Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 219 of 770

Read in context
Page 219
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    २१७

हों, ऐसी) हो, उसका गोबर यज्ञके कार्यमें नहीं लाना चाहिये, ऐसी शास्त्रकी आज्ञा है। विप्रवर ! जो पतङ्ग आदि भयंकर जीव सदा आकाशमें उड़ते रहते हैं, उनपर प्रहार करनेके लिये वेदीसे मिट्टी उठानेका विधान है। स्रुवाके मूलभागसे अथवा कुशसे वेदीपर रेखा करनी चाहिये। इसका उद्देश्य है अस्थि, कण्टक, तुष-केशादिसे शुद्धि। ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। द्विजश्रेष्ठ ! सब देवता और पितर जलस्वरूप हैं, अतः विधिज्ञ ऋषि-मुनियोंने जलसे वेदीका प्रोक्षण करनेकी आज्ञा दी है। सौभाग्यवती स्त्रियोंके द्वारा ही अग्नि लानेका विधान है। शुभदायक मृण्मय पात्रको जलसे धोकर उसमें अग्नि रखकर लानी चाहिये। वेदीपर रखा हुआ अमृतकलश दैत्योंद्वारा हड़प लिया गया, यह देखकर ब्रह्मा आदि सब देवताओंने वेदीकी रक्षाके लिये उसपर समिधासहित अग्निकी स्थापना की। नारद ! यज्ञसे दक्षिण दिशामें दानव आदि स्थित होते हैं; अतः उनसे यज्ञकी रक्षाके लिये ब्रह्माको यज्ञवेदीसे दक्षिण दिशामें स्थापित करना चाहिये। नारद! उत्तर दिशामें प्रणीता-प्रोक्षणी आदि सब यज्ञपात्र रखे। पश्चिममें यजमान रहे और पूर्वदिशामें सब ब्राह्मणोंको रहना चाहिये। जुएमें, व्यापारमें और यज्ञकर्ममें यदि कर्ता उदासीनचित्त हो जाय तो उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है—यही वास्तविक स्थिति है। यज्ञकर्ममें अपनी ही शाखाके विद्वान् ब्राह्मणोंको ब्रह्मा और आचार्य बनाना चाहिये। अन्य ऋत्विजोंके लिये कोई नियम नहीं है, यथालाभ उनका पूजन करना चाहिये। तीन-तीन अंगुलकी दो पवित्री होनी चाहिये। चार अंगुलकी एक प्रोक्षणी, तीन अंगुलकी एक आज्यस्थाली और छः अंगुलकी चरुस्थाली होनी चाहिये। दो अंगुलका एक उपयमन कुश और एक अंगुलका सम्मार्जन कुश रखे। स्रुव छः अंगुलका और स्रुच् साढ़े तीन अंगुलका बताया गया है। समिधाएँ प्रादेशमात्र (अँगूठेसे लेकर तर्जनीके शिरोभागतकके नापकी) हों। पूर्णपात्र छः अंगुलका हो। प्रोक्षणीके उत्तर भागमें प्रणीता-पात्र रहे और वह आठ अंगुलका हो। जो कोई भी तीर्थ (सरोवर), समुद्र और सरिताएँ हैं, वे सब प्रणीता-पात्रमें स्थित होते हैं; अतः उसे जलसे भर दे। द्विजश्रेष्ठ ! वस्त्रहीन वेदी नग्न कही जाती है; अतः विद्वान् पुरुष उसके चारों ओर कुश बिछाकर उसके ऊपर अग्निस्थापन करे। इन्द्रका वज्र, विष्णुका चक्र और महादेवजीका त्रिशूल—ये तीनों कुशरूपसे तीन 'पवित्रच्छेदन' बनते हैं। पवित्रीसे ही प्रोक्षणीको प्रणीताके जलसे संयुक्त करना चाहिये। अतः पवित्र-निर्माण अत्यन्त पुण्यदायक कर्म कहा गया है। आज्यस्थाली पलमात्रकी बनानी चाहिये। कुम्हारके चाकपर गढ़ा हुआ मिट्टीका पात्र 'आसुर' कहा गया है। वही हाथसे बनाया हुआ—स्थालीपात्र आदि हो तो उसे 'दैविक' माना गया है। स्रुवसे शुभ और अशुभ सभी कर्म होते हैं। अतः उसकी पवित्रताके लिये उसे अग्निमें तपानेका विधान है। स्रुवको यदि अग्रभागकी ओरसे थाम लिया जाय तो स्वामीकी मृत्यु होती है। मध्यमें पकड़ा जाय तो प्रजा एवं संततिका नाश होता है और मूलभागमें उसे पकड़नेसे होताकी मृत्यु होती है; अतः विचार कर उसे हाथमें धारण करना चाहिये। अग्नि, सूर्य, सोम, विरञ्चि (ब्रह्माजी), वायु तथा यम—ये छः देवता स्रुवके एक-एक अंगुलमें स्थित हैं। अग्नि भोग और धनका नाश करनेवाले हैं, सूर्य रोगकारक होते हैं। चन्द्रमाका कोई फल नहीं है। ब्रह्माजी सब कामना देनेवाले हैं, वायुदेव वृद्धिदाता हैं और यमराज मृत्युदायक माने गये हैं (अतः स्रुवको मूलभागकी ओर तीन