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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

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आशुर्ष बृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना. यत्र देवा इति ब्रवन्.. (१)
हे महान् बुद्धि वाले सोम! देवों के अतिशय प्रिय शरीर में धारा के द्वारा शीघ्र गमन करो.
तुम यह कहते हुए जाओ— “जहां देव हैं, मैं वहीं जा रहा हूं.” (१)
परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः. वृष्टिं दिवः परि स्रव.. (२)
हे सोम! तुम असंस्कृत स्थान को संस्कृत करते हुए एवं यज्ञ करने वाले यजमान को
जन्म देते हुए आकाश से बरसो. (२)
सुत एति पवित्र आ त्विषिं दधान ओजसा. विचक्षणो विरोचयन्.. (३)
दीप्ति धारण करते हुए एवं सबको देखते हुए निचोड़े गए सोम सबको दीप्त बनाते हैं
एवं अपनी शक्ति से दशापवित्र पर जाते हैं. (३)
अयं स यो दिवस्परि रघुयामा पवित्र आ. सिन्धोरूर्मा व्यक्षरत्.. (४)
दशापवित्र पर सींचे जाते हुए सोम पानी की लहरों के रूप में टपकते हैं एवं द्युलोक के
ऊपर तेज चाल से जाते हैं. (४)
आविवासन् परावतो अथो अर्वावतः सुतः. इन्द्राय सिच्यते मधु.. (५)
निचुड़े हुए सोम दूरवर्ती एवं समीपवर्ती देवों तथा इंद्र की सेवा के लिए मधु के समान
सींचे जाते हैं. (५)
समीचीना अनूषत हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. योनावृतस्य सीदत.. (६)
हे देवो! भली प्रकार मिले हुए स्तोता स्तुतियां करते हैं एवं पत्थरों की सहायता से हरे
रंग के सोम को प्रेरित करते हैं. इसलिए तुम यज्ञ में बैठो. (६)
सूक्त—४० देवता—सोम
पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः. शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः.. (१)
निचुड़ते हुए एवं सबको देखने वाले सोम सभी हिंसक शत्रुओं को लांघ गए. लोग
मेधावी सोम को स्तुतियों द्वारा अलंकृत करते हैं. (१)
आ योनिमरुणो रुहदगमदिन्द्रं वृषा सुतः. ध्रुवे सदसि सीदति.. (२)
लाल रंग वाले सोम द्रोणकलश में जा रहे हैं. इसके बाद अभिलाषापूरक एवं निचुड़े हुए
सोम इंद्र के समीप जाते हैं एवं निश्चित स्थान पर बैठते हैं. (२)
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नू नो रयिं महामिन्दोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणम्.. (३)
हे निचुड़े हुए सोम! तुम चारों ओर से हमारे लिए अगणित एवं महान् धन लाओ. (३)
विश्वा सोम पवमान द्युम्नानीन्दवा भर. विदाः सहस्रिणीरिषः.. (४)
हे निचुड़ते हुए दीप्तिशाली सोम! तुम बहुत प्रकार का अन्न हमारे पास लाओ एवं हमें
हजारों प्रकार का अन्न दो. (४)
स नः पुनान आ भर रयिं स्तोत्रे सुवीर्यम्. जरितुर्वर्धया गिरः.. (५)
हे निचुड़ते हुए सोम! तुम हमारे स्तोताओं के लिए शोभन पुत्र वाला धन लाओ तथा
उनकी स्तुतियों को बढ़ाओ. (५)
पुनान इन्दवा भर सोम द्विबर्हसं रयिम्. वृषन्निन्दो न उक्थ्यम्.. (६)
हे निचुड़ते हुए सोम! तुम हमारे लिए द्यावा-पृथिवी में बढ़े हुए धन को लाओ. हे
अभिलाषापूरक सोम! तुम हमें स्तुति के योग्य धन दो. (६)
सूक्त—४१ देवता—सोम
प्र ये गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः. घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम्.. (१)
निचुड़े हुए, गतिशील, तेज चलने वाले एवं दीप्तिशाली सोम काले चमड़े वाले लोगों को
मारते हुए घूमते हैं, तुम उनकी स्तुति करो. (१)
सुवितस्य मनामहेऽति सेतुं दुराव्यम्. साह्वांसो दस्युमव्रतम्.. (२)
शोभन-सोम यज्ञ न करने वाले तथा दस्युजनों को पराजित करना चाहते हैं. वे
बंधनकारी तथा दुष्टबुद्धि राक्षसों को दबाने की अभिलाषा रखते हैं. हम सोम की इन दोनों
इच्छाओं की प्रशंसा करते हैं. (२)
शृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः. चरन्ति विद्युतो दिवि.. (३)
सोम का शब्द वर्षा के समान सुनाई देता है तथा निचुड़ते हुए एवं शक्तिशाली सोम की
दीप्तियां अंतरिक्ष में चलती हैं. (३)
आ पवस्व महीमिषं गोमदिन्दो हिरण्यवत्. अश्वावद्वाजवत् सुतः.. (४)
हे सोम! तुम निचुड़कर हमारे सामने गायों, स्वर्ण, घोड़ों और बल से युक्त महान् अन्न
लाओ. (४)

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स पवस्व विचर्षण आ मही रोदसी पृण. उषाः सूर्यो न रश्मिभिः.. (५)
हे सूर्यदर्शक सोम! तुम नीचे की ओर गिरो एवं उस रस से विस्तृत द्यावा-पृथिवी को इस
प्रकार पूर्ण कर दो, जिस प्रकार सूर्य किरणों से दिन को पूर्ण करता है. (५)
परि णः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः. सरा रसेव विष्टपम्.. (६)
हे सोम! नदियां अपनी धारा से जिस प्रकार भूलोक को पूर्ण करती हैं, उसी प्रकार तुम
अपनी सुखकारी धारा के द्वारा हमें चारों ओर से पूर्ण करो. (६)
सूक्त—४२ देवता—सोम
जनयन्न्रोचना दिवो जनयन्नप्सु सूर्यम्. वसानो गा अपो हरिः.. (१)
ये हरे रंग के सोम द्युलोकसंबंधी नक्षत्र, ग्रह आदि को तथा अंतरिक्ष में सूर्य को उत्पन्न
करते हैं. इसके बाद नीचे बहने वाले जल से धरती को ढकते हैं. (१)
एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि. धारया पवते सुतः.. (२)
प्राचीन स्तोत्र के साथ निचुड़ते हुए ये सोम अपनी धारा से देवों के लिए सब ओर से
गिरते हैं. (२)
वावृधानाय तूर्वये पवन्ते वाजसातये. सोमाः सहस्रपाजसः.. (३)
असीमित शक्ति वाले सोम बढ़े हुए अन्न को शीघ्र पाने के लिए निचोड़े जाते हैं. (३)
दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यते. क्रन्दन्देवाँ अजीजनत्.. (४)
सोम प्राचीन रस को टपकाते हुए दशापवित्र पर सींचे जाते हैं एवं शब्द करते हुए देवों
को अपने समीप उत्पन्न करते हैं. (४)
अभि विश्वानि वार्याभि देवाँ ऋतावृधः. सोमः पुनानो अर्षति.. (५)
निचोड़े जाते हुए ये सोम सभी वरण करने योग्य धनों एवं यज्ञवर्धक देवों के पास जाते
हैं. (५)
गोमन्नः सोम वीरवदश्वावद्वाजवत्सुतः. पवस्व बृहतीरिषः.. (६)
हे सोम! तुम निचुड़कर हमें गायों, बहुत सी संतानों, घोड़ों तथा संग्राम में प्राप्त धनों के
साथ बहुत सा अन्न दो. (६)
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सूक्त—४३ देवता—सोम

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सूक्त—४३ देवता—सोम
यो अत्य इव मृज्यते गोभिर्मदाय हर्यतः. तं गीर्भिर्वासयामसि.. (१)
जो सुंदर सोम चलने वाले घोड़े के समान देवों के नशे के लिए गाय के दूध-दही आदि में
मिलाए जाते हैं, स्तुतियों द्वारा हम उन्हीं को प्रसन्न करेंगे. (१)
तं नो विश्वा अवस्युवो गिरः शुम्भन्ति पूर्वथा. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (२)
रक्षा की अभिलाषिणी हमारी सब स्तुतियां इंद्र के पीने के लिए सोम को पहले के समान
ही दीप्तिशाली बनाती हैं. (२)
पुनानो याति हर्यतः सोमो गीर्भिः परिष्कृतः. विप्रस्य मेध्यातिथेः.. (३)
निचुड़ते हुए सुंदर सोम स्तुतियों से सुशोभित होकर मुझ मेधावी मेध्यातिथि के कल्याण
के लिए द्रोणकलश में जाते हैं. (३)
पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम सुश्रियम्. इन्दो सहस्रवर्चसम्.. (४)
हे निचुड़ते हुए एवं छनते हुए सोम! तुम हमें शोभनश्री से युक्त एवं बहुत दीप्ति वाला
धन दो. (४)
इन्दुरत्यो न वाजसृत्कनिक्रन्ति पवित्र आ. यदक्षारति देवयुः.. (५)
सोम युद्ध में जाने वाले घोड़े के समान दशापवित्र में शब्द करते हैं. सोम जब नीचे
टपकते हैं, तब देवों के अभिलाषी बनकर शब्द करते हैं. (५)
पवस्व वाजसातये विप्रस्य गृणतो वृधे. सोम रास्व सुवीर्यम्.. (६)
हे सोम! स्तुति करने वाले मुझ मेध्यातिथि को अन्न देने एवं बढ़ाने के लिए टपको. तुम
हमें शोभन शक्ति वाला पुत्र दो. (६)
सूक्त—४४ देवता—पवमान सोम
प्र ण इन्दो महे तन ऊर्मिं न बिभ्रदर्षसि. अभि देवाँ अयास्यः.. (१)
हे सोम! तुम हमें महान् धन देने के लिए आते हो. अयास्य ऋषि तुम्हारी तरंगों को
धारण करते हुए पूजा करने के लिए देवों की ओर आते हैं. (१)
मती जुष्टो धिया हितः सोमो हिन्वे परावति. विप्रस्य धारया कविः.. (२)
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मेधावी स्तोता की स्तुतियों द्वारा सेवित, क्रांत-कर्म वाले सोम यज्ञ में स्थित होकर
अपनी धारा को दूर देश तक विस्तृत करते हैं. (२)
अयं देवेषु जागृविः सुत एति पवित्र आ. सोमो याति विचर्षणिः.. (३)
ये जागरणशील एवं निचुड़े हुए सोम देवों के लिए सभी ओर जाते हैं एवं पवित्र होने के
लिए दशापवित्र पर पहुंचते हैं. (३)
स नः पवस्व वाजय्युश्क्राणश्चारुमध्वरम्. बर्हिष्माँ आ विवासति.. (४)
हे सोम! ऋत्विज् तुम्हारी सेवा करते हैं. तुम हमारे लिए अन्न की इच्छा करते हुए एवं
हमारे यज्ञ को कल्याणकारी बनाते हुए टपको. (४)
स नो भगाय वायवे विप्रवीरः सदावृधः. सोमो देवेष्वा यमत्.. (५)
मेधावी ब्राह्मण सोम को भग और वायु देव के लिए प्रेरित करते हैं. सोम नित्य वृद्ध
होकर हमारे लिए देवों का धन दें. (५)
स नो अद्य वसुत्तये क्रतुविद् गातुवित्तमः. वाजं जेषि श्रवो बृहत्.. (६)
हे यज्ञ को प्राप्त करने वालों में श्रेष्ठ एवं पुण्यलोकों के मार्ग को भली प्रकार जानने वाले
सोम! आज हमें धन देने के लिए महान् अन्न एवं बल को जीतो. (६)
सूक्त—४५ देवता—सोम
स पवस्व मदाय कं नृचक्षा देववीतये. इन्दविन्द्राय पीतये.. (१)
हे नेताओं को देखने वाले सोम! तुम यज्ञ की पूर्ति एवं इंद्र के पीने के बाद मद तथा सुख
के लिए टपको. (१)
स नो अर्षामि दूत्यं१त्वमिन्द्राय तोशसे. देवानत्सखिभ्य आ वरम्.. (२)
हे सोम! तुम हमारे दूत बनो. तुम इंद्र के पीने के लिए हो. तुम देवों से हमारे लिए प्रिय
धन मांगो. (२)
उत त्वामरुणं वयं गोभिरञ्ज्मो मदाय कम्. वि नो राये दुरो वृधि.. (३)
हे लाल रंग वाले सोम! हम नशे के लिए तुम्हें गायों के दूध से शुद्ध करते हैं. तुम हमारे
लिए धन के द्वार खोलो. (३)
अत्यू पवित्रमक्रमीद्वाजी धुरं न यामनि. इन्दुर्वेदेवेषु पत्यते.. (४)

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जिस प्रकार चलते समय घोड़ा रथ के जुए से आगे निकल जाता है, उसी प्रकार सोम
दशापवित्र को लांघकर देवों के पास जाते हैं. (४)
समी सखायो अस्वरन्वने क्रीळन्तमत्यविम्. इन्दुं नावा अनूषत.. (५)
भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके जल में क्रीड़ा करने वाले इस सोम की
स्तुति स्तोताबंधु भली प्रकार करते हैं तथा वचनों द्वारा सोम के गुणों का वर्णन करते हैं. (५)
तया पवस्व धारया यया पीतो विचक्षसे. इन्दो स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (६)
हे सोम! जिस रसधारा को पीने वाले चतुर स्तोता को तुम शोभन वीर्य प्रदान करते हो,
उसी धारा से नीचे बहो. (६)
सूक्त—४६ देवता—सोम
असृग्रन्देववीतयेऽत्यासः कृत्व्या इव. क्षरन्तः पर्वतावृधः.. (१)
पर्वतों पर उत्पन्न एवं रस टपकाते हुए सोम यज्ञ में उसी प्रकार तैयार किए जाते हैं,
जिस प्रकार कार्यकुशल घोड़ा सजाया जाता है. (१)
परिष्कृतास इन्दवो योषेव पित्र्यावती. वायुं सोमा असृक्षत.. (२)
जैसे पिता वाली कन्या अलंकृत होकर वर के पास जाती है, उसी प्रकार निचोड़े जाते
हुए सोम वायु को प्राप्त होते हैं. (२)
एते सोमास इन्दवः प्रयस्वन्तश्चमू सुताः. इन्द्रं वर्धन्ति कर्मभिः.. (३)
दीप्तिशाली, अन्न से युक्त, निचोड़ने के पात्रों में रखे हुए एवं इस यज्ञ में वर्तमान सोम
अपने कर्मों से इंद्र को प्रसन्न करते हैं. (३)
आ धावता सुहस्त्यः शुक्रा गृभ्णीत मन्थिना. गोभिः श्रीणीत मत्सरम्.. (४)
हे शोभन हाथों वाले ऋत्विजो! दौड़कर आओ, मथानी से सफेद रंग वाले सोम को
ग्रहण करो एवं नशा करने वाले सोम को गाय के दूध, दही आदि से मिलाओ. (४)
स पवस्व धनञ्जय प्रयन्ता राधसो महः. अस्मभ्यं सोम गातुवित्.. (५)
हे शत्रुओं के धनों को जीतने वाले, अभीष्ट मार्ग को प्राप्त कराने वाले एवं हमारे लिए
महान् धन के दाता सोम! तुम टपको. (५)
एतं मृजन्ति मर्ज्यं पवमानं दश क्षिपः. इन्द्राय मत्सरं मदम्.. (६)

सूक्त—४७ देवता—पवमान सोम

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दस उंगलियां मसलने योग्य, टपकते हुए एवं नशीले इस सोम को इंद्र के निमित्त पवित्र
करती हैं. (६)
सूक्त—४७ देवता—पवमान सोम
अया सोमः सुकृत्यया महश्चिद्भ्यवर्धत. मन्दान उद्वृषायते.. (१)
निचोड़ने की इस शोभन क्रिया द्वारा सोम देवों के लिए वृद्धि को प्राप्त हुए हैं एवं प्रसन्न
होकर बैल के समान शब्द करते हैं. (१)
कृतानीदस्य कत्वा चेतन्ते दस्युतहंणा. ऋणा च धृष्णुश्चयते.. (२)
इन सोम के असुरनाशन आदि कर्म हमने किए हैं. शत्रुओं को हराने वाले सोम यजमानों
के ऋण भी चुकाते हैं. (२)
आत्सोम इन्द्रियो रसो वज्रः सहस्रसा भुवत्. उक्थं यदस्य जायते.. (३)
जिस समय इंद्रसंबंधी मंत्र बोले जाते हैं, तभी इंद्र का प्रिय करने वाले, बलवान् व वज्र
के समान हिंसाशून्य सोम हमारे लिए असीमित धन देते हैं. (३)
स्वयं कविर्विधर्तरि विप्राय रत्नमिच्छति. यदी मर्मृज्यते धियः.. (४)
जब क्रांत कर्म वाले सोम उंगलियों द्वारा शुद्ध किए जाते हैं, तभी वे मेधावी स्तोता को
अभिलाषापूर्वक इंद्र से रमणीय धन दिलाना चाहते हैं. (४)
सिषासतू रयीणां वाजेष्वर्वतामिव. भरेषु जिग्युषामसि.. (५)
हे सोम! संग्राम में जाने वाले घोड़े को जिस प्रकार घास दी जाती है, उसी प्रकार तुम
संग्राम में जीतने वालों को शत्रुओं के धन देते हो. (५)
सूक्त—४८ देवता—पवमान सोम
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतं सधस्थेषु महो दिवः. चारुं सुकृत्ययेमहे.. (१)
हे महान् द्युलोक के समान स्थानों में स्थित, हमारे लिए धन एवं कल्याण धारण करने
वाले एवं निचुड़ते हुए सोम! हम शोभन क्रिया द्वारा तुमसे धन मांगते हैं. (१)
संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्. शतं पुरो रुरुक्षणिम्.. (२)
हे शत्रुओं के नाशक, प्रशंसा के योग्य, पूजा के योग्य, बहुत से कर्म करने वाले, नशीले
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एवं शत्रुओं की नगरियों को नष्ट करने वाले सोम! हम तुमसे धन मांगते हैं. (२)
अतस्त्वा रयिमभि राजानं सुक्रतो दिवः. सुपर्णो अव्यथिर्भरत्.. (३)
हे शोभन-कर्म वाले तथा धन देने के लिए राजा सोम! बाज पक्षी तुम्हें स्वर्ग से लाया
था. (३)
विश्वस्मा इत्स्वर्दृशे साधारणं रजस्तुरम्. गोपामृतस्य विभ्ररत्.. (४)
बाज पक्षी जल बरसाने वाले, यज्ञ के रक्षक एवं सबको देखने वाले देवों के रस सोम को
समानरूप से लाया था. (४)
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे. अभिष्टिकृद्विचर्षणिः.. (५)
यज्ञकर्मों को विशेषरूप से देखने वाले, यजमानों को मनचाहा फल देने वाले एवं अपनी
शक्ति का प्रयोग करने वाले सोम प्रशंसा के योग्य महत्त्व प्राप्त करते हैं. (५)
सूक्त—४९ देवता—पवमान सोम
पवस्व वृष्टिमा सु नोऽपामूर्मिं दिवस्परि. अयक्ष्मा बृहतीरिषः.. (१)
हे सोम! तुम हमारे लिए द्युलोक से वर्षा गिराओ एवं जल की लहरें ले आओ. तुम हमें
विशाल अन्न का क्षयरहित समूह दो. (१)
तया पवस्व धारया यया गाव इहागमन्. जन्यास उप नो गृहम्.. (२)
हे सोम! तुम उस धारा से नीचे टपको, जिससे शत्रुओं के जनपद की गाएं हमारे घर आ
जावें. (२)
घृतं पवस्व धारया यज्ञेषु देववीतमः. अस्मभ्यं वृष्टिमा पव.. (३)
हे यज्ञों में देवों की अतिशय अभिलाषा करने वाले सोम! हम भार्गववंशी ऋषियों के
लिए तुम धीमी धारा से बरसो. (३)
स न ऊर्जे व्य१व्ययं पवित्रं धाव धारया. देवासः शृण्वन्हि कम्.. (४)
हे सोम! तुम निचुड़ते समय हमें अन्न देने के लिए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को
धारा के द्वारा प्राप्त करो. तुम्हारे शब्द को देव सुनें. (४)
पवमानो असिष्यदद्रक्षांस्यपजङ्घनत्. प्रत्नवद्रोचयन् रुचः.. (५)
ये निचुड़ते हुए सोम राक्षसों को मारते हुए एवं अपनी दीप्तियों को पहले के समान

सूक्त—५० देवता—पवमान सोम

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प्रकाशित करते हुए टपकते हैं. (५)
सूक्त—५० देवता—पवमान सोम
उत्ते शुष्मास ईरते सिन्धोरूर्मेरिव स्वनः. वाणस्य चोदय पविम्.. (१)
हे सोम! तुम्हारा वेग सागर की लहरों के समान चलता है. तुम धनुष से छोड़े हुए बाण
के समान शब्द करो. (१)
प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः. यदव्य एषि सानवि.. (२)
हे सोम! तुम जिस समय उन्नत एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हो, तब
तुम्हारी उत्पत्ति के समय यज्ञ करने के अभिलाषी यजमान के मुख से ऋक्, यजु एवं साम के
रूप में तीन वचन निकलते हैं. (२)
अव्यो वारे परि प्रियं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. पवमानं मधुश्चुतम्.. (३)
देवों के प्रिय, हरे रंग वाले, पत्थरों की सहायता से पीसे गए, रस टपकाने वाले एवं
निचुड़ते हुए सोम को ऋत्विज् भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर रखते हैं. (३)
आ पवस्व मदिन्तम पवित्रं धारया कवे. अर्कस्य योनिमासदम्.. (४)
हे अतिशय नशीले एवं क्रांत-कर्म वाले सोम! तुम पूजा के योग्य इंद्र का स्थान पाने के
लिए धारा के रूप में दशापवित्र पर गिरो. (४)
स पवस्व मदिन्तम गोभिरञ्जानो अक्तुभिः. इन्द्विन्द्राय पीतये.. (५)
हे अतिशय मादक सोम! तुम स्वादिष्ट बनाने वाले गाय के दूध, घी आदि से मिलकर इंद्र
के पीने के लिए टपको. (५)
सूक्त—५१ देवता—पवमान सोम
अध्वर्यो अद्रिभिः सुतं सोमं पवित्र आ सृज. पुनीहीन्द्राय पातवे.. (१)
हे अध्वर्युगण! पत्थरों की सहायता से पीसे हुए सोम को दशापवित्र पर डालो. तुम इसे
इंद्र के पीने के लिए शुद्ध करो. (१)
दिवः पीयूषमुत्तमं सोममिन्द्राय वज्रिणे. सुनोता मधुमत्तमम्.. (२)
हे अध्वर्युगण! अत्यधिक मधुर, स्वर्ग के अमृत के समान एवं उत्तम सोम को वज्रधारी
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इंद्र के लिए निचोड़ो. (२)
तव त्य इन्दो अन्धसो देवा मधोर्व्यश्नते. पवमानस्य मरुतः.. (३)
हे सोम तुम्हारे निचुड़ते हुए एवं नशीले रस को इंद्रादि देव एवं मरुत् प्राप्त करते हैं. (३)
त्वं हि सोम वर्धयन्त्सुतो मदाय भूर्णये. वृषन्त्स्तोतारमूतये.. (४)
हे निचुड़े हुए सोम! तुम देवों को उन्नत बनाते हुए एवं अभिलाषाओं की पूर्ति करते हुए
तुरंत नशा देने एवं रक्षा करने के लिए स्तोता के पास जाते हो. (४)
अभ्यर्ष विचक्षण पवित्रं धारया सुतः. अभि वाजमुत श्रवः.. (५)
हे विशेष बुद्धिमान् सोम! तुम निचुड़कर दशापवित्र की ओर धारा के रूप में पहुंचो एवं
हमारे लिए अन्न एवं कीर्ति दो. (५)
सूक्त—५२ देवता—पवमान सोम
परि द्युक्षः सनद्रयिर्भर्द्वाजं नो अन्धसा. सुवानो अर्ष पवित्र आ.. (१)
दीप्तिशाली एवं धन देने वाले सोम अन्न के साथ हमारे बल को बढ़ावें. हे सोम! तुम
निचुड़ कर दशापवित्र पर गिरो. (१)
तव प्रत्नेभिरध्वभिर्वरव्यो वारे परि प्रियः. सहस्रधारो यात्तना.. (२)
हे सोम! तुम्हारा देवों को प्रसन्न करने वाला, हजारों धाराओं वाला रस प्राचीन मार्गों की
सहायता से भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाता है. (२)
चरुर्न यस्तमीङ्खयेन्दो न दानमीङ्खय. वधैर्वधस्नवीङ्खय.. (३)
हे सोम हमें चरु के समान पूर्ण भोजन दो. हे दीप्तिशाली सोम! हमें देने योग्य वस्तु दो.
हे चोट खाकर बहने वाले सोम! तुम पत्थरों के प्रहरों से रस टपकाओ. (३)
नि शुष्ममिन्दवेषां पुरुहूत जनानाम्. यो अस्माँ आदिदेशति.. (४)
हे बहुतों द्वारा बुलाए गए सोम! जिन शत्रुओं का बल हमें बाधा के लिए ललकारता है,
उनका बल नष्ट करो. (४)
शतं न इन्द ऊतिभिः सहस्रं वा शुचीनाम्. पवस्व मंहयद्रयिः.. (५)
हे धन देने वाले सोम! तुम हमारी रक्षा करने के लिए सैकड़ों हजारों निर्मल धाराओं में
बहो. (५)
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सूक्त—५३ देवता—पवमान सोम

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सूक्त—५३ देवता—पवमान सोम
उत्तॆ शुष्मासॊ अस्थू रक्षॊ भिन्दन्तॊ अद्रिवः. नुदस्व याः परिस्पृधः.. (१)
हे पत्थरों वाले सोम! तुम्हारे वेग राक्षसों को विदीर्ण करते हुए उठते हैं. ललकारती हुई
जो शत्रुसेनाएं हमें बाधा पहुंचाती हैं, तुम उन्हें नष्ट करो. (१)
अया निजघ्निरोजसा रथसङ्गे धने हिते. स्तवा अबिभ्युषा हृदा.. (२)
हे अपने बल से शत्रुओं को मारने वाले सोम! मैं भयरहित हृदय से इसलिए तुम्हारी
स्तुति करता हूं कि तुम मेरे रथों में शत्रुओं का धन रखो. (२)
अस्य व्रतानि नाधृषे पवमानस्य दूढ्या. रुज यस्त्वा पृतन्यति.. (३)
हे निचोड़ते हुए सोम! तुम्हारे इस कर्म को दुष्टबुद्धि राक्षस नहीं सह सकते. जो तुमसे
युद्ध करना चाहता है, उसे तुम बाधा दो. (३)
तं हिन्वन्ति मदच्युतं हरिं नदीषु वाजिनम्.
इन्दुमिन्द्राय मत्सरम्.. (४)
ऋत्विज् नशीला रस टपकाने वाले, हरितवर्ण, शक्तिशाली एवं मादक सोम को इंद्र के
लिए जल में डालते हैं. (४)
सूक्त—५४ देवता—पवमान सोम
अस्य प्रत्नामनु द्युतं शुक्रं दुदुहे अह्रयः. पयः सहस्रसामृषिम्.. (१)
विद्वान् ऋत्विज् सोम के प्राचीन, दीप्तिशाली, उज्ज्वल, असीमित अभिलाषाओं को देने
वाले एवं कर्मफल के द्रष्टा रस को दुहते हैं. (१)
अयं सूर्य इवोपद्गयं सरांसि धावति. सप्त प्रवत आ दिवम्.. (२)
यह सोम सूर्य के समान सारे संसार को देखते हैं, तीस उक्थ पात्रों की ओर जाते हैं एवं
स्वर्ग से लेकर पृथ्वी तक सात नदियों को घेरते हैं. (२)
अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि. सोमो देवो न सूर्यः... (३)
निचोड़े जाते हुए यह सोमदेव सूर्य के समान सभी लोकों के ऊपर रहते हैं. (३)
परि णो देववीतये वाजाँ अर्षसि गोमतः. पुनान इन्दविन्द्रयुः.. (४)
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सूक्त—५५ देवता—पवमान सोम

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हे निचुड़ते हुए एवं इंद्राभिलाषी सोम! तुम हमारे यज्ञ के लिए चारों ओर से गायों से
युक्त अन्न बरसाओ. (४)
सूक्त—५५ देवता—पवमान सोम
यवयवं नो अन्धसा पुष्टम्पुष्टं परि स्रव. सोम विश्वा च सौभगा.. (१)
हे सोम! तुम हमें अन्न के साथ पके हुए जौ अधिक मात्रा में दो तथा अन्य
सौभाग्यसूचक संपत्तियां भी दो. (१)
इन्दो यथा तव स्तवो यथा ते जातमन्धसः. नि बर्हिषि प्रिये सदः.. (२)
हे सोमरूप अन्न! तुम अपनी स्तुतियों एवं जन्म के अनुरूप हमारे यज्ञ में अपने प्रिय
कुशों पर बैठो. (२)
उत नो गोविदश्ववित्पवस्व सोमान्धसा. मक्षूतमेभिरहभिः.. (३)
हे सोम! तुम हमें गाएं एवं घोड़े देते हो. तुम थोड़े दिनों में ही अन्न के साथ धारा के रूप
में टपको. (३)
यो जिनाति न जीयते हन्ति शत्रुम्भीत्य. स पवस्व सहस्रजित्.. (४)
हे असंख्य शत्रुओं को जीतने वाले सोम! तुम शत्रुओं को मारते हो, शत्रु तुम्हें नहीं मार
सकते. तुम टपको. (४)
सूक्त—५६ देवता—पवमान सोम
परि सोम ऋतं बृहदाशुः पवित्रे अर्षति. विघ्नन्नक्षांसि देवयुः.. (१)
शीघ्रगति वाले व देवों के अभिलाषी सोम दशापवित्र पर स्थित होकर राक्षसों को नष्ट
करते हैं एवं हमें विशाल अन्न देते हैं. (१)
यत्सोमो वाजमर्षति शतं धारा अपस्युवः. इन्द्रस्य सख्यमाविशन्.. (२)
जब सोम की यज्ञाभिलाषिणी सौ धाराएं इंद्र की मित्रता प्राप्त करती हैं, तब वह हमारे
लिए अन्न देते हैं. (२)
अभि त्वा योषणो दश जारं न कन्यान्षत. मृज्यसे सोम सातये.. (३)
हे सोम! कन्या जिस प्रकार अपने यार को बुलाती है, उसी प्रकार शब्द करती हुई दस
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सूक्त—५७ देवता—पवमान सोम

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उंगलियां हमें धन देने के लिए तुम्हें मसलती हैं. (३)
त्वमिन्द्राय विष्णवे स्वादुरिन्दो परि स्रव. नृन्त्स्तोतॄन्पाह्यंहसः.. (४)
हे प्रिय रस वाले सोम! तुम इंद्र और विष्णु के लिए रस टपकाओ एवं यज्ञकर्म के
नेताओं तथा अपने स्तोताओं की पाप से रक्षा करों. (४)
सूक्त—५७ देवता—पवमान सोम
प्र ते धारा असश्चतो दिवो न यन्ति वृष्टयः. अच्छा वाजं सहस्रिणम्.. (१)
हे सोम! जिस प्रकार द्युलोक से होने वाली जलवर्षा प्रजाओं को हजारों तरह का अन्न
देती है, उसी प्रकार तुम्हारी आसक्तिरहित धाराएं हमें अन्न देती हैं. (१)
अभि प्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्षति. हरिस्तुञ्जान आयुधा.. (२)
हरे रंग वाले सोम अपने सभी प्रीतिकर कर्मों को देखते हुए एवं अपने आयुधों को
राक्षसों के प्रति फेंकते हुए हमारे यज्ञ में आते हैं. (२)
स मर्मृजान आयुभिर्विभो राजेव सुव्रतः. श्येनो न वंसु षीदति.. (३)
ऋत्विजों द्वारा युद्ध करते हुए एवं शोभन कर्म वाले सोम भयरहित राजा अथवा बाज
पक्षी के समान जल में बैठते हैं. (३)
स नो विश्वा दिवो वसूतो पृथिव्या अधि. पुनान इन्दवा भर.. (४)
हे निचोड़ते हुए सोम! तुम स्वर्ग एवं पृथ्वी पर स्थित सारी संपत्तियां हमारे लिए लाओ.
(४)
सूक्त—५८ देवता—पवमान सोम
तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः. तरत्स मन्दी धावति.. (१)
देवों को मद देने वाले सोम अपने स्तोताओं को पाप से बचाते हैं. निचोड़े गए एवं देवों
के अन्न सोम की धाराएं गिरती हैं. स्तोताओं को पाप से बचाने वाले एवं देवमदकारी सोम
दौड़ते हैं. (१)
उस्रा वेद वसूनां मर्तस्य देव्यवसः. तरत्स मन्दी धावति.. (२)
इस सोम की धन देने वाली व दीप्तियुक्त धारा यजमान की रक्षा करना जानती है.
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स्तोताओं को पाप से बचाने वाले एवं देवमदकारी सोम गति करते हैं. (२)
ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दद्महे. तरत्स मन्दी धावति.. (३)
हमने ध्वस्र और पुरुषंति नामक राजाओं से हजारों धन लिए हैं. स्तोताओं को पाप से
बचाने वाले एवं देवमदकारी सोम चलते हैं. (३)
आ ययोस्त्रिंशतं तना सहस्राणि च दद्महे. तरत्स मन्दी धावति.. (४)
हमने ध्वस्र एवं पुरुषंति नामक राजाओं से हजारों वस्त्र लिए हैं. स्तोताओं को पाप से
बचाने वाले एवं देवमदकारी सोम चलते हैं. (४)
सूक्त—५९ देवता—पवमान सोम
पवस्व गोजिदश्वजिद्विश्वजित्सोम रण्यजित्. प्रजावद्रत्नमा भर.. (१)
हे गायों, घोड़ों, संसार एवं रमणीय धन को जीतने वाले सोम! तुम नीचे की ओर गिरो.
(१)
पवस्वाद्भ्यो अदाभ्यः पवस्वौषधीभ्यः. पवस्व धिषणाभ्यः.. (२)
हे सोम! तुम जल, किरणों, ओषधियों एवं पत्थरों से नीचे की ओर बहो. (२)
त्वं सोम पवमानो विश्वानि दुरिता तर. कविः सीद नि बर्हिषि.. (३)
हे निचुड़ते हुए सोम! तुम राक्षसों द्वारा होने वाले सभी उपद्रव नष्ट करो. हे क्रांत कर्मों
वाले सोम! तुम कुशों पर बैठो. (३)
पवमान स्वर्विदो जायमानोऽभवो महान्. इन्दो विश्वाँ अभीदसि.. (४)
हे निचुड़ते हुए सोम! तुम यजमान को सब कुछ दो. तुम उत्पन्न होते ही महान् हो गए
थे. दीप्तिशाली सोम! तुम सब शत्रुओं को अपने तेज से पराजित करते हो. (४)
सूक्त—६० देवता—पवमान सोम
प्र गायत्रेण गायत पवमानं विचर्षणिम्. इन्दुं सहस्रचक्षसम्.. (१)
हे स्तोताओ! विशेष दृष्टि वाले, हजारों नेत्रों वाले एवं निचुड़ते हुए सोम की स्तुति गायत्री
नामक सोम द्वारा करो. (१)
तं त्वा सहस्रचक्षसमथो सहस्रभर्णसम्. अति वारमपाविषुः.. (२)
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हे हजारों द्वारा दृश्यमान, हजारों का भरण करने वाले एवं निचुड़ते हुए सोम! ऋत्विज्
तुम्हें भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की सहायता से शुद्ध करते हैं. (२)
अति वारान्पवमानो असिष्यदत्कलशाँ अभि धावति. इन्द्रस्य हार्द्याविशन्.. (३)
निचुड़ते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके टपकते हैं एवं इंद्र के
हृदय में प्रवेश करते हुए द्रोणकलश में जाते हैं. (३)
इन्द्रस्य सोम राधसे शं पवस्व विचर्षणे. प्रजावद्रेत आ भर.. (४)
हे विशेषद्रष्टा सोम! तुम इंद्र को प्रसन्न करने के लिए अपना सुखकर रस नीचे टपकाओ
एवं हमारे लिए संतान उत्पादन में समर्थ अन्न दो. (४)
सूक्त—६१ देवता—पवमान सोम
अया वीती परि स्रव यस्त इन्दो मदेष्वा. अवाहन्नवतीर्नव.. (१)
हे सोम! तुम इंद्र के उपभोग के लिए उस रस के रूप में नीचे गिरो, जिसने संग्रामों में
शत्रुओं की निन्यानवे नगरियों को समाप्त किया था. (१)
पुरः सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय शम्बरम्. अध त्यं तुर्वशं यदुम्.. (२)
सोमरस ने एक ही दिन में शत्रु नगरियों के स्वामी शंबर, यदु एवं तुर्वश नामक राजाओं
को सच्चे कर्म वाले दिवोदास के वश में कर दिया था. (२)
परि णो अश्वमश्वविद्गोमदिन्दो हिरण्यवत्. क्षरा सहस्रिणीरिषः.. (३)
हे अश्व प्राप्त करने वाले सोम! तुम हमारे लिए घोड़ा, गाय एवं स्वर्ण से युक्त अनेक
प्रकार का अन्न दो. (३)
पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः. सखित्वमा वृणीमहे.. (४)
हे टपकने वाले एवं दशापवित्र को गीला करने वाले सोम! हम तुमसे मित्रता की प्रार्थना
करते हैं. (४)
ये ते पवित्रमूर्म्मयोऽभिक्षरन्ति धारया. तेभिर्नः सोम मृळय.. (५)
हे सोम! तुम्हारी जो लहरें धारा के रूप में दशापवित्र पर गिरती हैं, हमें उसके द्वारा
सुखी करो. (५)
स नः पुनान आ भर रयिं वीरवतीमिषम्. ईशानः सोम विश्वतः.. (६)
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हे समस्त धन के स्वामी एवं निचुड़ते हुए सोम! तुम शुद्ध होते हुए हमारे लिए धन एवं
संतानयुक्त धन चारों ओर से लाओ. (६)
एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सिन्धुमातरम्. समादित्येभिरख्यत.. (७)
नदियों के पुत्र सोम को दस उंगलियां मसलती हैं. सोम आदित्यों के साथ मिलते हैं. (७)
समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ. सं सूर्यस्य रश्मिभि:.. (८)
निचोड़े हुए सोम दशापवित्र में इंद्र, वायु एवं सूर्य की किरणों के साथ मिलते हैं. (८)
स नो भगाय वायवे पूष्णे पवस्व मधुमान्. चारुर्मित्रे वरुणे च.. (९)
हे मधुर रस से युक्त, कल्याणस्वरूप एवं निचुड़े हुए सोम! तुम भग, वायु, पूषा, मित्र
एवं वरुण के लिए टपको. (९)
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि षद्भू म्या ददे. उग्रं शर्म महि श्रव:.. (१०)
हे सोम! तुम्हारा अन्न द्युलोक में उत्पन्न होता है तथा तुम्हारा द्युलोक में विद्यमान, उग्र
एवं महान् सुख और अन्न धरती पर है. (१०)
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (११)
इन सोम की सहायता से मनुष्यों के सभी धनों को भली प्रकार प्राप्त करते हुए एवं
बांटने की इच्छा करते हुए भोगेंगे. (११)
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्य:. वरिवोवित्परि स्रव.. (१२)
हे धन देने वाले सोम! तुम हमारे यज्ञ के पात्र इंद्र, वरुण एवं मरुतों के लिए धारा के
रूप में नीचे गिरो. (१२)
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषु:.. (१३)
देवगण भली-भांति उत्पन्न, जल के द्वारा प्रेरित, शत्रुनाशक व गायों के दूध-दही आदि
से अलंकृत सोम के पास जाते हैं. (१३)
तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सं संशिश्वरीरिव. य इन्द्रस्य हृदंसनि:.. (१४)
हमारी स्तुतियां इंद्र के हृदयग्राही सोम को उसी प्रकार भली-भांति बढ़ावें, जैसे बढ़े हुए
दूध वाली माताएं बच्चों को बढ़ाती हैं. (१४)
अर्षा ण: सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्. वर्धा समुद्रमुक्थ्यम्.. (१५)

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हे सोम! तुम हमारी गायों को सुख दो. तुम हमारे लिए अधिक अन्न तथा प्रशंसनीय जल
बढ़ाओ. (१५)
पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्युतम्. ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्.. (१६)
शुद्ध होते हुए सोम ने वैश्वानर नामक ज्योति को वज्र के समान इसलिए उत्पन्न किया
था कि स्वर्ग का विस्तार हो सके. (१६)
पवमानस्य ते रसो मदो राजन्नदुच्छुनः. वि वारमव्यमर्षति.. (१७)
हे दीप्तिशाली सोम! जब तुम शुद्ध होते हो तो तुम्हारा राक्षसनाशक एवं मदकारक रस
भेड़ के बालों से बने हुए दशापवित्र पर जाता है. (१७)
पवमान रसस्तव दक्षो वि राजति द्युमान्. ज्योतिर्विश्वं स्वर्द्दशे.. (१८)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम्हारा बढ़ा हुआ एवं दीप्तिशाली रस विशेषरूप से सुशोभित
होता है तथा अपने तेज से विश्व को व्याप्त करके देखने योग्य बनाता है. (१८)
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा. देवावीरघशंसहा.. (१९)
हे सोम! तुम अपने देवाभिलाषी, राक्षसहंता, सबके वरण करने योग्य एवं नशीले रस
को अन्न के साथ टपकाओ. (१९)
जघ्निर्वृत्रममित्रियं सस्निर्वजं दिवेदिवे. गोषा उ अश्वसा असि.. (२०)
हे सोम! तुमने शत्रु वृत्र को मारा, प्रतिदिन संग्राम में भाग लिया एवं तुम गाएं तथा घोड़े
देते हो. (२०)
सम्मिश्लो अरुषो भव सूपस्थाभिर्न धेनुभिः. सीदञ्छ्येनो न योनिमा.. (२१)
हे शोभन स्वाद वाले गाय के दूध, दही आदि से मिले हुए सोम! तुम बाज पक्षी के
समान शीघ्र अपने स्थान पर बैठते हुए सुशोभित बनो. (२१)
स पवस्व य आविथेन्द्रं वृत्राय हन्तवे. वव्रिवांसं महीरपः.. (२२)
हे सोम! तुमने विशाल जलों को रोकने वाले वृत्र के मारने के लिए इंद्र की रक्षा की थी.
तुम इस समय नीचे गिरो. (२२)
सुवीरासो वयं धना जयेम सोम मीढ्वः. पुनानो वर्ध नो गिरः.. (२३)
हे सींचने वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमारी स्तुतियों को बढ़ाओ. हम
अंगिरागोत्रीय अमहीयु आदि ऋषि शत्रुओं के धन जीतें. (२३)
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त्वोतासस्तवावसा स्याम वन्वन्त आमुरः. सोम व्रतेषु जागृहि.. (२४)
हे सोम! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर अपने शत्रुओं को पाते ही मार डालें. तुम हमारे
यज्ञकर्मों में जागृत बनो. (२४)
अपघ्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः. गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्.. (२५)
सोम शत्रुओं को मारते हुए, धनदान न करने वालों को मारते हुए तथा इंद्र के स्थान को
पाते हुए धारा के रूप में गिरे थे. (२५)
महो नो राय आ भर पवमान जही मृधः. रास्वेन्दो वीरवद्यशः.. (२६)
हे शुद्ध होते हुए सोम! हमारे लिए महान् धन लाओ, हमें मारने वाले शत्रुओं को मारो
तथा हमें संतानयुक्त यश दो. (२६)
न त्वा शतं चन हुतो राधो दित्सन्तमा मिनन्. यत्पुनानो मखस्यसे.. (२७)
हे सोम! जब तुम शुद्ध होते हुए हमें धन देना चाहते हो, उस समय हमें धन देने वाले
तुमको बहुत से शत्रु भी नहीं रोक पाते. (२७)
पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने. विश्वा अप द्विषो जहि.. (२८)
हे निचुड़े हुए एवं सींचने वाले सोम! तुम धारा के रूप में टपको, हमें जनपदों में यशस्वी
बनाओ तथा सभी शत्रुओं को मारो. (२८)
अस्य ते सख्ये वयं तवेन्दो द्युम्न उत्तमे. सासह्वाम पृतन्यतः.. (२९)
हे इस यज्ञ में वर्तमान सोम! जब हम तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेंगे एवं तुम्हारे द्वारा
दिए गए श्रेष्ठ अन्न से पुष्ट हो जाएंगे तो युद्ध के इच्छुक शत्रुओं को मारेंगे. (२९)
या ते भीमान्यायुधा तिग्मानि सन्ति धूर्वणे. रक्षा समस्य नो निदः.. (३०)
हे सोम! तुम्हारे जो भयंकर, तीखे और शत्रुवध करने वाले आयुध हैं, उनके द्वारा हमें
सभी शत्रुओं की निंदा से बचाओ. (३०)
सूक्त—६२ देवता—पवमान सोम
एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः. विश्वान्यभि सौभगा.. (१)
ऋत्विज् सभी धनों को पाने के उद्देश्य से शीघ्र गति वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम को
दशापवित्र के समीप ले जाते हैं. (१)
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विघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः. तना कृण्वन्तो अर्वते.. (२)
बहुत से पापों को नष्ट करने वाले तथा हमारे पुत्रों और अश्वों को सुख देने वाले
शक्तिशाली सोम दशापवित्र के समीप जाते हैं. (२)
कृण्वन्तो वरिवो गवेऽभ्यर्षन्ति सुष्टुतिम्. इळामस्मभ्यं संयतम्.. (३)
सोम हमारे लिए और हमारी गायों के लिए सुख देने वाला धन तथा अन्न देते हुए हमारी
शोभन स्तुति के सामने जाते हैं. (३)
असाव्यंशुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः. श्येनो न योनिमासदत्.. (४)
पर्वत पर उत्पन्न, नशे के लिए निचोड़े गए व जलों में बढ़े हुए सोम बाज पक्षी के समान
अपने स्थान पर आकर बैठते हैं. (४)
शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धूतो नृभिः सुतः. स्वदन्ति गावः पयोभिः.. (५)
गाएं अपने दूध के द्वारा देवों के प्रार्थित सोमरूप शोभन अन्न को स्वादिष्ट बनाती हैं.
ऋत्विजों द्वारा निचोड़े गए सोम जल के द्वारा शुद्ध होते हैं. (५)
आदीमश्वं न हेतारोऽशूशुभन्नमृताय. मध्वो रसं सधमादे.. (६)
ऋत्विज् अमरता पाने के लिए इस नशीले सोम के रस को यज्ञ में इस प्रकार अलंकृत
करते हैं, जैसे युद्ध में जाने वाला घोड़ा सजाया जाता है. (६)
यास्ते धारा मधुश्चुतोऽसृग्रमिन्द ऊतये. ताभिः पवित्रमासदः.. (७)
हे सोम! तुम्हारी जो मधुर रस टपकाने वाली धाराएं रक्षा के लिए बनाई जाती हैं, उनके
साथ तुम दशापवित्र पर बैठो. (७)
सो अर्षेन्द्राय पीतये तिरो रोमाण्याव्यया. सीदन्योना वनेष्वा.. (८)
हे निचोड़े हुए सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके इंद्र के लिए
अपने पात्र में अपने स्थान पर टपको. (८)
त्वमिन्दो परि स्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः. वरिवोविद् घृतं पयः.. (९)
हे स्वादिष्ट एवं हमें धन देने वाले सोम! तुम अंगिरागोत्रीय ऋत्विजों के लिए दूध और घी
बरसाओ. (९)
अयं विचर्षणिर्हितः पवमानः स चेतति. हिन्वान आप्यं बृहत्.. (१०)
ये विशेष द्रष्टा, पात्रों में रखे हुए एवं पवित्र होते हुए सोम! जल में उत्पन्न महान् अन्न को
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प्रेरित करते हुए सबके द्वारा जाने जाते हैं. (१०)
एष वृषा वृषव्रतः पवमानो अशस्तिहा. करद्वसूनि दाशुषे.. (११)
ये अभिलाषापूरक, बैल के समान कर्म करने वाले, राक्षसों को मारने वाले एवं शुद्ध होते
हुए सोम हव्यदाता यजमान को धन देते हैं. (११)
आ पवस्व सहस्रिणं रयिं गोमन्तमश्विनम्. पुरुश्चन्द्रं पुरुस्पृहम्.. (१२)
हे सोम! तुम हजारों संख्याओं वाला, गायों से युक्त, अश्वसहित, बहुतों को प्रसन्न करने
वाला एवं अनेक द्वारा चाहने योग्य धन दो. (१२)
एष स्य परि षिच्यते मर्मृज्यमान आयुभिः. उरुगायः कविक्रतुः.. (१३)
बहुतों द्वारा स्तुत एवं क्रांत कर्मों वाले ये सोम मनुष्यों द्वारा शुद्ध होते हुए बहते हैं. (१३)
सहस्रोतिः शतामघो विमानो रजसः कविः. इन्द्राय पवते मदः.. (१४)
असीमित रक्षाओं वाले, बहुत धन के स्वामी, लोक के निर्माता, क्रांत-कर्म वाले और
नशीले सोम इंद्र के लिए टपकते हैं. (१४)
गिरा जात इह स्तुत इन्दुरिन्द्राय धीयते. विर्योना वसताविव.. (१५)
उत्पन्न एवं स्तुतियों द्वारा प्रशंसित सोम इंद्र के निमित्त इस यज्ञ में इस प्रकार जाते हैं,
जैसे पक्षी अपने घोंसले में जाता है. (१५)
पवमानः सुतो नृभिः सोमो वाजमिवासरत्. चमूषु शक्मनासदम्.. (१६)
ऋत्विजों द्वारा निचोड़े गए सोम अपनी शक्ति से यज्ञस्थान में बैठने हेतु इस प्रकार जाते
हैं, जैसे कोई युद्ध में जाता है. (१६)
तं त्रिपृष्ठे त्रिवन्धुरे रथे युञ्जन्ति यातवे. ऋषीणां सप्त धीतिभिः.. (१७)
ऋषियों का रथ यज्ञ है. उस में सोम निचोड़ने के तीन काल, तीन पीठ, तीनों वेद, तीन
स्थान एवं सात छंद सात रस्सियां हैं. ऋत्विज् सोमरूपी रथ को देवों के पास जाने के लिए
जोतते हैं. (१७)
तं सोतारो धनस्पृतमाशुं वाजाय यातवे. हरिं हिनोत वाजिनम्.. (१८)
हे सोमरस निचोड़ने वाले लोगो! धन की सृष्टि करने वाले, शक्तिशाली एवं शीघ्रगति
वाले सोमरूपी घोड़े को यज्ञरूपी युद्ध में जाने के लिए प्रेरणा दो. (१८)
आविशन्कलशं सुतो विश्वा अर्षन्नभि श्रियः. शूरो न गोषु तिष्ठति.. (१९)
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