Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
Page 2937Permalink

अपने धर्मपर दृष्टि रखनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वही यह मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ है? ।। ५१ ½ ।।
देवार्हा मानुषा भोगाः प्राप्ता असुलभा नृपैः ।। ५२ ।।
ऐश्वर्यं चोत्तमं प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया ।
जो दूसरे राजाओंके लिये दुर्लभ हैं, वे देवताओंको ही सुलभ होनेवाले मानवभोग मुझे प्राप्त हुए हैं। मैंने उत्तम ऐश्वर्य पा लिया है; अतः मुझसे उत्कृष्ट अन्त और किसका हुआ है? ।। ५२ ½ ।।
ससुहृत् सानुगश्चैव स्वर्गं गन्ताहमच्युत ।। ५३ ।।
यूयं निहतसंकल्पाः शोचन्तो वर्तयिष्यथ ।
अच्युत! मैं सुहृदों और सेवकोंसहित स्वर्गलोकमें जाऊँगा और तुमलोग भग्नमनोरथ होकर शोचनीय जीवन बिताते रहोगे ।। ५३ ½ ।।
(न मे विषादो भीमेन पादेन शिर आहतम् ।
काका वा कङ्कगृध्रा वा निधास्यन्ति पदं क्षणात् ।।)
भीमसेनने अपने पैरसे जो मेरे सिरपर आघात किया है, इसके लिये मुझे कोई खेद नहीं है; क्योंकि अभी क्षणभरके बाद कौए, कंक अथवा गृध्र भी तो इस शरीरपर अपना पैर रखेंगे।

संजय उवाच

अस्य वाक्यस्य निधने कुरुराजस्य धीमतः ।। ५४ ।।
अपतत् सुमहद् वर्षं पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् ।
संजय कहते हैं— राजन्! बुद्धिमान् कुरुराज दुर्योधनकी यह बात पूरी होते ही उसके ऊपर पवित्र सुगंधवाले पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ।। ५४ ½ ।।
अवादयन्त गन्धर्वा वादित्रं सुमनोहरम् ।। ५५ ।।
जगुश्चाप्सरसो राज्ञो यशःसम्बद्धमेव च ।
गन्धर्वगण अत्यन्त मनोहर बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ राजा दुर्योधनके सुयशसम्बन्धी गीत गाने लगीं ।।
सिद्धाश्च मुमुचुर्वाचः साधु साध्विति पार्थिव ।। ५६ ।।
ववौ च सुरभिर्वायुः पुण्यगन्धो मृदुः सुखः ।
व्यराजंश्च दिशः सर्वा नभो वैडूर्यसंनिभम् ।। ५७ ।।
राजन्! उस समय सिद्धगण बोल उठे—‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’। फिर पवित्र गन्धवाली मनोहर, मृदुल एवं सुखदायक हवा चलने लगी। सारी दिशाओंमें प्रकाश छा गया और आकाश नीलमके समान चमक उठा ।। ५६-५७ ।।
अत्यद्भुतानि ते दृष्ट्वा वासुदेवपुरोगमाः ।

Page 2938Permalink

दुर्योधनस्य पूजां तु दृष्ट्वा व्रीडामुपागमन् ॥ ५८ ॥
श्रीकृष्ण आदि सब लोग ये अद्भुत बातें और दुर्योधनकी यह पूजा देखकर बहुत लज्जित हुए ॥ ५८ ॥

हतांश्चाधर्मतः श्रुत्वा शोकार्ताः शुशुचुर्हि ते ।
भीष्मं द्रोणं तथा कर्णं भूरिश्रवसमेव च ॥ ५९ ॥
भीष्म, द्रोण, कर्ण और भूरिश्रवाको अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर सब लोग शोकसे व्याकुल हो खेद प्रकट करने लगे ॥ ५९ ॥

तांस्तु चिन्तापरान् दृष्ट्वा पाण्डवान् दीनचेतसः ।
प्रोवाचेदं वचः कृष्णो मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ ६० ॥
पाण्डवोंको दीनचित्त एवं चिन्तामग्न देख मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर घोष करनेवाले श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा— ॥ ६० ॥

नैष शक्योऽतिशीघ्रास्त्रस्ते च सर्वे महारथाः ।
ऋजुयुद्धेन विक्रान्ता हन्तुं युष्माभिराहवे ॥ ६१ ॥
‘यह दुर्योधन अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला था, अतः इसे कोई जीत नहीं सकता था और वे भीष्म, द्रोण आदि महारथी भी बड़े पराक्रमी थे। उन्हें धर्मानुकूल सरलतापूर्वक युद्धके द्वारा आपलोग नहीं मार सकते थे ॥ ६१ ॥

नैष शक्यः कदाचित् तु हन्तुं धर्मेण पार्थिवः ।
ते वा भीष्ममुखाः सर्वे महेष्वासा महारथाः ॥ ६२ ॥
‘यह राजा दुर्योधन अथवा वे भीष्म आदि सभी महाधनुर्धर महारथी कभी धर्मयुद्धके द्वारा नहीं मारे जा सकते थे ॥ ६२ ॥

मयानेकरुपायैस्तु मायायोगेन चासकृत् ।
हतास्ते सर्व एवाजौ भवतां हितमिच्छता ॥ ६३ ॥
‘आपलोगोंका हित चाहते हुए मैंने ही बारंबार मायाका प्रयोग करके अनेक उपायोंसे युद्धस्थलमें उन सबका वध किया ॥ ६३ ॥

यदि नैवंविधं जातु कुर्यां जिह्ममहं रणे ।
कुतो वो विजयो भूयः कुतो राज्यं कुतो धनम् ॥ ६४ ॥
‘यदि कदाचित् युद्धमें मैं इस प्रकार कपटपूर्ण कार्य नहीं करता तो फिर तुम्हें विजय कैसे प्राप्त होती, राज्य कैसे हाथमें आता और धन कैसे मिल सकता था? ॥ ६४ ॥

ते हि सर्वे महात्मानश्चत्वारोऽतिरथा भुवि ।
न शक्या धर्मतो हन्तुं लोकपालैरपि स्वयम् ॥ ६५ ॥
‘भीष्म, द्रोण, कर्ण और भूरिश्रवा—ये चारों महामना इस भूतपर अतिरथीके रूपमें विख्यात थे। साक्षात् लोकपाल भी धर्मयुद्ध करके उन सबको नहीं मार सकते थे ॥ ६५ ॥

तथैवायं गदापाणिर्धार्तराष्ट्रो गतक्लमः ।

Page 2939Permalink

न शक्यो धर्मतो हन्तुं कालेनापीह दण्डिना ॥ ६६ ॥
'यह गदाधारी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन भी युद्धसे थकता नहीं था, इसे दण्डधारी काल भी धर्मानुकूल युद्धके द्वारा नहीं मार सकता था ॥ ६६ ॥
न च वो हृदि कर्तव्यं यदयं घातितो रिपुः ।
मिथ्यावध्यास्तथोपायैर्बहवः शत्रवोऽधिकाः ॥ ६७ ॥
'इस प्रकार जो यह शत्रु मारा गया है इसके लिये तुम्हें अपने मनमें विचार नहीं करना चाहिये? बहुतेरे अधिक शक्तिशाली शत्रु नाना प्रकारके उपायों और कूटनीतिके प्रयोगोंद्वारा मारनेके योग्य होते हैं ॥ ६७ ॥
पूर्वै्रनुगतो मार्गो दैवैरसुरघातिभिः ।
सद्भिश्चानुगतः पन्थाः स सर्वैरनुगम्यते ॥ ६८ ॥
'असुरोंका विनाश करनेवाले पूर्ववर्ती देवताओंने इस मार्गका आश्रय लिया है। श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे चले हैं, उसका सभी लोग अनुसरण करते हैं ॥ ६८ ॥
कृतकृत्याश्च सायाह्ने निवासं रोचयामहे ।
साश्वनागरथाः सर्वे विश्रामामो नराधिपाः ॥ ६९ ॥
'अब हमलोगोंका कार्य पूरा हो गया, अतः सायंकालके समय विश्राम करनेकी इच्छा हो रही है। राजाओ! हम सब लोग घोड़े, हाथी एवं रथसहित विश्राम करें' ॥ ६९ ॥
वासुदेववचः श्रुत्वा तदानीं पाण्डवैः सह ।
पञ्चाला भृशसंहृष्टा विनेदुः सिंहसंघवत् ॥ ७० ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उस समय पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल अत्यन्त प्रसन्न हुए और सिंहसमुदायके समान दहाड़ने लगे ॥ ७० ॥
ततः प्राध्मापयन् शङ्खान् पाञ्चजन्यं च माधवः ।
हृष्टा दुर्योधनं दृष्ट्वा निहतं पुरुषर्षभ ॥ ७१ ॥
पुरुषप्रवर! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग दुर्योधनको मारा गया देख हर्षमें भरकर अपने-अपने शंख बजाने लगे। श्रीकृष्णने पांचजन्य शंख बजाया ॥
(देवदत्तं प्रहृष्टात्मा शङ्खप्रवरमर्जुनः ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ।
प्रसन्नचित्त अर्जुनने देवदत्त नामक श्रेष्ठ शंखकी ध्वनि की। कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय तथा भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनने पौण्ड्र नामक महान् शंख बजाया।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥
धृष्टद्युम्नस्तथा जैत्रं सात्यकिर्नन्दिवर्धनम् ।
तेषां नादेन महता शङ्खानां भरतर्षभ ॥
आपुपूरे नभः सर्वं पृथिवी च चचाल ह ॥

Page 2940Permalink

नकुल और सहदेवने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। धृष्टद्युम्नने जैत्र और सात्यकिने नन्दिवर्धन नामक शंखकी ध्वनि फैलायी। भरतश्रेष्ठ! उन महान् शंखोंके शब्दसे सारा आकाश भर गया और धरती डोलने लगी।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
पाण्डुसैन्येष्ववाद्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।।
अस्तुवन् पाण्डवानन्ये गीर्भिंश्च स्तुतिमङ्गलैः ।)
तत्पश्चात् पाण्डवसेनाओंमें शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाये जाने लगे। उन सबकी मिली-जुली आवाज बड़ी भयानक जान पड़ती थी। उस समय अन्य बहुत-से मनुष्य स्तुति एवं मंगलमय वचनोंद्वारा पाण्डवोंका स्तवन करने लगे।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि कृष्णपाण्डवदुर्योधनसंवादे
एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें श्रीकृष्ण, पाण्डव और दुर्योधनका संवादविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2941)

Page 2941Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विषष्टितमोऽध्यायः

पाण्डवोंका कौरव शिविरमें पहुँचना, अर्जुनके रथका दग्ध होना और पाण्डवोंका भगवान् श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजना

संजय उवाच

ततस्ते प्रययुः सर्वे निवासाय महीक्षितः ।
शङ्खान् प्रध्मापयन्तो वै हृष्टाः परिघबाहवः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर परिघके समान मोटी भुजाओंवाले सब नरेश अपना-अपना शंख बजाते हुए शिविरमें विश्राम करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक चल दिये ॥ १ ॥

पाण्डवान् गच्छतश्चापि शिविरं नो विशाम्पते ।
महेष्वासोऽन्वगात् पश्चाद् युयुत्सुः सात्यकिस्तथा ॥ २ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाश्च सर्वशः ।
सर्वे चान्ये महेष्वासाः प्रययुः शिबिराण्युत ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! हमारे शिविरकी ओर जाते हुए पाण्डवोंके पीछे-पीछे महाधनुर्धर युयुत्सु, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके सभी पुत्र तथा अन्य सब धनुर्धर योद्धा भी उन शिविरोंमें गये ॥ २-३ ॥

ततस्ते प्राविशन् पार्था हतत्विट्कं हतेश्वरम् ।
दुर्योधनस्य शिविरं रङ्गवद्विसृते जने ॥ ४ ॥
गतोत्सवं पुरमिव हृतनागमिव ह्रदम् ।
स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठं वृद्धामात्यैरधिष्ठितम् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् कुन्तीके पुत्रोंने पहले दुर्योधनके शिविरमें प्रवेश किया। जैसे दर्शकोंके चले जानेपर सूना रंगमण्डप शोभाहीन दिखायी देता है, उसी प्रकार जिसका स्वामी मारा गया था, वह शिविर उत्सवशून्य नगर और नागरहित सरोवरके समान श्रीहीन जान पड़ता था। वहाँ रहनेवाले लोगोंमें अधिकांश स्त्रियाँ और नपुंसक थे तथा बूढ़े मन्त्री अधिष्ठाता बनकर उस शिविरका संरक्षण कर रहे थे ॥ ४-५ ॥

तत्रैतान् पर्युपातिष्ठन् दुर्योधनपुरःसराः ।
कृताञ्जलिपुटा राजन् काषायमलिनाम्बराः ॥ ६ ॥
राजन्! वहाँ दुर्योधनके आगे-आगे चलनेवाले सेवकगण मलिन भगवा वस्त्र पहनकर हाथ जोड़े हुए इन पाण्डवोंके समक्ष उपस्थित हुए ॥ ६ ॥

शिविरं समनुप्राप्य कुरुराजस्य पाण्डवाः ।

Page 2942Permalink

अवतेरुर्महाराज रथेभ्यो रथसत्तमाः ॥ ७ ॥
महाराज! कुरुराजके शिबिरमें पहुँचकर रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डव अपने रथोंसे नीचे उतरे ॥ ७ ॥

ततो गाण्डीवधन्वानमभ्यभाषत केशवः ।
स्थितः प्रियहिते नित्यमतीव भरतर्षभ ॥ ८ ॥
अवरोपय गाण्डीवमक्षयौ च महेषुधी ।
अथाहमवरोक्ष्यामि पश्चाद् भरतसत्तम ॥ ९ ॥
स्वयं चैवावरोह त्वमेतच्छ्रेयस्तवानघ ।

भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सदा अर्जुनके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनसे कहा—‘भरतवंशशिरोमणे! तुम गाण्डीव धनुषको और इन दोनों बाणोंसे भरे हुए अक्षय तरकसोंको उतार लो। फिर स्वयं भी उतर जाओ! इसके बाद मैं उतरूँगा! अनघ! ऐसा करनेमें ही तुम्हारी भलाई है’ ॥

तच्चाकरोत् तथा वीरः पाण्डुपुत्रो धनंजयः ॥ १० ॥
अथ पश्चात् ततः कृष्णो रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम् ।
अवारोहत मेधावी रथाद् गाण्डीवधन्वनः ॥ ११ ॥

वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनने वह सब वैसे ही किया। तदनन्तर परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर गाण्डीवधारी अर्जुनके रथसे स्वयं भी उतर पड़े ॥ १०-११ ॥

अथावतीर्णे भूतानामीश्वरे सुमहात्मनि ।
कपिरन्तर्दधे दिव्यो ध्वजो गाण्डीवधन्वनः ॥ १२ ॥

समस्त प्राणियोंके ईश्वर परमात्मा श्रीकृष्णके उतरते ही गाण्डीवधारी अर्जुनका ध्वजस्वरूप दिव्य वानर उस रथसे अन्तर्धान हो गया ॥ १२ ॥

स दग्धो द्रोणकर्णाभ्यां दिव्यैरस्त्रैर्महारथः ।
अथादीप्तोऽग्निना ह्याशु प्रजज्वाल महीपते ॥ १३ ॥

पृथ्वीनाथ! इसके बाद अर्जुनका वह विशाल रथ, जो द्रोण और कर्णके दिव्यास्त्रोंद्वारा दग्धप्राय हो गया था, तुरंत ही आगसे प्रज्वलित हो उठा ॥ १३ ॥

सोपासङ्गः सरश्मिश्च साश्वः सयुगबन्धुरः ।
भस्मीभूतोऽपतद् भूमौ रथो गाण्डीवधन्वनः ॥ १४ ॥

गाण्डीवधारीका वह रथ उपासंग, बागडोर, जूआ, बन्धुरकाष्ठ और घोड़ोंसहित भस्म होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १४ ॥

तं तथा भस्मभूतं तु दृष्ट्वा पाण्डुसुताः प्रभो ।
अभवन् विस्मिता राजन्नर्जुनश्चेदमब्रवीत् ॥ १५ ॥
कृताञ्जलिः सप्रणयं प्रणिपत्याभिवाद्य ह ।

Page 2943Permalink

गोविन्द कस्माद् भगवन् रथो दग्धोऽयमग्निना ।। १६ ।।
किमेतन्महदाश्चर्यमभवद् यदुनन्दन ।
तन्मे ब्रूहि महाबाहो श्रोतव्यं यदि मन्यसे ।। १७ ।।
प्रभो! नरेश्वर! उस रथको भस्मीभूत हुआ देख समस्त पाण्डव आश्चर्यचकित हो उठे और अर्जुनने भी हाथ जोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें बारंबार प्रणाम करके प्रेमपूर्वक पूछा—'गोविन्द! यह रथ अकस्मात् कैसे आगसे जल गया? भगवन्! यदुनन्दन! यह कैसी महान् आश्चर्यकी बात हो गयी? महाबाहो! यदि आप सुनने-योग्य समझें तो इसका रहस्य मुझे बतावें' ।। १५—१७ ।।

वासुदेव उवाच

अस्त्रैर्बहुविधैर्दग्धः पूर्वमेवायमर्जुन ।
मदधिष्ठितत्वात् समरे न विशीर्णः परंतप ।। १८ ।।
**श्रीकृष्णने कहा—**शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन! यह रथ नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा पहले ही दग्ध हो चुका था; परंतु मेरे बैठे रहनेके कारण समरांगणमें भस्म होकर गिर न सका ।। १८ ।।
इदानीं तु विशीर्णोऽयं दग्धो ब्रह्मास्त्रतेजसा ।
मया विमुक्तः कौन्तेय त्वय्यद्य कृतकर्मणि ।। १९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2944)

Page 2944Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

युद्धके अन्तमें अर्जुनके रथका दाह

कुन्तीनन्दन! आज जब तुम अपना अभीष्ट कार्य पूर्ण कर चुके हो, तब मैंने इसे छोड़ दिया है; इसलिये पहलेसे ही ब्रह्मास्त्रके तेजसे दग्ध हुआ यह रथ इस समय बिखरकर गिर पड़ा है ॥ १९ ॥

ईषदुत्स्मयमानस्तु भगवान् केशवोऽरिहा ।
परिष्वज्य च राजानं युधिष्ठिरमभाषत ॥ २० ॥

इसके बाद शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने किंचित् मुसकराते हुए वहाँ राजा युधिष्ठिरको हृदयसे लगाकर कहा— ॥ २० ॥

दिष्ट्या जयसि कौन्तेय दिष्ट्या ते शत्रवो जिताः ।
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ २१ ॥
त्वं चापि कुशली राजन् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
मुक्ता वीरक्षयादस्मात् संग्रामान्निहतद्विषः ॥ २२ ॥

‘कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे आपकी विजय हुई और सारे शत्रु परास्त हो गये। राजन्! गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डुकुमार भीमसेन, आप और माद्रीपुत्र पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव

Page 2945Permalink

—ये सब-के-सब सकुशल हैं तथा जहाँ वीरोंका विनाश हुआ और तुम्हारे सारे शत्रु कालके गालमें चले गये, उस घोर संग्रामसे तुमलोग जीवित बच गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २१-२२ ॥

क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि भारत ।
उपायातमुपप्लव्यं सह गाण्डीवधन्वना ॥ २३ ॥
आनीय मधुपर्कं मां यत् पुरा त्वमवोचथाः ।
एष भ्राता सखा चैव तव कृष्ण धनंजयः ॥ २४ ॥
रक्षितव्यो महाबाहो सर्वास्वापत्स्विति प्रभो ।
‘भरतनन्दन! अब आगे समयानुसार जो कार्य प्राप्त हो उसे शीघ्र कर डालिये। पहले गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जब मैं उपप्लव्य नगरमें आया था, उस समय मेरे लिये मधुपर्क अर्पित करके आपने मुझसे यह बात कही थी कि ‘श्रीकृष्ण! यह अर्जुन तुम्हारा भाई और सखा है। प्रभो! महाबाहो! तुम्हें इसकी सब आपत्तियोंसे रक्षा करनी चाहिये’ ॥ २३-२४½ ॥

तव चैव ब्रुवाणस्य तथेत्येवाहमब्रुवम् ॥ २५ ॥
स सव्यसाची गुप्तस्ते विजयी च जनेश्वर ।
भ्रातृभिः सह राजेन्द्र शूरः सत्यपराक्रमः ॥ २६ ॥
मुक्तो वीरक्षयादस्मात् संग्रामाल्लोमहर्षणात् ।
‘आपने जब ऐसा कहा, तब मैंने ‘तथास्तु’ कहकर वह आज्ञा स्वीकार कर ली थी। जनेश्वर! राजेन्द्र! आपका वह शूरवीर, सत्यपराक्रमी भाई सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर विजयी हुआ है तथा वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे भाइयोंसहित जीवित बच गया है’ ॥ २५-२६½ ॥

एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २७ ॥
हृष्टरोमा महाराज प्रत्युवाच जनार्दनम् ।
महाराज! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें रोमांच हो आया। वे उनसे इस प्रकार बोले ॥ २७½ ॥

युधिष्ठिर उवाच
प्रमुक्तं द्रोणकर्णाभ्यां ब्रह्मास्त्रमरिमर्दन ॥ २८ ॥
कस्त्वदन्यः सहेत् साक्षादपि वज्री पुरंदरः ।
**युधिष्ठिरने कहा—**शत्रुमर्दन श्रीकृष्ण! द्रोणाचार्य और कर्णने जिस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था। साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी उसका आघात नहीं सह सकते थे ॥ २८½ ॥

भवतस्तु प्रसादेन संशप्तकगणा जिताः ॥ २९ ॥

Page 2946Permalink

महारणगतः पार्थो यच्च नासीत् पराङ्मुखः ।
आपकी ही कृपासे संशप्तकगण परास्त हुए हैं और कुन्तीकुमार अर्जुनने उस महासमरमें जो कभी पीठ नहीं दिखायी है, वह भी आपके ही अनुग्रहका फल है ॥ २९ १/२ ॥

तथैव च महाबाहो पर्यायैर्बहुभिर्मया ॥ ३० ॥
कर्मणामनुसंतानं तेजसश्च गतीः शुभाः ।
महाबाहो! आपके द्वारा अनेकों बार हमारे कार्योंकी सिद्धि हुई है और हमें तेजके शुभ परिणाम प्राप्त हुए हैं ॥ ३० १/२ ॥

उपप्लव्ये महर्षिर्मे कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ३१ ॥
यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः ।
उपप्लव्य नगरमें महर्षि द्वैपायनने मुझसे कहा था कि ‘जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है’ ॥ ३१ १/२ ॥

इत्येवमुक्ते ते वीराः शिविरं तव भारत ॥ ३२ ॥
प्रविश्य प्रत्यपद्यन्त कोशरत्नौघसंचयान् ।
भारत! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर पाण्डव वीरोंने आपके शिविरमें प्रवेश करके खजाना, रत्नोंकी ढेरी तथा भण्डारघरपर अधिकार कर लिया ॥ ३२ १/२ ॥

रजतं जातरूपं च मणीनथ च मौक्तिकान् ॥ ३३ ॥
भूषणान्यथ मुख्यानि कम्बलान्यजिनानि च ।
दासीदासमसंख्येयं राज्योपकरणानि च ॥ ३४ ॥
चाँदी, सोना, मोती, मणि, अच्छे-अच्छे आभूषण, कम्बल (कालीन), मृगचर्म, असंख्य दास-दासी तथा राज्यके बहुत-से सामान उनके हाथ लगे ॥ ३३-३४ ॥

ते प्राप्य धनमक्षयं त्वदीयं भरतर्षभ ।
उदक्रोशन्महाभागा नरेन्द्र विजितारयः ॥ ३५ ॥
भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! आपके धनका अक्षय भण्डार पाकर शत्रुविजयी महाभाग पाण्डव जोर-जोरसे हर्षध्वनि करने लगे ॥ ३५ ॥

ते तु वीराः समाश्वस्य वाहनान्यवमुच्य च ।
अतिष्ठन्त मुहुः सर्वे पाण्डवाः सात्यकिस्तथा ॥ ३६ ॥
वे सारे वीर अपने वाहनोंको खोलकर वहीं विश्राम करने लगे। समस्त पाण्डव और सात्यकि वहाँ एक साथ बैठे हुए थे ॥ ३६ ॥

अथाब्रवीन्महाराज वासुदेवो महायशाः ।
अस्माभिर्मङ्गलार्थाय वस्तव्यं शिबिराद् बहिः ॥ ३७ ॥
महाराज! तदनन्तर महायशस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण-ने कहा—‘आजकी रातमें हमलोगोंको अपने मंगलके लिये शिविरसे बाहर ही रहना चाहिये’ ॥ ३७ ॥

Page 2947Permalink

तथेत्युक्त्वा हि ते सर्वे पाण्डवाः सात्यकिस्तथा ।
वासुदेवेन सहिता मङ्गलार्थं बहिर्ययुः ॥ ३८ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर समस्त पाण्डव और सात्यकि श्रीकृष्णके साथ अपने मंगलके लिये छावनीसे बाहर चले गये ॥ ३८ ॥

ते समासाद्य सरितं पुण्यामोघवतीं नृप ।
न्यवसंश्च तां रात्रिं पाण्डवा हतशत्रवः ॥ ३९ ॥
नरेश्वर! जिनके शत्रु मारे गये थे, उन पाण्डवोंने उस रातमें पुण्यसलिला ओघवती नदीके तटपर जाकर निवास किया ॥ ३९ ॥

युधिष्ठिरस्ततो राजा प्राप्तकालमचिन्तयत् ।
तत्र ते गमनं प्राप्तं रोचते तव माधव ॥ ४० ॥
गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः प्रशमार्थमरिंदम ।
तब राजा युधिष्ठिरने वहाँ समयोचित कार्यका विचार किया और कहा—'शत्रुदमन माधव! एक बार क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त करनेके लिये आपका हस्तिनापुरमें जाना उचित जान पड़ता है ॥

हेतुकारणयुक्तैश्च वाक्यैः कालसमीरितैः ॥ ४१ ॥
क्षिप्रमेव महाभाग गान्धारीं प्रशमिष्यसि ।
पितामहश्च भगवान् व्यासस्तत्र भविष्यति ॥ ४२ ॥
'महाभाग! आप युक्ति और कारणोंसहित समयोचित बातें कहकर गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर सकेंगे। हमारे पितामह भगवान् व्यास भी इस समय वहीं होंगे' ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः सम्प्रेषयामासुर्यादवं नागसाह्वयम् ।
स च प्रायाज्जवेनाशु वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ४३ ॥
दारुकं रथमारोप्य येन राजाम्बिकासुतः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर पाण्डवोंने यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजा। प्रतापी वासुदेव दारुकको रथपर बिठाकर स्वयं भी बैठे और जहाँ अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र थे, वहाँ पहुँचनेके लिये बड़े वेगसे चले ॥ ४३ १/२ ॥

तमूचुः सम्प्रयास्यन्तं शैब्यसुग्रीववाहनम् ॥ ४४ ॥
प्रत्याश्वासय गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम् ।
शैब्य और सुग्रीव नामक अश्व जिनके वाहन हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णके जाते समय पाण्डवोंने फिर उनसे कहा—'प्रभो! यशस्विनी गान्धारी देवीके पुत्र मारे गये हैं; अतः आप उस दुःखिया माताको धीरज बँधावें' ॥

स प्रायात् पाण्डवैरुक्तस्तत् पुरं सात्वतां वरः ।

Page 2948Permalink

आससाद ततः क्षिप्रं गान्धारीं निहतात्मजाम् ॥ ४५ ॥
पाण्डवोंके ऐसा कहनेपर सात्वतवंशके श्रेष्ठ पुरुष भगवान् श्रीकृष्ण जिनके पुत्र मारे गये थे, उन गान्धारी देवीके पास हस्तिनापुरमें शीघ्र जा पहुँचे ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि वासुदेवप्रेषणे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें पाण्डवोंका भगवान् श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजनाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2949)

Page 2949Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिषष्टितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुनः पाण्डवोंके पास लौट आना

जनमेजय उवाच

किमर्थं द्विजशार्दूल धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
गान्धार्याः प्रेषयामास वासुदेवं परंतपम् ।। १ ।।
जनमेजयने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिरने शत्रुसंतापी भगवान् श्रीकृष्णको गान्धारी देवीके पास किसलिये भेजा? ।। १ ।।
यदा पूर्वं गतः कृष्णः शमार्थं कौरवान् प्रति ।
न च तं लब्धवान् कामं ततो युद्धमभूदिदम् ।। २ ।।
जब पूर्वकालमें श्रीकृष्ण संधि करानेके लिये कौरवोंके पास गये थे, उस समय तो उन्हें उनका अभीष्ट मनोरथ प्राप्त ही नहीं हुआ, जिससे यह युद्ध उपस्थित हुआ ।। २ ।।
निहतेषु तु योधेषु हते दुर्योधने तदा ।
पृथिव्यां पाण्डवेयस्य निःसपत्ने कृते युधि ।। ३ ।।
विद्रुते शिबिरे शून्ये प्राप्ते यशसि चोत्तमे ।
किं नु तत् कारणं ब्रह्मन् येन कृष्णो गतः पुनः ।। ४ ।।
ब्रह्मन्! जब युद्धमें सारे योद्धा मारे गये, दुर्योधनका भी अन्त हो गया, भूमण्डलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके शत्रुओंका सर्वथा अभाव हो गया, कौरवदलके लोग शिविरको सूना करके भाग गये और पाण्डवोंको उत्तम यशकी प्राप्ति हो गयी, तब कौन-सा ऐसा कारण आ गया, जिससे श्रीकृष्ण पुनः हस्तिनापुरमें गये? ।। ३-४ ।।
न चैतत् कारणं ब्रह्मन्नल्पं विप्रतिभाति मे ।
यत्रागमदमेयात्मा स्वयमेव जनार्दनः ।। ५ ।।
विप्रवर! मुझे इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं जान पड़ता, जिससे अप्रमेयस्वरूप साक्षात् भगवान् जनार्दनको ही जाना पड़ा ।। ५ ।।
तत्त्वतो वै समाचक्ष्व सर्वमध्वर्युसत्तम ।
यच्चात्र कारणं ब्रह्मन् कार्यस्यास्य विनिश्चये ।। ६ ।।
यजुर्वेदीय विद्वानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! इस कार्यका निश्चय करनेमें जो भी कारण हो, वह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये ।। ६ ।।

वैशम्पायन उवाच

Page 2950Permalink

त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो यन्मां पृच्छसि पार्थिव ।
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद् भरतर्षभ ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतकुलभूषण नरेश! तुमने जो प्रश्न किया है, वह सर्वथा उचित है। तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुझे यथार्थरूपसे बताऊँगा ।।
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे ।
व्युत्क्रम्य समयं राजन् धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ ८ ॥
अन्यायेन हतं दृष्ट्वा गदायुद्धेन भारत ।
युधिष्ठिरं महाराज महत् भयमाविशत् ॥ ९ ॥
राजन्! भरतवंशी महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र महाबली दुर्योधनको भीमसेनेने युद्धमें उसके नियमका उल्लङ्घन करके मारा है। वह गदायुद्धके द्वारा मारा गया है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके युधिष्ठिरके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। ८-९ ।।
चिन्तयानो महाभागां गान्धारीं तपसान्विताम् ।
घोरेण तपसा युक्तां त्रैलोक्यमपि सा दहेत् ॥ १० ॥
वे घोर तपस्यासे युक्त महाभागा तपस्विनी गान्धारी देवीका चिन्तन करने लगे। उन्होंने सोचा 'गान्धारी देवी कुपित होनेपर तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकती हैं' ।।
तस्य चिन्तयमानस्य बुद्धिः समभवत् तदा ।
गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः पूर्वं प्रशमनं भवेत् ॥ ११ ॥
इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा युधिष्ठिरके हृदयमें उस समय यह विचार हुआ कि पहले क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त कर देना चाहिये ।।
सा हि पुत्रवधं श्रुत्वा कृतमस्माभीरीदृशम् ।
मानसेनाग्निना क्रुद्धा भस्मसान्नः करिष्यति ॥ १२ ॥
वे हमलोगोंके द्वारा इस तरह पुत्रका वध किया गया सुनकर कुपित हो अपने संकल्पजनित अग्निसे हमें भस्म कर डालेंगी ।। १२ ।।
कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी सा सहिष्यति ।
श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्मयोधिनम् ॥ १३ ॥
उनका पुत्र सरलतासे युद्ध कर रहा था; परंतु छलसे मारा गया। यह सुनकर गान्धारी देवी इस तीव्र दुःखको कैसे सह सकेंगी? ।। १३ ।।
एवं विचिन्त्य बहुधा भयशोकसमन्वितः ।
वासुदेवमिदं वाक्यं धर्मराजोऽभ्यभाषत ॥ १४ ॥
इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके धर्मराज युधिष्ठिर भय और शोकमें डूब गये और वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ।। १४ ।।
तव प्रसादाद् गोविन्द राज्यं निहतकण्टकम् ।
अप्राप्यं मनसापीदं प्राप्तमस्माभिरच्युत ॥ १५ ॥

Page 2951Permalink

‘गोविन्द! अच्युत! जिसे मनके द्वारा भी प्राप्त करना असम्भव था, वही यह अकण्टक राज्य हमें आपकी कृपासे प्राप्त हो गया ॥ १५ ॥
प्रत्यक्षं मे महाबाहो संग्रामे लोमहर्षणे ।
विमर्दः सुमहान् प्राप्तस्त्वया यादवनन्दन ॥ १६ ॥
‘यादवनन्दन! महाबाहो! इस रोमांचकारी संग्राममें जो महान् विनाश प्राप्त हुआ था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥ १६ ॥
त्वया देवासुरे युद्धे वधार्थममरद्विषाम् ।
यथा साह्यं पुरा दत्तं हताश्च विबुधद्विषः ॥ १७ ॥
साह्यं तथा महाबाहो दत्तमस्माकमच्युत ।
सारथ्येन च वार्ष्णेय भवता हि धृता वयम् ॥ १८ ॥
‘पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जैसे आपने देवद्रोही दैत्योंके वधके लिये देवताओंकी सहायता की थी, जिससे वे सारे देवशत्रु मारे गये, महाबाहु अच्युत! उसी प्रकार इस युद्धमें आपने हमें सहायता प्रदान की है। वृष्णिनन्दन! आपने सारथिका कार्य करके हमलोगोंको बचा लिया ॥ १७-१८ ॥
यदि न त्वं भवेर्नाथः फाल्गुनस्य महारणे ।
कथं शक्यो रणे जेतुं भवेदेष बलार्णवः ॥ १९ ॥
‘यदि आप इस महासमरमें अर्जुनके स्वामी और सहायक न होते तो युद्धमें इस कौरव-सेनारूपी समुद्रपर विजय पाना कैसे सम्भव हो सकता था? ॥ १९ ॥
गदाप्रहारा विपुलाः परिघैश्चापि ताडनम् ।
शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च तोमरैः सपरश्वधैः ॥ २० ॥
अस्मत्कृते त्वया कृष्ण वाचः सुरुषाः श्रुताः ।
शस्त्राणां च निपाता वै वज्रस्पर्शोपमा रणे ॥ २१ ॥
‘श्रीकृष्ण! आपने हमलोगोंके लिये गदाओंके बहुत-से आघात सहे, परिघोंकी मार खायी; शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर और फरसोंकी चोटें सहन कीं तथा बहुत-सी कठोर बातें सुनीं। आपके ऊपर रणभूमिमें ऐसे-ऐसे शस्त्रोंके प्रहार हुए, जिनका स्पर्श वज्रके तुल्य था ॥ २०-२१ ॥
ते च ते सफला जाता हते दुर्योधनेऽच्युत ।
तत् सर्वं न यथा नश्येत् पुनः कृष्ण तथा कुरु ॥ २२ ॥
‘अच्युत! दुर्योधनके मारे जानेपर वे सारे आघात सफल हो गये। श्रीकृष्ण! अब ऐसा कीजिये, जिससे वह सारा किया-कराया कार्य फिर नष्ट न हो जाय ॥
संदेहदोलां प्राप्तं नश्चेतः कृष्ण जये सति ।
गान्धार्या हि महाबाहो क्रोधं बुद्धयस्व माधव ॥ २३ ॥

Page 2952Permalink

श्रीकृष्ण! आज विजय हो जानेपर भी हमारा मन संदेहके झूलापर झूल रहा है। महाबाहु माधव! आप गान्धारी देवीके क्रोधपर तो ध्यान दीजिये ।। २३ ।।
सा हि नित्यं महाभागा तपसोग्रेण कर्शिता ।
पुत्रपौत्रवधं श्रुत्वा ध्रुवं नः सम्प्रधक्ष्यति ।। २४ ।।
‘महाभागा गान्धारी प्रतिदिन उग्र तपस्यासे अपने शरीरको दुर्बल करती जा रही हैं। वे पुत्रों और पौत्रोंका वध हुआ सुनकर निश्चय ही हमें जला डालेंगी ।। २४ ।।
तस्याः प्रसादनं वीर प्राप्तकालं मतं मम ।
कश्च तां क्रोधताम्राक्षीं पुत्रव्यसनकर्शिताम् ।। २५ ।।
वीक्षितुं पुरुषः शक्तस्त्वामृते पुरुषोत्तम ।
‘वीर! अब उन्हें प्रसन्न करनेका कार्य ही मुझे समयोचित जान पड़ता है। पुरुषोत्तम! आपके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो पुत्रोंके शोकसे दुर्बल हो क्रोधसे लाल आँखें करके बैठी हुई गान्धारी देवीकी ओर आँख उठाकर देख सके ।। २५ १/२ ।।
तत्र मे गमनं प्राप्तं रोचते तव माधव ।। २६ ।।
गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः प्रशमार्थमरिंदम ।
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले माधव! इस समय क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त करनेके लिये आपका वहाँ जाना ही मुझे उचित जान पड़ता है ।।
त्वं हि कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाप्ययः ।। २७ ।।
हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैः कालसमीरितैः ।
क्षिप्रमेव महाबाहो गान्धारीं शमयिष्यसि ।। २८ ।।
‘महाबाहो! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और संहारक हैं। आप ही सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। आप युक्ति और कारणोंसे संयुक्त समयोचित वचनोंद्वारा गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर देंगे ।। २७-२८ ।।
पितामहश्च भगवान् कृष्णस्तत्र भविष्यति ।
सर्वथा ते महाबाहो गान्धार्याः क्रोधनाशनम् ।। २९ ।।
कर्तव्यं सात्वतां श्रेष्ठ पाण्डवानां हितार्थिना ।
‘हमारे पितामह श्रीकृष्णद्वैपायन भगवान् व्यास भी वहीं होंगे। महाबाहो! सात्वतवंशके श्रेष्ठ पुरुष! आप पाण्डवोंके हितैषी हैं। आपको सब प्रकारसे गान्धारी देवीके क्रोधको शान्त कर देना चाहिये’ ।। २९ १/२ ।।
धर्मराजस्य वचनं श्रुत्वा यदुकुलोद्वहः ।। ३० ।।
आमन्त्र्य दारुकं प्राह रथः सज्जो विधीयताम् ।
धर्मराजकी यह बात सुनकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने दारुकको बुलाकर कहा—‘रथ तैयार करो’ ।। ३० १/२ ।।
केशवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणोऽथ दारुकः ।। ३१ ।।

Page 2953Permalink

न्यवेदयद् रथं सज्जं केशवाय महात्मने ।
केशवका यह आदेश सुनकर दारुकने बड़ी उतावलीके साथ रथको सुसज्जित किया और उन महात्माको इसकी सूचना दी ॥ ३१ १/२ ॥
तं रथं यादवश्रेष्ठः समारुह्य परंतपः ॥ ३२ ॥
जगाम हास्तिनपुरं त्वरितः केशवो विभुः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले यादवश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही उस रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरकी ओर चल दिये ॥ ३२ १/२ ॥
ततः प्रायान्महाराज माधवो भगवान् रथी ॥ ३३ ॥
नागसाह्वयमासाद्य प्रविवेश च वीर्यवान् ।
महाराज! पराक्रमी भगवान् माधव उस रथपर बैठकर हस्तिनापुरमें जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया ॥ ३३ १/२ ॥
प्रविश्य नगरं वीरो रथघोषेण नादयन् ॥ ३४ ॥
विदितो धृतराष्ट्रस्य सोऽवतीर्य रथोत्तमात् ।
अभ्यगच्छददीनात्मा धृतराष्ट्रनिवेशनम् ॥ ३५ ॥
नगरमें प्रविष्ट होकर वीर श्रीकृष्ण अपने रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। धृतराष्ट्रको उनके आगमनकी सूचना दी गयी और वे अपने उत्तम रथसे उतरकर मनमें दीनता न लाते हुए धृतराष्ट्रके महलमें गये ॥ ३४-३५ ॥
पूर्वं चाभिगतं तत्र सोऽपश्यदृषिसत्तमम् ।
पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य राज्ञश्चापि जनार्दनः ॥ ३६ ॥
अभ्यवादयदव्यग्रो गान्धारीं चापि केशवः ।
वहाँ उन्होंने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको पहलेसे ही उपस्थित देखा। व्यास तथा राजा धृतराष्ट्र दोनोंके चरण दबाकर जनार्दन श्रीकृष्णने बिना किसी व्यग्रताके गान्धारी देवीको प्रणाम किया ॥ ३६ १/२ ॥
ततस्तु यादवश्रेष्ठो धृतराष्ट्रमधोक्षजः ॥ ३७ ॥
पाणिमालम्ब्य राजेन्द्र सुस्वरं प्ररुरोद ह ।
राजेन्द्र! तदनन्तर यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रका हाथ अपने हाथमें लेकर उन्मुक्त स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे ॥
स मुहूर्तादिवोत्सृज्य बाष्पं शोकसमुद्भवम् ॥ ३८ ॥
प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे ह्याचम्य च यथाविधि ।
उवाच प्रस्तुतं वाक्यं धृतराष्ट्रमरिंदमः ॥ ३९ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् वृद्धस्य तव भारत ।
कालस्य च यथावृत्तं तत् ते सुविदितं प्रभो ॥ ४० ॥

Page 2954Permalink

उन्होंने दो घड़ीतक शोकके आँसू बहाकर शुद्ध जलसे नेत्र धोये और विधिपूर्वक आचमन किया। तत्पश्चात् शत्रुदमन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रसे प्रस्तुत वचन कहा—‘भारत! आप वृद्ध पुरुष हैं; अतः कालके द्वारा जो कुछ भी संघटित हुआ और हो रहा है, वह कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है। प्रभो! आपको सब कुछ अच्छी तरह विदित है ॥ ३८—४० ॥

यतितं पाण्डवैः सर्वैस्तव चित्तानुरोधिभिः ।
कथं कुलक्षयो न स्यात्तथा क्षत्रस्य भारत ॥ ४१ ॥
‘भारत! समस्त पाण्डव सदासे ही आपकी इच्छाके अनुसार बर्ताव करनेवाले हैं। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया कि किसी तरह हमारे कुलका तथा क्षत्रियसमूहका विनाश न हो ॥ ४१ ॥

भ्रातृभिः समयं कृत्वा क्षान्तवान् धर्मवत्सलः ।
द्यूतच्छलजितैः शुद्धैर्वनवासो ह्युपागतः ॥ ४२ ॥
‘धर्मवत्सल युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ नियत समयकी प्रतीक्षा करते हुए सारा कष्ट चुपचाप सहन किया था। पाण्डव शुद्धभावसे आपके पास आये थे तो भी उन्हें कपटपूर्वक जूएमें हराकर वनवास दिया गया ॥ ४२ ॥

अज्ञातवासचर्या च नानावेषसमावृतैः ।
अन्ये च बहवः क्लेशात् त्वशक्तैरिव सर्वदा ॥ ४३ ॥
‘उन्होंने नाना प्रकारके वेशोंमें अपनेको छिपाकर अज्ञातवासका कष्ट भोगा। इसके सिवा और भी बहुत-से क्लेश उन्हें असमर्थ पुरुषोंके समान सदा सहन करने पड़े हैं ॥ ४३ ॥

मया च स्वयमागम्य युद्धकाल उपस्थिते ।
सर्वलोकस्य सांनिध्ये ग्रामांस्त्वं पञ्च याचितः ॥ ४४ ॥
‘जब युद्धका अवसर उपस्थित हुआ, उस समय मैंने स्वयं आकर शान्ति स्थापित करनेके लिये सब लोगोंके सामने आपसे केवल पाँच गाँव माँगे थे ॥ ४४ ॥

त्वया कालोपसृष्टेन लोभतो नापवर्जिताः ।
तवापराधान्नृपते सर्वं क्षत्रं क्षयं गतम् ॥ ४५ ॥
‘परंतु कालसे प्रेरित हो आपने लोभवश वे पाँच गाँव भी नहीं दिये। नरेश्वर! आपके अपराधसे समस्त क्षत्रियोंका विनाश हो गया ॥ ४५ ॥

भीष्मेण सोमदत्तेन बाह्लीकेन कृपेण च ।
द्रोणेन च सपुत्रेण विदुरेण च धीमता ॥ ४६ ॥
याचितस्त्वं शमं नित्यं न च तत् कृतवानसि ।
‘भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और बुद्धिमान् विदुरजीने भी सदा आपसे शान्तिके लिये याचना की थी; परंतु आपने वह कार्य नहीं किया ॥ ४६½ ॥

Page 2955Permalink

कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुह्यन्ति भारत ।। ४७ ।।
यथा मूढो भवान् पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते ।
किमन्यत् कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम् ।। ४८ ।।
'भारत! जिनका चित्त कालके प्रभावसे दूषित हो जाता है, वे सब लोग मोहमें पड़ जाते हैं। जैसे कि पहले युद्धकी तैयारीके समय आपकी भी बुद्धि मोहित हो गयी थी। इसे कालयोगके सिवा और क्या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है ।। ४७-४८ ।।
मा च दोषान् महाप्राज्ञ पाण्डवेषु निवेशय ।
अल्पोऽप्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ४९ ।।
धर्मतो न्यायतश्चैव स्नेहतश्च परंतप ।
'महाप्राज्ञ! आप पाण्डवोंपर दोषारोपण न कीजियेगा। परंतप! धर्म, न्याय और स्नेहकी दृष्टिसे महात्मा पाण्डवोंका इसमें थोड़ा-सा भी अपराध नहीं है ।। ४९ १/२ ।।
एतत् सर्वं तु विज्ञाय ह्यात्मदोषकृतं फलम् ।। ५० ।।
असूयां पाण्डुपुत्रेषु न भवान् कर्तुमर्हति ।
'यह सब अपने ही अपराधोंका फल है, ऐसा जानकर आपको पाण्डवोंके प्रति दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ।। ५० १/२ ।।
कुलं वंशश्च पिण्डाश्च यच्च पुत्रकृतं फलम् ।। ५१ ।।
गान्धार्यास्तव वै नाथ पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ।
'अब तो आपका कुल और वंश पाण्डवोंसे ही चलनेवाला है। नाथ! आपको और गान्धारी देवीको पिण्डा-पानी तथा पुत्रसे प्राप्त होनेवाला सारा फल पाण्डवोंसे ही मिलनेवाला है। उन्हींपर यह सब कुछ अवलम्बित है ।। ५१ १/२ ।।
त्वं चैव कुरुशार्दूल गान्धारी च यशस्विनी ।। ५२ ।।
मा शुचो नरशार्दूल पाण्डवान् प्रति किल्बिषम् ।
'कुरुप्रवर! पुरुषसिंह! आप और यशस्वी गान्धारी-देवी कभी पाण्डवोंकी बुराई करनेकी बात न सोचें ।।
एतत् सर्वमनुध्याय आत्मनश्च व्यतिक्रमम् ।। ५३ ।।
शिवेन पाण्डवान् पाहि नमस्ते भरतर्षभ ।
'भरतश्रेष्ठ! इन सब बातों तथा अपने अपराधोंका चिन्तन करके आप पाण्डवोंके प्रति कल्याण-भावना रखते हुए उनकी रक्षा करें। आपको नमस्कार है ।। ५३ १/२ ।।
जानासि च महाबाहो धर्मराजस्य या त्वयि ।। ५४ ।।
भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ।

Page 2956Permalink

‘महाबाहो! भरतवंशके सिंह! आप जानते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें आपके प्रति कितनी भक्ति और कितना स्वाभाविक स्नेह है ।। ५४ १/२ ।।
एतच्च कदनं कृत्वा शत्रूणामपकारिणाम् ।। ५५ ।।
दह्यते स दिवा रात्रौ न च शर्माधिगच्छति ।
‘अपने अपराधी शत्रुओंका ही यह संहार करके वे दिन-रात शोककी आगमें जलते हैं, कभी चैन नहीं पाते हैं ।। ५५ १/२ ।।
त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् ।। ५६ ।।
स शोचन् नरशार्दूलः शान्तिं नैवाधिगच्छति ।
‘पुरुषसिंह! आप और यशस्विनी गान्धारी देवीके लिये निरन्तर शोक करते हुए नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको शान्ति नहीं मिल रही है ।। ५६ १/२ ।।
ह्रिया च परयाऽऽविष्टो भवन्तं नाधिगच्छति ।। ५७ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम् ।
‘आप पुत्रशोकसे सर्वथा संतप्त हैं। आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हैं। ऐसी दशामें वे अत्यन्त लज्जित होनेके कारण आपके सामने नहीं आ रहे हैं’ ।। ५७ १/२ ।।
एवमुक्त्वा महाराज धृतराष्ट्रं यदूत्तमः ।। ५८ ।।
उवाच परमं वाक्यं गान्धारीं शोककर्शिताम् ।
महाराज! यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शोकसे दुर्बल हुई गान्धारी देवीसे यह उत्तम वचन बोले— ।। ५८ १/२ ।।
सौबलेयि निबोध त्वं यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।। ५९ ।।
त्वत्समा नास्ति लोकेऽस्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे ।
‘सुबलनन्दिनि! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो और समझो। शुभे! इस संसारमें तुम्हारी-जैसी तपोबल-सम्पन्न स्त्री दूसरी कोई नहीं है ।। ५९ १/२ ।।
जानासि च यथा राज्ञि सभायां मम संनिधौ ।। ६० ।।
धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयोः पक्षयोर्हितम् ।
उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयैः कृतम् ।। ६१ ।।
‘रानी! तुम्हें याद होगा, उस दिन सभामें मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षोंका हित करनेवाला धर्म और अर्थयुक्त वचन कहा था, किन्तु कल्याणि! तुम्हारे पुत्रोंने उसे नहीं माना ।। ६०-६१ ।।
दुर्योधनस्त्वया चोक्तो जयार्थी परुषं वचः ।
शृणु मूढ वचो मह्यं यतो धर्मस्ततो जयः ।। ६२ ।।
‘तुमने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दुर्योधनको सम्बोधित करके उससे बड़ी रुखाईके साथ कहा था—‘ओ मूढ़! मेरी बात सुन ले, जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी जीत