संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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स्थान कण्ठ है। मन्द्र (पञ्चम)-का स्थान रसना बतायी जाती है। (मन्द्रस्योरसि तूच्यते—इस पाठके अनुसार उसका स्थान वक्षःस्थल भी है।) अतिस्वार नामवाले नीच स्वर (निषाद) का स्थान हृदयमें बताया जाता है। अङ्गुष्ठके शिरोभागमें क्रुष्ट (सप्तम-पञ्चम) का न्यास करना चाहिये। अङ्गुष्ठमें ही प्रथम स्वरका भी स्थान बताया गया है। तर्जनीमें गान्धार तथा मध्यमामें ऋषभकी स्थिति है। अनामिकामें षड्ज और कनिष्ठिकामें धैवत हैं। कनिष्ठाके नीचे मूल भागमें निषाद स्वरकी स्थिति बताये। मन्द्र स्वरसे सर्वथा पृथक् न होनेसे निषाद 'अपर्व' है। उसका पृथक् ज्ञान न होनेके कारण उसे 'असंज्ञ' कहा गया है तथा उसमें लिङ्ग, वचन आदिका सम्बन्ध न होनेसे उसे 'अव्यय' भी कहते हैं। अतः मन्द्र ही मन्दीभूत होकर 'परिस्वार' (निषाद) कहा गया है। क्रुष्ट स्वरसे देवता जीवन धारण करते हैं और प्रथमसे मनुष्य; द्वितीय स्वरसे पशु तथा तृतीयसे गन्धर्व और अप्सराएँ जीवन धारण करती हैं। अण्डज (पक्षी) तथा पितृगण चतुर्थ-स्वरजीवी होते हैं। पिशाच, असुर तथा राक्षस मन्द्रस्वरसे जीवन-निर्वाह करते हैं। नीच अतिस्वार (निषाद)-से स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् जीवन धारण करता है। इस प्रकार सामिक स्वरसे सभी प्राणी जीवन धारण करते हैं।
जो दीप्ता, आयता, करुणा, मृदु तथा मध्यम श्रुतियोंका विशेषज्ञ नहीं है, वह आचार्य कहलानेका अधिकारी नहीं है। मन्द्र (पञ्चम), द्वितीय, चतुर्थ, अतिस्वार (षष्ठ) और तृतीय—इन पाँच स्वरोंकी श्रुति 'दीप्ता' कही गयी है। (प्रथमकी श्रुति मृदु है) और सप्तमकी श्रुति 'करुणा' है। अन्य जो 'मृदु', 'मध्यमा' और 'आयता' नामवाली श्रुतियाँ हैं, वे द्वितीय स्वरमें होती हैं। मैं उन सबके पृथक्-पृथक् लक्षण बताता हूँ। नीच अर्थात् तृतीय स्वर परे रहते द्वितीय स्वरकी आयता श्रुति होती है, विपर्यय अर्थात् चतुर्थ स्वर परे रहनेपर उक्त स्वरकी मृदुभूता श्रुति होती है। अपना स्वर परे हो और स्वरान्तर परे न हो तो उसकी मध्यमा श्रुति होती है। यह सब विचारकर सामस्वरका प्रयोग करना चाहिये। क्रुष्ट स्वर परे होनेपर द्वितीय स्वरमें स्थित जो श्रुति है, उसे 'दीप्ता' समझे। प्रथम स्वरमें हो तो वह 'मृदु' श्रुति मानी गयी है। यदि चतुर्थ स्वरमें हो तो वही श्रुति मृदु कहलाती है। तथा मन्द्र स्वरमें हो तो दीप्ता होती है। सामकी समाप्ति होनेपर जिस किसी भी स्वरमें स्थित श्रुति दीप्ता ही होती है। स्वरके समास होनेसे पहले आयतादि श्रुतिका प्रयोग न करे। स्वर समास होनेपर भी जबतक गानका विच्छेद न हो जाय, दो स्वरोंके मध्यमें भी श्रुतिका प्रयोग न करे। ह्रस्व तथा दीर्घ अक्षरका गान होते समय भी श्रुति नहीं करनी चाहिये (केवल प्लुतमें ही श्रुति कर्तव्य है) तथा जहाँ घुट-संज्ञक स्वर हो, वहाँ भी श्रुतिका प्रयोग न करे। तालव्य इकारका 'आ' 'इ' भाव होता है और 'आ उ' भाव होता है; ये दो प्रकारकी गतियाँ हैं और ऊष्म वर्ण 'श ष स' के साथ जो त्रिविध पदान्त सन्धि है—ये सब मिलकर पाँच स्थान हैं; इन स्थानोंमें घुट-संज्ञक स्वर जानना चाहिये (इनमें श्रुति नहीं करनी चाहिये)। श्रुतिस्थानोंमें जहाँ स्वर और स्वरान्तर समास न हुए हों तथा जो ह्रस्व, दीर्घ एवं 'घुट' संज्ञाके स्थल हैं, वे सब श्रुतिसे रहित हैं, उनमें श्रुति नहीं करनी चाहिये। वहाँ स्वरसे ही श्रुतिवत् कार्य होता है।
(सामव्यतिरिक्त स्थलोंमें) उदात्त स्वरमें 'दीप्ता' नामवाली श्रुतिको जाने। स्वरितमें भी विद्वान्