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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1969)

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कर्ण और भीमसेनका युद्ध तथा कर्णका पलायन

संजय उवाच

तानभिद्रवतो दृष्ट्वा पाण्डवांस्तावकं बलम् ।
दुर्योधनो महाराज वारयामास सर्वशः ॥ १ ॥
योधांश्च स्वबलं चैव समन्ताद् भरतर्षभ ।
क्रोशतस्तव पुत्रस्य न स्म राजन् न्यवर्तत ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! पाण्डवोंको आपकी सेनापर आक्रमण करते देख दुर्योधनने सब ओरसे सब प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा उन योद्धाओंको रोकने तथा अपनी सेनाको भी स्थिर करनेका प्रयत्न किया। भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! आपके पुत्रके बहुत चीखने-चिल्लानेपर भी भागती हुई सेना पीछे न लौटी ॥ १-२ ॥

ततः पक्षः प्रपक्षश्च शकुनिश्चापि सौबलः ।
तदा सशस्त्राः कुरवो भीममभ्यद्रवन् रणे ॥ ३ ॥
तदनन्तर व्यूहके पक्ष और प्रपक्षभागमें खड़े हुए सैनिक, सुबलपुत्र शकुनि तथा सशस्त्र कौरववीर उस समय रणक्षेत्रमें भीमसेनपर टूट पड़े ॥ ३ ॥

कर्णोऽपि दृष्ट्वा द्रवतो धार्तराष्ट्रान् सराजकान् ।
मद्रराजमुवाचेदं याहि भीमरथं प्रति ॥ ४ ॥
उधर कर्णने भी राजा दुर्योधन और उसके सैनिकोंको भागते देख मद्रराज शल्यसे कहा—‘भीमसेनके रथके समीप चलो’ ॥ ४ ॥

एवमुक्तश्च कर्णेन शल्यो मद्राधिपस्तदा ।
हंसवर्णान् हयानग्र्यान् प्रैषीद् यत्र वृकोदरः ॥ ५ ॥
कर्णके ऐसा कहनेपर मद्रराज शल्यने हंसके समान श्वेत वर्णवाले श्रेष्ठ घोड़ोंको उधर ही हाँक दिया, जहाँ भीमसेन खड़े थे ॥ ५ ॥

ते प्रेरिता महाराज शल्येनाहवशौभिना ।
भीमसेनरथं प्राप्य समसज्जन्त वाजिनः ॥ ६ ॥
महाराज! संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यसे संचालित हो वे घोड़े भीमसेनके रथके समीप जाकर पाण्डव-सेनामें मिल गये ॥ ६ ॥

दृष्ट्वा कर्णं समायान्तं भीमः क्रोधसमन्वितः ।
मतिं चक्रे विनाशाय कर्णस्य भरतर्षभ ॥ ७ ॥
भरतश्रेष्ठ! कर्णको आते देख क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने उसके विनाशका विचार किया ॥ ७ ॥

सोऽब्रवीत् सात्यकिं वीरं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ।
यूयं रक्षत राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥
संशयान्महतो मुक्तं कथंचित् प्रेक्षतो मम ।
उन्होंने वीर सात्यकि तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नसे कहा—'तुमलोग धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो। वे अभी-अभी मेरे देखते-देखते किसी प्रकार महान् प्राण-संकटसे मुक्त हुए हैं ॥ ८ १/२ ॥
अग्रतो मे कृतो राजा छिन्नसर्वपरिच्छदः ॥ ९ ॥
दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थं राधेयेन दुरात्मना ।
'दुरात्मा राधापुत्र कर्णने दुर्योधनकी प्रसन्नताके लिये मेरे सामने ही धर्मराजकी समस्त युद्ध-सामग्रीको छिन्न-भिन्न कर डाला है ॥ ९ १/२ ॥
अन्तमद्य गमिष्यामि तस्य दुःखस्य पार्षत ॥ १० ॥
हन्तास्म्यद्य रणे कर्णं स वा मां निहनिष्यति ।
संग्रामेण सुघोरेण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ११ ॥
'द्रुपदकुमार! इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है; अतः अब मैं उसका बदला लूँगा। आज रणभूमिमें अत्यन्त घोर संग्राम करके या तो मैं ही कर्णको मार डालूँगा या वही मेरा वध करेगा; यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ १०-११ ॥
राजानमद्य भवतां न्यासभूतं ददानि वै ।
तस्य संरक्षणे सर्वे यतध्वं विगतज्वराः ॥ १२ ॥
'इस समय राजाको धरोहरके रूपमें मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम सब लोग निश्चिन्त होकर इनकी रक्षाके लिये पूर्ण प्रयत्न करना' ॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुः प्रायादाधिरथिं प्रति ।
सिंहनादेन महता सर्वाः संनादयन् दिशः ॥ १३ ॥
ऐसा कहकर महाबाहु भीमसेन अपने महान् सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए सूतपुत्र कर्णकी ओर बढ़े ॥ १३ ॥
दृष्ट्वा त्वरितमायान्तं भीमं युद्धाभिनन्दिनम् ।
सूतपुत्रमथोवाच मद्राणामीश्वरो विभुः ॥ १४ ॥
युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको बड़ी उतावलीके साथ आते देख मद्रदेशके स्वामी शक्तिशाली शल्यने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ १४ ॥

शल्य उवाच

पश्य कर्ण महाबाहुं संक्रुद्धं पाण्डुनन्दनम् ।
दीर्घकालार्जितं क्रोधं मोक्तुकामं त्वयि ध्रुवम् ॥ १५ ॥

**शल्य बोले—**कर्ण! क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन महाबाहु भीमसेनको देखो, जो दीर्घकालसे संचित किये हुए क्रोधको आज तुम्हारे ऊपर छोड़नेका दृढ़ निश्चय किये हुए हैं॥ १५॥
ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदाचन ।
अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे च घटोत्कचे ॥ १६ ॥
कर्ण! अभिमन्यु तथा घटोत्कच राक्षसके मारे जानेपर भी पहले कभी मैंने इनका ऐसा रूप नहीं देखा था॥ १६॥
त्रैलोक्यस्य समस्तस्य शक्तः क्रुद्धो निवारणे ।
बिभर्ति सदृशं रूपं युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ १७ ॥
ये इस समय कुपित हो समस्त त्रिलोकीको रोक देनेमें समर्थ हैं; क्योंकि प्रलयकालके अग्निके समान तेजस्वी रूप धारण कर रहे हैं॥ १७॥

संजय उवाच

इति ब्रुवति राधेयं मद्राणामीश्वरे नृप ।
अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ॥ १८ ॥
**संजय कहते हैं—**नरेश्वर! मद्रराज शल्य राधापुत्र कर्णसे ऐसी बातें कह ही रहे थे कि क्रोधसे प्रज्वलित हुए भीमसेन उसके सामने आ पहुँचे॥ १८॥
अथागतं तु सम्प्रेक्ष्य भीमं युद्धाभिनन्दिनम् ।
अब्रवीद् वचनं शल्यं राधेयः प्रहसन्निव ॥ १९ ॥
युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको सामने आया देख हँसते हुए-से राधापुत्र कर्णने शल्यसे इस प्रकार कहा— ॥ १९॥
यदुक्तं वचनं मेऽद्य त्वया मद्रजनेश्वर ।
भीमसेनं प्रति विभो तत् सत्यं नात्र संशयः ॥ २० ॥
'मद्रराज! प्रभो! आज तुमने भीमसेनके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह सर्वथा सत्य है—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥
एष शूरश्च वीरश्च क्रोधनश्च वृकोदरः ।
निरपेक्षः शरीरे च प्राणतश्च बलाधिकः ॥ २१ ॥
'ये भीमसेन शूरवीर, क्रोधी, अपने शरीर और प्राणों-का मोह न करनेवाले तथा अधिक बलशाली हैं॥ २१॥
अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा ।
द्रौपद्याः प्रियकामेन केवलं बाहुसंश्रयात् ॥ २२ ॥
गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ।

‘विराटनगरमें अज्ञातवास करते समय इन्होंने द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे छिपे-छिपे जाकर केवल बाहुबलसे कीचकको उसके साथियोंसहित मार डाला था ।। २२१/२ ।।
सोऽद्य संग्रामशिरसि संनद्धः क्रोधमूर्च्छितः ।। २३ ।।
किं करोद्यतदण्डेन मृत्युनापि व्रजेद् रणम् ।
‘वे ही आज क्रोधसे आतुर हो कवच बाँधकर युद्धके मुहानेपर उपस्थित हैं; परंतु क्या ये दण्ड धारण किये यमराजके साथ भी युद्धके लिये रणभूमिमें उतर सकते हैं?’ ।। २३१/२ ।।
चिरकालाभिलषितो मामयं तु मनोरथः ।। २४ ।।
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद् धनंजयः ।
स मे कदाचिदद्यैव भवेद् भीमसमागमात् ।। २५ ।।
‘मेरे हृदयमें दीर्घकालसे यह अभिलाषा बनी हुई है कि समरांगणमें अर्जुनका वध करूँ अथवा वे ही मुझे मार डालें। कदाचित् भीमसेनके साथ समागम होनेसे मेरी वह इच्छा आज ही पूरी हो जाय ।। २४-२५ ।।
निहते भीमसेने वा यदि वा विरथीकृते ।
अभियास्यति मां पार्थस्तन्मे साधु भविष्यति ।। २६ ।।
अत्र यन्मन्यसे प्राप्तं तच्छीघ्रं सम्प्रधारय ।
‘यदि भीमसेन मारे गये अथवा रथहीन कर दिये गये तो अर्जुन अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे, जो मेरे लिये अधिक अच्छा होगा। तुम जो यहाँ उचित समझते हो, वह शीघ्र निश्चय करके बताओ’ ।। २६१/२ ।।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राधेयस्यामितौजसः ।। २७ ।।
उवाच वचनं शल्यः सूतपुत्रं तथागतम् ।
अमित शक्तिशाली राधापुत्र कर्णका यह वचन सुनकर राजा शल्यने सूतपुत्रसे उस अवसरके लिये उपयुक्त वचन कहा— ।। २७१/२ ।।
अभियाहि महाबाहो भीमसेनं महाबलम् ।। २८ ।।
निरस्य भीमसेनं तु ततः प्राप्स्यसि फाल्गुनम् ।
‘महाबाहो! तुम महाबली भीमसेनपर चढ़ाई करो। भीमसेनको परास्त कर देनेपर निश्चय ही अर्जुनको अपने सामने पा जाओगे ।। २८१/२ ।।
यस्ते कामोऽभिलषितश्चिरात् प्रभृति हृद्गतः ।। २९ ।।
स वै सम्पत्स्यते कर्ण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
‘कर्ण! तुम्हारे हृदयमें चिरकालसे जो अभीष्ट मनोरथ संचित है, वह निश्चय ही सफल होगा, यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ’ ।। २९१/२ ।।
एवमुक्ते ततः कर्णः शल्यं पुनरभाषत ।। ३० ।।

हन्ताहमर्जुनं संख्ये मां वा हन्याद् धनंजयः ।
युद्धे मनः समाधाय याहि यत्र वृकोदरः ॥ ३१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर कर्णने शल्यसे फिर कहा—'मद्रराज! मैं युद्धमें अर्जुनको मारूँ या अर्जुन ही मुझे मार डालें। इस उद्देश्यसे युद्धमें मन लगाकर जहाँ भीमसेन हैं, उधर ही चलो' ॥ ३०-३१ ॥

संजय उवाच

ततः प्रायाद् रथेनाशु शल्यस्तत्र विशाम्पते ।
यत्र भीमो महेष्वासो व्यद्रावयत वाहिनीम् ॥ ३२ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! तदनन्तर शल्य रथके द्वारा तुरंत ही वहाँ जा पहुँचे, जहाँ महाधनुर्धर भीमसेन आपकी सेनाको खदेड़ रहे थे ॥ ३२ ॥
ततस्तूर्यनिनादश्च भेरीणां च महास्वनः ।
उदतिष्ठच्च राजेन्द्र कर्णभीमसमागमे ॥ ३३ ॥
राजेन्द्र! कर्ण और भीमसेनका संघर्ष उपस्थित होनेपर फिर तूर्य और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी ॥ ३३ ॥
भीमसेनोऽथ संक्रुद्धस्तस्य सैन्यं दुरासदम् ।
नाराचैर्विमलैस्तीक्ष्णैर्दिशः प्राद्रावयद् बली ॥ ३४ ॥
बलवान् भीमसेनने अत्यन्त कुपित होकर चमचमाते हुए तीखे नाराचोंसे आपकी दुर्जय सेनाको सम्पूर्ण दिशाओंमें खदेड़ दिया ॥ ३४ ॥
स संनिपातस्तुमुलो घोररूपो विशाम्पते ।
आसीद् रौद्रो महाराज कर्णपाण्डवयोधें ॥ ३५ ॥
प्रजानाथ! महाराज! कर्ण और भीमसेनके उस युद्धमें बड़ी भयंकर, भीषण और घोर मार-काट हुई ॥
ततो मुहूर्ताद् राजेन्द्र पाण्डवः कर्णमाद्रवत् ।
समापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥ ३६ ॥
आजघान सुसंक्रुद्धो नाराचेन स्तनान्तरे ।
पुनश्चैनममेयात्मा शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३७ ॥
राजेन्द्र! पाण्डुपुत्र भीमसेनने दो ही घड़ीमें कर्णपर आक्रमण कर दिया। उन्हें अपनी ओर आते देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए धर्मात्मा वैकर्तन कर्णने एक नाराचद्वारा उनकी छातीमें प्रहार किया। फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उस वीरने उन्हें अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ३६-३७ ॥
स विद्धः सूतपुत्रेण छादयामास पत्रिभिः ।
विव्याध निशितैः कर्णं नवभिर्नतपर्वभिः ॥ ३८ ॥

सूतपुत्रके द्वारा घायल होनेपर उन्होंने भी उसे बाणोंसे आच्छादित कर दिया और झुकी हुई गाँठवाले नौ तीखे बाणोंसे कर्णको बींध डाला ॥ ३८ ॥

तस्य कर्णो धनुर्मध्ये द्विधा चिच्छेद पत्रिभिः ।
अथैनं छिन्नधन्वानं प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ३९ ॥
नाराचेन सुतीक्ष्णेन सर्वावरणभेदिना ।

तब कर्णने कई बाण मारकर भीमसेनके धनुषके बीचसे ही दो टुकड़े कर दिये। धनुष कट जानेपर उनकी छातीमें समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले अत्यन्त तीखे नाराचसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३९ ½ ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय सूतपुत्रं वृकोदरः ॥ ४० ॥
राजन् मर्मसु मर्मज्ञो विव्याध निशितैः शरैः ।
ननाद बलवन्नादं कम्पयन्निव रोदसी ॥ ४१ ॥

राजन्! मर्मज्ञ भीमसेनने दूसरा धनुष लेकर सूतपुत्रके मर्मस्थानोंमें पैने बाणोंद्वारा प्रहार किया और पृथ्वी तथा आकाशको कँपाते हुए-से उन्होंने बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४०-४१ ॥

तं कर्णः पञ्चविंशत्या नाराचेन समर्पयत् ।
मदोत्कटं वने दृप्तमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ ४२ ॥

कर्णने भीमसेनको पचीस नाराच मारे, मानो किसी शिकारीने वनमें दर्पयुक्त मदोन्मत्त गजराजपर उल्काओंद्वारा प्रहार किया हो ॥ ४२ ॥

ततः सायकभिन्नाङ्गः पाण्डवः क्रोधमूर्च्छितः ।
संरम्भामर्षताम्राक्षः सूतपुत्रवधेप्सया ॥ ४३ ॥
स कार्मुके महावेगं भारसाधनमुत्तमम् ।
गिरीणामपि भेत्तारं सायकं समयोजयत् ॥ ४४ ॥

फिर कर्णके बाणोंसे सारा शरीर घायल हो जानेके कारण पाण्डुपुत्र भीमसेन क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे। रोष और अमर्षसे उनकी आँखें लाल हो गयीं। उन्होंने सूतपुत्रके वधकी इच्छासे अपने धनुषपर एक अत्यन्त वेगशाली, भारसाधनमें समर्थ, उत्तम और पर्वतोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले बाणका संधान किया ॥ ४३-४४ ॥

विकृष्य बलवच्चापमाकर्णादतिमारुतिः ।
तं मुमोच महेष्वासः क्रुद्धः कर्णजिघांसया ॥ ४५ ॥

फिर हनुमान्‌जीसे भी अधिक पराक्रम प्रकट करनेवाले महाधनुर्धर भीमसेनने धनुषको जोर-जोरसे कानतक खींचकर कर्णको मार डालनेकी इच्छासे उस बाणको क्रोधपूर्वक छोड़ दिया ॥ ४५ ॥

स विसृष्टो बलवता बाणो वज्राशनिस्वनः ।
अदारयद् रणे कर्णं वज्रवेगो यथाचलम् ॥ ४६ ॥

बलवान् भीमसेनके हाथसे छूटकर वज्र और विद्युत्‌के समान शब्द करनेवाले उस बाणने रणभूमिमें कर्णको चीर डाला, मानो वज्रके वेगने पर्वतको विदीर्ण कर दिया हो ।।
स भीमसेनाभिहतः सूतपुत्रः कुरुद्वह ।
निषसाद रथोपस्थे विसंज्ञः पृतनापतिः ॥ ४७ ॥
कुरुश्रेष्ठ! भीमसेनकी गहरी चोट खाकर सेनापति सूतपुत्र कर्ण अचेत हो रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गया ।।
(रुधिरेणावसिक्ताङ्गो गतासुवदरिंदमः ।
एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा मद्रराजो वृकोदरम् ।।
जिह्वां छेत्तुं समायान्तं सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ।
उसका सारा शरीर रक्तसे सिंच गया। शत्रुओंका दमन करनेवाला वह वीर प्राणहीन-सा हो गया था। इसी समय भीमसेनको कर्णकी जीभ काटनेके लिये आते देख मद्रराज शल्यने उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा।

शल्य उवाच
भीमसेन महाबाहो यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।
वचनं हेतुसम्पन्नं श्रुत्वा चैतत् तथा कुरु ॥
शल्य बोले— महाबाहु भीमसेन! मैं तुमसे जो युक्तियुक्त वचन कह रहा हूँ, उसे सुनो और सुनकर उसका पालन करो।
अर्जुनेन प्रतिज्ञातो वधः कर्णस्य शुष्मिणः ।।
तां तथा कुरु भद्रं ते प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ।
अर्जुनने पराक्रमी कर्णके वधकी प्रतिज्ञा की है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सव्यसाची अर्जुनके उस प्रतिज्ञाको सफल करो।

भीम उवाच
दृढव्रतत्वं पार्थस्य जानामि नृपसत्तम ।
राज्ञस्तु धर्षणं पापः कृतवान् मम संनिधौ ।।
ततः कोपाभिभूतेन शेषं न गणितं मया ।
भीमसेनने कहा— नृपश्रेष्ठ! मैं अर्जुनकी दृढ़-प्रतिज्ञाको जानता हूँ; परंतु इस पापी कर्णने मेरे समीप ही राजा युधिष्ठिरका तिरस्कार किया है, अतः क्रोधके वशीभूत होकर मैंने और किसी बातकी परवा नहीं की है।
पतिते चापि राधेये न मे मन्युः शमं गतः ।।
जिह्वोद्धरणमेवास्य प्राप्तकालं मतं मम ।
यद्यपि राधापुत्र कर्ण गिर गया है तो भी मेरा क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ है। मैं तो इस समय इसकी जीभ खींच लेना ही उचित समझता हूँ।

अनेन सुनृशंसेन समवेतेषु राजसु ।।
अस्माकं शृण्वतां कृष्णा यानि वाक्यानि मातुल ।
असह्यानि च नीचेन बहूनि श्रावितानि भोः ।।
नूनं चैतत् परिज्ञातं दूरस्थस्यापि पार्थिव ।
छेदनं चास्य जिह्वायास्तदेवाकाङ्क्षितं मया ।।
मामाजी! इस नीच नृशंसने जहाँ बहुत-से राजा एकत्र हुए थे, वहाँ हमारे सुनते हुए द्रौपदीके प्रति बहुत-से असह्य कटुवचन सुनाये थे। राजन्! आप दूर होनेपर भी निश्चय ही यह समझ गये हैं कि मेरे द्वारा इसकी जीभ काटी जानेवाली है। वास्तवमें इस समय मैंने इसकी जीभ काटनेकी ही इच्छा की थी।
राज्ञस्तु प्रियकामेन कालोऽयं परिपालितः ।
भवता तु यदुक्तोऽस्मि वाक्यं हेत्वर्थसंहितम् ।।
तद् गृहीतं महाराज कटुकस्थमिवौषधम् ।
केवल राजा युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये मैंने आजतक प्रतीक्षा की है। महाराज! आपने जो युक्तियुक्त बात मुझसे कही है, उसे कड़वी दवाके समान मैंने ग्रहण कर लिया है।
हीनप्रतिज्ञो बीभत्सुर्न हि जीवेत् कहिंचित् ।।
अस्मिन् विनष्टे नष्टाः स्मः सर्व एव सकेशवाः ।
क्योंकि यदि अर्जुनकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी तो वे कभी जीवित नहीं रह सकेंगे; उनके नष्ट होनेपर श्रीकृष्णसहित हम सब लोग भी नष्ट ही हो जायँगे।
अद्य चैव नृशंसात्मा पापः पापकृतां वरः ।।
गमिष्यति पराभावं दृष्टमात्रः किरीटिना ।
आज किरीटधारी अर्जुनकी दृष्टि पड़ते ही यह पापाचारियोंमें श्रेष्ठ पापात्मा क्रूर कर्ण पराभवको प्राप्त हो जायगा।
युधिष्ठिरस्य कोपेन पूर्वं दग्धो नृशंसकृत् ।।
त्वया संरक्षितस्त्वस्य मत्समीपादुपायतः ॥)
यह नृशंस कर्ण महाराज युधिष्ठिरके क्रोधसे पहले ही दग्ध हो चुका था। आज आपने उचित उपायद्वारा मेरे निकटसे इसकी रक्षा कर ली है।
ततो मद्राधिपो दृष्ट्वा विसंज्ञं सूतनन्दनम् ।
अपोवाह रथेनाजौ कर्णमाहवशोभिनम् ।। ४८ ।।
तदनन्तर मद्रराज शल्य संग्राममें शोभा पानेवाले सूतपुत्र कर्णको अचेत हुआ देख रथके द्वारा युद्धस्थलसे दूर हटा ले गये ।। ४८ ।।
ततः पराजिते कर्णे धातराष्ट्रीं महाचमूम् ।
व्यद्रावयद् भीमसेनो यथेन्द्रो दानवान् पुरा ।। ४९ ।।

कर्णके पराजित हो जानेपर भीमसेन दुर्योधनकी विशाल सेनाको पुनः खदेड़ने लगे। ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने दानवोंको मार भगाया था ।। ४९ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णपलायने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका पलायनविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)