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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

सूक्त—८ देवता—अश्विनीकुमार

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सूक्त—८ देवता—अश्विनीकुमार
आ नो विश्वाभिरूतिभिरश्विना गच्छतं युवम्.
दस्रा हिरण्यवर्तनी पिबतं सोम्यं मधु.. (१)
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! अपने सोने के रथ द्वारा सभी रक्षासाधनों को लेकर आओ
एवं मधुर सोमरस पिओ. (१)
आ नूनं यातमश्विना रथेन सूर्यत्वचा.
भुजी हिरण्यपेशसा कवी गम्भीरचेतसा.. (२)
हे हविभोक्ता, सोने से अलंकार धारण करने वाले, स्तुतियोग्य एवं प्रशंसनीय ज्ञान वाले
अश्विनीकुमारो! सूर्य के समान चमकीले रथ के द्वारा हमारे समीप आओ. (२)
आ यातं नहुषस्पर्यन्तरिक्षात् सुवृक्ति भिः.
पिबाथो अश्विना मधु कण्वानां सवने सुतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! हमारी शोभन स्तुतियां सुनकर तुम अंतरिक्षलोक से धरती पर आओ
एवं कण्वगोत्रीय ऋषियों के यज्ञ में निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. (३)
आ नो यातं दिवस्पर्यन्तरिक्षादधप्रिया.
पुत्रः कण्वस्य वामिह सुषाव सोम्यं मधु.. (४)
हे मर्त्यलोक को प्रेम करने वाले अश्विनीकुमारो! स्वर्ग एवं अंतरिक्ष से आओ. कण्व
ऋषि के पुत्र ने यहां तुम्हारे लिए मधुर सोमरस निचोड़ा है. (४)
आ नो यातमपुश्रुत्यश्विना सोमपीतये.
स्वाहा स्तोमस्य वर्धना प्र कवी धीतिभिर्नरा.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! सोम पीने के लिए हमारे इस स्तुतिपूर्ण यज्ञ में आओ. हे वृद्धि करने
वाले, कवि एवं नेता अश्विनीकुमारो! अपनी बुद्धि और कामों से स्तोता को बढ़ाओ. (५)
यच्चिद्धि वां पुर ऋषयो जुहुरेऽवसे नरा. आ यातमश्विना गंतमुपेमां सुष्टुतिं मम.. (६)
हे नेता अश्विनीकुमारो! पुराने समय में ऋषियों ने तुम्हें जब भी अपनी रक्षा के लिए
बुलाया, तब तुम आए थे. तुम मेरी इस शोभन स्तुति को सुनकर आओ. (६)
दिवश्चिद्रोचनादध्या नो गन्तं स्वर्विदा. धीभिर्वत्सप्रचेतसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता.. (७)
हे सूर्य को जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्वर्ग एवं अंतरिक्ष से हमारे समीप आओ. हे
स्तोता को उत्तम ज्ञान देने वाले अश्विनीकुमारो! बुद्धि के साथ आओ. हे पुकार सुनने वाले

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अश्विनीकुमारो! स्तोत्रों के साथ आओ. (७)
किमन्ये पर्यासतेऽस्मत्स्तोमेभिरश्विना.
पुत्रः कण्वस्य वामृषिर्गीर्भिर्वत्सो अवीवृधत्.. (८)
मेरे अतिरिक्त कौन स्तोत्रों द्वारा अश्विनीकुमारों की उपासना कर सकता है? कण्व के
पुत्र वत्स ऋषि ने तुम्हें अपनी स्तुतियों द्वारा बढ़ाया. (८)
आ वां विप्र इहावसेऽह्वत्स्तोमेभिरश्विना.
अरिप्रा वृत्रहन्तमा ता नो भूतं मयोभुवा.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! स्तोता ने स्तुति द्वारा तुम्हें रक्षण के लिए बुलाया है. तुम शत्रुहंता,
पापरहित और शोभन हो. तुम हमारे लिए सुख का वर्षण करो. (९)
आ यद्वां योषणा रथमतिष्ठद्वाजिनीवसू.
विश्वान्याश्विना युवं प्र धीतान्यगच्छतम्.. (१०)
हे यज्ञोपयुक्त धन वाले अश्विनीकुमारो! सूर्या नामक नारी तुम्हारे रथ पर सवार हुई थी.
तुम सभी मनचाहे पदार्थ पाओ. (१०)
अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना.
वत्सो वां मधुमद्वचोऽशंसीत्काव्यः कविः.. (११)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने स्थान से हजाररूपों वाले रथ द्वारा आओ. मेधावी पिता
के मेधावी पुत्र वत्स ऋषि ने मधुर वचन बोले थे. (११)
पुरुमन्द्रा पुरूवसू मनोतरा रयीणाम्.
स्तोमं मे अश्विनाविममभि वह्नी अनूषाताम्.. (१२)
हे अधिक मोद वाले, पर्याप्त धन वाले एवं धनदाता अश्विनीकुमारो! तुम संसार का
वहन करते हुए मेरी इस स्तुति की प्रशंसा करो. (१२)
आ नो विश्वान्याश्विना धत्तं राधांस्यह्रया.
कृतं न ऋत्वियावतो मा नो रीरधतं निदे.. (१३)
हे अश्विनीकुमारो! हमें प्रशंसनीय संपत्तियां दो एवं समय पर संतान उत्पन्न करने योग्य
बनाओ. तुम हमें शत्रु के अधिकार में मत देना. (१३)
यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अध्यम्बरे.
अतः सहस्रनिर्णिजा रथेना यातमश्विना.. (१४)
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हे सत्य स्वभाव वाले अश्विनीकुमारो! चाहे तुम दूर रहो, चाहे समीप रहो. तुम अपने
स्थान से हजाररूपों वाले रथ के द्वारा आओ. (१४)
यो वां नासत्यावृषिर्गीर्भिर्वत्सो अवीवृधत्.
तस्मै सहस्रनिर्णिजमिषं धत्तं घृतश्रुतम्.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! जिस वत्स ऋषि ने तुम्हें अपने स्तुतिवचनों के द्वारा बढ़ाया, उनके
लिए घी टपकाने वाला हजाररूपों का अन्न दो. (१५)
प्रास्मा ऊर्जं घृतश्रुतमश्विना यच्छतं युवम्.
यो वां सुम्नाय तुष्टवद्वस्रूयाद्वानुनस्पती.. (१६)
हे दान के अधिपति अश्विनीकुमारो! स्तोता के लिए घी टपकाने वाला एवं बलकारक
अन्न दो. इन्होंने धन की इच्छा करके हमारे सुख के लिए स्तुति की थी. (१६)
आ नो गन्तं रिशादसेमं स्तोमं पुरुभुजा.
कृतं नः सुश्रियो नरेमा दातमभिष्टये.. (१७)
हे शत्रुक्षक एवं अधिक हवि का उपयोग करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम हमारी स्तुति
सुनने के लिए आओ. हमें शोभन धन वाला बनाओ एवं सांसारिक वस्तुएं दो. (१७)
आ वां विश्वाभिरूतिभिः प्रियमैधा अहूषत.
राजन्तावध्वराणामश्विना यामहूतिषु.. (१८)
हे अश्विनीकुमारो! प्रियमैध ऋषियों ने यज्ञ के समय तुम्हें सभी रक्षासाधनों सहित
बुलाया था. तुम यज्ञ में शोभा पाओ. (१८)
आ नो गन्तं मयोभुवाश्विना शम्भुवा युवम्.
यो वां विपन्यू धीतिभिर्गीर्भिर्वतसो अवीवृधत्.. (१९)
हे सुख देने वाले, रोगनाश करने वाले एवं स्तुति-योग्य अश्विनीकुमारो! जिन ऋषियों ने
तुम्हें स्तुतियों द्वारा बढ़ाया था, उनके सामने आओ. (१९)
याभिः कण्वं मेधातिथिं याभिर्वशं दशव्रजम्.
याभिर्गोशर्यमावतं ताभिर्नोऽवतं नरा.. (२०)
हे नेता अश्विनीकुमारो! जिन साधनों से तुमने कण्व, मेधातिथि, वश, दशव्रज एवं गोशर्य
की रक्षा की थी, उन्हीं साधनों द्वारा हमें अन्न पाने के लिए बचाओ. (२०)
याभिर्नरा त्रसदस्युमावतं कृत्व्ये धने.
ताभिः ष्वीस्माँ अश्विना प्रावतं वाजसातये.. (२१)
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हे नेता अश्विनीकुमारो! जिन रक्षासाधनों से तुमने धन पाने के अभिलाषी त्रसदस्यु को
बचाया था, उन्हीं के द्वारा हमें अन्न पाने के लिए बचाओ. (२१)
प्र वां स्तोमाः सुवृक्तयो गिरो वर्धन्त्वश्विना.
पुरुत्रा वृत्रहन्तमा ता नो भूतं पुरुस्पृहा.. (२२)
हे बहुतों की रक्षा करने वाले एवं शत्रुनाशकों में श्रेष्ठ अश्विनीकुमारो! दोषरहित
स्तुतिवचन एवं स्तोत्र तुम्हें बढ़ावें! तुम हमारे लिए अनेक प्रकार से चाहने योग्य बनो. (२२)
त्रीणि पदान्यश्विनोराविः सान्ति गुहा परः.
कवी ऋतस्य पत्मभिर्वाग्जीवेभ्यस्परि.. (२३)
अश्विनीकुमारों का तीन पहियों वाला रथ छिपा रहने के बाद प्रकट होता है. हे बुद्धिमान्
अश्विनीकुमारो! यज्ञ पूर्ण करने में सहायक अपने रथ द्वारा हमारे सामने आओ. (२३)
सूक्त—९ देवता—अश्विनीकुमार
आ नूनमश्विना युवं वत्सस्य गन्तमवसे.
प्रास्मै यच्छतमवृकं पृथु च्छर्दियुयुतं या अरातयः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम वत्स ऋषि की रक्षा के लिए निश्चित रूप से गए थे. तुम इन्हें
बाधारहित एवं विस्तृत घर दो एवं इनके शत्रुओं को समाप्त करो. (१)
यदन्तरिक्षे यद्दिवि यत्पञ्च मानुषाँ अनु. नृम्णं तद्धत्तमश्विना.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! जो धन अंतरिक्ष में, स्वर्ग में अथवा पांच वर्ग वाले लोगों के पास है,
वह हमें दो. (२)
ये वां दंसांस्याश्विना विप्रासः परिमामृशुः. एवेत्काण्वस्य बोधतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! जिस बुद्धिमान् स्तोता ने बार-बार तुम्हारे यज्ञों का अनुष्ठान किया है
उसे जानो. इसी प्रकार कण्व के पुत्र के यज्ञों को जानो. (३)
अयं वां घर्मो अश्विना स्तोमेन परि षिच्यते.
अयं सोमो मधुमान्वाजिनीवसू येन वृत्रं चिकेतथः.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा यज्ञसंबंधी कड़ाह मंत्र बोलने के साथ गीला किया जाता है.
हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! यह वही मीठा सोमरस है, जिसे पीकर तुमने वृत्र
को जाना था. (४)
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यदप्सु यद्वनस्पतौ यदोषधीषु पुरुदंसंसा कृतम्. तेन माविष्टमश्विना.. (५)
हे अनेक कर्म वाले अश्विनीकुमारो! तुमने वनस्पतियों एवं ओषधियों में जो पाक धारण
किया है, उसके द्वारा हमारी रक्षा करो. (५)
यन्नासत्या भुरण्यथो यद्वा देव भिषज्यथ:.
अयं वां वत्सो मतिभिर्न विन्धते हविष्मन्तं हि गच्छथ:.. (६)
हे सच्चे स्वभाव वाले एवं दिव्यगुणसंपन्न अश्विनीकुमारो! तुमने संसार का भरण किया
है एवं सबको रोगरहित बनाया है. वत्सगोत्रीय ऋषि तुम्हें स्तुतियों द्वारा प्राप्त नहीं करते, तुम
हवि धारण करने वालों के पास आते हो. (६)
आ नूनमश्विनोर्ऋषि: स्तोमं चिकेत वामया.
आ सोमं मधुमत्तमं घर्मं सिञ्चादथर्वणि.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! मुझ वत्स ऋषि ने उत्तम बुद्धि के द्वारा तुम्हारे स्तोत्र को जाना था.
मैंने अथर्वा ऋषि द्वारा मंथन की गई अग्नि में अतिशय मधुर सोमरस एवं धर्म नामक हवि को
डाला था. (७)
आ नूनं रघुवर्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना.
आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुम तेज चलने वाले रथ पर चढ़ो. सूर्य के समान दीप्तिशाली ये मेरे
स्तोत्र तुम्हारे सामने आते हैं. (८)
यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि.
यद्वा वाणीभिरश्विनेवेत्काण्वस्य बोधतम्.. (९)
हे सत्यरूप अश्विनीकुमारो! आज हम स्तुति वाक्यों और मंत्रों की सहायता से तुम्हें
जिस प्रकार से ले आते हैं, उसी प्रकार कण्व के पुत्र की स्तुतियों को सुनो. (९)
यद्वां कक्षीवाँ उत यद्व्यश्व ऋषिर्यद्वां दीर्घतमा जुहाव.
पृथी यद्वां वैन्य: सादनेष्वेवेदतो अश्विना चेतयेथाम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार तुम्हें कक्षीवान्, व्यश्व एवं दीर्घतमा ऋषियों एवं राजा वेन
के पुत्र पृथु ने अपनी यज्ञशाला में बुलाया था, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. तुम
इसे जानो. (१०)
यातं छर्दिष्पा उत न: परस्पा भूतं जगत्या उत नस्तनूपा.
वर्तिस्तोकाय तनयाय यातंम्.. (११)
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हे अश्विनीकुमारो! तुम गृहपालक के रूप में आओ और हमारे लिए अत्यंत पुष्टिकर्त्ता
बनो. तुम हमारे संसार तथा हमारे शरीर के पालनकर्त्ता बनो. तुम हमारे पुत्रों और पौत्रों के
घरों में आओ. (११)
यदिन्द्रेण सरथं याथो अश्विना यद्वा वायुना भवथः समोकसा.
यदादित्येभिर्ऋभुभिः सजोषसा यद्वा विष्णोर्विक्रमणेषु तिष्ठथः.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम यदि इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर आते हो, यदि वायु के साथ
एक स्थान में रहते हो, यदि अदिति के पुत्र ऋभुओं के साथ प्रसन्न रहते हो तथा यदि विष्णु के
कदमों के साथ चलते हो तो हमारे पास आओ. (१२)
यद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये.
यत्पृत्सु तुर्वणे सहस्तच्छ्रेष्ठमश्विनोरवः.. (१३)
मैं अश्विनीकुमारों को जब बुलाऊं, तभी वे मेरे युद्ध में सहायता के लिए आवें.
अश्विनीकुमारों के शत्रुनाशन में विजयी रक्षासाधन श्रेष्ठ है. (१३)
आ नूनं यातमश्विनेमा हव्यानि वां हिता.
इमे सोमासो अधि तुर्वशे यदाविमे कण्वेषु वामथ.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! इन हव्यों का निर्माण तुम्हारे निमित्त हुआ है. तुम अवश्य आओ. यह
सोम यदु और तुर्वशु राजाओं के पास उपस्थित है, तुम्हारे लिए बनाया गया है एवं कण्वपुत्रों
को दिया गया है. (१४)
यन्नासत्या पराके अर्वाके अस्ति भेषजम्.
तेन नूनं विमदाय प्रचेतसा छर्दिर्वत्साय यच्छतम्.. (१५)
हे सत्य स्वरूप अश्विनीकुमारो! जो ओषधियां समीप और दूर के क्षेत्रों में मिलती हैं,
उन्हें आप हमें प्राप्त कराएं. विमद की तरह वत्स को भी घर दो. (१५)
अभुत्स्यु प्र देव्या साकं वाचाहमश्विनोः.
व्यावद्देव्या मतिं वि रातिं मर्त्येभ्यः.. (१६)
मैं अश्विनीकुमारों संबंधी दिव्य स्तोत्र के साथ जागा हूं. हे उषादेवी! मेरी स्तुति को
सुनकर अंधकार मिटाओ और मानवों को धन दो. (१६)
प्र बोधयोषो अश्विना प्र देवि सूनृते महि.
प्र यज्ञहोतरानुषक्प्र मदाय श्रवो बृहत्.. (१७)
हे शोभन नेत्रों वाली एवं महान् उषादेवी! अश्विनीकुमारों को जगाओ एवं उन्नत बनाओ.
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तुम उनके आनंद के लिए अधिक मात्रा में सोमरस तैयार करो. (१७)
यदुषो यासि भानुना सं सूर्येण रोचसे.
आ हायमश्विनो रथो वर्तियाति नृपाय्यम्.. (१८)
हे उषा! जब तुम अपने प्रकाश के साथ गति करती हो, तब सूर्य के समान दीप्ति वाली
लगती हो. उस समय अश्विनीकुमारों का रथ मानवों के यज्ञ में जाता है. (१८)
यदापीतासो अंशवो गावो न दुह ऊधभिः.
यद्वा वाणीरनूषत प्र देवयन्तो अश्विना.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! जिस समय पीले रंग की सोमलता को गाय के थन की तरह निचोड़ा
जाता है एवं देवों को चाहने वाले लोग स्तुति करते हैं, उस समय हमारी रक्षा करो. (१९)
प्र द्युम्नाय प्र शवसे प्र नृषाह्याय शर्मणे. प्र दक्षाय प्रचेतसा.. (२०)
हे उत्तम ज्ञान वाले अश्विनीकुमारो! तुम लोग धन के लिए, बल के लिए, मनुष्यों द्वारा
भोगने योग्य सुख के लिए तथा उन्नति के लिए हमारी रक्षा करो. (२०)
यन्नूनं धीभिरश्विना पितुर्योना निषीदथः. यद्वा सुम्नेभिरुक्थ्या.. (२१)
हे अश्विनीकुमारो! चाहे तुम अपने पिता के समान द्युलोक में बैठे होओ अथवा
सुखपूर्वक प्रशंसनीय घर में रहते होओ, दोनों जगहों से हमारे पास आओ. (२१)
सूक्त—१० देवता—अश्विनीकुमार
यत्स्थो दीर्घप्रसद्मनि यद्वादो रोचने दिवः.
यद्वा समुद्रे अध्याकृते गृहेऽत आ यातमश्विना.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! चाहे तुम प्रशंसनीय यज्ञशालाओं वाले मर्त्यलोक में रहते होओ तथा
द्युलोक के दीप्तिशाली भाग में अथवा आकाश में निवास करते हो. तुम इन स्थानों से हमारे
पास आओ. (१)
यद्वा यज्ञं मनवे संमिमिक्षथुरेवेत्काण्वस्य बोधतम्.
बृहस्पतिं विश्वान्देवाँ अहं हुव इन्द्राविष्णू अश्विनावाशुहेषसा.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम लोगों ने जिस प्रकार मनु के लिए यज्ञ को सफल बनाया था,
उसी प्रकार कण्व के यज्ञ को भी समझो. मैं बृहस्पति सभी देवों, इंद्र, विष्णु एवं गतिशील
अश्वों वाले अश्विनीकुमारों को बुलाता हूं. (२)
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त्या न्व१श्विना हुवे सुदंससा गृभे कृता.
ययोरस्ति प्र णः सख्यं देवेष्वध्याप्यम्.. (३)
मैं शोभन कर्म वाले एवं हमारा हविष्य स्वीकार करने के लिए प्रकट होने वाले
अश्विनीकुमारों को बुलाता हूं. अश्विनीकुमारों की मित्रता सभी देवों में उत्तम मानी जाती है.
(३)
ययोरधि प्र यज्ञा असूरे सन्ति सूरयः.
ता यज्ञस्याध्वरस्य प्रचेतसा स्वधाभिर्या पिबतः सोम्यं मधु.. (४)
यज्ञ जिन अश्विनीकुमारों को वश में रखते हैं एवं बिना स्तोताओं वाले देश में भी
जिनकी स्तुति होती है, वे यज्ञ के उत्तम जानकार हैं. वे स्वधा शब्दों के साथ मधुर सोमरस
पिएं. (४)
यदद्याश्विनावपाग्यत्प्राक्स्थो वाजिनीवसू.
यद् द्रुह्यव्यनवि तुर्वशे यदौ हुवे वामथ मा गतम्.. (५)
हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! इस समय तुम लोग चाहे पूर्व दिशा में होओ,
चाहे पश्चिमी दिशा में, चाहे द्रुह्यु, अनु, तुर्वशु एवं यदु राजा के पास हो, मैं तुम्हें वहीं से
बुलाता हूं. तुम मेरे पास आओ. (५)
यदन्तरिक्षे पतथः पुरुभुजा यद्वेमे रोदसी अनु.
यद्वा स्वधाभिरधितिष्ठथो रथमत्त आ यातमश्विना.. (६)
हे अधिक हवि भक्षण करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम चाहे अंतरिक्ष में गमन करते
होओ अथवा द्यावा-पृथिवी की ओर जा रहे होओ, अथवा तेजरूपी रथ पर बैठे होओ, इन
सभी स्थानों से आओ. (६)
सूक्त—११ देवता—अग्नि
त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा. त्वं यज्ञेष्वीड्यः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम मनुष्यों में यज्ञकर्म की रक्षा करने वाले हो एवं यज्ञ में प्रशंसा करने
योग्य हो. (१)
त्वमसि प्रशस्यो विदथेषु सहन्त्य. अग्ने रथीरध्वराणाम्.. (२)
हे शत्रुओं को हराने वाले अग्नि! तुम यज्ञों में प्रशंसा करने योग्य एवं यज्ञों के नेता हो.
(२)
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स त्वमस्मदप द्विषो युयोधि जातवेदः. अदेवीरणे अरातीः.. (३)
हे जातवेद अग्नि! तुम हमारे शत्रुओं को हमसे अलग करो. हे अग्नि! देवों से द्वेष रखने
वाले शत्रुसेनाओं को तुम अलग करो. (३)
अन्ति चित्सन्तमह यज्ञं मर्तस्य रिपोः. नोप वेषि जातवेदः.. (४)
हे जातवेद अग्नि! तुम शत्रु के पास रहकर भी कभी उसके यज्ञ की इच्छा नहीं करते.
(४)
मर्ता अमर्त्यस्य ते भूरि नाम मनामहे. विप्रासो जातवेदसः.. (५)
हम मरणधर्मा ब्राह्मण तुझ मरणरहित अग्नि की विशाल स्तुतियां करेंगे. (५)
विप्रं विप्रासोऽवसे देवं मर्तास ऊतये. अग्निं गीर्भिर्हवामहे.. (६)
हम मरणधर्मा ब्राह्मण मेधावी अग्नि देव को अपनी रक्षा की दृष्टि से स्तुतियों द्वारा
बुलाते हैं और हव्य द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हैं. (६)
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वांकामया गिरा.. (७)
हे अग्नि! वत्सगोत्रीय ऋषि तुम्हारे उत्तम निवास स्थान से तुम्हें बुला लेते हैं. वे अपनी
स्तुति द्वारा हमारी कामना करते हैं. (७)
पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि विशो विश्वा अनु प्रभुः. समत्सु त्वा हवामहे.. (८)
हे अग्नि! तुम बहुत से स्थानों को समानरूप से देखते हो. इसलिए तुम सारी प्रजाओं के
मालिक हो. हम तुम्हें युद्ध में बुलाते हैं. (८)
समत्स्वग्निमवसे वाजयन्तो हवामहे. वाजेषु चित्रराधसम्.. (९)
हम अन्न की अभिलाषा से युद्ध में अपनी रक्षा करने के लिए अग्नि को बुलाते हैं. युद्ध
में अग्नि विचित्र धन वाले हैं. (९)
प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि.
स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व.. (१०)
हे अग्नि! तुम यज्ञ में पूज्य, प्राचीन, बहुत समय से हवन करने वाले, स्तुति के योग्य एवं
यज्ञ में स्थित रहने वाले हो. तुम अपना शरीर हवि से प्रसन्न करो और हमें सौभाग्य दो. (१०)
सूक्त—१२ देवता—इंद्र
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य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति. येना हंसि न्य१त्रिणं तमीमहे.. (१)
हे सोमरस पीने वालों में श्रेष्ठ एवं अतिशय बलशाली इंद्र! तुम प्रसन्न होकर अपने
कर्त्तव्य जानते हो. हम तुम्हारी उस प्रसन्नता की याचना करते हैं, जिसके कारण तुम राक्षसों
को मारते हो. (१)
येना दशग्वमधिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्. येना समुद्रमाविथा तमीमहे.. (२)
हे इंद्र! हम तुमसे उसी मदपूर्ण स्थिति में आने की याचना करते हैं, जिसके कारण तुमने
अंगिरागोत्रीय, अंधकार नाश करने वाले सूर्य एवं समुद्र की रक्षा की थी. (२)
येन सिन्धुं महीरपो रथाँ इव प्रचोदयः. पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे.. (३)
हे इंद्र! जिस मद के कारण तुम विशाल जलों का रथ के समान सागर की ओर भेजते
हो, हम यज्ञ के मार्ग पर चलने के लिए तुमसे उसी मद की दशा में होने की याचना करते हैं.
(३)
इमं स्तोममभिष्टये घृतं न पूतमद्रिवः. येना नु सद्य ओजसा ववक्षिथ.. (४)
हे वज्रधारी इंद्र! हमें मनचाहा फल देने के लिए घृत के समान पवित्र हमारे उस स्तोत्र
को जानो, जिसे सुनकर तुम तुरंत अपने बल से हमारी अभिलाषा पूरी करते हो. (४)
इमं जुषस्व गिर्वणः समुद्र इव पिन्वते. इन्द्र विश्वाभिरूतिभिर्ववक्षिथ.. (५)
हे स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! हमारे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. यह चंद्रोदय के समय
बढ़ने वाले सागर के समान बढ़ता है. तुम उसी स्तोत्र के कारण हमें समस्त रक्षासाधनों द्वारा
कल्याण देते हो. (५)
यो नो देवः परावतः सखित्वनाय मामहे. दिवो न वृष्टिं प्रथयन्ववक्षिथ.. (६)
हे इंद्र देव! तुमने दूर देश से आकर हमारी मैत्रीभावना बढ़ाने के लिए हमें धन दिया है.
तुम हमारा धन अंतरिक्ष से होने वाली वर्षा के समान बढ़ाओ एवं हमें कल्याण देने की इच्छा
करो. (६)
ववक्षुरस्य केतव उत वज्रो गभस्त्योः यत्सूर्यो न रोदसी अवर्धयत्.. (७)
इंद्र जब सूर्य के समान द्यावा-पृथिवी को वर्षा द्वारा बढ़ाते हैं, तब इंद्र के रथ पर लगे
झंडे एवं उनका वज्र हमें अनेक कल्याण देते हैं. (७)
यदि प्रवृद्ध सत्पते सहस्रं महिषाँ अधः. आदित्त इन्द्रियं महि प्र वावृधे.. (८)
हे अतिशय महान् एवं सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने हजारों महान् राक्षसों
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को मारा था, उसके बाद ही तुम्हारा बल महान् रूप से बढ़ा था. (८)
इन्द्रः सूर्यस्य रश्मिभिर्न्यर्शानमोषति. अग्निर्वनेव सासहिः प्र वावृधे.. (९)
जिस प्रकार अग्नि वनों को जलाते हैं, उसी प्रकार इंद्र सूर्य की किरणों द्वारा बाधक
राक्षसों को ठीक से जलाते हैं एवं शत्रुओं को पराजित करते हुए बढ़ते हैं. (९)
इयं त ऋत्वियावती धीतिरेति नवीयसी. सपर्यन्ती पुरुप्रिया मिमीतः इत्.. (१०)
हे इंद्र! विभिन्न ऋतुओं में होने वाले यज्ञकर्मों से युक्त, अतिशय नवीन, आदर करती हुई
एवं अधिक प्रसन्नताकारक यह स्तुति तुम्हारे पास जाती है. (१०)
गर्भो यज्ञस्य देवयुः क्रतुं पुनीत आनुषक्. स्तोमैरिन्द्रस्य वावृधे मिमीतः इत्.. (११)
यज्ञ करने वाला स्तोता इंद्र को दयालु करने की अभिलाषा से दशापवित्र द्वारा इंद्र के
पान हेतु सोमरस को पुनीत करता है, स्तोत्रों द्वारा इंद्र को बढ़ाता है एवं स्तोत्रों द्वारा इंद्र के
गुणों को सीमित करता है. (११)
सनिर्मित्रस्य पप्रथ इन्द्रः सोमस्य पीतये. प्राची वाशीव सुन्वते मिमीतः इत्.. (१२)
मित्र स्तोता को धन देने वाले इंद्र ने सोमरस पीने के लिए अपना शरीर उसी प्रकार बढ़ा
लिया है, जिस प्रकार सोमरस निचोड़ने वाला यजमान अपने स्तुतिवचन का विस्तार करता है
एवं इंद्र के गुणों की सीमा बांधता है. (१२)
यं विप्रा उक्थवाहसोऽभिप्रमन्दुरायवः घृतं न पिप्य आसन्मृतस्य यत्.. (१३)
मेधावी एवं स्तोत्र वहन करने वाले मनुष्य जिन इंद्र को भली प्रकार प्रमुदित करते हैं,
उन्हीं इंद्र के मुख में मैं घृत के समान हव्य डालूंगा. (१३)
उत स्वराजे अदितिः स्तोममिन्द्राय जीजनत्. पुरुप्रशस्तमूतय ऋतस्य यत्.. (१४)
अदिति ने अपनी रक्षा के विचार से स्वयं प्रदीप्त के लिए बहुतों द्वारा प्रशंसित एवं यज्ञ
संबंधी स्तोत्र उत्पन्न किया था. (१४)
अधि वह्नय ऊतयेऽनूषत प्रशस्तये. न देव विव्रता हरी ऋतस्य यत्.. (१५)
ऋत्विज् रक्षा एवं प्रशंसा पाने के लिए इंद्र की स्तुति करते हैं. हे इंद्र देव! इस समय
विविध कर्म करने वाले घोड़े तुम्हें यज्ञ के लिए ढोते हैं. (१५)
यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये. यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः.. (१६)
हे इंद्र! यद्यपि तुम विष्णु के आने पर सोमरस पीते हो अथवा जलपुत्र त्रित राजर्षि के
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यज्ञ में सोमरस पीते हो अथवा मरुतों के आने पर सोमरस पीते हो, फिर भी तुम हमारा सोम
पीकर ही प्रसन्न बनो. (१६)
यद्वा शक्र परावति समुद्र अधि मन्दसे. अस्माकमित्सुते रणा समिन्दुभिः.. (१७)
हे शक्तिशाली इंद्र! यद्यपि तुम दूरवर्ती सोमरस से प्रसन्न होते हो, तथापि हमारा सोमरस
निचुड़ जाने पर उसके द्वारा प्रसन्न बनो. (१७)
यद्वासि सुन्वतो वृधो यजमानस्य सत्पते. उक्थे वा यस्य रण्यसि समिन्दुभिः.. (१८)
हे सज्जनों के पालक इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले जिस यजमान को बढ़ाते हो एवं
मंत्रों से प्रसन्न होते हो, उसका सोमरस पीकर प्रमुदित बनो. (१८)
देवंदेवं वोऽवस इन्द्रमिन्द्रं गृणीषणि. अधा यज्ञाय तुर्वणे व्यानशुः.. (१९)
हे यजमान! तुम्हारी रक्षा के लिए मैं जिन इंद्र की स्तुतियां करना चाहता हूं, मेरी स्तुतियां
शीघ्र सेवा एवं यज्ञ के लिए उसी इंद्र को व्याप्त करें. (१९)
यज्ञेभिर्यज्ञवाहसं सोमेभिः सोमपातमम्. होत्राभिरिन्द्रं वावृधुर्व्यानशुः.. (२०)
स्तोतागण यज्ञों द्वारा यजमान को फल देने वाले एवं सोमरस पीने वालों में श्रेष्ठ इंद्र को
सोम एवं स्तुतियों द्वारा बढ़ाते एवं व्याप्त करते हैं. (२०)
महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः. विश्वा वसूनि दाशुषे व्यानशुः.. (२१)
इंद्र का धनदान महान् एवं यश विस्तृत है. इंद्र हव्यदाता यजमान को देने के लिए सभी
धन व्याप्त करते हैं. (२१)
इन्द्रं वृत्राय हन्तवे देवासो दधिरे पुरः. इन्द्रं वाणीरनूषता समोजसे.. (२२)
देवों ने वृत्र को मारने के लिए इंद्र को अपने अग्रभाग में स्वामी बनाकर रखा था.
वाणियां उचित बल पाने के लिए इंद्र की ठीक से स्तुति करती हैं. (२२)
महान्तं महिना वयं स्तोमेभिर्हवनश्रुतम्. अर्कैरभि प्र णोनुमः समोजसे.. (२३)
हम सर्वाधिक महान् एवं पुकार सुनने वाले इंद्र को उचित बल की प्राप्ति के लिए स्तोत्रों
तथा मंत्रों द्वारा स्तुत करते हैं. (२३)
न यं विविक्ततो रोदसी नान्तरिक्षाणि वज्रिणम्. अमादिदस्य तित्विषे समोजसः..
(२४)
द्यावा-पृथिवी और आकाश जिस वज्रधारी इंद्र को अपने से अलग नहीं कर सकते,
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उन्हीं इंद्र की शक्ति से शक्ति पाने हेतु सारा संसार दीप्त होता है. (२४)
यदिन्द्र पृतनाज्ये देवास्त्वा दधिरे पुरः. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२५)
हे इंद्र! जब देवों ने तुम्हें संग्राम में स्वामी के रूप में आगे किया था, उसी समय सुंदर
घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२५)
यदा वृत्रं नदीवृतं शवसा वज्रिन्नवधीः. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२६)
हे वज्रधारी इंद्र! तुमने जल को रोकने वाले वृत्र को जिस समय मारा था, उसी समय
तुम्हारे सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२६)
यदा ते विष्णुरोजसा त्रीणि पदा विचक्रमे. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२७)
हे इंद्र! तुम्हारे छोटे भाई विष्णु ने जिस समय अपने बल से तीन लोकों को अपने तीन
कदमों से नापा था, उसी समय तुम्हारे सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२७)
यदा ते हर्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (२८)
हे इंद्र! तुम्हारे सुंदर घोड़े जब प्रतिदिन बढ़े थे, उसी के बाद तुमने सारे संसार को नियम
में बांधा था. (२८)
यदा ते मारुतीर्विशस्तुभ्यमिन्द्र नियेमिरे. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (२९)
हे इंद्र! जब तुम्हारी मरुद्गणरूपी प्रजा तुम्हारे लिए सब प्राणियों को नियम में बांधती
हैं, उसी के बाद तुम सारे विश्व को नियमित करते हो. (२९)
यदा सूर्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (३०)
हे इंद्र! तुम उज्ज्वल प्रकाश वाले सूर्य को जिस समय द्युलोक में धारण करते हो, उसी
समय सारे संसार को नियमों में बांधते हो. (३०)
इमां त इन्द्र सुष्टुतिं विप्र इयर्ति धीतिभिः. जामिं पदेव पिप्रतीं प्राध्वरे.. (३१)
हे इंद्र! बुद्धिमान् स्तोता यज्ञ में प्रसन्नता देने वाली शोभन स्तुति अपने सेवाकार्यों द्वारा
इस प्रकार तुम्हारे पास भेजता है जिस प्रकार लोग अपने बंधु उत्तम स्थान में भेजते हैं. (३१)
यदस्य धामनि प्रिय समीचीनासो अस्वरन्. नाभा यज्ञस्य दोहना प्राध्वरे.. (३२)
हे इंद्र! यज्ञ में तुम्हारे तेज को प्रसन्न करने के लिए स्तोता एकत्र होकर जब ऊंचे स्वर से
स्तुति बोलते हैं, उस समय तुम धरती की नाभिरूप यज्ञ की वेदी पर धन दो. (३२)
सुवीर्यं स्वश्व्यं सुगव्यमिन्द्र दद्धि नः. होतेव पूर्वचित्तये प्राध्वरे.. (३३)
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सूक्त—१३ देवता—इंद्र

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हे इंद्र! मुझे शोभन शक्ति, सुंदर घोड़े एवं अच्छी गाएं दो. मैंने ज्ञान पाने के लिए यज्ञ में
होता के समान पहले ही स्तुति की थी. (३३)
सूक्त—१३ देवता—इंद्र
इन्द्रः सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीत उक्थ्यम्. विदे वृधस्य दक्षसो महान्हि षः.. (१)
इंद्र सोमरस निचूड़ जाने पर यज्ञ करने वाले एवं स्तोता को पवित्र करते हैं एवं बढ़े हुए
बल के लाभ के लिए महान् हुए हैं. (१)
स प्रथमे व्योमनि देवानां सदने वृधः. सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्.. (२)
वे इंद्र विस्तृत व्योमरूप देवस्थान में देवों को बढ़ाते हैं. इंद्र यज्ञकर्म पूरा करने वाले,
शोभन यश वाले एवं जल पीने के लिए वृत्र के विजेता हैं. (२)
तमह्वे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्. भवा नः सुम्ने अन्तमः सखा वृधे.. (३)
मैं अन्नप्राप्ति के हेतु होने वाले संग्राम में सहायता के लिए शक्तिशाली इंद्र को बुलाता हूं.
हे इंद्र! तुम हमारा इच्छित धन बढ़ाने के लिए हमारे मित्र बनो. (३)
इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (४)
हे स्तुतियों द्वारा सेवा करने योग्य इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की यह आहुति
तुम्हें प्राप्त होती है. तुम प्रसन्न होकर इस यज्ञ में विराजो. (४)
नूनं तदिन्द्र दद्धि नो यत्त्वा सुन्वन्त ईमहे. रयिं नश्चित्रामा भरा स्वर्विदम्.. (५)
हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम जिस धन की अभिलाषा करते हैं, वह हमें दो. तुम
हमें स्वर्ग देने वाला विचित्र धन दो. (५)
स्तोता यत्ते विचर्षणििरति प्रशर्धयद्गिरः. वया इवानु रोहते जुषन्त यत्.. (६)
हे इंद्र! विशेषरूप से देखने वाले स्तोता जिस समय तुम्हारे प्रति शत्रुओं को हराने में
समर्थ स्तुतियां करते हैं एवं उनके द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं, उस समय तुम में सभी गुण इस
प्रकार आ जाते हैं जैसे एक वृक्ष में बहुत सी शाखाएं होती हैं. (६)
प्रत्नवज्जनया गिरः शृणुधी जरितुह्र्वम्. मदेमदे ववक्षिथा सुकृत्वने.. (७)
हे इंद्र! तुम पहले के समान स्तोताओं द्वारा स्तुतियां उत्पन्न कराओ एवं स्तोताओं की
पुकार सुनो. तुम सोमरस द्वारा प्रसन्नता प्राप्त करके शोभन कर्म करने वाले यजमान को
मनचाहा फल देते हो. (७)
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क्रीळन्त्यस्य सूनृता आपो न प्रवता यतीः. अया धिया य उच्यते पतिर्दिवः.. (८)
इंद्र की सच्ची बातें नीचे की ओर बहने वाली जलधारा के समान विहार करती हैं. हमारी
इस स्तुति द्वारा स्वर्ग के स्वामी की प्रशंसा होती है. (८)
उतो पतिर्य उच्यते कृष्टीनामेक इद्वशी. नमोवृधैरवस्युभिः सुते रण.. (९)
वश में करने वाले एकमात्र इंद्र ही मनुष्यों का पालन करने वाले कहे गए हैं. हे इंद्र! तुम
स्तुतियों द्वारा बढ़ने वालों एवं रक्षा के इच्छुक लोगों के साथ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (९)
स्तुहि श्रुतं विपश्चितं हरी यस्य प्रसक्षिणा. गन्तारा दाशुषो गृहं नमस्विनः.. (१०)
हे स्तोता! विद्वान् एवं प्रसिद्ध इंद्र की स्तुति करो. उनके दोनों शत्रुविजयी घोड़े हव्यदाता
यजमान के घर जाने वाले हैं. (१०)
तूतुजानो महेमतेऽश्वेभिः पृषितप्सुभिः. आ याहि यज्ञमाशुभिः शमिद्धि ते.. (११)
हे महाफल देने वाली बुद्धि से युक्त इंद्र! तुम शीघ्र चलने वाले एवं चिकने घोड़े के साथ
यज्ञ में आओ. उस यज्ञ में तुम्हें सुख मिलता है. (११)
इन्द्र शविष्ठ सत्पते रयिं गृणत्सु धारय. श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनम्.. (१२)
हे शक्तिशालियों में श्रेष्ठ एवं सज्जनों के पालक इंद्र! हम स्तुति करने वालों को धन दो
एवं स्तोताओं को मरणरहित तथा व्यापक यश दो. (१२)
हवे त्वा सूर उदिते हवे मध्यन्दिने दिवः. जुषाण इन्द्र सप्तिभिर्न आ गहि.. (१३)
हे इंद्र! मैं तुम्हें सूर्य निकलने पर एवं दोपहर के समय बुलाता हूं. तुम प्रसन्न होकर अपने
तेज चलने वाले घोड़ों के द्वारा आओ. (१३)
आ तू गहि प्र तु द्रव मत्स्वा सुतस्य गोमतः. तन्तुं तनुष्व पूर्व्य यथा विदे.. (१४)
हे इंद्र! शीघ्र आओ एवं यज्ञ में जाओ. वहां गाय के दूध से मिले हुए सोमरस से प्रसन्न
बनो. तुम पूर्वजों द्वारा किए हुए यज्ञ को उसी प्रकार बढ़ाओ, जिस प्रकार मैं जानता हूं. (१४)
यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन्. यद्वा समुद्रे अन्धसोऽवितेदसि.. (१५)
हे शक्तिशाली एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम चाहे दूरवर्ती स्थान में होओ, चाहे समीपवर्ती स्थान
में होओ, चाहे सागर में होओ, सब स्थानों से आओ एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (१५)
इन्द्रं वर्धन्तु नो गिर इन्द्रं सुतास इन्दवः. इन्द्रे हविष्मतीर्विशो अराणिषुः.. (१६)
हमारी स्तुतियां एवं निचोड़े हुए सोमरस इंद्र को बढ़ावें. हव्य धारण करने वाली प्रजाएं
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इंद्र के प्रति श्रद्धा रखती हैं. (१६)
तमिद्धिप्रा अवस्यवः प्रवत्वतीभिरूतिभिः. इन्द्रं क्षोणीरवर्धयन्वया इव.. (१७)
बुद्धिमान् एवं रक्षा चाहने वाले स्तोता इंद्र को तृप्त करने वाली स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं.
सब लोक वृक्ष की शाखाओं के समान इंद्र के अधीन होकर उन्हें बढ़ाते हैं. (१७)
त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः सदावृधम्.. (१८)
देवों ने त्रिकद्रुक नाम के यज्ञ में चैतन्य करने वाले इंद्र को यज्ञ के योग्य बनाया था. सदा
बढ़ने वाले इंद्र को हमारी स्तुतियां बढ़ावें. (१८)
स्तोता यत्ते अनुव्रत उक्थान्यृतुथा दधे. शुचिः पावक उच्यते सो अद्भुत:.. (१९)
हे इंद्र! तुम्हारा स्तोता प्रत्येक ऋतु के अनुसार अनुकूल कर्म करता हुआ उक्थों को
बोलता है. शुद्ध, पवित्र करने वाले एवं आश्चर्यजनक तुम स्तुति का विषय बनते हो. (१९)
तदिद्रुद्रस्य चेतति यह्वं प्रत्नेषु धामसु. मनो यत्रा वि तद्दधुर्विचेतसः.. (२०)
वे ही रुद्रपुत्र मरुत् अपने पुराने स्थानों में वर्तमान हैं, जिनकी स्तुति विशेष ज्ञान वाले
स्तोता करते हैं. (२०)
यदि मे सख्यामावर इमस्य पाह्यन्धसः. येन विश्वा अति द्विषो अतारिम.. (२१)
हे इंद्र! यदि तुम मुझे अपनी मित्रता दो एवं इस सोमरस को पिओ, मैं सभी शत्रुओं को
हरा सकता हूं. (२१)
कदा त इन्द्र गिर्वणः स्तोता भवाति शन्तमः. कदा नो गव्ये अश्व्ये वसौ दधः.. (२२)
हे स्तुतियां स्वीकार करने वाले इंद्र! तुम्हारा स्तोता कब अतिशय सुखी होगा? तुम हमें
कब गायों एवं अश्वों वाले घर में रखोगे. (२२)
उत ते सुष्टुता हरी वृषणा वहतो रथम्. अजुर्यस्य मदिन्तमं यमीमहे.. (२३)
हे जरारहित इंद्र! तुम्हारे भली प्रकार स्तुत एवं अभिलाषापूरक घोड़े तुम्हारे रथ को यहां
लावें. हे अतिशय प्रसन्न इंद्र! हम तुमसे याचना करते हैं. (२३)
तमीमहे पुरुष्टुतं यह्वं प्रत्नाभिरूतिभिः. नि बर्हिषि प्रिये सददध द्विता.. (२४)
महान् एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र से हम प्राचीन सोमाहुतियों द्वारा याचना करते हैं. वे
प्रिय कुश पर बैठें एवं दो प्रकार का हव्य स्वीकार करें. (२४)
वर्धस्वा सु पुरुष्टुत ऋषिष्टुताभिरूतिभिः. धुक्षस्व पिप्युषीमिषमवा च नः.. (२५)
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हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम ऋषियों द्वारा प्रशंसित अपने रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ
एवं हमें उन्नतिशील अन्न दो. (२५)
इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः. ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम्.. (२६)
हे वज्रधारणकर्त्ता इंद्र! तुम सब प्रकार स्तोता की रक्षा करते हो. तुम्हारे सच्चे स्तोत्र के
द्वारा मैं तुम्हारी दया प्राप्त करता हूं. (२६)
इह त्या सधमाद्या युजानः सोमपीतये. हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभि स्वर.. (२७)
हे इंद्र! तुम अपने प्रसिद्ध, सम्मिलित रूप से प्रसन्न एवं विस्तृत धन वाले घोड़ों को रथ
में जोड़ कर इस यज्ञ में सोमरस पीने के लिए आओ. (२७)
अभि स्वरन्तु ये तव रुद्रासः सक्षत श्रियम्. उतो मरुत्वतीर्विशो अभि प्रयः..(२८)
हे इंद्र! तुम्हारे अनुचर रुद्रपुत्र मरुद्गण इस आश्रययोग्य यज्ञ में प्राप्त हों एवं मरुतों से
युक्त प्रजाएं भी हमारे हव्य को प्राप्त करें. (२८)
इमा अस्य प्रतूर्तयः पदं जुषन्त यद्दिवि. नाभा यज्ञस्य सं दधुर्यथा विदे.. (२९)
इंद्र की ये मरुत्रूपी प्रजाएं शत्रुओं का नाश करती हुई अपने आश्रयस्थल स्वर्गलोक
की सेवा करती हैं एवं यज्ञ की नाभिरूपिणी उत्तरवेदी पर इस प्रकार स्थित रहती हैं कि हम
धन पा सकें. (२९)
अयं दीर्घाय चक्षसे प्राचि प्रयत्यध्वरे. मिमीते यज्ञमानुषग्विचक्ष्य.. (३०)
इंद्र प्राचीन यज्ञशाला में यज्ञ आरंभ होने पर उसे पूर्वापररूप से देखकर इस प्रकार पूर्ण
करते हैं, जिससे देखने योग्य फल मिल सके. (३०)
वृषायमिन्द्र ते रथ उतो ते वृषणा हरी. वृषा त्वं शतक्रतो वृषा हवः.. (३१)
हे इंद्र! तुम्हारा यह रथ अभिलाषापूरक है तथा तुम्हारे घोड़े की कामना पूरी करने वाले
हैं. हे शतक्रतु इंद्र! तुम एवं तुम्हारे आह्वान दोनों ही अभिलाषापूरक हों. (३१)
वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः. वृषा यज्ञो यमिन्वसि वृषा हवः.. (३२)
हे इंद्र! सोमलता कूटने वाले पत्थर, सोमरस का नशा व निचोड़ा हुआ सोम
अभिलाषापूरक हैं. जिस यज्ञ में तुम प्राप्त होते हो, वह कामना पूरी करने वाला है. तुम्हारा
आह्वान इच्छापूरक है. (३२)
वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः. वावन्थ हि प्रतिष्टुतिं वृषा हवः.. (३३)

सूक्त—१४ देवता—इंद्र

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हे वज्रधारी एवं अभिलाषापूरक इंद्र! हवि सेचन करने वाला मैं विचित्र स्तुतियों द्वारा
तुम्हें बुलाता हूं. तुम अपनी स्तुतियां स्वीकार करो. तुम्हारा आह्वान अभिलाषापूरक है. (३३)
सूक्त—१४ देवता—इंद्र
यदिन्द्रा॒हं यथा॒ त्वमीशी॑य॒ वस्व॒ एक॒ इत्. स्तो॒ता मे॑ गो॒सखा॑ स्यात्.. (१)
हे इंद्र! जिस प्रकार तुम एकमात्र धनस्वामी हो, उसी प्रकार यदि मैं भी ऐश्वर्य वाला बन
जाऊं तो मेरा स्तोता भी गाय वाला बन जाएगा. (१)
शिक्षे॑यमस्मै॒ दित्से॑यं शचीपते मनी॒षिणे॑. यद॒हं गो॑प॒तिः स्याम्.. (२)
हे शक्तिशाली इंद्र! यदि तुम्हारी कृपा से मैं गायों का स्वामी बन जाऊं तो इस स्तोता को
देने की इच्छा करूंगा एवं इसके द्वारा मांगी हुई संपत्ति दूंगा. (२)
धे॒नुष्ट॒ इन्द्र॑ सू॒नृता॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते. गामश्वं॑ पि॒प्युषी॑ दुहे.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारी सच्ची एवं उन्नति करने वाली स्तुति दुधारू गाय बनकर सोमरस
निचोड़ने वाले यजमान को गाएं और घोड़े देती है. (३)
न ते॑ व॒र्त्तास्ति॒ राध॑स॒ इन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्य॑:. यदि॑त्ससि स्तु॒तो म॒घम्.. (४)
हे इंद्र! तुम स्तुति सुनकर स्तोताओं को जो धन देना चाहते हो, उसे रोकने वाला न कोई
देवता है एवं न मनुष्य. (४)
य॒ज्ञ इन्द्र॑मवर्धय॒द्यद्भूमिं॒ व्यव॑र्तयत्. च॒क्राण ओ॒पशं॑ दि॒वि.. (५)
यज्ञ ने इंद्र को बढ़ाया था, क्योंकि इंद्र ने द्युलोक में जाकर मेघ को सुलाते हुए धरती को
स्थिर किया था. (५)
वा॒वृ॒धा॒नस्य॑ ते व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युष॑:. ऊ॒तिमिन्द्रा॑ वृणीमहे.. (६)
हे वर्धमान एवं शत्रुओं के सभी धन जीतने वाले इंद्र! हम तुम्हारी रक्षा को प्राप्त करते
हैं. (६)
व्य॑न्तरि॑क्षमतिरन्म॒दे सोम॑स्य रोच॒ना. इन्द्रो॒ यदभि॑नद्व॒लम्.. (७)
इंद्र ने सोमरस के नशे में तेजस्वी अंतरिक्ष को बढ़ाया है एवं शक्तिशाली मेघ का नाश
किया है. (७)
उद्गा आ॒जदङ्गिरो॑भ्य आवि॒ष्कृण्वन्गुहा॑ स॒तीः. अ॒र्वाञ्चं॑ नुनुदे व॒लम्.. (८)
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इंद्र ने गुहा में छिपी हुई गायों को बाहर निकालकर अंगिरागोत्रीय ऋषियों को दिया था
एवं गायों को चुराने वाले बल को औंधा कर दिया था. (८)
इन्द्रेण रोचना दिवो दृळ्हानि दृंहितानि च. स्थिराणि न पराणुदे.. (९)
इंद्र ने दीप्तिशाली नक्षत्रों को शक्तिशाली एवं दृढ़ किया था. उन स्थिर नक्षत्रों को कोई
नीचे नहीं गिरा सकता. (९)
अपामूर्मिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते. वि ते मदा अराजीषुः.. (१०)
हे इंद्र! एक-दूसरे के ऊपर चलने वाली सागर की तरंगों के समान तुम्हारी स्तुतियां
शीघ्रता से गति करती हैं. तुम्हारे मद विशेष रूप से दीप्तिशाली बनते हैं. (१०)
त्वं हि स्तोमवर्धन इन्द्रास्युक्थवर्धनः. स्तोतॄणामुत भद्रकृत्.. (११)
हे इंद्र! तुम स्तुतियों एवं उक्थों द्वारा बढ़ने वाले हो एवं स्तोताओं का कल्याण करते हो.
(११)
इन्द्रमित्केशिना हरी सोमपेयाय वक्षतः. उप यज्ञं सुराधसम्.. (१२)
केश धारण करने वाले दो घोड़े शोभनधन वाले इंद्र को यज्ञ के समीप ले जाते हैं. (१२)
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः. विश्वा यदजयः स्पृधः.. (१३)
हे इंद्र! जब तुमने विरोध करने वाली सभी असुर-सेनाओं को हराया था, उसी समय
वज्र पर जलों का फेन लपेटकर तुमने नमुचि का सिर काटा था. (१३)
मायाभिरुत्सिसृप्सत इन्द्र द्यामारुरुक्षतः. इव दस्यूँरधूनुथाः.. (१४)
हे इंद्र! तुमने मायाओं के द्वारा विस्तार पाने के इच्छुक एवं स्वर्ग पर चढ़ने के अभिलाषी
शत्रु राक्षसों को औंधा कर दिया था. (१४)
असुन्वामिन्द्र संसदं विषूचीं व्यनाशयः. सोमपा उत्तरो भवन्.. (१५)
हे सोमपानकर्त्ता इंद्र! तुमने अत्यंत उत्कृष्ट होकर सोमरस न निचोड़ने वाले लोगों को
परस्पर विरोध द्वारा निर्बल बनाकर समाप्त किया. (१५)
सूक्त—१५ देवता—इंद्र
तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (१)
उन्हीं इंद्र की स्तुति करो, जिन्हें बहुतों ने बुलाया है और बहुतों ने जिनकी स्तुति की है.
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स्तुतिवचनों द्वारा महान् इंद्र की सेवा करो. (१)
यस्य द्विबर्हसो बृहत्सहो दाधार रोदसी. गिरीँर्रज्राँ अपः स्वर्वृषत्वना.. (२)
द्यावा-पृथिवी दोनों स्थानों में पूज्य इंद्र की महती शक्ति द्यावा-पृथिवी को धारण करती
है. इंद्र अपनी शक्ति द्वारा शीघ्रगामी बादलों एवं बहने वाले जलों को धारण करते हैं. (२)
स राजसि पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे. (३)
हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम दीप्तिशाली बनते हो. तुम जीतने-योग्य धनों एवं सुनने
योग्य यशों को नियंत्रित करने के लिए अकेले ही शत्रुओं का वध करते हो. (३)
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृत्सु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्.. (४)
हे वज्रधारी इंद्र! हम तुम्हारे अभिलाषापूरक, युद्धों में शत्रुओं को हराने वाले, स्थान
बनाने वाले एवं हरि नामक घोड़ों द्वारा सेवायोग्य साहस की प्रशंसा करते हैं. (४)
येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिश. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (५)
हे इंद्र! तुमने जिस मद के कारण आयु एवं मनु के हेतु प्रकाशपिंडों को दीप्त किया था,
उसी मद से प्रसन्न होकर तुम इस विशाल यज्ञ के कर्त्ता के रूप में सुशोभित हो. (५)
तदद्या चित्त उक्थिनोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा. वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे.. (६)
हे इंद्र! स्तोता पहले के समान आज भी तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम उस जल को
प्रतिदिन स्वायत्त करो, जिसके स्वामी बादल हैं. (६)
तव त्यदिन्द्रियं बृहत्तव शुष्ममुत क्रतुम्. वज्रं शिशाति धिषणा वरेण्यम्.. (७)
हे इंद्र! यह स्तुति तुम्हारे बल को विस्तृत करती है. तुम्हारा बल तुम्हारे कर्मों एवं वज्र को
तेज करता है. (७)
तव द्यौरिन्द्र पौंस्यं पृथिवी वर्धति श्रवः. त्वामापः पर्वतासश्च हिन्विरे.. (८)
हे इंद्र! स्वर्गलोक तुम्हारी शक्ति और धरती तुम्हारा यश बढ़ाती है. पर्वत एवं अंतरिक्ष
तुम्हें प्रसन्न करते हैं. (८)
त्वां विष्णुर्बृहन् क्षयो मित्रो गृणाति वरुणः. त्वां शर्धो मदत्यनु मारुतम्.. (९)
हे इंद्र! महान् व निवासस्थान देने वाले विष्णु, मित्र एवं वरुण तुम्हारी स्तुति करते हैं.
मरुतों की शक्ति तुम्हारे मद के पश्चात् मत्त होती है. (९)
त्वं वृषा जनानां मंहिष्ठ इन्द्र जज्ञिषे. सत्रा विश्वा स्वपत्यानि दधिषे.. (१०)
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