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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २०५

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २०५

स्वरग्रामको ‘षाडव’ या ‘षाड्जव’ जानना चाहिये। यदि मध्यमस्वरमें पञ्चमका विराम हो और अन्तरस्वर गान्धार हो जाय तथा उसके बाद क्रमसे ऋषभ, निषाद एवं पञ्चमका उदय हो तो उस पञ्चमको भी ऐसा ही (षाडव या षाड्जव) समझे। यदि मध्यमस्वरका आरम्भ होनेपर गान्धारका आधिपत्य (वृद्धि) हो जाय, निषादस्वर बारंबार जाता-आता रहे, धैवतका एक ही बार उच्चारण होनेके कारण वह दुर्बलावस्थामें रहे तथा षड्ज और ऋषभकी अन्य पाँचोंके समान ही स्थिति हो तो उसे ‘मध्यम ग्राम’ कहते हैं। जहाँ आरम्भमें षड्ज हो और निषादका थोड़ा-सा स्पर्श किया गया हो तथा गान्धारका अधिक उच्चारण हुआ हो, साथ ही धैवतस्वरका कम्पन-पातन देखा जाता हो तथा उसके बाद दूसरे स्वरोंका यथारुचि गान किया गया हो, उसे ‘षड्जग्राम’ कहा गया है। जहाँ आरम्भमें षड्ज हो और इसके बाद अन्तरस्वर-संयुक्त काकली देखी जाती हो अर्थात् चार बार केवल निषादका ही श्रवण होता हो, पञ्चम स्वरमें स्थित उस आधारयुक्त गीतको ‘श्रुति कैशिक’ जानना चाहिये। जब पूर्वोक्त कैशिक नामक गीतको सब स्वरोंसे संयुक्त करके मध्यमसे उसका आरम्भ किया जाय और मध्यममें ही उसकी स्थापना हो तो वह ‘कैशिक मध्यम’ नामक ग्रामराग होता है। जहाँ पूर्वोक्त काकली देखी जाती हो और प्रधानता पञ्चम स्वरकी हो तथा शेष दूसरे-दूसरे स्वर सामान्य स्थितिमें हों तो कश्यप ऋषि उसे मध्यम ग्रामजनित ‘कैशिक राग’ कहते हैं। विद्वान् पुरुष ‘गा’ का अर्थ गेय मानते हैं और ‘ध’ का अर्थ कलापूर्वक बाजा बजाना कहते हैं और रेफसहित ‘व’ का अर्थ वाद्य-सामग्री कहते हैं। यही ‘गान्धर्व’ शब्दका लक्ष्यार्थ है। जो सामगान करनेवाले विद्वानोंका प्रथम स्वर है, वही वेणुका मध्यम स्वर कहा गया है। जो उनका द्वितीय स्वर है, वही वेणुका गान्धार स्वर है और जो उनका तृतीय है, वही वेणुका ऋषभ स्वर माना गया है। सामग विद्वानोंके चौथे स्वरको वेणुका षड्ज कहा गया है। उनका पञ्चम वेणुका धैवत होता है। उनके छठेको वेणुका निषाद समझना चाहिये और उनका सातवाँ ही वेणुका पञ्चम माना गया है। मोर षड्ज स्वरमें बोलता है। गायें ऋषभ स्वरमें रँभाती हैं, भेड़ और बकरियाँ गान्धार स्वरमें बोलती हैं। तथा क्रौञ्च (कुरर) पक्षी मध्यम स्वरमें बोलता है। जब साधारणरूपसे सब प्रकारके फूल खिलने लगते हैं, उस वसन्त-ऋतुमें कोयल पञ्चम स्वरमें बोलती है। घोड़ा धैवत स्वरमें हिनहिनाता है और हाथी निषाद स्वरमें चिग्घाड़ता है। षड्ज स्वर कण्ठसे प्रकट होता है। ऋषभ मस्तकसे उत्पन्न होता है, गान्धारका उच्चारण मुखसहित नासिकासे होता है और मध्यम स्वर हृदयसे प्रकट होता है। पञ्चम स्वरका उत्थान छाती, सिर और कण्ठसे होता है। धैवतको ललाटसे उत्पन्न जानना चाहिये तथा निषादका प्राकट्य सम्पूर्ण संधियोंसे होता है। षड्ज स्वर नासिका, कण्ठ, वक्षःस्थल, तालु, जिह्वा तथा दाँतोंके आश्रित है। इन छः अङ्गोंसे उसका जन्म होता है। इसलिये उसे ‘षड्ज’ कहा गया है। नाभिसे उठी हुई वायु कण्ठ और मस्तकसे टकराकर वृषभके समान गर्जना करती है। इसलिये उससे प्रकट हुए स्वरका नाम ‘ऋषभ’ है। नाभिसे उठी हुई वायु कण्ठ और सिरसे टकराकर पवित्र गन्ध लिये हुए बहती है। इस कारण उसे ‘गान्धार’ कहते हैं। नाभिसे उठी हुई वायु ऊरु तथा हृदयसे टकराकर नाभिस्थानमें आकर मध्यवर्ती होती है। अतः उससे निकले

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हुए स्वरका नाम 'मध्यम' होता है। नाभिसे उठी हुई वायु वक्ष, हृदय, कण्ठ और सिरसे टकराकर इन पाँचों स्थानोंसे स्वरके साथ प्रकट होती है। इसलिये उस स्वरका नाम 'पञ्चम' रखा जाता है। अन्य विद्वान् धैवत और निषाद—इन दो स्वरोंको छोड़कर शेष पाँच स्वरोंको पाँचों स्थानोंसे प्रकट मानते हैं। पाँचों स्थानोंमें स्थित होनेके कारण इन्हें सब स्थानोंमें धारण किया जाता है। षड्ज स्वर अग्निके द्वारा गाया गया है। ऋषभ ब्रह्माजीके द्वारा गाया कहा जाता है। गान्धारका गान सोमने और मध्यम स्वरका गान विष्णुने किया है। नारदजी ! पञ्चम स्वरका गान तो तुम्हींने किया है, इस बातको स्मरण करो। धैवत और निषाद—इन दो स्वरोंको तुम्बुरुने गाया है। विद्वान् पुरुषोंने ब्रह्माजीको आदि—षड्ज स्वरका देवता कहा है। ऋषभका प्रकाश तीखा और उद्दीप्त है, इसलिये अग्निदेव ही उसके देवता हैं। जिसके गान करनेपर गौएँ संतुष्ट होती हैं, वह गान्धार है और इसी कारण गौएँ ही उसकी अधिष्ठात्री देवी हैं। गान्धारको सुनकर गौएँ पास आती हैं, इसमें संदेह नहीं है। पञ्चम स्वरके देवता सोम हैं, जिन्हें ब्राह्मणोंका राजा कहा गया है। जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें बढ़ता है और कृष्णपक्षमें घटता है, उसी प्रकार स्वरग्राममें प्राप्त होनेपर जिस स्वरका ह्रास होता और वृद्धि होती है तथा इन पूर्वोत्पन्न स्वरोंकी जहाँ अतिसंधि होती है, वह धैवत है। इसीसे उसके धैवतत्वका विधान किया गया है। निषादमें सब स्वरोंका निषादन (अन्तर्भाव) होता है, इसीलिये वह निषाद कहलाता है। यह सब स्वरोंको अभिभूत कर लेता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य सब नक्षत्रोंको अभिभूत करता है; क्योंकि सूर्य ही इसके अधिदेवता हैं।

काठकी वीणा तथा गात्रवीणा—ये गान-जातिमें दो प्रकारकी वीणाएँ होती हैं। नारद! सामगानके लिये गात्रवीणा होती है, उसका लक्षण सुनो। गात्रवीणा उसे कहते हैं, जिसपर सामगान करनेवाले विद्वान् गाते हैं। वह अंगुलि और अङ्गुष्ठसे रञ्जित तथा स्वर-व्यञ्जनसे संयुक्त होती है। उसमें अपने दोनों हाथोंको संयममें रखकर उन्हें घुटनोंपर रखे और गुरुका अनुकरण करे, जिससे भिन्न बुद्धि न हो। पहले प्रणवका उच्चारण करे, फिर व्याहृतियोंका। तदनन्तर गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके सामगान प्रारम्भ करे। सब अंगुलियोंको फैलाकर स्वरमण्डलका आरोपण करे। अंगुलियोंसे अङ्गुष्ठका और अङ्गुष्ठसे अंगुलियोंका स्पर्श कदापि न करे। अंगुलियोंको बिलगाकर न रखे और उनके मूलभागका भी स्पर्श न करे, सदा उन अंगुलियोंके मध्यपर्वमें अँगूठेके अग्रभागसे स्पर्श करना चाहिये। विभागके ज्ञाता पुरुषको चाहिये कि मात्रा-द्विमात्रा-वृद्धिके विभागके लिये बायें हाथकी अंगुलियोंसे द्विमात्राका दर्शन कराता रहे। जहाँ त्रिरेखा देखी जाय, वहाँ संधिका निर्देश करे; वह पर्व है, ऐसा जानना चाहिये। शेष अन्तर-अन्तर है। साममन्त्रमें (प्रथम और द्वितीय स्वरके बीच) जौके बराबर अन्तर करे तथा ऋचाओंमें तिलके बराबर अन्तर करे। मध्यम पर्वोंमें भलीभाँति निविष्ट किये हुए स्वरोंका ही निवेश करे। विद्वान् पुरुष यहाँ शरीरके किसी अवयवको कँपाये नहीं। नीचेके अङ्ग—ऊरु, जङ्घा आदिको सुखपूर्वक रखकर उनपर दोनों हाथोंको प्रचलित परिपाटीके अनुसार रखे (अर्थात् दाहिने हाथको गायके कानके समान रखे और बायेंको उत्तानभावसे रखे)। जैसे बादलोंमें बिजली मणिमय सूत्रकी भाँति चमकती दिखायी देती है, यही विवृत्तियों (पदादि विभागों)-के छेद—बिलगाव—स्पष्ट निर्देशका दृष्टान्त है।

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जैसे सिरके बालोंपर कैंची चलती है और बालोंको पृथक् कर देती है, उसी प्रकार पद और स्वर आदिका पृथक्-पृथक् विभागपूर्वक बोध कराना चाहिये। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार अन्य सब चेष्टाओंको विलीन करके मन और दृष्टि देकर विद्वान् पुरुष, स्वस्थ, शान्त तथा निर्भीक होकर वर्णोंका उच्चारण करे। मन्त्रका उच्चारण करते समय नाककी सीधमें पूर्व दिशाकी ओर गोकर्णके समान आकृतिमें हाथको उठाये रखे और हाथके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए शास्त्रके अर्थका निरन्तर चिन्तन करता रहे। मन्त्र-वाक्यको हाथ और मुख दोनोंसे साथ-साथ भलीभाँति प्रचारित करे। वर्णोंका जिस प्रकार द्रुतादि वृत्तिसे आरम्भमें उच्चारण करे, उसी प्रकार उन्हें समास भी करे। (एक ही मन्त्रमें दो वृत्तियोंकी योजना न करे।) अभ्याघात, निर्घात, प्रगान तथा कम्पन न करे, समभावसे साममन्त्रोंका गान करे। जैसे आकाशमें श्येन पक्षी सम गतिसे उड़ता है, जैसे जलमें विचरती हुई मछलियों अथवा आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंके मार्गका विशेष रूपसे पता नहीं चलता, उसी प्रकार सामगानमें स्वरगत श्रुतिके विशेष स्वरूपका अवधारण नहीं होता। सामान्यतः गीतमात्रकी उपलब्धि होती है। जैसे दहीमें घी अथवा काठके भीतर अग्नि छिपी रहती है और प्रयत्नसे उसकी उपलब्धि भी होती है, उसी प्रकार स्वरगत श्रुति भी गीतमें छिपी रहती है, प्रयत्नसे उसके विशेष स्वरूपकी भी उपलब्धि होती है। प्रथम स्वरसे दूसरे स्वरपर जो स्वर-संक्रमण होता है, उसे प्रथम स्वरसे संधि रखते हुए ही करे, विच्छेद करके न करे और न वेगसे ही करे। जैसे छाया एवं धूप सूक्ष्म गतिसे धीरे-धीरे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जाते हैं—न तो पूर्वस्थानसे सहसा सम्बन्ध तोड़ते हैं और न नये स्थानपर ही वेगसे जाते हैं, उसी प्रकार स्वर-संक्रमण भी सम तथा अविच्छिन्न भावसे करे। जब प्रथम स्वरको खींचते हुए द्वितीय स्वर होता है, तब उसे 'कर्षण' कहते हैं। विद्वान् पुरुष निम्नाङ्कित छः दोषोंसे युक्त कर्षणका त्याग करे, अनागत तथा अतिक्रान्त अवस्थामें कर्षण न करे। द्वितीय स्वरके आरम्भसे पहले उसकी अनागत अवस्था है, प्रथम स्वरका सर्वथा व्यतीत हो जाना उसकी अतिक्रान्तावस्था है; इन दोनों स्थितियोंमें प्रथम स्वरका कर्षण न करे। प्रथम मात्राका विच्छेद करके भी कर्षण न करे। उसे विषमाहत-कम्पित करके भी द्वितीय स्वरपर न जाय। कर्षणकालमें तीन मात्रासे अधिक स्वरका विस्तार न करे। अस्थितान्तका त्याग करे अर्थात् द्वितीय स्वरमें भी त्रिमात्रायुक्त स्थिति करनी चाहिये, न कि दो मात्रासे ही युक्त। जो स्वर स्थानसे च्युत होकर अपने स्थानका अतिवर्तन (लङ्घन) करता है, उसे सामगान करनेवाले विद्वान् 'विस्वर' कहते हैं और वीणा बजाकर गानेवाले गायक उसे 'विरक्त' नाम देते हैं। स्वयं अभ्यास करनेके लिये द्रुतवृत्तिसे मन्त्रोच्चारण करे। प्रयोगके लिये मध्यम वृत्तिका आश्रय ले और शिष्योंके उपदेशके लिये विलम्बित वृत्तिका अवलम्बन करे। इस प्रकार शिक्षाशास्त्रोक्त विधिसे जिसने ग्रन्थ (सामगान) को ग्रहण किया है, वह विद्वान् द्विज ग्रन्थोच्चारणकी शिक्षा लेनेवाले शिष्योंको हाथसे ही अध्ययन कराये।

कृष्ट (सप्तम एवं पञ्चम) स्वरका स्थान मस्तकमैं है। प्रथम (षड्ज) स्वरका स्थान ललाटमें है। द्वितीय (ऋषभ) स्वरका स्थान दोनों भौंहोंके मध्यमें है। तृतीय (गान्धार) स्वरका स्थान दोनों कानोंमें हैं। चतुर्थ (मध्यम) स्वरका

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स्थान कण्ठ है। मन्द्र (पञ्चम)-का स्थान रसना बतायी जाती है। (मन्द्रस्योरसि तूच्यते—इस पाठके अनुसार उसका स्थान वक्षःस्थल भी है।) अतिस्वार नामवाले नीच स्वर (निषाद) का स्थान हृदयमें बताया जाता है। अङ्गुष्ठके शिरोभागमें क्रुष्ट (सप्तम-पञ्चम) का न्यास करना चाहिये। अङ्गुष्ठमें ही प्रथम स्वरका भी स्थान बताया गया है। तर्जनीमें गान्धार तथा मध्यमामें ऋषभकी स्थिति है। अनामिकामें षड्ज और कनिष्ठिकामें धैवत हैं। कनिष्ठाके नीचे मूल भागमें निषाद स्वरकी स्थिति बताये। मन्द्र स्वरसे सर्वथा पृथक् न होनेसे निषाद 'अपर्व' है। उसका पृथक् ज्ञान न होनेके कारण उसे 'असंज्ञ' कहा गया है तथा उसमें लिङ्ग, वचन आदिका सम्बन्ध न होनेसे उसे 'अव्यय' भी कहते हैं। अतः मन्द्र ही मन्दीभूत होकर 'परिस्वार' (निषाद) कहा गया है। क्रुष्ट स्वरसे देवता जीवन धारण करते हैं और प्रथमसे मनुष्य; द्वितीय स्वरसे पशु तथा तृतीयसे गन्धर्व और अप्सराएँ जीवन धारण करती हैं। अण्डज (पक्षी) तथा पितृगण चतुर्थ-स्वरजीवी होते हैं। पिशाच, असुर तथा राक्षस मन्द्रस्वरसे जीवन-निर्वाह करते हैं। नीच अतिस्वार (निषाद)-से स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् जीवन धारण करता है। इस प्रकार सामिक स्वरसे सभी प्राणी जीवन धारण करते हैं।

जो दीप्ता, आयता, करुणा, मृदु तथा मध्यम श्रुतियोंका विशेषज्ञ नहीं है, वह आचार्य कहलानेका अधिकारी नहीं है। मन्द्र (पञ्चम), द्वितीय, चतुर्थ, अतिस्वार (षष्ठ) और तृतीय—इन पाँच स्वरोंकी श्रुति 'दीप्ता' कही गयी है। (प्रथमकी श्रुति मृदु है) और सप्तमकी श्रुति 'करुणा' है। अन्य जो 'मृदु', 'मध्यमा' और 'आयता' नामवाली श्रुतियाँ हैं, वे द्वितीय स्वरमें होती हैं। मैं उन सबके पृथक्-पृथक् लक्षण बताता हूँ। नीच अर्थात् तृतीय स्वर परे रहते द्वितीय स्वरकी आयता श्रुति होती है, विपर्यय अर्थात् चतुर्थ स्वर परे रहनेपर उक्त स्वरकी मृदुभूता श्रुति होती है। अपना स्वर परे हो और स्वरान्तर परे न हो तो उसकी मध्यमा श्रुति होती है। यह सब विचारकर सामस्वरका प्रयोग करना चाहिये। क्रुष्ट स्वर परे होनेपर द्वितीय स्वरमें स्थित जो श्रुति है, उसे 'दीप्ता' समझे। प्रथम स्वरमें हो तो वह 'मृदु' श्रुति मानी गयी है। यदि चतुर्थ स्वरमें हो तो वही श्रुति मृदु कहलाती है। तथा मन्द्र स्वरमें हो तो दीप्ता होती है। सामकी समाप्ति होनेपर जिस किसी भी स्वरमें स्थित श्रुति दीप्ता ही होती है। स्वरके समास होनेसे पहले आयतादि श्रुतिका प्रयोग न करे। स्वर समास होनेपर भी जबतक गानका विच्छेद न हो जाय, दो स्वरोंके मध्यमें भी श्रुतिका प्रयोग न करे। ह्रस्व तथा दीर्घ अक्षरका गान होते समय भी श्रुति नहीं करनी चाहिये (केवल प्लुतमें ही श्रुति कर्तव्य है) तथा जहाँ घुट-संज्ञक स्वर हो, वहाँ भी श्रुतिका प्रयोग न करे। तालव्य इकारका 'आ' 'इ' भाव होता है और 'आ उ' भाव होता है; ये दो प्रकारकी गतियाँ हैं और ऊष्म वर्ण 'श ष स' के साथ जो त्रिविध पदान्त सन्धि है—ये सब मिलकर पाँच स्थान हैं; इन स्थानोंमें घुट-संज्ञक स्वर जानना चाहिये (इनमें श्रुति नहीं करनी चाहिये)। श्रुतिस्थानोंमें जहाँ स्वर और स्वरान्तर समास न हुए हों तथा जो ह्रस्व, दीर्घ एवं 'घुट' संज्ञाके स्थल हैं, वे सब श्रुतिसे रहित हैं, उनमें श्रुति नहीं करनी चाहिये। वहाँ स्वरसे ही श्रुतिवत् कार्य होता है।

(सामव्यतिरिक्त स्थलोंमें) उदात्त स्वरमें 'दीप्ता' नामवाली श्रुतिको जाने। स्वरितमें भी विद्वान्

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २०९

लोग 'दीप्ता' की ही स्थिति मानते हैं। अनुदात्तमें 'मृदु' श्रुति जाननी चाहिये। गान्धर्व गानमें श्रुतिका अभाव होनेपर भी स्वरको ही श्रुतिके समान करना चाहिये, वहाँ स्वरमें ही श्रुतिका वैभव निहित है। उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचय¹ तथा निघात²—ये पाँच स्वरभेद होते हैं।

इसके बाद मैं आर्चिकके तीन स्वरोंका प्रतिपादन करता हूँ। पहला उदात्त, दूसरा अनुदात्त और तीसरा स्वरित है। जिसको उदात्त कहा गया है, वही स्वरितसे परे हो तो विद्वान् पुरुष उसे प्रचय कहते हैं। वहाँ दूसरा कोई स्वरान्तर नहीं होता। स्वरितके दो भेद हैं—वर्ण-स्वार तथा अतीत-स्वार। इसी प्रकार वर्ण भी मात्रिक एवं उच्चरितके पश्चात् दीर्घ होता है। प्रत्यय-स्वारूप प्रत्ययका दर्शन होनेसे उसे सात प्रकारका जानना चाहिये। वह क्या, कहाँ और कैसा है, इसका ज्ञान पदसे प्राप्त करना चाहिये। दाहिने कानमें सातों स्वरोंका श्रवण करावे। आचार्योंने पुत्रों और शिष्योंके हितकी इच्छासे ही इस शिक्षाशास्त्रका प्रणयन किया है। उच्च (उदात्त)-से कोई उच्चतर नहीं है और नीच (अनुदात्त)-से नीचतर नहीं है। फिर विशिष्ट स्वरके रूपमें जो 'स्वार' संज्ञा दी जाती है, उसमें स्वारका क्या स्थान है? (इसके उत्तरमें कहते हैं—) उच्च (उदात्त) और नीच (अनुदात्त)-के मध्यमें जो 'साधारण' यह श्रुति है, उसीको शिक्षाशास्त्रके विद्वान् स्वार-संज्ञामें 'स्वार' नामसे जानते हैं। उदात्तमें निषाद और गान्धार स्वर हैं, अनुदात्तमें ऋषभ और धैवत स्वर हैं। और ये—षड्ज, मध्यम तथा पञ्चम—स्वरितमें प्रकट होते हैं। जिसके परे 'क' और 'ख' हैं तथा जो जिह्वामूलीयरूप प्रयोजनको सिद्ध करनेवाली है, उस 'ऊष्मा' (ᳵक ᳵख)—को 'मात्रा' जाने। वह अपने स्वरूपसे ही 'कला' है (किसी दूसरे वर्णका अवयव नहीं है। इसे उपध्मानीयका भी उपलक्षण मानना चाहिये)।

जात्य, क्षैप्र, अभिनिहित, तैरोव्यञ्जन, तिरोविराम, प्रश्लिष्ट तथा सातवाँ पादवृत्त—ये सात स्वार हैं। अब मैं इन सब स्वारोंका पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ। लक्षण कहकर उन सबके यथायोग्य उदाहरण भी बताऊँगा। जो अक्षर 'य' कार और 'व' कारके साथ स्वरित होता है तथा जिसके आगे उदात्त नहीं होता, वह 'जात्य' स्वार कहलाता है। जब उदात्त 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण कहीं पदादि अनुदात्त अकार परे रहते सन्धि होनेपर 'य' 'व' के रूपमें परिणत हो स्वरित होते हैं, तो वहाँ सदा 'क्षैप्र' स्वारका लक्षण समझना चाहिये। 'ए' और 'ओ' इन दो उदात्त स्वरोंसे परे जो वकारसहित अकार निहित (अनुदात्तरूपमें निपातित) हो और उसका जहाँ लोप ('ए' कार या 'उ' कार में अनुप्रवेश) होता है, उसे 'अभिनिहित' स्वार माना जाता है। छन्दमें जहाँ कहीं या जो कोई भी ऐसा स्वरित होता है, जिसके पूर्वमें उदात्त हो, तो वह सर्व बहुस्वार—(सर्वत्र बहुलतासे होनेवाला स्वर) 'तैरोव्यञ्जन' कहलाता है। यदि उदात्त अवग्रह हो और अवग्रहसे परे अनन्तर स्वरित हो तो उसे 'तिरोविराम' समझना चाहिये। जहाँ उदात्त 'इ' कारको अनुदात्त 'इ' कारसे संयुक्त देखो, वहाँ विचार लो कि 'प्रश्लिष्ट' स्वार है। जहाँ स्वर अक्षर अकारादिमें स्वरित हो और पूर्वपदके साथ


१-स्वरितसे आगे स्वरित ही हों तो उनकी 'प्रचय' संज्ञा होती है। २- प्रचय परे हो तो स्वरितका आहनन होनेसे उसकी 'निघात' संज्ञा होती है। प्रचय न हो, तब तो शुद्ध 'स्वरित' ही रहता है।

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२१०* संक्षिप्त नारदपुराण *

संहिता विभक्त हो, उसे पादवृत्त स्वरका शास्त्रोक्त लक्षण समझना चाहिये।

'जात्य' स्वरका उदाहरण है—'स जात्येन' इत्यादि। शृष्टी+अग्ने=शृष्ट्यग्ने आदि स्थलोंमें 'क्षैप्र' स्वर है। 'वे मन्वत' इत्यादिमें 'अभिनिहित' स्वर जानना चाहिये। उ+ऊतये=ऊतये, वि+ईतये=वीतये इत्यादिमें 'तैरव्यञ्जन' नामक स्वर है। 'विस्कभिते विस्कभिते' आदि स्थलोंमें 'तिरोविराम' है। 'हि इन्द्र गिर्वणः'='हीन्द्र०' इत्यादिमें 'प्रश्लिष्ट' स्वर है। 'क ईम् क ईं वेद' इत्यादिमें 'पादवृत्त' नामक स्वर है। इस प्रकार ये सब सात स्वर हैं।

जात्य स्वरोंको छोड़कर एक पूर्ववर्ती उदात्त अक्षरसे परे जो भी अक्षर हो, उसकी स्वरित संज्ञा होती है। यह स्वरितका सामान्य लक्षण बताया जाता है। पूर्वोक्त चार स्वर उदात्त अथवा एक अनुदात्त परे रहनेपर शास्त्रतः 'कम्प' उत्पन्न करते हैं। (जिसका स्वरूप चल हो, उस स्वरका नाम कम्प है) इसका उदाहरण है 'जुह्वग्निः।' 'उप त्वा जुहू', 'उप त्वा जुह्वो मम' इत्यादि। पूर्वपद 'इ'कारान्त हो और परे 'उ'कारकी स्थिति हो तो मेधावी पुरुष वहाँ 'ह्रस्व कम्प' जाने—इसमें संशय नहीं है। यदि 'उ'कारद्वययुक्त पद परे हो तो इकारान्त पदमें दीर्घ कम्प जानना चाहिये। इसका दृष्टान्त है—'शग्ध्यूषू' इत्यादि। तीन दीर्घ कम्प जानने चाहिये, जो संध्यक्षरोंमें होते हैं। उनके क्रमशः उदाहरण ये हैं—मन्या। पथ्या। न इन्द्राभ्याम्। शेष ह्रस्व कहे गये हैं। जब अनेक उदात्तोंके बाद कोई अनुदात्त प्रत्यय हो तो एक उदात्त परे रहते दूसरे-तीसरे उदात्तकी 'शिवकम्प' संज्ञा होती है अर्थात् वह शिवकम्पसंज्ञक आद्युदात्त होता है। किंतु वह उदात्त प्रत्यय होना चाहिये। जहाँ दो, तीन, चार आदि उदात्त अक्षर हों, नीच—अनुदात्त हो और उससे पूर्व उच्च अर्थात् उदात्त हो और वह भी पूर्ववर्ती उदात्त या उदात्तोंसे परे हो तो वहाँ विद्वान् पुरुष 'उदात्त' मानते हैं। रेफ या 'ह'कारमें कहीं द्वित्व नहीं होता—दो रेफ या दो 'ह'कारका प्रयोग एक साथ नहीं होता। कवर्ग आदि वर्गोंके दूसरे और चौथे अक्षरोंमें भी कभी द्वित्व नहीं होता। वर्गके चौथे अक्षरको तीसरेके द्वारा और दूसरेको प्रथमके द्वारा पीडित न करे। आदि, मध्य और अन्त्य (क, ग, ङ आदि)—को अपने ही अक्षरसे पीडित (संयुक्त) करे। यदि संयोगदशामें अनन्त्य (जो अन्तिम वर्ण नहीं है, वह 'ग'कार आदि) वर्ण पहले हो और 'न'कारादि अन्त्य वर्ण बादमें हो तो मध्यमें यम (य व र ल ञ म ङ ण न) अक्षर स्थित होता है, वह पूर्ववर्ती अक्षरका सवर्ण हुआ करता है। पूर्ववर्ती श ष स तथा य र ल व—इन अक्षरोंसे संयुक्त वर्गान्त्य वर्णोंको देखकर यम निवृत्त हो जाते हैं—ठीक वैसे ही, जैसे चोर-डाकुओंको देखकर राही अपने मार्गसे लौट जाते हैं। संहितामें जब वर्गके तीसरे और चौथे अक्षर संयुक्त हों तो पदकालमें चतुर्थ अक्षरसे ही आरम्भ करके उत्तर पद होगा। दूसरे, तीसरे और 'ह'कार — इन सबका संयोग हो तो उत्तरपद हकारादि ही होगा। अनुस्वार, उपध्मानीय तथा जिह्वामूलीयके अक्षर किसी पदमें नहीं जाते, उनका दो बार उच्चारण नहीं होता। यदि पूर्वमें र या ह अक्षरसे संयोग हो तो परवर्ती अक्षरका द्वित्व हो जाता है। जहाँ संयोगमें स्वरित हो तथा उद्धृत (नीचेसे ऊपर जाने)—में और पतन (ऊँचेसे नीचे जाने)—में स्वरित हो, वहाँ पूर्वाङ्गको आदिमें करके (नीचमें उच्चत्व लाकर) पराङ्गके आदिमें स्वरितका संनिवेश करे। संयोगके विरत (विभक्त) होनेपर जो उत्तरपदसे असंयुक्त व्यञ्जन दिखायी दे, उसे पूर्वाङ्ग जानना चाहिये तथा जिस

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २११

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २११

व्यञ्जनसे उत्तरपदका आरम्भ हो, उसे पराङ्ग समझे। संयोगसे परवर्ती भागको स्वरयुक्त करना चाहिये, क्योंकि वह उत्तम एवं संयोगका नायक है, वहीं प्रधानतया स्वरकी विश्रान्ति होती है तथा व्यञ्जनसंयुक्त वर्णका पूर्व अक्षर स्वरित है; उसे बिना स्वरके ही बोलना चाहिये। अनुस्वार, पदान्त, प्रत्यय तथा सवर्णपद परे रहनेपर होनेवाला द्वित्व तथा रेफस्वरूप स्वरभक्ति—यह सब पूर्वाङ्ग कहलाता है। पादादिमें, पदादिमें, संयोग तथा अवग्रहोंमें भी 'य' कारके द्वित्वका प्रयोग करना चाहिये; उसे 'य्य' शब्द जानना चाहिये। अन्यत्र 'य' केवल 'य' के रूपमें ही रहता है। पदादिमें रहते हुए भी विच्छेद (विभाग) न होनेपर अथवा संयोगके अन्तमें स्थित होनेपर र् ह् रेफविशिष्ट य—इनको छोड़कर अन्य वर्णोंका अयादेश (द्वित्वाभाव) देखा जाता है। स्वयं संयोगयुक्त अक्षरको गुरु जानना चाहिये। अनुस्वारयुक्त तथा विसर्गयुक्त वर्णका गुरु होना तो स्पष्ट ही है। शेष अणु (ह्रस्व) है। 'हि' 'गो' इनमें प्रथम संयुक्त और दूसरा विसर्गयुक्त है। संयोग और विसर्ग दोनोंके आदि अक्षरका गुरुत्व भी स्पष्ट है। जो उदात्त है, वह उदात्त ही रहता है; जो स्वरित है, वह पदमें नीच (अनुदात्त) होता है। जो अनुदात्त है, वह तो अनुदात्त रहता ही है; जो प्रचयस्थ स्वर है, वह भी अनुदात्त हो जाता है। विभिन्न मन्त्रोंमें आये हुए 'अग्निः', 'सुतः' 'मित्रम्, 'इदम्', 'वयम्', 'अया', 'वहा', 'प्रियम्', 'दूतम्', 'घृतम्', 'चित्तम्' तथा 'अभि'—ये पद नीच (अर्थात् अनुदात्तसे आरम्भ) होते हैं। 'अर्क', 'सुत', 'यज्ञ', 'कलश', 'शत' तथा 'पवित्र'—इन शब्दोंमें अनुदात्तसे श्रुतिका उच्चारण प्रारम्भ किया जाता है। 'हरि', 'वरुण', 'वरेण्य', 'धारा' तथा 'पुरुष'—इन शब्दोंमें रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। 'विश्वानर' शब्दमें नकारयुक्त और अन्यत्र 'नर' शब्दोंमें रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। परंतु 'उदुत्तमं त्वं वरुण' इत्यादि वरुण-सम्बन्धी दो मन्त्रोंमें 'व' कार ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। 'उरु धारा मरं कृतम्', 'उरु धारेव दोहने' इत्यादि मन्त्रोंमें 'धारा'का 'धाकार' ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। (यह पूर्व नियमका अपवाद है) ह्रस्व या दीर्घ जो अक्षर यहाँ स्वरित होता है, उसकी पहली आधी मात्रा उदात्त होती है और शेष आधी मात्रा उससे परे अनुदात्त होती है (पाणिनिने भी यही कहा है—'तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम्' [१। २। ३२]) कम्प, उत्स्वरित और अभिगीतके विषयमें जो द्विस्वरका प्रयोग होता है, वहाँ ह्रस्वको दीर्घके समान करे और ह्रस्व कर्षण करे। पलक मारनेमें जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि बिजली चमककर जितने समयमें अदृश्य हो जाती है, वह एक 'मात्रा' का मान है। कुछ विद्वानोंका ऐसा मत है कि ऋ, छ अथवा श के उच्चारणमें जितना समय लगता है, उतने कालकी एक मात्रा होती है। समासमें यदि अवग्रह (विग्रह या पद-विच्छेद) करे तो उसमें समासपदको संहितायुक्त ही रखे; क्योंकि वहाँ जिससे अक्षरादिकरण होता है, उसी स्वरको उस समास-पदका अन्त मानते हैं। सर्वत्र, पुत्र, मित्र, सखि, अद्रि, शतक्रतु, आदित्य, प्रजातवेद, सत्पति, गोपति, वृत्रहा, समुद्र—ये सभी शब्द अवग्राह्य (अवग्रहके योग्य) हैं। 'स्वर्युवः', 'देवयुवः', 'अरतिम्', 'देवतातये', 'चिकितिः', 'चुक्रुधम्'—इन सबमें एक पद होनेके कारण पण्डितलोग अवग्रह नहीं करते। अक्षरोंके नियोगसे चार प्रकारकी विवृत्तियाँ जाननी चाहिये, ऐसा मेरा मत है। अब तुम मुझसे उनके

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२१२* संक्षिप्त नारदपुराण *

नाम सुनो—वत्सानुसृता, वत्सानुसारिणी, पाकवती और पिपीलिका। जिसके पूर्वपदमें ह्रस्व और उत्तरपदमें दीर्घ है, वह ह्रस्वादिस्वरूप बछड़ोंसे अनुगत होनेके कारण 'वत्सानुसृता' विवृत्ति कही गयी है। जिसमें पहले ही पदमें दीर्घ और उत्तर पदमें ह्रस्व हो, वह 'वत्सानुसारिणी' विवृत्ति है। जहाँ दोनों पदोंमें ह्रस्व है, वह 'पाकवती' कहलाती है तथा जिसके दोनों पदोंमें दीर्घ है, वह 'पिपीलिका' कही गयी है। इन चारों विवृत्तियोंमें एक मात्राका अन्तर होता है। दूसरोंके मतमें यह अन्तर आधा मात्रा है और किन्हींके मतमें अणु मात्रा है। रेफ तथा श ष स—ये जिनके आदिमें हों, ऐसे प्रत्यय परे होनेपर 'मकार' अनुस्वारभावको प्राप्त होता है। य व ल परे हों तो वह परसवर्ण होता है और स्पर्शवर्ण परे हों तो उन-उन वर्गोंके पञ्चम वर्णको प्राप्त होता है। नकारान्त पद पूर्वमें हो और स्वर परे हो तो नकारके द्वारा पूर्ववर्ती आकार अनुरञ्जित होता है, अतः उसे 'रक्त' कहते हैं (यथा 'महाँ३असि' इत्यादि)। यदि नकारान्त पद पूर्वमें हो और य व हि आदि व्यञ्जन परे हों तो पूर्वकी आधी मात्रा—अणु मात्रा अनुरञ्जित होती है। पूर्वमें स्वरसे संयुक्त हलन्त नकार यदि पदान्तमें स्थित हो और उसके परे भी पद हो तो वह चार रूपोंसे युक्त होता है। कहीं वह रेफ होता है, कहीं रंग (या रक्त) बनता है, कहीं उसका लोप और कहीं अनुस्वार हो जाता है (यथा 'भवांश्चिनोति'में रेफ होता है। 'महाँ ३ असि' में रंग है। 'महाँ इन्द्र' में 'न' का लोप हुआ है। पूर्वका अनुनासिक या अनुस्वार हुआ है)। 'रंग' हृदयसे उठता है, कांस्यके वाद्यकी भाँति उसकी ध्वनि होती है। वह मृदु तथा दो मात्राका (दीर्घ) होता है। दधन्वाँ २ यह उदाहरण है। नारद! जैसे सौराष्ट्र देशकी नारी 'अरां' बोलती है, उसी प्रकार 'रंग' का प्रयोग करना चाहिये—यह मेरा मत है। नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात—इन चार प्रकारके पदोंके अन्तमें स्वरपूर्वक ग ड द व ङ ण न म ष स—ये दस अक्षर 'पदान्त' कहे गये हैं। उदात्त स्वर, अनुदात्त स्वर और स्वरित स्वर जहाँ भी स्थित हों, व्यञ्जन उनका अनुसरण करते हैं। आचार्यलोग तीनों स्वरोंकी ही प्रधानता बताते हैं। व्यञ्जनोंको तो मणियोंके समान समझे और स्वरको सूत्रके समान; जैसे बलवान् राजा दुर्बलके राज्यको हड़प लेता है, उसी प्रकार बलवान् दुर्बल व्यञ्जनको हर लेता है। ओभाव, विवृत्ति, श, ष, स, र, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये ऊष्माकी आठ गतियाँ हैं। ऊष्मा (सकार) इन आठ भावोंमें परिणत होता है। संहितामें जो स्वर-प्रत्यया विवृत्ति होती है, वहाँ विसर्ग समझे अथवा उसका तालव्य होता है। जिसकी उपधामें संध्यक्षर (ए, ओ, ऐ, औ) हों ऐसी सन्धिमें यदि य और व लोपको प्राप्त हुए हों तो वहाँ व्यञ्जननामक विवृत्ति और स्वरनामक प्रतिसंहिता होती है। जहाँ ऊष्मान्त विरत हो और सन्धिमें 'व' होता हो, वहाँ जो विवृत्ति होती है, उसे 'स्वर विवृत्ति' नामसे कहना चाहिये। यदि 'ओ' भावका प्रसंधान हो तो उत्तर पद ऋकारादि होता है; वैसे प्रसंधानको स्वरान्त जानना चाहिये। इससे भिन्न ऊष्माका प्रसंधान होता है (यथा 'वायो ऋ' इति। यहाँ ओभावका प्रसंधान है। 'क इह' यहाँ ऊष्माका प्रसंधान है)। जब श ष स आदि परे हों, उस समय यदि प्रथम (वर्गके पहले अक्षर) और उत्तम (वर्गके अन्तिम अक्षर) पदान्तमें स्थित हों तो वे द्वितीय स्थानको प्राप्त होते हैं। ऊष्मसंयुक्त होनेपर अर्थात् सकारादि परे होनेपर प्रथम जो तकार आदि अक्षर हैं, उनको

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २१३

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २१३

द्वितीय (थकार आदि)-की भाँति दिखाये—थकार आदिकी भाँति उच्चारण करे, उन्हें स्पष्टतः थकार आदिके रूपमें ही न समझ ले। उदाहरणके लिये—'मत्स्यः', 'क्षुरः' और 'अप्सराः' आदि उदाहरण हैं। लौकिक श्लोक आदिमें छन्दका ज्ञान करानेके लिये तीन हेतु हैं—छन्दोमान, वृत्त और पादस्थान (पदान्त)। परंतु ऋचाएँ स्वभावतः गायत्री आदि छन्दोंसे आवृत हैं। उनकी पाद-गणना या गुरु, लघु एवं अक्षरोंकी गणना तो छन्दोविभागको समझनेके लिये ही है; उन लक्षणोंके अनुसार ही ऋचाएँ हों, यह नियम नहीं है। लौकिक छन्द ही पाद और अक्षर-गणनाके अनुसार होते हैं। ऋवर्ण और स्वरभक्तिमें जो रेफ है, उसे अक्षरान्तर मानकर छन्दकी अक्षर-गणना या मात्रागणनामें सम्मिलित करे। किंतु स्वरभक्तियोंमें प्रत्ययके साथ रेफरहित अक्षरकी गणना करे। ऋवर्णमें रेफरूप व्यञ्जनकी प्रतीति पृथक् होती है और स्वररूप अक्षरकी प्रतीति अलग होती है। यदि 'ऋ' से ऊष्माका संयोग न हो तो उस ऋकारको लघु अक्षर जाने। जहाँ ऊष्मा (शकार आदि)-से संयुक्त होकर ऋकार पीड़ित होता है, उस ऋवर्णको ही स्वर होनेपर भी गुरु समझना चाहिये; यहाँ 'तृचम्' उदाहरण है। (यहाँ ऋकार लघु है।) ऋषभ, गृहीत, बृहस्पति, पृथिवी तथा निर्ऋति—इन पाँच शब्दोंमें ऋकार स्वर ही है, इसमें संशय नहीं है। श, ष, स, ह, र—ये जिसके आदिमें हों, ऐसे पदमें द्विपद सन्धि होनेपर कहीं 'इ' और 'उ' से रहित एकपदा स्वरभक्ति होती है, वह क्रमवियुक्त होती है। स्वरभक्ति दो प्रकारकी कही गयी है—ऋकार तथा रेफ। उसे अक्षरचिन्तकोंने क्रमशः 'स्वरोदा' और 'व्यञ्जनोदा' नाम दिया है। श, ष, स के विषयमें स्वरोदया एवं विवृता स्वरभक्ति मानी गयी है और हकारके विषयमें विद्वान् लोग व्यञ्जनोदया एवं संवृता स्वरभक्ति निश्चित करते हैं (दोनोंके क्रमशः उदाहरण हैं—'ऊर्षति, अर्हति)। स्वरभक्तिका प्रयोग करनेवाला पुरुष तीन दोषोंको त्याग दे—इकार, उकार तथा ग्रस्तदोष। जिससे परे संयोग हो और जिससे परे छ हो, जो विसर्गसे युक्त हो, द्विमात्रिक (दीर्घ) हो, अवसानमें हो, अनुस्वारयुक्त हो तथा घुडन्त हो—ये सब लघु नहीं माने जाते।

पथ्या (आर्या) छन्दके प्रथम और तृतीय पाद बारह मात्राके होते हैं। द्वितीय पाद अठारह मात्राका होता है और अन्तिम (चतुर्थ) पाद पंद्रह मात्राका होता है। यह पथ्याका लक्षण बताया गया; जो इससे भिन्न है, उसका नाम विपुला है। अक्षरमें जो ह्रस्व है, उससे परे यदि संयोग न हो तो उसकी 'लघु' संज्ञा होती है। यदि ह्रस्वसे परे संयोग हो तो उसे गुरु समझे तथा दीर्घ अक्षरोंको भी गुरु जाने। जहाँ स्वरके आते ही विवृति देखी जाती हो, वहाँ गुरु स्वर जानना चाहिये; वहाँ लघुकी सत्ता नहीं है। पदोंके जो स्वर हैं, उनके आठ प्रकार जानने चाहिये—अन्तोदात्त, आद्युदात्त, उदात्त, अनुदात्त, नीचस्वरित, मध्योदात्त, स्वरित तथा द्विरुदात्त—ये आठ पद-संज्ञाएँ हैं। 'अग्निर्वृत्राणि' इसमें 'अग्निः' अन्तोदात्त है। 'सोमः पवते' इसमें 'सोमः' आद्युदात्त है। 'प्र वो यह्वम्' इसमें 'प्र' उदात्त और 'वः' अनुदात्त है। 'बलं न्युब्जं वीर्यम्' इसमें 'वीर्यम्' नीचस्वरित है। 'हविषा विधेम' इसमें 'हविषा' मध्योदात्त है। 'भूर्भुवः स्वः' इसमें 'स्वः' स्वरित है। 'वनस्पतिः' में 'व' कार और 'स्प' दो उदात्त होनेसे यह द्विरुदात्तका उदाहरण है। नाममें अन्तर एवं मध्यममें उदात्त होता है। निपातमें अनुदात्त होता है। उपसर्गमें आद्य स्वरसे परे

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२१४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

स्वरित होता है तथा आख्यातमें दो अनुदात्त होते हैं। स्वरितसे परे जो धार्य अक्षर हैं (यथा 'निहोता सत्सि' इसमें 'ता' स्वरित है, उससे परे 'सत्सि' ये धार्य अक्षर हैं), वे सब प्रचयस्थान हैं; क्योंकि 'स्वरित' प्रचित होता है। वहाँ आदिस्वरितका निघात स्वर होता है। जहाँ प्रचय देखा जाय, वहाँ विद्वान् पुरुष स्वरका निघात करे। जहाँ केवल मृदु स्वरित हो, वहाँ निघात न करे। आचार्य-कर्म पाँच प्रकारका होता है—मुख, न्यास, करण, प्रतिज्ञा तथा उच्चारण। इस विषयमें कहते हैं, सप्रतिज्ञ उच्चारण ही श्रेय है। जिस किसी भी वर्णका करण (शिक्षादि शास्त्र) नहीं उपलब्ध होता हो, वहाँ प्रतिज्ञा (गुरुपरम्परागत निश्चय)-का निर्वाह करना चाहिये; क्योंकि करण प्रतिज्ञारूप ही है। नारद! तुम, तुम्बुरु, वसिष्ठजी तथा विश्वावसु आदि गन्धर्व भी सामके विषयमें शिक्षाशास्त्रोक्त सम्पूर्ण लक्षणोंको स्वरकी सूक्ष्मताके कारण नहीं जान पाते।

जठराग्निकी सदा रक्षा करे। हितकर (पथ्य) भोजन करे। भोजन पच जानेपर उषःकालमें नींदसे उठ जाय और ब्रह्मका चिन्तन करे। शरत्कालमें जो विषुवद्योग (जिस समय दिन-रात बराबर होते हैं) आता है, उसके बीतनेके बाद जबतक वसन्त-ऋतुकी मध्यम रात्रि उपस्थित न हो जाय तबतक वेदोंके स्वाध्यायके लिये उषःकालमें उठना चाहिये। सबेरे उठकर मौनभावसे आम, पलाश, बिल्व, अपामार्ग अथवा शिरीष—इनमेंसे किसी वृक्षकी टहनी लेकर उससे दाँतुन करे। खैर, कदम्ब, करबीर तथा करंजकी भी दाँतुन ग्राह्य है। काँटे तथा दूधवाले सभी वृक्ष पवित्र और यशस्वी माने गये हैं। उनकी दाँतुनसे इस पुरुषकी वाक्-इन्द्रियमें सूक्ष्मता (कफकी कमी होकर सरलतापूर्वक शब्दोच्चारणकी शक्ति) तथा मधुरता (मीठी आवाज) आती है। वह व्यक्ति प्रत्येक वर्णका स्पष्ट उच्चारण कर लेता है, जैसी कि 'प्राचीनौदवज्रि' नामक आचार्यकी मान्यता है। शिष्यको चाहिये वह नमकके साथ सदा त्रिफलाचूर्ण भक्षण करे। यह त्रिफला जठराग्निको प्रज्वलित करनेवाली तथा मेधा (धारणशक्ति)-को बढ़ानेवाली है। स्वर और वर्णके स्पष्ट उच्चारणमें भी सहयोग करनेवाली है। पहले जठरानलकी उपासना अर्थात्—मल-मूत्रादिका त्याग करके आवश्यक धर्मों (दाँतुन, स्नान, संध्योपासन)-का अनुष्ठान करनेके अनन्तर मधु और घी पीकर शुद्ध हो वेदका पाठ करे। पहले सात मन्त्रोंको उपांशुभावसे (बिना स्पष्ट बोले) पढ़े, उसके बाद मन्द्रस्वरमें वेदपाठ आरम्भ करके यथेष्ट स्वरमें मन्त्रोच्चारण करे। यह सब शाखाओंके लिये विधि है। प्रातःकाल ऐसी वाणीका उच्चारण न करे, जो प्राणोंका उपरोध करती हो; क्योंकि प्राणोपरोधसे वैस्वर्य (विपरीत स्वरका उच्चारण) हो जाता है। इतना ही नहीं, उससे स्वर और व्यञ्जनका माधुर्य भी लुप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। कुतीर्थसे प्राप्त हुई दग्ध (अपवित्र) वस्तुको जो दुर्जन पुरुष खा लेते हैं, उनका उसके दोषसे उद्धार नहीं होता—ठीक उसी तरह, जैसे पापरूप सर्पके विषसे जीवनकी रक्षा नहीं हो पाती। इसी प्रकार कुतीर्थ (बुरे अध्यापक)-से प्राप्त हुआ जो दग्ध (निष्फल) अध्ययन है, उसे जो लोग अशुद्ध वर्णोंके उच्चारणपूर्वक भक्षण (ग्रहण) करते हैं, उनका पापरूपी सर्पके विषकी भाँति पापी उपाध्यायसे मिले हुए उस कुत्सित अध्ययनके दोषसे छुटकारा नहीं होता। उत्तम आचार्यसे प्राप्त अध्ययनको ग्रहण करके अच्छी तरह अभ्यासमें लाया जाय तो वह शिष्यमें सुप्रतिष्ठित होता है

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ २१५

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* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २१५

और उसके द्वारा सुन्दर मुख एवं शोभन स्वरसे उच्चारित वेदकी बड़ी शोभा होती है। जो नाक, आँख, कान आदिके विकृत होनेसे विकराल दिखायी देता है, जिसके ओठ लंबे-लंबे हैं, जो सब बात नाकसे ही बोलता है, जो गद्गद-कण्ठसे बोलता है अथवा जिसकी जीभ बँधी-सी रहती है अर्थात् जो रुक-रुककर बोलता है, वह वेदमन्त्रोंके प्रयोगका अधिकारी नहीं है। जिसका चित्त एकाग्र है, अन्तःकरण वशमें है और जिसके दाँत तथा ओष्ठ सुन्दर हैं, ऐसा व्यक्ति यदि स्नानसे शुद्ध हो गाना छोड़ दे तो वह मन्त्राक्षरोंका ठीक प्रयोग कर सकता है। जो अत्यन्त क्रोधी, स्तब्ध, आलसी तथा रोगी हैं और जिनका मन इधर-उधर फैला हुआ है, वे पाँच प्रकारके मनुष्य विद्या ग्रहण नहीं कर पाते। विद्या धीरे-धीरे पढ़ी जाती है। धन धीरे-धीरे कमाया जाता है, पर्वतपर धीरे-धीरे चढ़ना चाहिये। मार्गका अनुसरण भी धीरे-धीरे ही करे और एक दिनमें एक योजनसे अधिक न चले। चींटी धीरे-धीरे चलकर सहस्रों योजन चली जाती है। किंतु गरुड़ भी यदि चलना शुरू न करे तो वह एक पग भी आगे नहीं जा सकता। पापीकी पापदूषित वाणी प्रयोगों (वेदमन्त्रों)-का उच्चारण नहीं कर सकती—ठीक उसी तरह, जैसे बातचीतमें चतुर सुलोचना रमणी बहरेके आगे कुछ नहीं कह सकती*। जो उपांशु (सूक्ष्म) उच्चारण करता है, जो उच्चारणमें जल्दबाजी करता है तथा जो डरता हुआ-सा अध्ययन करता है, वह सहस्र रूपों (शब्दोच्चारण)-के विषयमें सदा संदेहमें ही पड़ा रहता है। जिसने केवल पुस्तकके भरोसे पढ़ा है, गुरुके समीप अध्ययन नहीं किया है, वह सभामें सम्मानित नहीं होता—वैसे ही, जैसे जारपुरुषसे गर्भ धारण करनेवाली स्त्री समाजमें प्रतिष्ठा नहीं पाती। प्रतिदिन व्यय किये जानेपर अञ्जनकी पर्वतराशिका भी क्षय हो जाता है और दीमकोंके द्वारा थोड़ी-थोड़ी मिट्टीके संग्रहसे भी बहुत ऊँचा वल्मीक बन जाता है, इस दृष्टान्तको सामने रखते हुए दान और अध्ययनादि सत्कर्मोंमें लगे रहकर जीवनके प्रत्येक दिनको सफल बनावे—व्यर्थ न बीतने दे। कीड़े चिकने धूलकणोंसे जो बहुत ऊँचा वल्मीक बना लेते हैं, उसमें उनके बलका प्रभाव नहीं है, उद्योग ही कारण है। विद्याको सहस्रों बार अभ्यासमें लाया जाय और सैकड़ों बार शिष्योंको उसे पढ़ाया जाय, तब वह उसी प्रकार जिह्वाके अग्रभागपर आ जायगी, जैसे जल ऊँचे स्थानसे नीचे स्थानमें स्वयं बह आता है। अच्छी जातिके घोड़े आधी रातमें भी आधी ही नींद सोते हैं अथवा वे आधी रातमें सिर्फ एक पहर सोते हैं, उन्हींकी भाँति विद्यार्थियोंके नेत्रोंमें चिरकालतक निद्रा नहीं ठहरती। विद्यार्थी भोजनमें आसक्त होकर अध्ययनमें विलम्ब न करे। नारीके मोहमें न फँसे। विद्याकी अभिलाषा रखनेवाला छात्र आवश्यकता हो तो गरुड़ और हंसकी भाँति बहुत दूरतक भी चला जाय। विद्यार्थी जनसमूहसे उसी तरह डरे, जैसे सर्पसे डरता है। दोस्ती बढ़ानेके व्यसनको नरक समझकर उससे भी दूर रहे। स्त्रियोंसे उसी तरह बचकर रहे, जैसे राक्षसियोंसे। इस तरह करनेवाला पुरुष ही विद्या प्राप्त कर सकता है। शठ प्रकृतिके मनुष्य विद्यारूप अर्थकी सिद्धि नहीं कर पाते।


* शिक्षा-संग्रहमें जो नारदी-शिक्षा संकलित हुई है, उसमें इस श्लोकका पाठ इस प्रकार है—
न हि पाष्णिहता वाणी प्रयोगान् वक्तुमर्हति। बधिरस्येव तत्पस्था विदग्धा वामलोचना॥

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२१६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

कायर तथा अहंकारी भी विद्या एवं धनका उपार्जन नहीं कर पाते। लोकापवादसे डरनेवाले लोग भी विद्या और धनसे वञ्चित रह जाते हैं तथा 'जो आज नहीं कल' करते हुए सदा आगामी दिनकी प्रतीक्षामें बैठे रहते हैं, वे भी न विद्या पढ़ पाते हैं न धन ही लाभ करते हैं। जैसे खनतीसे धरती खोदनेवाला पुरुष एक दिन अवश्य पानी प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार गुरुकी निरन्तर सेवा करनेवाला छात्र गुरुमें स्थित विद्याको अवश्य ग्रहण कर लेता है। गुरुसेवासे विद्या प्राप्त होती है अथवा बहुत धन व्यय करनेसे उनकी प्राप्ति होती है। अथवा एक विद्या देनेसे दूसरी विद्या मिलती है; अन्यथा उसकी प्राप्ति नहीं होती। यद्यपि बुद्धिके गुणोंसे सेवा किये बिना भी विद्या प्राप्त हो जाती है; तथापि वन्ध्या युवतीकी भाँति वह सफल नहीं होती। नारद ! इस प्रकार मैंने तुमसे शिक्षाग्रन्थका संक्षेपसे वर्णन किया है। इस आदिवेदाङ्गको जानकर मनुष्य ब्रह्मभावकी प्राप्तिके योग्य हो जाता है। (पूर्वभाग—द्वितीय पाद, अध्याय ५०)


वेदके द्वितीय अङ्ग कल्पका वर्णन—गणेशपूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्धका निरूपण

सनन्दनजी कहते हैं—मुनीश्वर ! अब मैं कल्पग्रन्थका वर्णन करता हूँ; जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्य कर्ममें कुशल हो जाता है। कल्प पाँच प्रकारके माने गये हैं—नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प। नक्षत्रकल्पमें नक्षत्रोंके स्वामीका विस्तारपूर्वक यथार्थ वर्णन किया गया है; वह यहाँ भी जानने योग्य है। मुनीश्वर ! वेदकल्पमें ऋगादि-विधानका विस्तारसे वर्णन है—जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये कहा गया है। संहिताकल्पमें तत्त्वदर्शी मुनियोंने मन्त्रोंके ऋषि, छन्द और देवताओंका निर्देश किया है। आङ्गिरसकल्पमें स्वयं ब्रह्माजीने अभिचार-विधिसे विस्तारपूर्वक छः कर्मोंका वर्णन किया है। मुनिश्रेष्ठ ! शान्तिकल्पमें दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पातोंकी पृथक्-पृथक् शान्ति बतायी गयी है। यह संक्षेपसे कल्पके स्वरूपका परिचय दिया गया है, अन्य शाखाओंमें इसका विशेष रूपसे पृथक्-पृथक् निरूपण किया गया है। द्विजश्रेष्ठ ! गृहकल्प सबके लिये उपयोगी है, अतः इस समय उसीका वर्णन करूँगा। सावधान होकर सुनो। पूर्वकालमें 'ॐकार' और 'अथ' शब्द—ये दोनों ब्रह्माजीके कण्ठका भेदन करके निकले थे, अतः ये मङ्गल-सूचक हैं। जो शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करके उन्हें ऊँचे उठाना चाहता है, वह 'अथ' शब्दका प्रयोग करे। इससे वह कर्म अक्षय होता है। परिसमूहनके लिये परिगणित शाखावाले कुश कहे गये हैं, न्यून या अधिक संख्यामें उन्हें ग्रहण करनेपर वे अभीष्ट कर्मको निष्फल कर देते हैं। पृथ्वीपर जो कृमि, कीट और पतंग आदि भ्रमण करते हैं, उनकी रक्षाके लिये परिसमूहन कहा गया है। ब्रह्मन् ! वेदीपर जो तीन रेखाएँ कही गयी हैं, उनको बराबर बनाना चाहिये; उन्हें न्यूनाधिक नहीं करना चाहिये; ऐसा ही शास्त्रका कथन है। नारद ! यह पृथ्वी मधु और कैटभ नामवाले दैत्योंके मेदेसे व्याप्त है, इसलिये इसे गोबरसे लीपना चाहिये। जो गाय वन्ध्या, दुष्टा, दीनाङ्गी और मृतवत्सा (जिसके बछड़े मर जाते

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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हों, ऐसी) हो, उसका गोबर यज्ञके कार्यमें नहीं लाना चाहिये, ऐसी शास्त्रकी आज्ञा है। विप्रवर ! जो पतङ्ग आदि भयंकर जीव सदा आकाशमें उड़ते रहते हैं, उनपर प्रहार करनेके लिये वेदीसे मिट्टी उठानेका विधान है। स्रुवाके मूलभागसे अथवा कुशसे वेदीपर रेखा करनी चाहिये। इसका उद्देश्य है अस्थि, कण्टक, तुष-केशादिसे शुद्धि। ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। द्विजश्रेष्ठ ! सब देवता और पितर जलस्वरूप हैं, अतः विधिज्ञ ऋषि-मुनियोंने जलसे वेदीका प्रोक्षण करनेकी आज्ञा दी है। सौभाग्यवती स्त्रियोंके द्वारा ही अग्नि लानेका विधान है। शुभदायक मृण्मय पात्रको जलसे धोकर उसमें अग्नि रखकर लानी चाहिये। वेदीपर रखा हुआ अमृतकलश दैत्योंद्वारा हड़प लिया गया, यह देखकर ब्रह्मा आदि सब देवताओंने वेदीकी रक्षाके लिये उसपर समिधासहित अग्निकी स्थापना की। नारद ! यज्ञसे दक्षिण दिशामें दानव आदि स्थित होते हैं; अतः उनसे यज्ञकी रक्षाके लिये ब्रह्माको यज्ञवेदीसे दक्षिण दिशामें स्थापित करना चाहिये। नारद! उत्तर दिशामें प्रणीता-प्रोक्षणी आदि सब यज्ञपात्र रखे। पश्चिममें यजमान रहे और पूर्वदिशामें सब ब्राह्मणोंको रहना चाहिये। जुएमें, व्यापारमें और यज्ञकर्ममें यदि कर्ता उदासीनचित्त हो जाय तो उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है—यही वास्तविक स्थिति है। यज्ञकर्ममें अपनी ही शाखाके विद्वान् ब्राह्मणोंको ब्रह्मा और आचार्य बनाना चाहिये। अन्य ऋत्विजोंके लिये कोई नियम नहीं है, यथालाभ उनका पूजन करना चाहिये। तीन-तीन अंगुलकी दो पवित्री होनी चाहिये। चार अंगुलकी एक प्रोक्षणी, तीन अंगुलकी एक आज्यस्थाली और छः अंगुलकी चरुस्थाली होनी चाहिये। दो अंगुलका एक उपयमन कुश और एक अंगुलका सम्मार्जन कुश रखे। स्रुव छः अंगुलका और स्रुच् साढ़े तीन अंगुलका बताया गया है। समिधाएँ प्रादेशमात्र (अँगूठेसे लेकर तर्जनीके शिरोभागतकके नापकी) हों। पूर्णपात्र छः अंगुलका हो। प्रोक्षणीके उत्तर भागमें प्रणीता-पात्र रहे और वह आठ अंगुलका हो। जो कोई भी तीर्थ (सरोवर), समुद्र और सरिताएँ हैं, वे सब प्रणीता-पात्रमें स्थित होते हैं; अतः उसे जलसे भर दे। द्विजश्रेष्ठ ! वस्त्रहीन वेदी नग्न कही जाती है; अतः विद्वान् पुरुष उसके चारों ओर कुश बिछाकर उसके ऊपर अग्निस्थापन करे। इन्द्रका वज्र, विष्णुका चक्र और महादेवजीका त्रिशूल—ये तीनों कुशरूपसे तीन 'पवित्रच्छेदन' बनते हैं। पवित्रीसे ही प्रोक्षणीको प्रणीताके जलसे संयुक्त करना चाहिये। अतः पवित्र-निर्माण अत्यन्त पुण्यदायक कर्म कहा गया है। आज्यस्थाली पलमात्रकी बनानी चाहिये। कुम्हारके चाकपर गढ़ा हुआ मिट्टीका पात्र 'आसुर' कहा गया है। वही हाथसे बनाया हुआ—स्थालीपात्र आदि हो तो उसे 'दैविक' माना गया है। स्रुवसे शुभ और अशुभ सभी कर्म होते हैं। अतः उसकी पवित्रताके लिये उसे अग्निमें तपानेका विधान है। स्रुवको यदि अग्रभागकी ओरसे थाम लिया जाय तो स्वामीकी मृत्यु होती है। मध्यमें पकड़ा जाय तो प्रजा एवं संततिका नाश होता है और मूलभागमें उसे पकड़नेसे होताकी मृत्यु होती है; अतः विचार कर उसे हाथमें धारण करना चाहिये। अग्नि, सूर्य, सोम, विरञ्चि (ब्रह्माजी), वायु तथा यम—ये छः देवता स्रुवके एक-एक अंगुलमें स्थित हैं। अग्नि भोग और धनका नाश करनेवाले हैं, सूर्य रोगकारक होते हैं। चन्द्रमाका कोई फल नहीं है। ब्रह्माजी सब कामना देनेवाले हैं, वायुदेव वृद्धिदाता हैं और यमराज मृत्युदायक माने गये हैं (अतः स्रुवको मूलभागकी ओर तीन

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२१८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अंगुल छोड़कर चौथे-पाँचवें अंगुलपर पकड़ना चाहिये)। सम्मार्जन और उपयमन नामक दो कुश बनाने चाहिये। इनमेंसे सम्मार्जन कुश सात शाखा (कुश)-का और उपयमन कुश पाँचका होता है। स्रुव तथा स्रुक्-निर्माण करनेके लिये श्रीपर्णी (गंभारी), शमी, खदिर, विकङ्कत (कँटाई) और पलाश—ये पाँच प्रकारके काष्ठ शुभ जानने चाहिये। हाथभरका स्रुवा उत्तम माना गया है और तीस अंगुलका स्रुक्। यह ब्राह्मणोंके स्रुव और स्रुक्के विषयमें बताया गया है; अन्य वर्णवालोंके लिये एक अंगुल छोटा रखनेका विधान है। नारद! शूद्रों, पतितों तथा गर्दभ आदि जीवोंके दृष्टि-दोषका निवारण करनेके लिये सब पात्रोंके प्रोक्षणकी विधि है। विप्रवर! पूर्णपात्र-दान किये बिना यज्ञमें छिद्र उत्पन्न हो जाता है और पूर्णपात्रकी विधि कर देनेपर यज्ञकी पूर्ति हो जाती है। आठ मुट्ठीका 'किञ्चित्' होता है, चार किञ्चित्का 'पुष्कल' होता है और चार पुष्कलका एक 'पूर्णपात्र' होता है, ऐसा विद्वानोंका मत है। होमकाल प्राप्त होनेपर अन्यत्र कहीं आसन नहीं देना चाहिये। दिया जाय तो अग्निदेव अतृप्त होते और दारुण शाप देते हैं। 'आघार' नामकी दो आहुतियाँ अग्निदेवकी नासिका कही गयी हैं। 'आज्यभाग' नामवाली दो आहुतियाँ उनके नेत्र हैं। 'प्राजापत्य' आहुतिको मुख कहा गया है और व्याहृति होमको कटिभाग बताया गया है। पञ्चवारुण होमको दो हाथ, दो पैर और मस्तक कहते हैं। विप्रवर! 'स्विष्टकृत्' होम तथा पूर्णाहुति—ये दो आहुतियाँ दोनों कान हैं। अग्निदेवके दो मुख, एक हृदय, चार कान, दो नाक, दो मस्तक, छः नेत्र, पिङ्गल वर्ण और सात जिह्वाएँ हैं। उनके वाम-भागमें तीन और दक्षिण-भागमें चार हाथ हैं। स्रुक्, स्रुवा, अक्षमाला और शक्ति—ये सब उनके दाहिने हाथोंमें हैं। उनके तीन मेखला और तीन पैर हैं। वे घृतपात्र लिये हुए हैं। दो चँवर धारण करते हैं। भेड़पर चढ़े हुए हैं। उनके चार सींग हैं। बालसूर्यके समान उनकी अरुण कान्ति है। वे यज्ञोपवीत धारण करके जटा और कुण्डलोंसे सुशोभित हैं। इस प्रकार अग्निके स्वरूपका ध्यान करके होमकर्म प्रारम्भ करे। दूध, दही, घी और घृतपक्व या तैलपक्व पदार्थका जो हाथसे हवन करता है, वह ब्राह्मण ब्रह्महत्यारा होता है (इन सबका स्रुवासे होम करना चाहिये)। मनुष्य जो अन्न खाता है, उसके देवता भी वही अन्न खाते हैं। सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये हविष्यमें तिलका भाग अधिक रखना उत्तम माना गया है। होममें तीन प्रकारकी मुद्राएँ बतायी गयी हैं—मृगी, हंसी और सूकरी। अभिचार-कर्ममें सूकरी-मुद्राका उपयोग होता है और शुभकर्ममें मृगी तथा हंसी नामवाली मुद्राएँ उपयोगमें लायी जाती हैं। सब अंगुलियोंसे सूकरी-मुद्रा बनती है। हंसी-मुद्रामें कनिष्ठिका अंगुलि मुक्त रहती है और मृगी नामवाली मुद्रा केवल मध्यमा, अनामिका और अङ्गुष्ठद्वारा सम्पन्न होनेवाली कही गयी है। पूर्वोक्त प्रमाणवाली आहुतिको पाँचों अंगुलियोंसे लेकर उसके द्वारा अन्य ऋत्विजोंके साथ हवन करे। हवन-सामग्रीमें दही, मधु और घी मिलाया हुआ तिल होना चाहिये। पुण्यकर्मोंमें संलग्न होनेपर अपनी अनामिका अंगुलिमें कुशोंकी पवित्री अवश्य धारण करनी चाहिये।

भगवान् रुद्र और ब्रह्माजीने गणेशजीको 'गणपति' पदपर बिठाया और कर्मोंमें विघ्न डालनेका कार्य उन्हें सौंप रखा है। वे विघ्नेश विनायक जिसपर सवार होते हैं, उस पुरुषके लक्षण सुनो। वह स्वप्नमें बहुत अगाध जलमें

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* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २१९


प्रवेश कर जाता है, मूँड मुड़ाये मनुष्योंको तथा गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले पुरुषोंको देखता है। कच्चा मांस खानेवाले गृध्र आदि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओंपर चढ़ता है। एक स्थानपर चाण्डालों, गदहों और ऊँटोंके साथ उनसे घिरा हुआ बैठता है। चलते समय भी अपने-आपको शत्रुओंसे अनुगत मानता है—उसे ऐसा भान होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। (जाग्रत्-अवस्थामें भी) उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्यका आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण खिन्न रहता है। विघ्नराजका सताया हुआ मनुष्य राजाका पुत्र होकर भी राज्य नहीं पाता। कुमारी कन्या अनुकूल पति नहीं पाती, विवाहिता स्त्रीको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती। श्रोत्रियको आचार्यपद नहीं मिलता, शिष्य स्वाध्याय नहीं कर पाता, वैश्यको व्यापारमें और किसानको खेतीमें लाभ नहीं हो पाता।

ऐसे पुरुषको किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घीसे ढीला करे और उस मनुष्यके शरीरमें उसीका उबटन लगाये। प्रियङ्गु, नागकेसर आदि सब प्रकारकी ओषधियों और चन्दन, अगुरु, कस्तूरी आदि सब प्रकारकी सुगन्धित वस्तुओंको उसके मस्तकमें लगाये। फिर उसे भद्रासनपर बिठाकर उसके लिये ब्राह्मणोंसे शुभ स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदीसङ्गम तथा जलाशयसे लायी हुई पाँच प्रकारकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुंकुम, अगुरु आदि) और गुग्गुल—ये सब वस्तुएँ जलमें छोड़े और उसी जलमें छोड़े, जो गहरे और कभी न सूखनेवाले जलाशयसे एक रंगके चार नये कलशोंद्वारा लाया गया हो। तदनन्तर लाल रंगके वृषभचर्मपर भद्रासन* स्थापित करे। (इसी भद्रासनपर यजमानको बैठाकर ब्राह्मणोंसे पूर्वोक्त स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसके सिवा स्वस्तिवाचनके अनन्तर जिनके पति और पुत्र जीवित हों, ऐसी सुवेशधारिणी स्त्रियोंद्वारा मङ्गल-गान कराते हुए पूर्वादिशावर्ती कलशको लेकर आचार्य निम्नाङ्कित मन्त्रसे यजमानका अभिषेक करे—)

सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्।
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते॥

‘जो सहस्रों नेत्रों (अनेक प्रकारकी शक्तियों)-से युक्त हैं, जिसकी सैकड़ों धाराएँ (बहुत-से प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पावन बनाया है, उस पवित्र जलसे मैं तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। पावमानी ऋचाएँ तथा यह पवित्र जल तुम्हें पवित्र करें (और विनायकजनित विघ्नकी शान्ति हो)।'

(तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मन्त्रको पढ़ते हुए अभिषेक करे—)

भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः।
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥

‘राजा वरुण, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा


*पूर्वोक्त गन्ध-औषधादिसहित चार कलशोंमें आम्र आदिके पल्लव रखकर उनके कण्ठमें माला पहनाये, उन्हें चन्दनसे चर्चित करे और नूतन वस्त्रसे विभूषित करके उन कलशोंको पूर्वादि चारों दिशाओंमें स्थापित कर दे। फिर पवित्र एवं लिपी-पुती वेदीपर पाँच रंगोंसे स्वस्तिक बनाकर लाल रंगका वृषभचर्म, जिसका लोम उत्तरकी ओर तथा ग्रीवा पूर्वकी ओर हो, बिछाये और उसके ऊपर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित काष्ठनिर्मित आसन रखे। यही भद्रासन है।

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२२० * संक्षिप्त नारदपुराण *

सप्तर्षिगण तुम्हें कल्याण प्रदान करें।'

(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे—)

यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि।
ललाटे कर्णयोरक्षणोरापस्तद् घ्नन्तु सर्वदा॥

'तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, वह सब सदाके लिये जल शान्त कर दे।'

(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे। इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमानके मस्तकपर बायें हाथमें लिये हुए कुशोंको रखकर उसपर गूलरकी स्रुवासे सरसोंका तेल उठाकर डाले, उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—) 'ॐ मिताय स्वाहा। ॐ संमिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा। ॐ कटंकटाय स्वाहा। ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा। ॐ राजपुत्राय स्वाहा।' मस्तकपर होमके पश्चात् लौकिक अग्निमें भी स्थालीपाककी विधिसे चरु तैयार करके उक्त छः मन्त्रोंसे ही उसी अग्निमें हवन करे। फिर होमशेष चरुद्वारा बलिमन्त्रोंको पढ़कर इन्द्रादि दिक्पालोंको बलि भी अर्पित करे। तत्पश्चात् कृताकृत आदि उपहार-द्रव्य भगवान् विनायकको अर्पित करके उनके समीप रहनेवाली माता पार्वतीको भी उपहार भेंट करे। फिर पृथ्वीपर मस्तक रखकर 'तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे गणेशजीको और 'सुभागायै विद्महे। काममालिन्यै धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे अम्बिकादेवीको नमस्कार करे। फिर गणेशजननी अम्बिकाका उपस्थान करे। उपस्थानसे पूर्व फूल और जलसे अर्घ्य देकर दूर्वा, सरसों और पुष्पसे पूर्ण अञ्जलि अर्पण करे। (उपस्थानका मन्त्र इस प्रकार है—)

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे॥

'भगवति! मुझे रूप दो, यश दो, कल्याण प्रदान करो, पुत्र दो, धन दो और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करो।'

पार्वतीजीका उपस्थान करके धूप, दीप, गन्ध, माल्य, अनुलेप और नैवेद्य आदिके द्वारा उमापति श्रीभगवान् शङ्करकी पूजा करे। तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दन और मालासे अलंकृत हो ब्राह्मणोंको भोजन कराये और गुरुको भी दक्षिणासहित दो वस्त्र अर्पित करे।

इस प्रकार विनायककी पूजा करके लक्ष्मी, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयुकी इच्छा रखनेवाले वीर्यवान् पुरुषको ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु—इन नवों ग्रहोंकी क्रमशः स्थापना करनी चाहिये। सूर्यकी प्रतिमा ताँबेसे, चन्द्रमाकी रजत (या स्फटिक)—से, मङ्गलकी लाल चन्दनसे, बुधकी सुवर्णसे, गुरुकी सुवर्णसे, शुक्रकी रजतसे, शनिकी लोहेसे तथा राहु—केतुकी सीसेसे बनाये, इससे शुभकी प्राप्ति होती है। अथवा वस्त्रपर उनके-उनके रंगके अनुसार वर्णकसे उनका चित्र अङ्कित कर लेना चाहिये। अथवा मण्डल बनाकर उनमें गन्ध (चन्दन-कुंकुम आदि)—से ग्रहोंकी आकृति बना ले। ग्रहोंके रंगके अनुसार ही उन्हें फूल और वस्त्र भी देने चाहिये। सबके लिये गन्ध, बलि, धूप और गुग्गुल देना चाहिये। प्रत्येक ग्रहके लिये (अग्निस्थापनपूर्वक) समन्त्रक चरुका होम करना चाहिये। 'आ कृष्णेन रजसा०' इत्यादि सूर्य देवताके, 'इमं देवाः०' इत्यादि चन्द्रमाके, 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०' इत्यादि मङ्गलके, 'उद्बुध्यस्व०' इत्यादि मन्त्र बुधके, 'बृहस्पते अति यदर्यः०' इत्यादि मन्त्र बृहस्पतिके,

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२१

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२१

'अन्नात् परिस्रुतो०' इत्यादि मन्त्र शुक्रके, 'शन्नो देवी०' इत्यादि मन्त्र शनैश्चरके, 'काण्डाट् काण्डाट्०' इत्यादि मन्त्र राहुके और 'केतुं कृण्वन्नकेतवे०' इत्यादि मन्त्र केतुके हैं। आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा—ये क्रमशः सूर्य आदि ग्रहोंकी समिधा हैं। सूर्यादि ग्रहोंमेंसे प्रत्येकके लिये एक सौ आठ या अट्ठाईस बार मधु, घी, दही अथवा खीरकी आहुति देनी चाहिये। गुड़ मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य (मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठीके चावलका भात, दही-भात, घी-भात, तिलचूर्णमिश्रित भात, माष (उड़द) मिलाया हुआ भात और खिचड़ी—इनको ग्रहके क्रमानुसार विद्वान् पुरुष ब्राह्मणके लिये भोजन दे। अपनी शक्तिके अनुसार यथाप्राप्त वस्तुओंसे ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक सत्कार करके उनके लिये क्रमशः धेनु, शङ्ख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, काली गौ, लोहा और बकरा—ये वस्तुएँ दक्षिणामें दे। ये ग्रहोंकी दक्षिणाएँ बतायी गयी हैं। जिस-जिस पुरुषके लिये जो ग्रह जब अष्टम आदि दुष्ट स्थानोंमें स्थित हो, वह पुरुष उस ग्रहकी उस समय विशेष यत्नपूर्वक पूजा करे। ब्रह्माजीने इन ग्रहोंको वर दिया है कि 'जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक सम्मान) करना। राजाओंके धन और जातिका उत्कर्ष तथा जगत्की जन्म-मृत्यु भी ग्रहोंके ही अधीन है; अतः ग्रह सभीके लिये पूजनीय हैं। जो सदा सूर्यदेवकी पूजा एवं स्कन्दस्वामीको तथा महागणपतिको तिलक करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, उसे प्रत्येक कर्ममें सफलता एवं उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो मातृयाग किये बिना ग्रहपूजन करता है, उसपर मातृकाएँ कुपित होती हैं और उसके प्रत्येक कार्यमें विघ्न डालती हैं। शुभकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको 'वसोः पवित्रम्०' इस मन्त्रसे वसुधारा समर्पित करके प्रत्येक माङ्गलिक कर्ममें गौरी आदि मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये। उनके नाम ये हैं—गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, हृष्टि और तुष्टि। इनके साथ अपनी कुलदेवी और गणेशजी अधिक हैं। वृद्धिके अवसरोंपर इन सोलह मातृकाओंकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। इन सबकी प्रसन्नताके लिये क्रमशः आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, (आचमनीय), स्नान, (वस्त्र), चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल, नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, पूगीफल, आरती तथा दक्षिणा—ये उपचार समर्पित करने चाहिये।

अब मैं पितृकल्पका वर्णन करूँगा, जो धन और संततिकी वृद्धि करनेवाला है। अमावस्या, अष्टका, वृद्धि (विवाहादिका अवसर), कृष्णपक्ष, दोनों अयनोंके आरम्भका दिन, श्राद्धीय द्रव्यकी उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मणकी प्राप्ति, विषुवत् योग, सूर्यकी संक्रान्ति, व्यतीपात योग, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्धके लिये रुचिका होना—ये सभी श्राद्धके समय अथवा अवसर कहे गये हैं। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञानमें अग्रगण्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मवेत्ता, युवक, मन्त्र और ब्राह्मणरूप वेदका तत्त्वज्ञ, ज्येष्ठ सामका गान करनेवाला, त्रिमधु¹, त्रिसुपर्ण², भानजा, ऋत्विक्, जामाता, यजमान, श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेत³, दौहित्र,


१. 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप और तदनुकूल व्रतका आचरण करनेवाला। २. त्रिसौपर्णी ऋचाओंका अध्येता और तत्सम्बन्धी व्रतका पालन करनेवाला। ३. त्रिणाचिकेत-संज्ञक त्रिविध अग्निविद्याको जाननेवाला और तदनुकूल व्रतका पालक।

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* संक्षिप्त नारदपुराण *

शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पञ्चाग्निसेवी*, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके भक्त ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति हैं। रोगी, न्यूनाङ्ग, अधिकाङ्ग, काना, पुनर्भूकी संतान, अवकीर्णी (ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहते हुए ब्रह्मचर्य भंग करनेवाला), कुण्ड (पतिके जीते-जी पर-पुरुषसे उत्पन्न की हुई संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद जारज संतान), खराब नखवाला, काले दाँतवाला, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, नपुंसक, कन्याको कलङ्कित करनेवाला, स्वयं जिसपर दोषारोपण किया गया हो वह, मित्र-द्रोही, चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाला, माता, पिता और गुरुका त्याग करनेवाला, कुण्ड और गोलकका अन्न खानेवाला, शूद्रसे उत्पन्न, एक पतिको छोड़कर आयी हुई स्त्रीका पति, चोर और कर्मभ्रष्ट—ये ब्राह्मण श्राद्धमें निन्दित हैं (अतः इनका त्याग करना चाहिये)।

श्राद्धकर्ता पुरुष मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर, पवित्र हो, श्राद्धसे एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोंको भी उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा पूर्ण संयमशील रहना चाहिये। श्राद्धके दिन अपराह्नकालमें आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करे। स्वयं हाथमें कुशकी पवित्री धारण किये रहे। जब ब्राह्मणलोग आचमन कर लें, तब उन्हें आसनपर बिठाये। देवकार्यमें अपनी शक्तिके अनुसार युग्म (दो, चार, छः आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको और श्राद्धमें अयुग्म (एक, तीन, पाँच, आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। सब ओरसे घिरे हुए गोबर आदिसे लिपे-पुते पवित्र स्थानमें, जहाँ दक्षिण दिशाकी ओर भूमि कुछ नीची हो, श्राद्ध करना चाहिये। वैश्वदेव-श्राद्धमें दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाये और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख। अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे। मातामहोंके श्राद्धमें भी ऐसा ही करना चाहिये। अर्थात् दो वैश्वदेव-श्राद्धमें और तीन मातामहादि श्राद्धमें अथवा उभयपक्षमें एक-ही-एक ब्राह्मण रखे।

वैश्वदेव-श्राद्धके लिये ब्राह्मणका हाथ धुलानेके निमित्त उसके हाथमें जल दे और आसनके लिये कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पूछे—‘मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहता हूँ।' तब ब्राह्मण आज्ञा दें—‘आवाहन करो।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर ‘विश्वेदेवास आगत०' इत्यादि ऋचा पढ़कर विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तब ब्राह्मणके समीपकी भूमिपर जौ बिखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्घ्यपात्रमें ‘शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल छोड़े, ‘यवोऽसि०' इत्यादिसे जौ डाले, फिर बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प भी छोड़ दे। तत्पश्चात् ‘या दिव्या आपः०' इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणके हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे और कहे—‘अमुकश्राद्धे विश्वेदेवाः इदं वो हस्तार्घ्यं नमः।' यों कहकर वह अर्घ्यजल कुशयुक्त ब्राह्मणके हाथमें या कुशापर गिरा दे। तत्पश्चात् हाथ धोनेके लिये जल देकर क्रमशः गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा आच्छादन वस्त्र अर्पण करे; पुनः हस्तशुद्धिके लिये जल दे। (विश्वेदेवोंको जो कुछ भी दे, सव्यभावसे उत्तराभिमुख होकर दे और पितरोंको प्रत्येक वस्तु अपसव्यभावसे दक्षिणाभिमुख होकर देनी चाहिये)।

वैश्वदेवकाण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य


*सभ्य, आवसथ्य तथा त्रिणाचिकेत—इन पाँच अग्नियोंका उपासक।

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २२३
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करके पिता आदि तीनके लिये तीन द्विगुण-भुग्न कुशोंको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रमसे दे। फिर पूर्ववत् ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर 'उशन्तस्त्वा०' इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका आवाहन करके 'आयन्तु नः०' इत्यादिका जप करे। 'अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः०' यह मन्त्र पढ़ कर सब ओर तिल बिखेरे। वैश्वदेव-श्राद्धमें जो कार्य जैसे किया जाता है, वही पितृश्राद्धमें तिलसे करना चाहिये। अर्घ्य आदि पूर्ववत् करे। संस्रव (ब्राह्मणके हाथसे चुए हुए जल) पितृपात्रमें ग्रहण करके भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके ढुलका दे और कहे 'पितृभ्यः स्थानमसि।' फिर उसके ऊपर अर्घ्यपात्र और पवित्रक आदि रखकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि पितरोंको निवेदित करे।

इसके बाद 'अग्नौ करण' कर्म करे। घीसे तर किया हुआ अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'अग्नौ करिष्ये' (मैं अग्निमें इसकी आहुति देना चाहता हूँ)। तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दें। इस प्रकार आज्ञा लेकर वह पिण्डपितृयज्ञकी भाँति उस अन्नकी दो आहुति दे (उस समय ये दो मन्त्र क्रमशः पढ़े—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा नमः। सोमाय पितृमते स्वाहा नमः।)। फिर होमशेष अन्नको एकाग्रचित्त होकर यथाप्राप्त पात्रोंमें—विशेषतः चाँदीके पात्रोंमें परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर 'पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानम्०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर 'इदं विष्णु०' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श कराये। तदनन्तर तीनों व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्र तथा 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे और ब्राह्मणोंसे कहे—'आप सुखपूर्वक अन्न ग्रहण करें।' फिर वे ब्राह्मण भी मौन होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करें।

उस समय यजमान क्रोध और उतावलीको त्याग दे और जबतक ब्राह्मणलोग पूर्णतः तृप्त न हो जायँ, तबतक पूछ-पूछकर प्रिय अन्न और हविष्य उन्हें परोसता रहे। उस समय पूर्वोक्त मन्त्रोंका तथा पावमानी आदि ऋचाओंका जप या पाठ करते रहना चाहिये। तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'क्या आप पूर्ण तृप्त हो गये?' ब्राह्मण कहें—'हाँ, हम तृप्त हो गये।' यजमान फिर पूछे—'शेष अन्न क्या किया जाय?' ब्राह्मण कहें—'इष्टजनोंके साथ भोजन करो।' उनकी इस आज्ञाको 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार करे। फिर हाथमें लिये हुए अन्नको ब्राह्मणोंके आगे उनकी जूठनके पास ही दक्षिणाग्र कुश भूमिपर रखकर उन कुशोंपर तिल-जल छोड़कर वह अन्न रख दे। उस समय 'ये अग्निदग्धाः०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ब्राह्मणोंके हाथमें कुल्ला करनेके लिये एक-एक बार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ सारा अन्न लेकर दक्षिणाभिमुख हो पिण्डपितृयज्ञ-कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान करे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर ब्राह्मणोंके आचमनार्थ जल दे, तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उनके हाथमें जल देकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे—आपलोग 'अक्षय्यमस्तु' कहें। तब ब्राह्मण 'अक्षय्यम् अस्तु' बोलें। इसके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहे—'अब मैं स्वधावाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण कहें—'स्वधावाचन कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर पितरों और मातामहादिके लिये 'आप यह स्वधावाचन करें, ऐसा कहे। तब ब्राह्मण बोलें—'अस्तु स्वधा।' इसके अनन्तर पृथ्वीपर जल सींचे और 'विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्' यों कहे। ब्राह्मण भी इस वाक्यको दुहरायें—'प्रीयन्तां विश्वेदेवाः।' तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे

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२२४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


श्राद्धकर्ता निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे—
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति ॥
'मेरे दाता बढ़ें। वेद और संतति बढ़े। हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दानके लिये बहुत धन हो।'

यह कहकर ब्राह्मणोंसे नम्रतापूर्वक प्रिय वचन बोले और उन्हें प्रणाम करके विसर्जन करे—'वाजे-वाजे०' इत्यादि ऋचाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक विसर्जन करे। पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका विसर्जन करना चाहिये। पहले जिस अर्घ्यपात्रमें संस्रवका जल डाला गया था, उस पितृपात्रको उत्तान करके ब्राह्मणोंको विदा करना चाहिये। ग्रामकी सीमातक ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे जाकर उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे और पितृसेवित श्राद्धान्नको इष्टजनोंके साथ भोजन करे। उस रात्रिमें यजमान और ब्राह्मण—दोनोंको ब्रह्मचारी रहना चाहिये।

इसी प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि वृद्धिके अवसरोंपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख पितरोंका यजन करे। दही और बेर मिले हुए अन्नका पिण्ड दे और तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे करे। एकोद्दिष्ट श्राद्ध बिना वैश्वदेवके होता है। उसमें एक ही अर्घ्यपात्र तथा एक ही पवित्रक दिया जाता है। इसमें आवाहन और अग्नौकरणकी क्रिया नहीं होती। सब कार्य जनेऊको अपसव्य रखकर किये जाते हैं। 'अक्षय्यमस्तु' के स्थानमें 'उपनिष्ठताम्' का प्रयोग करे। 'वाजे-वाजे०' इस मन्त्रसे ब्राह्मणका विसर्जन करते समय 'अभिरम्यताम्' यों कहे और ये ब्राह्मणलोग 'अभिरताः स्मः' ऐसा उत्तर दें। सपिण्डीकरण श्राद्धमें पूर्वोक्त विधिसे अर्घ्यसिद्धिके लिये गन्ध, जल और तिलसे युक्त चार अर्घ्यपात्र तैयार करे। (इनमेंसे तीन तो पितरोंके पात्र हैं और एक प्रेतका पात्र होता है।) इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोंके पात्रोंमें डाले। उस समय 'ये समाना०' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करे। शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट श्राद्ध माताके लिये भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरणश्राद्ध वर्ष पूर्ण होनेसे पहले हो जाता है, उसके लिये एक वर्षतक ब्राह्मणको सान्नोदक कुम्भदान देते रहना चाहिये। एक वर्षतक प्रतिमास मृत्युतिथिको एकोद्दिष्ट करना चाहिये; फिर प्रत्येक वर्षमें एक बार क्षयाहतिथिको एकोद्दिष्ट करना उचित है। प्रथम एकोद्दिष्ट तो मरनेके बाद ग्यारहवें दिन किया जाता है। सभी श्राद्धोंमें पिण्डोंको गाय, बकरे अथवा लेनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंको दे देना चाहिये। अथवा उन्हें अग्निमें या अगाध जलमें डाल देना चाहिये। जबतक ब्राह्मणलोग भोजन करके वहाँसे उठ न जायँ, तबतक उच्छिष्ट स्थानपर झाडू न लगाये। श्राद्धमें हविष्यान्नके दानसे एक मासतक और खीर देनेसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है। भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशीको विशेषतः मघा नक्षत्रका योग होनेपर जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है वह अक्षय होता है। एक चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदासे अमावास्यातककी चौदह तिथियोंमें श्राद्ध-दान करनेवाला पुरुष क्रमशः इन चौदह फलोंको पाता है—रूप-शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् तथा रूपवान् दामाद, पशु, श्रेष्ठ पुत्र, द्यूत-विजय, खेतीमें लाभ, व्यापारमें लाभ, दो खुर और एक खुरवाले पशु, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र, सुवर्ण, रजत, कुप्यक (त्रपु-सीसा आदि), जाति-भाइयोंमें श्रेष्ठता और सम्पूर्ण मनोरथ। जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हों, उन्हींके लिये उस चतुर्दशी तिथिको श्राद्ध प्रदान किया जाता है।