महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1757)
सप्तविंशोऽध्यायः
अर्जुनद्वारा राजा श्रुतंजय, सौश्रुति, चन्द्रदेव और सत्यसेन आदि महारथियोंका वध एवं संशप्तक-सेनाका संहार
संजय उवाच
श्वेताश्वोऽथ महाराज व्यधमत्तावकं बलम् ।
यथा वायुः समासाद्य तूलराशिं समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! एक ओर श्वेतवाहन अर्जुन आपकी सेनाको उसी प्रकार छिन्न-भिन्न कर रहे थे, जैसे वायु रूईके ढेरको पाकर उसे सब ओर बिखेर देती है ॥ १ ॥
प्रत्युद्ययुस्त्रिगर्त्तास्तं शिबयः कौरवैः सह ।
शाल्वाः संशप्तकाश्चैव नारायणबलं च तत् ॥ २ ॥
उस समय उनका सामना करनेके लिये त्रिगर्त, शिबि, कौरवोंसहित शाल्व, संशप्तकगण तथा नारायणी-सेनाके सैनिक आगे बढ़े ॥ २ ॥
सत्यसेनश्चन्द्रदेवो मित्रदेवः श्रुतंजयः ।
सौश्रुतिश्चित्रसेनश्च मित्रवर्मा च भारत ॥ ३ ॥
त्रिगर्तराजः समरे भ्रातृभिः परिवारितः ।
पुत्रैश्चैव महेष्वासैर्नानाशस्त्रविशारदैः ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, श्रुतंजय, सौश्रुति, चित्रसेन तथा मित्रवर्मा— इन सात भाइयों तथा नाना प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारमें कुशल महाधनुर्धर पुत्रोंसे घिरा हुआ त्रिगर्तराज सुशर्मा समरांगणमें उपस्थित हुआ ॥
ते सृजन्तः शरव्रातान् किरन्तोऽर्जुनमाहवे ।
अभ्यवर्तन्त सहसा वार्योघा इव सागरम् ॥ ५ ॥
वे सभी वीर युद्धस्थलमें अर्जुनपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए जैसे जलका प्रवाह समुद्रकी ओर जाता है, उसी प्रकार सहसा उनके सामने आ पहुँचे ॥ ५ ॥
ते त्वर्जुनं समासाद्य योधाः शतसहस्रशः ।
अगच्छन् विलयं सर्वे तार्क्ष्यं दृष्ट्वेव पन्नगाः ॥ ६ ॥
परंतु जैसे गरुड़को देखते ही सर्प अपने प्राण खो देते हैं, उसी प्रकार वे सब-के-सब लाखों योद्धा अर्जुनके पास पहुँचते ही कालके गालमें चले गये ॥ ६ ॥
ते हन्यमानाः समरे नाजहुः पाण्डवं रणे ।
हन्यमाना महाराज शलभा इव पावकम् ॥ ७ ॥
जैसे पतंगे जलते रहनेपर भी आगमें टूटे पड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें मारे जानेपर भी वे समस्त योद्धा युद्धमें पाण्डुकुमार अर्जुनको छोड़कर भाग न सके ।। ७ ।।
सत्यसेनस्त्रिभिर्बाणैर्विव्याध युधि पाण्डवम् ।
मित्रदेवस्त्रिषष्ट्या तु चन्द्रदेवस्तु सप्तभिः ।। ८ ।।
मित्रवर्मा त्रिसप्तत्या सौश्रुतिश्चापि सप्तभिः ।
श्रुतंजयस्तु विंशत्या सुशर्मा नवभिः शरैः ।। ९ ।।
सत्यसेनने तीन, मित्रदेवने तिरसठ, चन्द्रदेवने सात, मित्रवर्माने तिहत्तर, सौश्रुतिने सात, श्रुतंजयने बीस तथा सुशर्माने नौ बाणोंसे युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र अर्जुनको बींध डाला ।। ८-९ ।।
स विद्धो बहुभिः संख्ये प्रतिविव्याध तान् नृपान् ।
सौश्रुतिं सप्तभिर्विद्ध्वा सत्यसेनं त्रिभिः शरैः ।। १० ।।
इस प्रकार रणभूमिमें बहुसंख्यक योद्धाओंन्द्वारा घायल किये जानेपर बदलेमें अर्जुनने भी उन सभी नरेशोंको क्षत-विक्षत कर दिया। उन्होंने सौश्रुतिको सात बाणोंसे घायल करके सत्यसेनको तीन बाण मारे ।। १० ।।
श्रुतंजयं च विंशत्या चन्द्रदेवं तथाष्टभिः ।
मित्रदेवं शतेनैव श्रुतसेनं त्रिभिः शरैः ।। ११ ।।
नवभिर्मित्रवर्माणं सुशर्माणं तथाष्टभिः ।
श्रुतंजयको बीस, चन्द्रदेवको आठ, मित्रदेवको सौ, श्रुतसेन (चित्रसेन)-को तीन, मित्रवर्माको नौ तथा सुशर्माको आठ बाणोंसे घायल कर दिया ।। ११ १/२ ।।
श्रुतंजयं च राजानं हत्वा तत्र शिलाशितैः ।। १२ ।।
सौश्रुतेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ।
त्वरितश्चन्द्रदेवं च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।। १३ ।।
फिर सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कई बाणोंसे राजा श्रुतंजयका वध करके सौश्रुतिके शिरस्त्राणसहित सिरको धड़से अलग कर दिया। फिर तुरंत ही चन्द्रदेवको भी अपने बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ।। १२-१३ ।।
तथैतरान् महाराज यतमानान् महारथान् ।
पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरेकैकं प्रत्यवारयत् ।। १४ ।।
महाराज! इसी प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील अन्य महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाण मारकर रोक दिया ।। १४ ।।
सत्यसेनस्तु संक्रुद्धस्तोमरं व्यसृजन्महत् ।
समुद्दिश्य रणे कृष्णं सिंहनादं ननाद च ।। १५ ।।
तब सत्यसेनने अत्यन्त कुपित होकर रणभूमिमें श्रीकृष्णको लक्ष्य करके एक विशाल तोमरका प्रहार किया और सिंहके समान गर्जना की ।। १५ ।।
स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महात्मनः ।
अयस्मयो हेमदण्डो जगाम धरणीं तदा ॥ १६ ॥
सुवर्णमय दण्डवाला वह लोहनिर्मित तोमर महात्मा श्रीकृष्णकी बायीं भुजापर चोट करके तत्काल धरतीपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥
माधवस्य तु विद्धस्य तोमरेण महारणे ।
प्रतोदः प्रापतद्धस्ताद् रश्मयश्च विशाम्पते ॥ १७ ॥
प्रजानाथ! उस महासमरमें तोमरसे घायल हुए श्रीकृष्णके हाथसे चाबुक और बागडोर गिर पड़ी ॥ १७ ॥
वासुदेवं विभिन्नाङ्गं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः ।
क्रोधमाहारयत्तीव्रं कृष्णं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णके शरीरमें घाव देखकर कुन्तीकुमार अर्जुन-को बड़ा क्रोध हुआ। वे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥
प्रापयाश्वान् महाबाहो सत्यसेनं प्रति प्रभो ।
यावदेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ १९ ॥
‘प्रभो! महाबाहो! आप घोड़ोंको सत्यसेनके निकट पहुँचाइये। मैं अपने तीखे बाणोंसे पहले इसीको यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १९ ॥
प्रतोदं गृह्य सोऽन्यत्तु रश्मीनपि यथा पुरा ।
वाहयामास तानश्वान् सत्यसेनरथं प्रति ॥ २० ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने दूसरा चाबुक लेकर पूर्ववत् घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और उन घोड़ोंको सत्यसेनके रथके समीप पहुँचा दिया ॥ २० ॥
विष्वक्सेनं तु निर्भिन्नं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः ।
सत्यसेनं शरैस्तीक्ष्णैर्वारयित्वा महारथः ॥ २१ ॥
ततः सुनिशितैर्भल्लै राज्ञस्तस्य महच्छिरः ।
कुण्डलोपचितं कायाच्चकर्त पृतनान्तरे ॥ २२ ॥
कुन्तीकुमार महारथी अर्जुनने श्रीकृष्णको घायल हुआ देख सत्यसेनको तीखे बाणोंसे रोककर तेज धारवाले भल्लोंसे सेनाके मध्यभागमें उस राजकुमारके कुण्डलमण्डित महान् मस्तकको धड़से काट डाला ॥ २१-२२ ॥
तन्निकृत्य शितैर्बाणैर्मित्रवर्माणमाक्षिपत् ।
वत्सदन्तेन तीक्ष्णेन सारथिं चास्य मारिष ॥ २३ ॥
मान्यवर! सत्यसेनको मारकर तीखे बाणोंद्वारा मित्रवर्माको और एक पैने वत्सदन्तसे उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २३ ॥
ततः शरशतैर्भूयः संशप्तकगणान् बली ।
पातयामास संक्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २४ ॥
तदनन्तर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए बलवान् अर्जुनने पुनः हजारों और सैकड़ों संशप्तकगणोंको सैकड़ों बाणोंसे मारकर धरतीपर सुला दिया ॥ २४ ॥
ततो रजतपुङ्खेन राजञ्छीर्षं महात्मनः ।
मित्रदेवस्य चिच्छेद क्षुरप्रेण महारथः ॥ २५ ॥
राजन्! फिर महारथी धनंजयने रजतमय पंखवाले क्षुरप्रसे महामना मित्रदेवके मस्तकको काट डाला ॥ २५ ॥
सुशर्माणं सुसंक्रुद्धो जत्रुदेशे समाहनत् ।
ततः संशप्तकाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ॥ २६ ॥
शस्त्रौघैर्ममृदुः क्रुद्धा नादयन्तो दिशो दश ।
साथ ही अत्यन्त कुपित होकर अर्जुनने सुशर्माके गलेकी हँसलीपर भी गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो क्रोधमें भरे हुए सभी संशप्तक दसों दिशाओंको अपनी गर्जनासे प्रतिध्वनित करते हुए अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा पीड़ा देने लगे ॥ २६ १/२ ॥
अभ्यर्दितस्तु तैर्जिष्णुः शक्रतुल्यपराक्रमः ॥ २७ ॥
ऐन्द्रमस्त्रममेयात्मा प्रादुश्चक्रे महारथः ।
उनसे पीड़ित होकर इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी अर्जुनने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया ॥ २७ १/२ ॥
ततः शरसहस्राणि प्रादुरासन् विशाम्पते ॥ २८ ॥
ध्वजानां छिद्यमानानां कार्मुकाणां च मारिष ।
रथानां सपताकानां तूणीराणां युगैः सह ॥ २९ ॥
अक्षाणामथ चक्राणां योक्त्राणां रश्मिभिः सह ।
कूबराणां वरूथानां पूष्त्कानां च संयुगे ॥ ३० ॥
अश्वानां पततां चापि प्रासानाम्ऋष्टिभिः सह ।
गदानां परिघानां च शक्तितोमरपट्टिशैः ॥ ३१ ॥
शतघ्नीनां सचक्राणां भुजानां चोरुभिः सह ।
कण्ठसूत्राङ्गदानां च केयूराणां च मारिष ॥ ३२ ॥
हाराणामथ निष्काणां तनूत्राणां च भारत ।
छत्राणां व्यजनानां च शिरसां मुकुटैः सह ॥ ३३ ॥
अश्रूयत महाशब्दस्तत्र तत्र विशाम्पते ।
प्रजानाथ! फिर तो वहाँ हजारों बाण प्रकट होने लगे। माननीय भरतवंशी प्रजापालक नरेश! उस समय कट-कटकर गिरनेवाले ध्वज, धनुष, रथ, पताका, तरकस, जूए, धुरे, पहिये, जोत, बागडोर, कूबर, वरूथ (रथका चर्ममय आवरण), बाण, घोड़े, प्रास, ऋष्टि, गदा, परिघ, शक्ति, तोमर, पट्टिश, चक्रयुक्त शतघ्नी, बाँह-जाँघ, कण्ठसूत्र, अंगद, केयूर, हार, निष्क, कवच, छत्र, व्यजन और मुकुटसहित मस्तकोंका महान् शब्द युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ सब ओर सुनायी देने लगा ।। २८—३३ १/२ ।।
सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च ।। ३४ ।।
शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे ।
पृथ्वीपर गिरे हुए कुण्डल और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मस्तक आकाशमें ताराओंके समूहकी भाँति दिखायी देते थे ।। ३४ १/२ ।।
सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च ।। ३५ ।।
शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले ।
वहाँ मारे गये राजाओंके सुन्दर हारोंसे सुशोभित, उत्तम वस्त्रोंसे सम्पन्न तथा चन्दनसे चर्चित शरीर पृथ्वीपर पड़े देखे जाते थे ।। ३५ १/२ ।।
गन्धर्वनगराकारं घोरमायोधनं तदा ।। ३६ ।।
निहतै राजपुत्रैश्च क्षत्रियैश्च महाबलैः ।
उस समय वहाँ मारे गये राजकुमारों तथा महाबली क्षत्रियोंकी लाशोंसे वह युद्धस्थल गन्धर्वनगरके समान भयानक जान पड़ता था ।। ३६ १/२ ।।
हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरङ्गैश्चाभवन्मही ।। ३७ ।।
अगम्यरूपा समरे विशीर्णैरिव पर्वतैः ।
समरांगणमें टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हुए हाथियों और घोड़ोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना-फिरना असम्भव हो गया था ।। ३७ १/२ ।।
नासीच्चक्रपथस्तत्र पाण्डवस्य महात्मनः ।। ३८ ।।
निघ्नतः शात्रवान् भल्लैर्हस्त्यश्वं चास्यतो महत् ।
अपने भल्लोंसे शत्रुसैनिकों तथा उनके हाथी-घोड़ेके महान् समुदायको मारते-गिराते हुए महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके रथके पहियोंके लिये मार्ग नहीं मिलता था ।। ३८ १/२ ।।
आतङ्कादिव सीदन्ति रथचक्राणि मारिष ।। ३९ ।।
चरतस्तस्य संग्रामे तस्मिंल्लोहितकर्दमे ।
मान्यवर! उस संग्राममें रक्तकी कीच मच गयी थी। उसमें विचरते हुए अर्जुनके रथके पहिये मानो भयसे शिथिल होते जा रहे थे ।। ३९ १/२ ।।
सीदमानानि चक्राणि समूहुस्तुरगा भृशम् ।। ४० ।।
श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ।
मन और वायुके समान वेगशाली घोड़े भी वहाँ धँसते हुए पहियोंको बड़े परिश्रमसे खींच पाते थे ।। ४० १/२ ।।
वध्यमानं तु तत् सैन्यं पाण्डुपुत्रेण धन्विना ।। ४१ ।।
प्रायशो विमुखं सर्वं नावतिष्ठत भारत ।
धनुर्धर पाण्डुकुमारकी मार खाकर आपकी वह सारी सेना प्राय: पीठ दिखाकर भाग चली। वहाँ क्षणभरके लिये भी ठहर न सकी ।। ४१ १/२ ।।
ताञ्जित्वा समरे जिष्णुः संशप्तकगणान् बहून् ।। ४२ ।।
विरराज तदा पार्थो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।। ४३ ।।
उस समय समरांगणमें उन बहुसंख्यक संशप्तकगणोंको परास्त करके विजयी कुन्तीकुमार अर्जुन धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान शोभा पा रहे थे ।। ४२-४३ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संशप्तकजये सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संशप्तकोंकी पराजयविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७ ।।
अर्जुनके द्वारा मित्रसेनका शिरश्छेद