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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 207 of 770

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Page 207
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २०५

स्वरग्रामको ‘षाडव’ या ‘षाड्जव’ जानना चाहिये। यदि मध्यमस्वरमें पञ्चमका विराम हो और अन्तरस्वर गान्धार हो जाय तथा उसके बाद क्रमसे ऋषभ, निषाद एवं पञ्चमका उदय हो तो उस पञ्चमको भी ऐसा ही (षाडव या षाड्जव) समझे। यदि मध्यमस्वरका आरम्भ होनेपर गान्धारका आधिपत्य (वृद्धि) हो जाय, निषादस्वर बारंबार जाता-आता रहे, धैवतका एक ही बार उच्चारण होनेके कारण वह दुर्बलावस्थामें रहे तथा षड्ज और ऋषभकी अन्य पाँचोंके समान ही स्थिति हो तो उसे ‘मध्यम ग्राम’ कहते हैं। जहाँ आरम्भमें षड्ज हो और निषादका थोड़ा-सा स्पर्श किया गया हो तथा गान्धारका अधिक उच्चारण हुआ हो, साथ ही धैवतस्वरका कम्पन-पातन देखा जाता हो तथा उसके बाद दूसरे स्वरोंका यथारुचि गान किया गया हो, उसे ‘षड्जग्राम’ कहा गया है। जहाँ आरम्भमें षड्ज हो और इसके बाद अन्तरस्वर-संयुक्त काकली देखी जाती हो अर्थात् चार बार केवल निषादका ही श्रवण होता हो, पञ्चम स्वरमें स्थित उस आधारयुक्त गीतको ‘श्रुति कैशिक’ जानना चाहिये। जब पूर्वोक्त कैशिक नामक गीतको सब स्वरोंसे संयुक्त करके मध्यमसे उसका आरम्भ किया जाय और मध्यममें ही उसकी स्थापना हो तो वह ‘कैशिक मध्यम’ नामक ग्रामराग होता है। जहाँ पूर्वोक्त काकली देखी जाती हो और प्रधानता पञ्चम स्वरकी हो तथा शेष दूसरे-दूसरे स्वर सामान्य स्थितिमें हों तो कश्यप ऋषि उसे मध्यम ग्रामजनित ‘कैशिक राग’ कहते हैं। विद्वान् पुरुष ‘गा’ का अर्थ गेय मानते हैं और ‘ध’ का अर्थ कलापूर्वक बाजा बजाना कहते हैं और रेफसहित ‘व’ का अर्थ वाद्य-सामग्री कहते हैं। यही ‘गान्धर्व’ शब्दका लक्ष्यार्थ है। जो सामगान करनेवाले विद्वानोंका प्रथम स्वर है, वही वेणुका मध्यम स्वर कहा गया है। जो उनका द्वितीय स्वर है, वही वेणुका गान्धार स्वर है और जो उनका तृतीय है, वही वेणुका ऋषभ स्वर माना गया है। सामग विद्वानोंके चौथे स्वरको वेणुका षड्ज कहा गया है। उनका पञ्चम वेणुका धैवत होता है। उनके छठेको वेणुका निषाद समझना चाहिये और उनका सातवाँ ही वेणुका पञ्चम माना गया है। मोर षड्ज स्वरमें बोलता है। गायें ऋषभ स्वरमें रँभाती हैं, भेड़ और बकरियाँ गान्धार स्वरमें बोलती हैं। तथा क्रौञ्च (कुरर) पक्षी मध्यम स्वरमें बोलता है। जब साधारणरूपसे सब प्रकारके फूल खिलने लगते हैं, उस वसन्त-ऋतुमें कोयल पञ्चम स्वरमें बोलती है। घोड़ा धैवत स्वरमें हिनहिनाता है और हाथी निषाद स्वरमें चिग्घाड़ता है। षड्ज स्वर कण्ठसे प्रकट होता है। ऋषभ मस्तकसे उत्पन्न होता है, गान्धारका उच्चारण मुखसहित नासिकासे होता है और मध्यम स्वर हृदयसे प्रकट होता है। पञ्चम स्वरका उत्थान छाती, सिर और कण्ठसे होता है। धैवतको ललाटसे उत्पन्न जानना चाहिये तथा निषादका प्राकट्य सम्पूर्ण संधियोंसे होता है। षड्ज स्वर नासिका, कण्ठ, वक्षःस्थल, तालु, जिह्वा तथा दाँतोंके आश्रित है। इन छः अङ्गोंसे उसका जन्म होता है। इसलिये उसे ‘षड्ज’ कहा गया है। नाभिसे उठी हुई वायु कण्ठ और मस्तकसे टकराकर वृषभके समान गर्जना करती है। इसलिये उससे प्रकट हुए स्वरका नाम ‘ऋषभ’ है। नाभिसे उठी हुई वायु कण्ठ और सिरसे टकराकर पवित्र गन्ध लिये हुए बहती है। इस कारण उसे ‘गान्धार’ कहते हैं। नाभिसे उठी हुई वायु ऊरु तथा हृदयसे टकराकर नाभिस्थानमें आकर मध्यवर्ती होती है। अतः उससे निकले