संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context२०६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
हुए स्वरका नाम 'मध्यम' होता है। नाभिसे उठी हुई वायु वक्ष, हृदय, कण्ठ और सिरसे टकराकर इन पाँचों स्थानोंसे स्वरके साथ प्रकट होती है। इसलिये उस स्वरका नाम 'पञ्चम' रखा जाता है। अन्य विद्वान् धैवत और निषाद—इन दो स्वरोंको छोड़कर शेष पाँच स्वरोंको पाँचों स्थानोंसे प्रकट मानते हैं। पाँचों स्थानोंमें स्थित होनेके कारण इन्हें सब स्थानोंमें धारण किया जाता है। षड्ज स्वर अग्निके द्वारा गाया गया है। ऋषभ ब्रह्माजीके द्वारा गाया कहा जाता है। गान्धारका गान सोमने और मध्यम स्वरका गान विष्णुने किया है। नारदजी ! पञ्चम स्वरका गान तो तुम्हींने किया है, इस बातको स्मरण करो। धैवत और निषाद—इन दो स्वरोंको तुम्बुरुने गाया है। विद्वान् पुरुषोंने ब्रह्माजीको आदि—षड्ज स्वरका देवता कहा है। ऋषभका प्रकाश तीखा और उद्दीप्त है, इसलिये अग्निदेव ही उसके देवता हैं। जिसके गान करनेपर गौएँ संतुष्ट होती हैं, वह गान्धार है और इसी कारण गौएँ ही उसकी अधिष्ठात्री देवी हैं। गान्धारको सुनकर गौएँ पास आती हैं, इसमें संदेह नहीं है। पञ्चम स्वरके देवता सोम हैं, जिन्हें ब्राह्मणोंका राजा कहा गया है। जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें बढ़ता है और कृष्णपक्षमें घटता है, उसी प्रकार स्वरग्राममें प्राप्त होनेपर जिस स्वरका ह्रास होता और वृद्धि होती है तथा इन पूर्वोत्पन्न स्वरोंकी जहाँ अतिसंधि होती है, वह धैवत है। इसीसे उसके धैवतत्वका विधान किया गया है। निषादमें सब स्वरोंका निषादन (अन्तर्भाव) होता है, इसीलिये वह निषाद कहलाता है। यह सब स्वरोंको अभिभूत कर लेता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य सब नक्षत्रोंको अभिभूत करता है; क्योंकि सूर्य ही इसके अधिदेवता हैं।
काठकी वीणा तथा गात्रवीणा—ये गान-जातिमें दो प्रकारकी वीणाएँ होती हैं। नारद! सामगानके लिये गात्रवीणा होती है, उसका लक्षण सुनो। गात्रवीणा उसे कहते हैं, जिसपर सामगान करनेवाले विद्वान् गाते हैं। वह अंगुलि और अङ्गुष्ठसे रञ्जित तथा स्वर-व्यञ्जनसे संयुक्त होती है। उसमें अपने दोनों हाथोंको संयममें रखकर उन्हें घुटनोंपर रखे और गुरुका अनुकरण करे, जिससे भिन्न बुद्धि न हो। पहले प्रणवका उच्चारण करे, फिर व्याहृतियोंका। तदनन्तर गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके सामगान प्रारम्भ करे। सब अंगुलियोंको फैलाकर स्वरमण्डलका आरोपण करे। अंगुलियोंसे अङ्गुष्ठका और अङ्गुष्ठसे अंगुलियोंका स्पर्श कदापि न करे। अंगुलियोंको बिलगाकर न रखे और उनके मूलभागका भी स्पर्श न करे, सदा उन अंगुलियोंके मध्यपर्वमें अँगूठेके अग्रभागसे स्पर्श करना चाहिये। विभागके ज्ञाता पुरुषको चाहिये कि मात्रा-द्विमात्रा-वृद्धिके विभागके लिये बायें हाथकी अंगुलियोंसे द्विमात्राका दर्शन कराता रहे। जहाँ त्रिरेखा देखी जाय, वहाँ संधिका निर्देश करे; वह पर्व है, ऐसा जानना चाहिये। शेष अन्तर-अन्तर है। साममन्त्रमें (प्रथम और द्वितीय स्वरके बीच) जौके बराबर अन्तर करे तथा ऋचाओंमें तिलके बराबर अन्तर करे। मध्यम पर्वोंमें भलीभाँति निविष्ट किये हुए स्वरोंका ही निवेश करे। विद्वान् पुरुष यहाँ शरीरके किसी अवयवको कँपाये नहीं। नीचेके अङ्ग—ऊरु, जङ्घा आदिको सुखपूर्वक रखकर उनपर दोनों हाथोंको प्रचलित परिपाटीके अनुसार रखे (अर्थात् दाहिने हाथको गायके कानके समान रखे और बायेंको उत्तानभावसे रखे)। जैसे बादलोंमें बिजली मणिमय सूत्रकी भाँति चमकती दिखायी देती है, यही विवृत्तियों (पदादि विभागों)-के छेद—बिलगाव—स्पष्ट निर्देशका दृष्टान्त है।