संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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संहिता विभक्त हो, उसे पादवृत्त स्वरका शास्त्रोक्त लक्षण समझना चाहिये।
'जात्य' स्वरका उदाहरण है—'स जात्येन' इत्यादि। शृष्टी+अग्ने=शृष्ट्यग्ने आदि स्थलोंमें 'क्षैप्र' स्वर है। 'वे मन्वत' इत्यादिमें 'अभिनिहित' स्वर जानना चाहिये। उ+ऊतये=ऊतये, वि+ईतये=वीतये इत्यादिमें 'तैरव्यञ्जन' नामक स्वर है। 'विस्कभिते विस्कभिते' आदि स्थलोंमें 'तिरोविराम' है। 'हि इन्द्र गिर्वणः'='हीन्द्र०' इत्यादिमें 'प्रश्लिष्ट' स्वर है। 'क ईम् क ईं वेद' इत्यादिमें 'पादवृत्त' नामक स्वर है। इस प्रकार ये सब सात स्वर हैं।
जात्य स्वरोंको छोड़कर एक पूर्ववर्ती उदात्त अक्षरसे परे जो भी अक्षर हो, उसकी स्वरित संज्ञा होती है। यह स्वरितका सामान्य लक्षण बताया जाता है। पूर्वोक्त चार स्वर उदात्त अथवा एक अनुदात्त परे रहनेपर शास्त्रतः 'कम्प' उत्पन्न करते हैं। (जिसका स्वरूप चल हो, उस स्वरका नाम कम्प है) इसका उदाहरण है 'जुह्वग्निः।' 'उप त्वा जुहू', 'उप त्वा जुह्वो मम' इत्यादि। पूर्वपद 'इ'कारान्त हो और परे 'उ'कारकी स्थिति हो तो मेधावी पुरुष वहाँ 'ह्रस्व कम्प' जाने—इसमें संशय नहीं है। यदि 'उ'कारद्वययुक्त पद परे हो तो इकारान्त पदमें दीर्घ कम्प जानना चाहिये। इसका दृष्टान्त है—'शग्ध्यूषू' इत्यादि। तीन दीर्घ कम्प जानने चाहिये, जो संध्यक्षरोंमें होते हैं। उनके क्रमशः उदाहरण ये हैं—मन्या। पथ्या। न इन्द्राभ्याम्। शेष ह्रस्व कहे गये हैं। जब अनेक उदात्तोंके बाद कोई अनुदात्त प्रत्यय हो तो एक उदात्त परे रहते दूसरे-तीसरे उदात्तकी 'शिवकम्प' संज्ञा होती है अर्थात् वह शिवकम्पसंज्ञक आद्युदात्त होता है। किंतु वह उदात्त प्रत्यय होना चाहिये। जहाँ दो, तीन, चार आदि उदात्त अक्षर हों, नीच—अनुदात्त हो और उससे पूर्व उच्च अर्थात् उदात्त हो और वह भी पूर्ववर्ती उदात्त या उदात्तोंसे परे हो तो वहाँ विद्वान् पुरुष 'उदात्त' मानते हैं। रेफ या 'ह'कारमें कहीं द्वित्व नहीं होता—दो रेफ या दो 'ह'कारका प्रयोग एक साथ नहीं होता। कवर्ग आदि वर्गोंके दूसरे और चौथे अक्षरोंमें भी कभी द्वित्व नहीं होता। वर्गके चौथे अक्षरको तीसरेके द्वारा और दूसरेको प्रथमके द्वारा पीडित न करे। आदि, मध्य और अन्त्य (क, ग, ङ आदि)—को अपने ही अक्षरसे पीडित (संयुक्त) करे। यदि संयोगदशामें अनन्त्य (जो अन्तिम वर्ण नहीं है, वह 'ग'कार आदि) वर्ण पहले हो और 'न'कारादि अन्त्य वर्ण बादमें हो तो मध्यमें यम (य व र ल ञ म ङ ण न) अक्षर स्थित होता है, वह पूर्ववर्ती अक्षरका सवर्ण हुआ करता है। पूर्ववर्ती श ष स तथा य र ल व—इन अक्षरोंसे संयुक्त वर्गान्त्य वर्णोंको देखकर यम निवृत्त हो जाते हैं—ठीक वैसे ही, जैसे चोर-डाकुओंको देखकर राही अपने मार्गसे लौट जाते हैं। संहितामें जब वर्गके तीसरे और चौथे अक्षर संयुक्त हों तो पदकालमें चतुर्थ अक्षरसे ही आरम्भ करके उत्तर पद होगा। दूसरे, तीसरे और 'ह'कार — इन सबका संयोग हो तो उत्तरपद हकारादि ही होगा। अनुस्वार, उपध्मानीय तथा जिह्वामूलीयके अक्षर किसी पदमें नहीं जाते, उनका दो बार उच्चारण नहीं होता। यदि पूर्वमें र या ह अक्षरसे संयोग हो तो परवर्ती अक्षरका द्वित्व हो जाता है। जहाँ संयोगमें स्वरित हो तथा उद्धृत (नीचेसे ऊपर जाने)—में और पतन (ऊँचेसे नीचे जाने)—में स्वरित हो, वहाँ पूर्वाङ्गको आदिमें करके (नीचमें उच्चत्व लाकर) पराङ्गके आदिमें स्वरितका संनिवेश करे। संयोगके विरत (विभक्त) होनेपर जो उत्तरपदसे असंयुक्त व्यञ्जन दिखायी दे, उसे पूर्वाङ्ग जानना चाहिये तथा जिस