरूरुचद्दिवो रोचना कविः.
राजा पवित्रमत्येति रोरुवद्दिवः पीयूषं दुहते नृचक्षसः.. (९)
बरसने वाले एवं विशेषद्रष्टा सोम द्युलोक में स्थित थे. सोम ने द्युलोक में तारों को
चमकाया. कवि एवं राजा सोम दशापवित्र को लांघकर जाते हैं. मनुष्यों को देखने वाले सोम
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शब्द करते हुए स्वर्ग के अमृत को दुहते हैं. (९)
दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतो वेना दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम्.
अप्सु द्रप्सं वावृधानं समुद्र आ सिन्धोरूर्मौ मधुमन्तं पवित्र आ.. (१०)
मधुर वचन बोलने वाले वेनगोत्रीय ऋषि यज्ञ के हविर्धान नामक स्थान में अलग-अलग
सोमरस निचोड़ते हैं एवं ऊंचे स्थान में स्थित जल बरसाने वाले, जल में बढ़ने वाले एवं
रसरूप सोम को सागर के समान विशाल द्रोणकलश में जल की लहरों से सींचते हैं. वे मीठे
रस वाले सोम को दशापवित्र में निचोड़ते हैं. (१०)
नाके सुपर्णमुपपत्तिवांसं गिरो वेनानामकृपन्त पूर्वीः.
शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्ततं हिरण्ययं शकुनं क्षामणि स्थाम्.. (११)
द्युलोक में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले एवं गिरने वाले सोम की प्रशंसा हमारी स्तुतियां
करती हैं. रोते हुए शिशु के समान शुद्ध करने योग्य, स्वर्णमय, पंखों से युक्त एवं धरती पर
स्थित सोम को हमारी स्तुतियां प्राप्त करती हैं. (११)
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थाद्विश्वा रूपा प्रतिचक्षाणो अस्य.
भानुः शुक्रेण शोचिषा व्यद्यौत्प्रारूरुचद्रोदसी मातरा शुचिः.. (१२)
उन्नत एवं किरणें धारण करने वाले सोम आदित्य के मध्य स्थित होते हैं एवं इस
आदित्य के सभी रूपों को देखते हैं. सूर्य में स्थित सोम दीप्त तेज के द्वारा प्रकाशित होते हैं.
दीप्ति वाले सूर्य विश्व का निर्माण करने वाली द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करते हैं. (१२)
सूक्त—८६ देवता—पवमान सोम
प्र त आशवः पवमान धीजवो मदा अर्षन्ति रघुजा इव त्मना.
दिव्याः सुपर्णा मधुमन्त इन्दवो मदिन्तमासः परि कोशमासते.. (१)
हे पवमान सोम! तुम्हारे व्यापक, मन के समान तेज चाल वाले तथा नशीले रस, तेज
चलने वाली घोड़ियों के बछड़ों के समान स्वयं ही चलते हैं. स्वर्ग में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले,
मधुरतायुक्त एवं अत्यंत नशीले रस द्रोणकलश में जाते हैं. (१)
प्र ते मदासो मदिरास आशवोऽसृक्षत रथ्यासो यथा पृथक्.
धेनुर्न वत्सं पयसाभि वज्रिणमिन्द्रमिन्दवो मधुमन्त ऊर्मयः.. (२)
हे सोम! मदकारक, व्याप्त एवं घोड़े के समान तेज चलने वाले रस अलग-अलग बनाए
जाते हैं. वे मधुर व अधिक रस वाले सोम वज्रधारी इंद्र के पास उसी प्रकार जाते हैं, जिस
प्रकार दुधारू गाय बछड़े के पास जाती है. (२)
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अत्यो न हियानो अभि वाजमर्ष स्वर्विस्कोशं दिवो अद्रिमातरम्.
वृषा पवित्रे अधि सानो अव्यये सोमः पुनान इन्द्रियाय धायसे.. (३)
हे सोम! तुम प्रेरित अश्व के समान संग्राम में जाओ. हे सब जानने वाले सोम! तुम
द्युलोक से जल के निर्माता द्रोणकलश के पास जाओ. वर्षा करने वाले सोम के धारणकर्त्ता
इंद्र के लिए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर शुद्ध होते हैं. दशापवित्र पर्वत की चोटी के
समान ऊंचा है. (३)
प्र त आश्विनीः पवमान धीजुवो दिव्या असृग्रन्पयसा धरीमणि.
प्रान्तर्ऋषयः स्थाविरीरसृक्षत ये त्वा मृजन्त्यृषिषाण वेधसः.. (४)
हे पवमान सोम! तुम्हारी फैलने वाली, मन के समान वेग वाली, दिव्य एवं दूध से युक्त
धाराएं द्रोणकलश में गिरती हैं. हे ऋषियों द्वारा सेवित सोम! तुम्हारा निर्माण करने वाले ऋषि
तुम्हारी धाराएं द्रोणकलश के मध्य में कर देते हैं. (४)
विश्वा धामानि विश्वचक्ष ऋभ्वसः प्रभोस्ते सतः परि यन्ति केतवः.
व्यानशिः पवसे सोम धर्मभिः पतिर्विश्वस्य भुवनस्य राजसि.. (५)
हे सबको देखने वाले प्रभु सोम! तुम्हारी विस्तृत किरणें सभी तेजों को प्रकाशित करती
हैं. हे व्यापक सोम! तुम रस-धाराओं के रूप में निचुड़ते हो एवं सकल भुवन के स्वामी के
रूप में सुशोभित होते हो. (५)
उभयतः पवमानस्य रश्मयो ध्रुवस्य सतः परि यन्ति केतवः.
यदी पवित्रे अधि मृज्यते हरिः सत्ता नि योना कलशेषु सीदति.. (६)
शुद्ध होते हुए, निश्चल एवं वर्तमान सोम का ज्ञान कराने वाली किरणें इधर-उधर चलती
हैं. हरे रंग वाले एवं स्थित रहने वाले सोम जब दशापवित्र पर छाने जाते हैं, तब द्रोणकलश में
रुकते हैं. (६)
यज्ञस्य केतुः पवते स्वध्वरः सोमो देवानामुप याति निष्कृतम्.
सहस्रधारः परि कोशमर्षति वृषा पवित्रमत्येति रोरुवत्.. (७)
यज्ञ का ज्ञान कराने वाले एवं शोभन यज्ञ वाले सोम निचोड़े जाते हैं. वे सोम देवों के
विशुद्ध स्थान को जाते हैं, हजार धाराओं वाले बनकर द्रोणकलश में पहुंचते हैं एवं सींचने
वाले सोम शब्द करते हुए दशापवित्र को पार करके नीचे जाते हैं. (७)
राजा समुद्रं नद्यो३ वि गाहतेऽपामूर्मिं सचते सिन्धुषु श्रितः.
अध्यस्थात्सानु पवमानो अव्ययं नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवः.. (८)
राजा सोम अंतरिक्ष एवं वहां स्थित जल में मिलते हैं तथा जल नीचे बरसाते हैं. जल में
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स्थित सोम पुकारे जाने पर दशापवित्ररूपी ऊंचे स्थान पर स्थित होते हैं जो धरती पर नाभि
हैं. सोम महान् द्युलोक को धारण करने वाले हैं. (८)
दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदद् द्यौश्च यस्य पृथिवी च धर्मभिः.
इन्द्रस्य सख्यं पवते विवेविदत्सोमः पुनानः कलशेषु सीदति.. (९)
सोम द्युलोक के ऊंचे स्थान को शब्दपूर्ण करते हुए चिल्लाते हैं एवं अपनी शक्ति से
द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. सोम इंद्र की मित्रता को जानते हुए छनते हैं एवं द्रोणकलशों
में स्थित होते हैं. (९)
ज्योतिर्यज्ञस्य पवते मधु प्रियं पिता देवानां जनिता विभूवसुः.
दधाति रत्नं स्वधयोरपीच्यं मदिन्तमो मत्सर इन्द्रियो रसः.. (१०)
यज्ञ के प्रकाशक सोम देवों के प्रिय मीठे रस को टपकाते हैं. देवों के पालक, सबको
उत्पन्न करने वाले एवं अधिक धन वाले सोम द्यावा-पृथिवी का रमणीय धन स्तोताओं को देते
हैं. अत्यंत नशीले सोम इंद्र को बढ़ाने वाले एवं रसपूर्ण हैं. (१०)
अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः.
हरिर्मित्रस्य सदनेषु सीदति मर्मृजानोऽविभिः सिन्धुभिर्वृषा.. (११)
गतिशील, द्युलोक के स्वामी, सौ धाराओं वाले, विशेष द्रष्टा व हरितवर्ण सोम देवों के
मित्र के समान यज्ञ में शब्द करते हुए द्रोणकलश में स्थित होते हैं. सोम छानने के साधन
दशापवित्र की सहायता से शुद्ध किए गए एवं वर्षाकारक हैं. (११)
अग्रे सिन्धूनां पवमानो अर्षत्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छति.
अग्रे वाजस्य भजते महाधनं स्वायुधः सोतृभिः पूयते वृषा.. (१२)
पवमान एवं उत्तम सोम जलों, माध्यमिका वाणी एवं किरणों के आगे जाते हैं. शोभन
आयुधों वाले एवं वर्षक सोम अन्न पाने के लिए संग्राम करते हैं एवं ऋत्विजों द्वारा निचोड़े
जाते हैं. (१२)
अयं मतवाञ्छकुनो यथा हितोऽव्ये ससार पवमान ऊर्मिणा.
तव क्रत्वा रोदसी अन्तरा कवे शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते.. (१३)
स्तोत्रयुक्त, शोधित होते हुए एवं प्रेरित सोमरस के साथ पक्षी के समान दशापवित्र की
ओर जाते हैं. हे मेधावी इंद्र! शुद्ध सोम तुम्हारे यज्ञकर्म के कारण ही द्यावा-पृथिवी के मध्य
निचोड़े जाते हैं. (१३)
द्रापिं वसानो यजतो दिविस्पृशमन्तरिक्षप्रा भुवनेष्वर्पितः.
स्वर्जञानो नभसाभ्यक्रमीत्प्रत्नमस्य पितरमा विवासति.. (१४)
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स्वर्ग को छूने वाले, तेजरूप कवच को पहनने वाले, यज्ञ के योग्य एवं जल से अंतरिक्ष
को पूर्ण करने वाले सोम जल में मिलकर एवं स्वर्ग को उत्पन्न करते हुए जल के साथ बहते हैं
एवं जल के पालक तथा प्राचीन इंद्र की सेवा करते हैं. (१४)
सो अस्य विशे महि शर्म यच्छति यो अस्य धाम प्रथमं व्यानशे.
पदं यदस्य परमे व्योमन्यतो विश्वा अभि सं याति संयतः. (१५)
सोम इंद्र को प्रवेश करने में बहुत सुख देते हैं. सोम ने इंद्र के तेजपूर्ण शरीर को पहले
प्राप्त किया था. उत्तम वेदी के ऊपर सोम का स्थान है. सोमरस से तृप्त होकर इंद्र सभी युद्धों
में जाते हैं. (१५)
प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम्.
मर्यइव युवतिभिः समर्षति सोमः कलशे शतयाम्ना पथा.. (१६)
सोम इंद्र के पेट में जाते हैं. मित्र होने के कारण सोम इंद्र के उदर को कष्ट नहीं पहुंचाते.
पुरुष जिस प्रकार युवतियों से मिलते हैं, उसी प्रकार सोम जल में मिलते हैं एवं सौ छेदों वाले
दशापवित्र के मार्ग से कलश में जाते हैं. (१६)
प्र वो धियो मन्द्रयुवो विपन्युवः पनस्युवः संवसनेष्वक्रमूः.
सोमं मनीषा अभ्यनूषत स्तुभोऽभि धेनवः पयसेमशिश्रयुः.. (१७)
हे सोम! तुम्हारा ध्यान करने वाले एवं तुम्हारे मादक शब्द एवं स्तुति को सुनने की इच्छा
करने वाले स्तोता निवासयोग्य यज्ञशालाओं में चलते-फिरते हैं. मन को वश में करने वाले
स्तोता तुम्हारी स्तुति करते हैं एवं गाएं तुम्हें अपने दूध से भिगोती हैं. (१७)
आ नः सोम संयतं पिप्यूषीमिषमिन्दो पवस्व पवमानो अस्रिधम्.
या नो दोहते त्रिरहन्नस्रुषी क्षुमद्वाजवन्मधुमत्सुवीर्यम्.. (१८)
हे दीप्त एवं शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमें एकत्र किया हुआ, वृद्धियुक्त एवं ह्रासरहित
अन्न दो. वह अन्न तीनों सवनों में बिना बाधा के प्राप्त होता है. वह शब्दयुक्त, शक्तिशाली,
मधुर एवं शोभन संतान देने वाला है. (१८)
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नः प्रतरीतोषसो दिवः.
क्राणा सिन्धूनां कलशाँ अवीवशदिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः.. (१९)
स्तोताओं के अभिलाषापूरक, विशेष रूप से देखने वाले व दिवस, उषा एवं द्युलोक को
बढ़ाने वाले तथा जलों के उत्पादक सोम शुद्ध होते हैं, कलशों में प्रवेश करना चाहते हैं तथा
मनीषियों द्वारा प्रशंसित होकर इंद्र के उदर में जाने के लिए टपकते हैं. (१९)
मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशाँ अचिऋदत्.
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त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरदिन्द्रस्य वायोः सख्याय कर्तवे.. (२०)
प्राचीन कवि एवं ऋत्विजों द्वारा नियमित सोम कलशों में जाने के लिए शब्द करते हुए
निचुड़ते हैं. सोम इंद्र एवं वायु के साथ मित्रता करने के लिए इंद्र के निमित्त जल उत्पन्न करते
हैं एवं मधुर रस टपकाते हैं. (२०)
अयं पुनान उषसो वि रोचयदयं सिन्धुभ्यो अभवदु लोककृत्.
अयं त्रिः सप्त दुदुहान आशिरं सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः.. (२१)
शुद्ध होते हुए सोम उषाओं को विशेष रूप से प्रकाशित करते हैं. लोककर्त्ता सोम जल
में बढ़ते हैं. इक्कीस गायों का दूध दुहते हुए मदकारक सोम उदर में जाने के लिए टपकते हैं.
(२१)
पवस्व सोम दिव्येषु धामसु सृजान इन्दो कलशे पवित्र आ.
सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतः सूर्यमारोहयो दिवि.. (२२)
हे कलश एवं दशापवित्र में निर्मित एवं दीप्त सोम! तुम देवों के उदरों में निचुड़ो. इंद्र के
पेट में जाकर शब्द करने वाले एवं ऋत्विजों द्वारा बुलाए हुए सोम ने सूर्य को द्युलोक में
आरोहित किया. (२२)
अद्रिभिः सुतः पवसे पवित्र आँ इन्द्विन्द्रस्य जठरेष्वाविशन्.
त्वं नृचक्षा अभवो विचक्षण सोम गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरप.. (२३)
हे सोम! तुम पत्थरों की सहायता से निचुड़कर इंद्र के पेट में प्रवेश करते हुए दशापवित्र
पर छाने जाते हो. हे विशेष द्रष्टा सोम! तुम मानवों को कृपादृष्टि से देखते हो. तुमने
अंगिरागोत्रीय ऋषियों के कल्याण के लिए उस पर्वत को आवरणरहित किया जो गाएं छिपाए
हुए था. (२३)
त्वां सोम पवमानं स्वाध्योऽनु विप्रासो अमदन्नवस्यवः.
त्वां सुपर्ण आभरद्दिवस्परिन्दो विश्वाभिर्मतिभिः परिष्कृतम्.. (२४)
हे शुद्ध होते हुए सोम! शोभन कर्मों वाले मेधावी स्तोता रक्षा की अभिलाषा से तुम्हारी
स्तुति करते हैं. हे विविध स्तुतियों से अलंकृत सोम! शोभन पंखों वाला बाज तुम्हें स्वर्गलोक
से लाया. (२४)
अव्ये पुनानं परि वार ऊर्मिणा हरिं नवन्ते अभि सप्त धेनवः.
अपामुपस्थे अध्यायवः कविर्मृतस्य योना महिषा अहेषत.. (२५)
भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर रस के द्वारा सब ओर से शुद्ध होते हुए हरे रंग के
सोम से सात नदियां मिलती हैं. महान् पुरुष मेधावी सोम को अंतरिक्ष के जल में जाने को
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प्रेरित करते हैं. (२५)
इन्दुः पुनानो अति गाहते मृधो विश्वानि कृण्वन्त्सुपथानि यज्यवे.
गाः कृण्वानो निर्णिजं हर्यतः कविरत्यो न क्रीळन्परि वारमर्षति.. (२६)
दीप्तिशाली सोम पवित्र होते समय यजमान के कल्याण के लिए सभी मार्ग सुगम बनाते
हुए शत्रुओं को हराकर कलश में जाते हैं. सुंदर एवं मेधावी सोम अश्व के समान क्रीड़ा करते
हुए एवं अपना रूप गोदुग्ध के समान बनाते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं.
(२६)
अस्रश्वतः शतधारा अभिश्रियो हरिं नवन्तेऽव ता उदन्युवः.
क्षिपो मृजन्ति परि गोभिरावृतं तृतीये पृष्ठे अधि रोचने दिवः.. (२७)
आपस में मिली हुई, सौ धाराओं वाली व सोम का सहारा लेने वाली सूर्यकिरणें हरे रंग
के सोम को प्राप्त करती हैं. उंगलियां किरणों से ढके हुए सोम एवं द्युलोक के दीप्त स्थान पर
स्थित सोम को मसलती हैं. (२७)
तवेमाः प्रजा दिव्यस्य रेतसस्त्वं विश्वस्य भुवनस्य राजसि.
अथेद् विश्वं पवमान ते वशे त्वमिन्दो प्रथमो धामधा असि.. (२८)
हे सोम! तुम्हारे दीप्त वीर्य से ये सब प्रजाएं उत्पन्न हुई हैं. तुम सारे संसार के स्वामी हो.
यह सारा विश्व तुम्हारे वश में है. तुम सबसे प्रमुख एवं तेजधारी हो. (२८)
त्वं समुद्रो असि विश्ववित्कवे तवेमाः पञ्च प्रदिशो विधर्मणि.
त्वं द्यां च पृथिवीं चाति जभ्रिषे तव ज्योतींषि पवमान सूर्यः.. (२९)
हे मेधावी सोम! तुम जलवर्षा के साधन एवं विश्व को जानने वाले हो. ये पांचों दिशाएं
तुम्हें ही आधार बनाती हैं. तुम द्युलोक एवं पृथ्वी को धारण करते हो एवं सूर्य तुम्हारी ज्योति
को विस्तृत करता है. (२९)
त्वं पवित्रे रजसो विधर्मणि देवेभ्यः सोम पवमान पूयसे.
त्वामुशिजः प्रथमा अगृभ्णत तुभ्येमा विश्वा भुवनानि येमिरे.. (३०)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम देवों के निमित्त रस धारण करने वाले दशापवित्र पर निचोड़े
जाते हो. अभिलाषा करने वाले प्रमुख पुरोहित तुम्हें ग्रहण करते हैं. सारे प्राणी तुम्हारे लिए
अपने-आपको अर्पित करते हैं. (३०)
प्र रेभ एत्यति वारमव्ययं वृषा वनेष्वव चक्रदद्धरिः.
सं धीतयो वावशाना अनूषत शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्रतम्.. (३१)
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शब्द करने वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं. वर्षा करने वाले
एवं हरे रंग के सोम जल में क्रंदन करते हैं. ध्यान करने वाली एवं सोम की कामना करने वाली
स्तुतियां शिशु के समान संस्कारयोग्य एवं शब्द करते हुए सोम को अपना विषय बनाती हैं.
(३१)
स सूर्यस्य रश्मिभिः परि व्यत तन्तुं तन्वानस्त्रिवृतं यथा विदे.
नयन्नृतस्य प्रशिषो नवीयसीः पतिर्जनीनामप याति निष्कृतम्.. (३२)
सोम तीनों सवनों के द्वारा यज्ञ का विस्तार करते हुए अपने-आपको सूर्यकिरणों से घेरते
हैं एवं यज्ञ को जानते हैं. प्रजाओं के पालक सोम यजमान की नवीन स्तुतियों को प्राप्त करते
हुए शुद्ध पात्र में जाते हैं. (३२)
राजा सिन्धूनां पवते पतिर्दिव ऋतस्य याति पथिभिः कनिक्रदत्.
सहस्रधारः परि षिच्यते हरिः पुनानो वाचं जनयन्नुपावसुः.. (३३)
नदियों के ईश्वर एवं स्वर्ग के स्वामी सोम शुद्ध किए जाते हैं एवं शब्द करते हुए यज्ञ के
मार्ग से जाते हैं. असीम धाराओं वाले सोम ऋत्विजों द्वारा पात्रों में भरे जाते हैं. सोम हरे रंग
वाले, शब्द करते हुए, शुद्ध होने वाले एवं समीप जाने वाले हैं. (३३)
पवमान मह्यर्णो वि धावसि सूरो न चित्रो अव्ययानि पव्यया.
गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिः सुतो महे वाजाय धन्याय धन्वसि.. (३४)
हे पवमान सोम! तुम अधिक रस देते हो. हे सूर्य के समान पूज्य सोम! तुम भेड़ के
बालों से बने दशापवित्र पर जाते हो. हे बहुतों द्वारा पवित्र एवं ऋत्विजों द्वारा पत्थरों की
सहायता से निचोड़े गए सोम! तुम महान् युद्धों में धनप्राप्ति के लिए जाते हो. (३४)
इषमूर्जं पवमानाभ्यर्षसि श्येनो न वंसु कलशेषु सीदसि.
इन्द्राय मद्धा मद्यो मदः सुतो दिवो विष्टम्भ उपमो विचक्षणः.. (३५)
हे पवमान सोम! तुम अन्न और बल को प्राप्त करते हो. बाज जिस प्रकार अपने घोंसले
में जाता है, उसी प्रकार तुम कलशों में स्थित होते हो. हे सोम! तुम स्वर्ग के समान, स्वर्ग को
साधने वाले एवं विशेष द्रष्टा हो. तुम्हारा नशीला रस इंद्र के लिए निचोड़ा गया है. (३५)
सप्त स्वसारो अभि मातरः शिशुं नवं जज्ञानं जेन्यं विपश्चितम्.
अपां गन्धर्वं दिव्यं नृचक्षसं सोमं विश्वस्य भुवनस्य राजसे.. (३६)
माता जिस प्रकार बालक के पास जाती है, उसी प्रकार सात नदियां नवीन उत्पन्न,
जीतने वाले, विद्वान्, जलों को जन्म देने वाले, जलधारणकर्त्ता, स्वर्ग में उत्पन्न एवं मानवों को
देखने वाले सोम के पास जाती हैं. (३६)
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ईशान इमा भुवनानि वीयसे युजान इन्दो हरितः सुपर्ण्यः.
तास्ते क्षरन्तु मधुमद्घृतं पयस्तव व्रते सोम तिष्ठन्तु कृष्टयः.. (३७)
हे सबके स्वामी हरितवर्ण एवं घोड़ियों को रथ में जोड़ने वाले सोम! तुम सारे लोकों में
जाते हो. वे घोड़ियां तुम्हारे लिए मीठा एवं उज्ज्वल जल लावें तथा सभी लोग तुम्हारे व्रत में
रहें. (३७)
त्वं नृचक्षा असि सोम विश्वतः पवमान वृषभ ता वि धावसि.
स नः पवस्व वसुमध्दिरण्वद्वयं स्याम भुवनेषु जीवसे.. (३८)
हे सोम! तुम सभी लोकों को देखने वाले हो. हे जलवर्षक सोम! तुम विविध प्रकार से
गति करते हो. तुम हमें गायों एवं स्वर्ण से युक्त धन दो तथा हम संसार में जीवित रहने में
समर्थ हों. (३८)
गोवित्पवस्व वसुविद्धिरण्विद्रतोधा इन्दो भुवनेष्वर्पितः.
त्वं सुवीरो असि सोम विश्ववित्तं त्वा विप्रा उप गिरेम आसते.. (३९)
हे गाय! धन और सोना देने वाले तथा जल धारण करने वाले सोम! तुम रस टपकाओ.
तुम शोभन शक्ति वाले एवं सबको जानने वाले हो. ये स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी उपासना
करते हैं. (३९)
उन्मध्व ऊर्मिर्वनना अतिष्ठिपदपो वसानो महिषो वि गाहते.
राजा पवित्ररथो वाजमारुहत्सहस्रभृष्टिर्जयति श्रवो बृहत्.. (४०)
मधुर सोम का रस स्तुतियों को उन्नत करता है. महान् सोम जल को ढकते हुए कलश में
जाते हैं. दशापवित्र राजा सोम का रथ है. अपरिमित गमन वाले सोम युद्ध में जाते हैं एवं
हमारे लिए बहुत सा अन्न जीतते हैं. (४०)
स भन्दना उदियर्ति प्रजावतीर्विश्वायुर्र्विश्वः सुभरा अहर्दिवि.
ब्रह्म प्रजावद्रयिमश्वपस्त्यं पीत इन्दविन्द्रमस्मभ्यं याचतात्.. (४१)
सबके पास जाने वाले सोम संतान देने वाली एवं शोभन भरण से युक्त स्तुतियों को
भली प्रकार प्रेरित करते हैं. हे सोम! जब इंद्र तुम्हें पी लें तो तुम उनसे हमारे लिए संतानसहित
अन्न एवं घर भरने वाला धन मांगो. (४१)
सो अग्रे अह्नां हरिर्हर्यतो मदः प्र चेतसा चेतयते अनु द्युभिः.
द्वा जना यातयन्नन्तरीयते नरा च शंसं दैव्यं च धर्तरि.. (४२)
सोम सब प्राणियों के चेतनायुक्त होने के साथ ही प्रातः के प्रकाश के साथ जाने जाते हैं.
हरे रंग वाले, सुंदर, नशीले, मानवों एवं देवों द्वारा प्रशंसित धन यजमान को देने वाले एवं
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धरती तथा स्वर्ग के जीवों को अपने-अपने काम में लगाने वाले सोम द्यावा-पृथिवी के मध्य
भाग में जाते हैं. (४२)
अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते.
सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृभ्णते.. (४३)
ऋत्विज् सोमरस को गाय के दूध-दही के साथ तरह-तरह से मिलाते हैं एवं उसका स्वाद
लेते हैं. वे सोम को मधु के साथ मिश्रित करते हैं. जल के ऊपर उठने पर नीचे की ओर
टपकने वाले व तृप्त करने वाले सोम को हिरण्य के द्वारा पवित्र करते हुए ऋत्विज् इस प्रकार
जल में जाते हैं, जिस प्रकार पशु स्नान आदि के लिए तालाब में जाते हैं. (४३)
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति.
अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीळन्नसरद्वृषा हरिः.. (४४)
हे ऋत्विजो! विद्वान् एवं शुद्ध होते हुए सोम के लिए स्तुतियां गाओ. जिस प्रकार वर्षा
की विशाल-धारा बाधा को पार करके आगे बढ़ती है, उसी प्रकार सोम रसरूपी अन्न को
लांघकर आगे बढ़ते हैं. सांप जिस प्रकार अपनी केंचुली छोड़ता है, उसी प्रकार सोम का रस
अपनी लता को छोड़ता है. वर्षा करने वाले व हरितवर्ण सोम घोड़े के समान क्रीड़ा करते हुए
दशापवित्र से द्रोणकलश में जाते हैं. (४४)
अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः.
हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतिरथः पवते राय ओक्यः.. (४५)
आगे चलने वाले, सुशोभित व जल में शुद्ध किए गए सोम की स्तुति की जाती है. दिनों
का निर्माण करने वाले, जलों में स्थित, हरे रंग वाले, जल उत्पन्न करने वाले, सुंदर, जल से
युक्त एवं ज्योतिपूर्ण रथ वाले सोम घर देते हैं. (४५)
असर्जि स्कम्भो दिव उद्यतो मदः परि त्रिधातुर्भुवनान्यर्षति.
अंशुं रिहन्ति मतयः पनिप्रतं गिरा यदि निर्णिजम्मृग्मिणो ययुः.. (४६)
स्वर्गलोक को धारण करने वाले, उन्नत एवं नशीले सोम निचोड़े जाते हैं. तीन धाराओं
वाले सोम सारे सवनों में घूमते हैं. जब स्तोता रूप वाले सोम की स्तुतियां करते हैं, तब
पुरोहित शब्दयुक्त सोम की कामना करते हैं. (४६)
प्र ते धारा अत्यण्वानि मेष्यः पुनानस्य संयतो यन्ति रंहयः.
यद् गोभिरिन्दो चम्वोः समज्यस आ सुवानः सोम कलशेषु सीदसि.. (४७)
हे सोम! छनते समय तुम्हारी चंचल धाराएं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार
करके जाती हैं. जब तुम चमू नामक पात्रों के ऊपर जलों के साथ मिलाए जाते हो, उस समय
तुम निचोड़ते हुए कलशों में स्थित होते हो. (४७)
पवस्व सोम क्रतुविन्न उक्थ्योऽव्यो वारे परि धाव मधु प्रियम्.
जहि विश्वान् रक्षस इन्दो अत्रिणो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (४८)
हे हमारी स्तुति के जानने वाले व उक्थमंत्रों द्वारा प्रशंसा करने योग्य सोम! तुम हमारे
यज्ञ के लिए टपको तथा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर अपना मधुर रस गिराओ. हे
दीप्तिशाली सोम! तुम मानवों का भक्षण करने वाले सब राक्षसों को मारो. शोभन संतान वाले
हम महान् धन पाकर यज्ञों में तुम्हारी बहुत स्तुति करेंगे. (४८)
सूक्त—८७ देवता—पवमान सोम
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष.
अश्वं न त्वा वाजिनं मर्य्यन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति.. (१)
हे सोम! दौड़कर आओ और द्रोणकलश में बैठो. तुम ऋत्विजों द्वारा पवित्र होते हुए
यजमान को अन्न दो. अध्वर्युजन यज्ञ में ले जाने के लिए सोम को जल द्वारा इस प्रकार साफ
करते हैं, जिस प्रकार शक्तिशाली घोड़े को नहलाया जाता है. (१)
स्वायुधः पवते देव इन्दुरशस्तिहा वृजनं रक्षमाणः.
पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः.. (२)
शोभन आयुध वाले, दीप्तिशाली, राक्षसों का नाश करने वाले, उपद्रव से रक्षा करने
वाले, देवों के पालनकर्त्ता, उत्पन्न करने वाले, शोभन शक्तियुक्त, स्वर्ग को सहारा देने वाले एवं
धरती के धारक सोम निचोड़ते हैं. (२)
ऋषिविप्रः पुरएता जनानामृभुर्धीर उशना काव्येन.
स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यं १ गुह्यं नाम गोनाम्.. (३)
ऋषि, मेधावी, सबके आगे चलने वाले, दीप्तिशाली एवं धीर उशना अपने स्तोत्रों द्वारा
गायों में छिपे हुए एवं गोपनीय दूध को प्राप्त करते हैं. (३)
एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णे परि पवित्रे अक्षाः.
सहस्रसाः शतसा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात्.. (४)
हे वर्षा करने वाले इंद्र! तुम्हारे लिए मधुर एवं वर्षक सोम दशापवित्र में होकर छनते हैं.
सैकड़ों और हजारों धनों के देने वाले, अधिक धन के दाता, नित्य एवं शक्तिशाली सोम यज्ञ में
स्थित रहते हैं. (४)
एते सोमा अभि गव्या सहस्रा महे वाजायाऽमृताय श्रवांसि.
पवित्रेभिः पवमाना असृग्रञ्छ्रवस्यवो न पृतनाजो अत्याः.. (५)
ये सोम गाय के दूध, दही व हजारों अन्नों को लक्ष्य करके दशापवित्र के छेदों से छनते
हुए महान् अन्न और अमृत के लिए इस प्रकार शुद्ध किए जाते हैं, जिस प्रकार सेना को
जीतने वाला घोड़ा नहलाया जाता है. (५)
परि हि ष्मा पुरुहूतो जनानां विश्वासरूद्धोजना पूयमानः.
अथा भर श्येनभृत प्रयांसि रयिं तुञ्जानो अभि वाजमर्ष.. (६)
बहुतों द्वारा बुलाए हुए एवं शुद्ध होते हुए सोम मनुष्यों को सभी भोज्य अन्न देते हैं. हे
बाज के द्वारा लाए हुए सोम! हमें अन्न एवं धन दो तथा अन्नरूपी रस की ओर जाओ. (६)
एष सुवानः परि सोमः पवित्रे सर्गो न सृष्टो अधावदर्वा.
तिग्मे शिशानो महिषो न शृङ्गे गा गव्यन्नभि शूरो न सत्वा.. (७)
ये निचुड़ते हुए एवं टपकने वाले सोम छोड़े हुए घोड़े के समान दशापवित्र की ओर
दौड़ते हैं. सोम अपने सींगों को तेज करने वाले भैंसे के समान एवं गाय चाहने वाले शूर के
समान दौड़ते हैं. (७)
एषा ययौ परमादन्तरद्रेः कूचित्सतीरूर्वे गा विवेद.
दिवो न विद्युत्स्तनयन्त्यभ्रैः सोमस्य ते पवत इन्द्र धारा.. (८)
सोमरस की यह धारा ऊंचे स्थान से पात्र की ओर जाती है. इसी धारा ने पणियों द्वारा
छिपाई हुई गायों को प्राप्त किया था. हे इंद्र! बिजली के समान शब्द करने वाली यह
सोमधारा तुम्हारे लिए ही गिरती है. (८)
उत स्म राशिं परि यासि गोनामिन्द्रेण सोम सरथं पुनानः.
पूर्वीरिषो बृहतीर्जीरदानो शिक्षा शचीवस्तव ता उपष्टुत्.. (९)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुमने इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर पणियों द्वारा चुराई हुई
गायों को प्राप्त किया था. हे शीघ्र फलदाता सोम! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें विशाल
धन दो. हे अन्नयुक्त सोम! सारा अन्न तुम्हारा है. (९)
सूक्त—८८ देवता—पवमान सोम
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्वे तुभ्यं पवते त्वमस्य पाहि.
त्वं ह यं चकृषे त्वं ववृष इन्दुं मदाय युज्याय सोमम्.. (१)
हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए निचोड़े और छाने जाते हैं. तुम इन्हें पिओ. तुम जिस सोम
को बनाते हो व वरण करते हो, उसीको मदप्राप्ति और सहायता के लिए पिओ. (१)
स ईं रथो न भुरिषाळयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि.
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आदीं विश्वा नहुष्याणि जाता स्वर्षाता वन ऊर्ध्वा नवन्त.. (२)
लोग बहुत सा धन लाने के लिए रथ के समान भार ढोने वाले महान् सोम को रथ के
समान ही जीतते हैं. युद्ध के अभिलाषी मनुष्य महान् धन देने वाले सोम को संग्राम में ले जाते
हैं. (२)
वायुर्न यो नियुत्वाँ इष्टयामा नासत्येव हव आ शम्भूविष्ठः.
विश्ववारो द्रविणोदाइव त्मन्यूषेव धीजवनोऽसि सोम.. (३)
हे सोम! तुम वायु के समान अश्वों वाले तथा मनचाहे स्थान पर जाने वाले,
अश्विनीकुमारों के समान पुकार सुनते ही सबको सुख देने वाले, धन देने वाले के समान
सबके वरणीय एवं सूर्य के समान मनोवेग वाले हो. (३)
इन्द्रो न यो महा कर्माणि चक्रिर्हन्ता वृत्राणामसि सोम पूर्भित्.
पैद्वो न हि त्वमहिनाम्नां हन्ता विश्वस्यासि सोम दस्योः.. (४)
हे सोम! तुमने इंद्र के समान महान् कर्म किए हैं. तुम शत्रुओं के नाशक एवं उनके नगरों
को तोड़ने वाले हो. तुम अहिवंश के लोगों को घोड़े के समान जल्दी आकर मारते हो. तुम
सब शत्रुओं को मारने वाले हो. (४)
अग्निर्न यो वन आ सृज्यमानो वृथा पाजांसि कृणुते नदीषु.
जनो न युध्वा महत उपब्दिरियर्ति सोमः पवमान ऊर्मिम्.. (५)
जिस तरह अग्नि वन में उत्पन्न होकर अपनी शक्ति दिखाते हैं, उसी तरह सोम जल में
पैदा होकर अपना बल दिखाते हैं. सोम युद्ध करने वाले वीर के समान शत्रु के पास भयंकर
शब्द करते हुए अधिक रस को प्रेरित करते हैं. (५)
एते सोमा अति वाराण्यव्या दिव्या न कोशासो अभ्रवर्षाः.
वृथा समुद्रं सिन्धवो न नीचीः सुतासो अभि कलशाँ असृग्रन्.. (६)
जैसे अंतरिक्ष से बरसने वाली मेघवर्षा एवं नदियां अपने-आप नीचे की ओर जाती हैं,
उसी प्रकार यह छनते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके द्रोणकलश की
ओर जाते हैं. (६)
शुष्मी शर्धो न मारुतं पवस्वानऽभिशस्ता दिव्या यथा विट्.
आपो न मक्षू सुमतिर्भवा नः सहस्राप्साः पृतनाषाण् यज्ञः.. (७)
हे शक्तिशाली सोम! तुम मरुतों की शक्ति के समान टपको. तुम स्वर्ग की प्रजाओं के
समान अनिद्रित रूप से बहो एवं जल के समान हमें शीघ्र मुक्ति दो. हे अनेक रूपों वाले
सोम! तुम सेना को जीतने वाले इंद्र के समान यज्ञ के पात्र हो. (७)
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सूक्त—८९ देवता—पवमान सोम
राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहद्गभीरं तव सोम धाम.
शुचिष्ट्वमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम.. (८)
हे सोम! मैं तुम्हारे यज्ञकर्मों को राजा वरुण के समान शीघ्र करता हूं. तुम्हारा तेज
विशाल एवं गंभीर है. तुम प्रिय मित्र के समान शुचि हो एवं अर्यमादेव के समान पूज्य हो. (८)
सूक्त—८९ देवता—पवमान सोम
प्रो स्य वह्निः पथ्याभिरस्यान्दिवो न वृष्टिः पवमानो अक्षाः.
सहस्रधारो असदन्य१स्मे मातुरुपस्थे वन आ च सोमः.. (१)
फल वहन करने वाले सोम यज्ञ के मार्गों से आकाश की वर्षा के समान बहते हैं. हजार
धाराओं वाले सोम हमारे पास या द्युलोक के पास बैठते हैं. (१)
राजा सिन्धूनामवसिष्ट वास ऋतस्य नावमारुहद्रजिष्ठाम्.
अप्सु द्रप्सो वावृधे श्येनजूतो दुह ईं पिता दुह ईं पितुर्जाम्.. (२)
गायों के राजा सोम दूध में मिलते हैं एवं यज्ञरूपी सरलगामिनी नाव में बढ़ते हैं. बाज
पक्षी द्वारा लाए गए सोम जलों में बढ़ते हैं. अध्वर्यु एवं अन्य लोक द्युलोक के पुत्र सोम को
दुहते हैं. (२)
सिंहं नसन्त मध्वो अयासं हरिमरुषं दिवो अस्य पतिम्.
शूरो युत्सु प्रथमः पृच्छते गा अस्य चक्षसा परि पात्युक्षा.. (३)
यजमान शत्रुनाशक, जलप्रेरक, हरे रंग वाले और द्युलोक के पालक सोम को व्याप्त
करते हैं. युद्धों में शूर एवं देवों में प्रमुख सोम पणियों द्वारा चुराई हुई गायों वाले स्थान का
मार्ग पूछते हैं. इंद्र सोम की सहायता से ही विश्व का पालन करते हैं. (३)
मधुपृष्ठं घोरमयासमश्वं रथे युञ्जन्त्युरुचक्र ऋषभम्.
स्वसार ईं जामयो मर्जयन्ति सनाभयो वाजिनमूर्जयन्ति.. (४)
मीठे पिछले भाग वाला, भयानक, गतिशील एवं सुंदर सोम यज्ञ में उसी प्रकार पकड़ा
जाता है, जैसे रथ में घोड़े को जोतते हैं. उंगलियां बहिनों और भाइयों के समान आपस में
मिलकर सोम को शुद्ध करती हैं एवं समान नियम पालन करने वाले अध्वर्यु सोम को
शक्तिशाली बनाते हैं. (४)
चतस्र ईं घृतदुहः सचन्ते समाने अन्तर्धरणे निषत्ताः.
ता ईमर्षन्ति नमसा पुनानास्ता ईं विश्वतः परि षन्ति पूर्वीः.. (५)
घी देने वाली चार गाएं इस सोम की सेवा करती हैं. वे गाएं सबको धारण करने वाले
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