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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 209 of 770

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Page 209
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    २०७

जैसे सिरके बालोंपर कैंची चलती है और बालोंको पृथक् कर देती है, उसी प्रकार पद और स्वर आदिका पृथक्-पृथक् विभागपूर्वक बोध कराना चाहिये। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार अन्य सब चेष्टाओंको विलीन करके मन और दृष्टि देकर विद्वान् पुरुष, स्वस्थ, शान्त तथा निर्भीक होकर वर्णोंका उच्चारण करे। मन्त्रका उच्चारण करते समय नाककी सीधमें पूर्व दिशाकी ओर गोकर्णके समान आकृतिमें हाथको उठाये रखे और हाथके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए शास्त्रके अर्थका निरन्तर चिन्तन करता रहे। मन्त्र-वाक्यको हाथ और मुख दोनोंसे साथ-साथ भलीभाँति प्रचारित करे। वर्णोंका जिस प्रकार द्रुतादि वृत्तिसे आरम्भमें उच्चारण करे, उसी प्रकार उन्हें समास भी करे। (एक ही मन्त्रमें दो वृत्तियोंकी योजना न करे।) अभ्याघात, निर्घात, प्रगान तथा कम्पन न करे, समभावसे साममन्त्रोंका गान करे। जैसे आकाशमें श्येन पक्षी सम गतिसे उड़ता है, जैसे जलमें विचरती हुई मछलियों अथवा आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंके मार्गका विशेष रूपसे पता नहीं चलता, उसी प्रकार सामगानमें स्वरगत श्रुतिके विशेष स्वरूपका अवधारण नहीं होता। सामान्यतः गीतमात्रकी उपलब्धि होती है। जैसे दहीमें घी अथवा काठके भीतर अग्नि छिपी रहती है और प्रयत्नसे उसकी उपलब्धि भी होती है, उसी प्रकार स्वरगत श्रुति भी गीतमें छिपी रहती है, प्रयत्नसे उसके विशेष स्वरूपकी भी उपलब्धि होती है। प्रथम स्वरसे दूसरे स्वरपर जो स्वर-संक्रमण होता है, उसे प्रथम स्वरसे संधि रखते हुए ही करे, विच्छेद करके न करे और न वेगसे ही करे। जैसे छाया एवं धूप सूक्ष्म गतिसे धीरे-धीरे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जाते हैं—न तो पूर्वस्थानसे सहसा सम्बन्ध तोड़ते हैं और न नये स्थानपर ही वेगसे जाते हैं, उसी प्रकार स्वर-संक्रमण भी सम तथा अविच्छिन्न भावसे करे। जब प्रथम स्वरको खींचते हुए द्वितीय स्वर होता है, तब उसे 'कर्षण' कहते हैं। विद्वान् पुरुष निम्नाङ्कित छः दोषोंसे युक्त कर्षणका त्याग करे, अनागत तथा अतिक्रान्त अवस्थामें कर्षण न करे। द्वितीय स्वरके आरम्भसे पहले उसकी अनागत अवस्था है, प्रथम स्वरका सर्वथा व्यतीत हो जाना उसकी अतिक्रान्तावस्था है; इन दोनों स्थितियोंमें प्रथम स्वरका कर्षण न करे। प्रथम मात्राका विच्छेद करके भी कर्षण न करे। उसे विषमाहत-कम्पित करके भी द्वितीय स्वरपर न जाय। कर्षणकालमें तीन मात्रासे अधिक स्वरका विस्तार न करे। अस्थितान्तका त्याग करे अर्थात् द्वितीय स्वरमें भी त्रिमात्रायुक्त स्थिति करनी चाहिये, न कि दो मात्रासे ही युक्त। जो स्वर स्थानसे च्युत होकर अपने स्थानका अतिवर्तन (लङ्घन) करता है, उसे सामगान करनेवाले विद्वान् 'विस्वर' कहते हैं और वीणा बजाकर गानेवाले गायक उसे 'विरक्त' नाम देते हैं। स्वयं अभ्यास करनेके लिये द्रुतवृत्तिसे मन्त्रोच्चारण करे। प्रयोगके लिये मध्यम वृत्तिका आश्रय ले और शिष्योंके उपदेशके लिये विलम्बित वृत्तिका अवलम्बन करे। इस प्रकार शिक्षाशास्त्रोक्त विधिसे जिसने ग्रन्थ (सामगान) को ग्रहण किया है, वह विद्वान् द्विज ग्रन्थोच्चारणकी शिक्षा लेनेवाले शिष्योंको हाथसे ही अध्ययन कराये।

कृष्ट (सप्तम एवं पञ्चम) स्वरका स्थान मस्तकमैं है। प्रथम (षड्ज) स्वरका स्थान ललाटमें है। द्वितीय (ऋषभ) स्वरका स्थान दोनों भौंहोंके मध्यमें है। तृतीय (गान्धार) स्वरका स्थान दोनों कानोंमें हैं। चतुर्थ (मध्यम) स्वरका