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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1429 of 1855

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Page 1429

आशुर्ष बृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना. यत्र देवा इति ब्रवन्.. (१)
हे महान् बुद्धि वाले सोम! देवों के अतिशय प्रिय शरीर में धारा के द्वारा शीघ्र गमन करो.
तुम यह कहते हुए जाओ— “जहां देव हैं, मैं वहीं जा रहा हूं.” (१)
परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः. वृष्टिं दिवः परि स्रव.. (२)
हे सोम! तुम असंस्कृत स्थान को संस्कृत करते हुए एवं यज्ञ करने वाले यजमान को
जन्म देते हुए आकाश से बरसो. (२)
सुत एति पवित्र आ त्विषिं दधान ओजसा. विचक्षणो विरोचयन्.. (३)
दीप्ति धारण करते हुए एवं सबको देखते हुए निचोड़े गए सोम सबको दीप्त बनाते हैं
एवं अपनी शक्ति से दशापवित्र पर जाते हैं. (३)
अयं स यो दिवस्परि रघुयामा पवित्र आ. सिन्धोरूर्मा व्यक्षरत्.. (४)
दशापवित्र पर सींचे जाते हुए सोम पानी की लहरों के रूप में टपकते हैं एवं द्युलोक के
ऊपर तेज चाल से जाते हैं. (४)
आविवासन् परावतो अथो अर्वावतः सुतः. इन्द्राय सिच्यते मधु.. (५)
निचुड़े हुए सोम दूरवर्ती एवं समीपवर्ती देवों तथा इंद्र की सेवा के लिए मधु के समान
सींचे जाते हैं. (५)
समीचीना अनूषत हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. योनावृतस्य सीदत.. (६)
हे देवो! भली प्रकार मिले हुए स्तोता स्तुतियां करते हैं एवं पत्थरों की सहायता से हरे
रंग के सोम को प्रेरित करते हैं. इसलिए तुम यज्ञ में बैठो. (६)
सूक्त—४० देवता—सोम
पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः. शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः.. (१)
निचुड़ते हुए एवं सबको देखने वाले सोम सभी हिंसक शत्रुओं को लांघ गए. लोग
मेधावी सोम को स्तुतियों द्वारा अलंकृत करते हैं. (१)
आ योनिमरुणो रुहदगमदिन्द्रं वृषा सुतः. ध्रुवे सदसि सीदति.. (२)
लाल रंग वाले सोम द्रोणकलश में जा रहे हैं. इसके बाद अभिलाषापूरक एवं निचुड़े हुए
सोम इंद्र के समीप जाते हैं एवं निश्चित स्थान पर बैठते हैं. (२)
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