ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1447 of 1855
Read in contextविघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः. तना कृण्वन्तो अर्वते.. (२)
बहुत से पापों को नष्ट करने वाले तथा हमारे पुत्रों और अश्वों को सुख देने वाले
शक्तिशाली सोम दशापवित्र के समीप जाते हैं. (२)
कृण्वन्तो वरिवो गवेऽभ्यर्षन्ति सुष्टुतिम्. इळामस्मभ्यं संयतम्.. (३)
सोम हमारे लिए और हमारी गायों के लिए सुख देने वाला धन तथा अन्न देते हुए हमारी
शोभन स्तुति के सामने जाते हैं. (३)
असाव्यंशुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः. श्येनो न योनिमासदत्.. (४)
पर्वत पर उत्पन्न, नशे के लिए निचोड़े गए व जलों में बढ़े हुए सोम बाज पक्षी के समान
अपने स्थान पर आकर बैठते हैं. (४)
शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धूतो नृभिः सुतः. स्वदन्ति गावः पयोभिः.. (५)
गाएं अपने दूध के द्वारा देवों के प्रार्थित सोमरूप शोभन अन्न को स्वादिष्ट बनाती हैं.
ऋत्विजों द्वारा निचोड़े गए सोम जल के द्वारा शुद्ध होते हैं. (५)
आदीमश्वं न हेतारोऽशूशुभन्नमृताय. मध्वो रसं सधमादे.. (६)
ऋत्विज् अमरता पाने के लिए इस नशीले सोम के रस को यज्ञ में इस प्रकार अलंकृत
करते हैं, जैसे युद्ध में जाने वाला घोड़ा सजाया जाता है. (६)
यास्ते धारा मधुश्चुतोऽसृग्रमिन्द ऊतये. ताभिः पवित्रमासदः.. (७)
हे सोम! तुम्हारी जो मधुर रस टपकाने वाली धाराएं रक्षा के लिए बनाई जाती हैं, उनके
साथ तुम दशापवित्र पर बैठो. (७)
सो अर्षेन्द्राय पीतये तिरो रोमाण्याव्यया. सीदन्योना वनेष्वा.. (८)
हे निचोड़े हुए सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके इंद्र के लिए
अपने पात्र में अपने स्थान पर टपको. (८)
त्वमिन्दो परि स्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः. वरिवोविद् घृतं पयः.. (९)
हे स्वादिष्ट एवं हमें धन देने वाले सोम! तुम अंगिरागोत्रीय ऋत्विजों के लिए दूध और घी
बरसाओ. (९)
अयं विचर्षणिर्हितः पवमानः स चेतति. हिन्वान आप्यं बृहत्.. (१०)
ये विशेष द्रष्टा, पात्रों में रखे हुए एवं पवित्र होते हुए सोम! जल में उत्पन्न महान् अन्न को
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