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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1444 of 1855

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Page 1444

हे समस्त धन के स्वामी एवं निचुड़ते हुए सोम! तुम शुद्ध होते हुए हमारे लिए धन एवं
संतानयुक्त धन चारों ओर से लाओ. (६)
एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सिन्धुमातरम्. समादित्येभिरख्यत.. (७)
नदियों के पुत्र सोम को दस उंगलियां मसलती हैं. सोम आदित्यों के साथ मिलते हैं. (७)
समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ. सं सूर्यस्य रश्मिभि:.. (८)
निचोड़े हुए सोम दशापवित्र में इंद्र, वायु एवं सूर्य की किरणों के साथ मिलते हैं. (८)
स नो भगाय वायवे पूष्णे पवस्व मधुमान्. चारुर्मित्रे वरुणे च.. (९)
हे मधुर रस से युक्त, कल्याणस्वरूप एवं निचुड़े हुए सोम! तुम भग, वायु, पूषा, मित्र
एवं वरुण के लिए टपको. (९)
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि षद्भू म्या ददे. उग्रं शर्म महि श्रव:.. (१०)
हे सोम! तुम्हारा अन्न द्युलोक में उत्पन्न होता है तथा तुम्हारा द्युलोक में विद्यमान, उग्र
एवं महान् सुख और अन्न धरती पर है. (१०)
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (११)
इन सोम की सहायता से मनुष्यों के सभी धनों को भली प्रकार प्राप्त करते हुए एवं
बांटने की इच्छा करते हुए भोगेंगे. (११)
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्य:. वरिवोवित्परि स्रव.. (१२)
हे धन देने वाले सोम! तुम हमारे यज्ञ के पात्र इंद्र, वरुण एवं मरुतों के लिए धारा के
रूप में नीचे गिरो. (१२)
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषु:.. (१३)
देवगण भली-भांति उत्पन्न, जल के द्वारा प्रेरित, शत्रुनाशक व गायों के दूध-दही आदि
से अलंकृत सोम के पास जाते हैं. (१३)
तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सं संशिश्वरीरिव. य इन्द्रस्य हृदंसनि:.. (१४)
हमारी स्तुतियां इंद्र के हृदयग्राही सोम को उसी प्रकार भली-भांति बढ़ावें, जैसे बढ़े हुए
दूध वाली माताएं बच्चों को बढ़ाती हैं. (१४)
अर्षा ण: सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्. वर्धा समुद्रमुक्थ्यम्.. (१५)