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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

॥ सौप्तिकपर्व सम्पूर्णम् ॥

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तदनन्तर यह सारा जगत् पुनः सुस्थिर हो गया। देवताओंने सारे हविष्यो॑मेंसे महादेवजीके लिये भाग नियत किया॥ २३॥

तस्मिन् क्रुद्धेऽभवत् सर्वमसुस्थं भुवनं प्रभो।
प्रसन्ने च पुनः सुस्थं प्रसन्नोऽस्य च वीर्यवान्॥ २४॥
राजन्! भगवान् शंकरके कुपित होनेपर सारा जगत् डाँवाडोल हो गया था और उनके प्रसन्न होनेपर वह पुनः सुस्थिर हो गया। वे ही शक्तिशाली भगवान् शिव अश्वत्थामापर प्रसन्न हो गये थे॥ २४॥

ततस्ते निहताः सर्वे तव पुत्रा महारथाः।
अन्ये च बहवः शूराः पाञ्चालस्य पदानुगाः॥ २५॥
इसीलिये उसने आपके सभी महारथी पुत्रों तथा पांचालराजका अनुसरण करनेवाले अन्य बहुत-से शूरवीरोंका वध किया है॥ २५॥

न तन्मनसि कर्तव्यं न च तद् द्रौणिना कृतम्।
महादेवप्रसादेन कुरु कार्यमनन्तरम्॥ २६॥
अतः इस बातको आप मनमें न लावें। अश्वत्थामाने यह कार्य अपने बलसे नहीं, महादेवजीकी कृपासे सम्पन्न किया है। अब आप आगे जो कुछ करना हो, वही कीजिये॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥


॥ सौप्तिकपर्व सम्पूर्णम् ॥


अनुष्टुप्बड़े श्लोकबड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपरकुल
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये७९०॥(१४)१९।८०९॥।
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१.............१
सौप्तिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या८१०॥।

स्त्रीपर्व

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⬅ विषय-सूची (TOC)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

स्त्रीपर्व

जलप्रदानिकपर्व

प्रथमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।

जनमेजय उवाच

हते दुर्योधने चैव हते सैन्ये च सर्वशः ।
धृतराष्ट्रो महाराज श्रुत्वा किमकरोन्मुने ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! दुर्योधन और उसकी सारी सेनाका संहार हो जानेपर महाराज धृतराष्ट्रने जब इस समाचारको सुना तो क्या किया? ॥ १ ॥

तथैव कौरवो राजा धर्मपुत्रो महामनाः ।
कृपप्रभृतयश्चैव किमकुर्वत ते त्रयः ॥ २ ॥
इसी प्रकार कुरुवंशी राजा महामनस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तथा कृपाचार्य आदि तीनों महारथियोंने भी इसके बाद क्या किया? ॥ २ ॥

अश्वत्थाम्नः श्रुतं कर्म शापादन््योन्यकारितात् ।
वृत्तान्तमुत्तरं ब्रूहि यदभाषत संजयः ॥ ३ ॥
अश्वत्थामाको श्रीकृष्णसे और पाण्डवोंको अश्वत्थामासे जो परस्पर शाप प्राप्त हुए थे, वहाँतक मैंने अश्वत्थामाकी करतूत सुन ली। अब उसके बादका वृत्तान्त बताइये कि संजयने धृतराष्ट्रसे क्या कहा? ॥ ३ ॥

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वैशम्पायन उवाच

हते पुत्रशते दीनं छिन्नशाखमिव द्रुमम् ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं धृतराष्ट्रं महीपतिम् ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी बोले— राजन्! अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेपर राजा धृतराष्ट्रकी दशा वैसी ही दयनीय हो गयी, जैसे समस्त शाखाओंके कट जानेपर वृक्षकी हो जाती है। वे पुत्रोंके शोकसे संतप्त हो उठे ॥ ४ ॥

ध्यानमूकत्वमापन्नं चिन्तया समभिप्लुतम् ।
अभिगम्य महाराज संजयो वाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ॥
महाराज! उन्हीं पुत्रोंका ध्यान करते-करते वे मौन हो गये, चिन्तामें डूब गये। उस अवस्थामें उनके पास जाकर संजयने इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

किं शोचसि महाराज नास्ति शोके सहायता ।
अक्षौहिण्यो हताश्चाष्टौ दश चैव विशाम्पते ॥ ६ ॥
‘महाराज! आप क्यों शोक कर रहे हैं? इस शोकमें जो आपकी सहायता कर सके, आपका दुःख बाँटा ले, ऐसा भी तो कोई नहीं बच गया है। प्रजानाथ! इस युद्धमें अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ मारी गयी हैं ॥ ६ ॥

निर्जनेयं वसुमती शून्या सम्प्रति केवला ।
नानादिग्भ्यः समागम्य नानादेश्या नराधिपाः ॥ ७ ॥
सहैव तव पुत्रेण सर्वे वै निधनं गताः ।
‘इस समय यह पृथ्वी निर्जन होकर केवल सूनी-सी दिखायी देती है। नाना देशोंके नरेश विभिन्न दिशाओंसे आकर आपके पुत्रके साथ ही सब-के-सब कालके गालमें चले गये हैं ॥ ७ ½ ॥

पितॄणां पुत्रपौत्राणां ज्ञातीनां सुहृदां तथा ।
गुरूणां चानुपूर्व्येण प्रेतकार्याणि कारय ॥ ८ ॥
‘राजन्! अब आप क्रमशः अपने चाचा, ताऊ, पुत्र, पौत्र, भाई-बन्धु, सुहृद् तथा गुरुजनोंके प्रेतकार्य सम्पन्न कराइये’ ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा करुणं वाक्यं पुत्रपौत्रवधार्दितः ।
पपात भुवि दुर्धर्षो वाताहत इव द्रुमः ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— नरेश्वर! संजयकी यह करुणाजनक बात सुनकर बेटों और पोतोंके वधसे व्याकुल हुए दुर्जय राजा धृतराष्ट्र आँधीके उखाड़े हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

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हतपुत्रो हतामात्यो हतसर्वसुहृज्जनः ।
दुःखं नूनं भविष्यामि विचरन् पृथिवीमिमाम् ॥ १० ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! मेरे पुत्र, मन्त्री और समस्त सुहृद् मारे गये। अब तो अवश्य ही मैं इस पृथ्वीपर भटकता हुआ केवल दुःख-ही-दुःख भोगूँगा ॥
किं नु बन्धुविहीनस्य जीवितेन ममाद्य वै ।
लूनपक्षस्य इव मे जराजीर्णस्य पक्षिणः ॥ ११ ॥
जिसकी पाँखें काट ली गयी हों, उस जराजीर्ण पक्षीके समान बन्धु-बान्धवोंसे हीन हुए मुझ वृद्धको अब इस जीवनसे क्या प्रयोजन है? ॥ ११ ॥
हृतराज्यो हतबन्धुर्हतचक्षुश्च वै तथा ।
न भ्राजिष्ये महाप्राज्ञ क्षीणरश्मिरिवांशुमान् ॥ १२ ॥
महामते! मेरा राज्य छिन गया, बन्धु-बान्धव मारे गये और आँखें तो पहलेसे ही नष्ट हो चुकी थीं। अब मैं क्षीण किरणोंवाले सूर्यके समान इस जगत्में प्रकाशित नहीं होऊँगा ॥
न कृतं सुहृदां वाक्यं जामदग्न्यस्य जल्पतः ।
नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ १३ ॥
मैंने सुहृदोंकी बात नहीं मानी, जमदग्निनन्दन परशुराम, देवर्षि नारद तथा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास सबने हितकी बात बतायी थी, पर मैंने किसीकी नहीं सुनी ॥ १३ ॥
सभामध्ये तु कृष्णेन यच्छ्रेयोऽभिहितं मम ।
अलं वैरेण ते राजन् पुत्रः संगृह्यतामिति ॥ १४ ॥
तच्च वाक्यमकृत्वाहं भृशं तप्यामि दुर्मतिः ।
श्रीकृष्णने सारी सभाके बीचमें मेरे भलेके लिये कहा था—'राजन्! वैर बढ़ानेसे आपको क्या लाभ है? अपने पुत्रोंको रोकिये।' उनकी उस बातको न मानकर आज मैं अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ। मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी ॥
न हि श्रोतास्मि भीष्मस्य धर्मयुक्तं प्रभाषितम् ॥ १५ ॥
दुर्योधनस्य च तथा वृषभस्येव नर्दतः ।
हाय! अब मैं भीष्मजीकी धर्मयुक्त बात नहीं सुन सकूँगा। साँड़के समान गर्जनेवाले दुर्योधनके वीरोचित वचन भी अब मेरे कानोंमें नहीं पड़ सकेंगे ॥ १५½ ॥
दुःशासनवधं श्रुत्वा कर्णस्य च विपर्ययम् ॥ १६ ॥
द्रोणसूर्योपरागं च हृदयं मे विदीर्यते ।
दुःशासन मारा गया, कर्णका विनाश हो गया और द्रोणरूपी सूर्यपर भी ग्रहण लग गया, यह सब सुनकर मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है ॥ १६½ ॥
न स्मराम्यात्मनः किंचित् पुरा संजय दुष्कृतम् ॥ १७ ॥
यस्येदं फलमद्येह मया मूढेन भुज्यते ।

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संजय! इस जन्ममें पहले कभी अपना किया हुआ कोई ऐसा पाप मुझे नहीं याद आ रहा है, जिसका मुझ मूढ़को आज यहाँ यह फल भोगना पड़ रहा है ॥ १७ १/२ ॥
नूनं व्यपकृतं किंचिन्मया पूर्वेषु जन्मसु ॥ १८ ॥
येन मां दुःखभागेषु धाता कर्मसु युक्तवान् ।
अवश्य ही मैंने पूर्वजन्मोंमें कोई ऐसा महान् पाप किया है, जिससे विधाताने मुझे इन दुःखमय कर्मोंमें नियुक्त कर दिया है ॥ १८ १/२ ॥
परिणामश्च वयसः सर्वबन्धुक्षयश्च मे ॥ १९ ॥
सुहृन्मित्रविनाशश्च दैवयोगादुपागतः ।
कोऽन्योऽस्ति दुःखिततरो मत्तोऽन्यो हि पुमान् भुवि ॥ २० ॥
अब मेरा बुढ़ापा आ गया, सारे बन्धु-बान्धवोंका विनाश हो गया और दैववश मेरे सुहृदों तथा मित्रोंका भी अन्त हो गया। भला, इस भूमण्डलमें अब मुझसे बढ़कर महान् दुःखी दूसरा कौन होगा? ॥ १९-२० ॥
तन्मामद्यैव पश्यन्तु पाण्डवाः संशितव्रताः ।
विवृतं ब्रह्मलोकस्य दीर्घमध्वानमास्थितम् ॥ २१ ॥
इसलिये कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डवलोग मुझे आज ही ब्रह्मलोकके खुले हुए विशाल मार्गपर आगे बढ़ते देखें ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य लालप्यमानस्य बहुशोकं वितन्वतः ।
शोकापहं नरेन्द्रस्य संजयो वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र जब बहुत शोक प्रकट करते हुए बारंबार विलाप करने लगे, तब संजयने उनके शोकका निवारण करनेके लिये यह बात कही— ॥ २२ ॥
शोकं राजन् व्यपनुद श्रुतास्ते वेदनिश्चयाः ।
शास्त्रागमाश्च विविधा वृद्धेभ्यो नृपसत्तम ॥ २३ ॥
सृञ्जये पुत्रशोकार्ते यदूचुर्मुनयः पुरा ।
‘नृपश्रेष्ठ राजन्! आपने बड़े-बूढ़ोंके मुखसे वे वेदोंके सिद्धान्त, नाना प्रकारके शास्त्र एवं आगम सुने हैं, जिन्हें पूर्वकालमें मुनियोंने राजा सृञ्जयको पुत्रशोकसे पीड़ित होनेपर सुनाया था, अतः आप शोक त्याग दीजिये ॥ २३ १/२ ॥
यथा यौवनजं दर्पमास्थिते तं सुते नृप ॥ २४ ॥
न त्वया सुहृदां वाक्यं ब्रुवतामवधारितम् ।
‘नरेश्वर! जब आपका पुत्र दुर्योधन जवानीके घमंडमें आकर मनमाना बर्ताव करने लगा, तब आपने हितकी बात बतानेवाले सुहृदोंके कथनपर ध्यान नहीं दिया ॥

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स्वार्थश्च न कृतः कश्चिल्लुब्धेन फलगृद्धिना ॥ २५ ॥
असिनैकधारेण स्वबुद्ध्या तु विचेष्टितम्।
प्रायशोऽवृत्तसम्पन्नाः सततं पर्युपासिताः ॥ २६ ॥
उसके मनमें लोभ था और वह राज्यका सारा लाभ स्वयं ही भोगना चाहता था, इसलिये उसने दूसरे किसीको अपने स्वार्थका सहायक या साझीदार नहीं बनाया। एक ओर धारवाली तलवारके समान अपनी ही बुद्धिसे सदा काम लिया। प्रायः जो अनाचारी मनुष्य थे, उन्हींका निरन्तर साथ किया ॥

यस्य दुःशासनो मन्त्री राधेयश्च दुरात्मवान् ।
शकुनिश्चैव दुष्टात्मा चित्रसेनश्च दुर्मतिः ॥ २७ ॥
शल्यश्च येन वै सर्वं शल्यभूतं कृतं जगत्।
'दुःशासन, दुरात्मा राधापुत्र कर्ण, दुष्टात्मा शकुनि, दुर्बुद्धि चित्रसेन तथा जिन्होंने सारे जगत्को शल्यमय (कण्टकाकीर्ण) बना दिया था वे शल्य—ये ही लोग दुर्योधनके मन्त्री थे ॥ २७ १/२ ॥

कुरुवृद्धस्य भीष्मस्य गान्धार्या विदुरस्य च ॥ २८ ॥
द्रोणस्य च महाराज कृपस्य च शरद्वतः।
कृष्णस्य च महाबाहो नारदस्य च धीमतः ॥ २९ ॥
ऋषीणां च तथान्येषां व्यासस्यामिततेजसः।
न कृतं तेन वचनं तव पुत्रेण भारत ॥ ३० ॥
'महाराज! महाबाहो! भरतनन्दन! कुरुकुलके ज्ञानवृद्ध पुरुष भीष्म, गान्धारी, विदुर, द्रोणाचार्य, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य, श्रीकृष्ण, बुद्धिमान् देवर्षि नारद, अमिततेजस्वी वेदव्यास तथा अन्य महर्षियोंकी भी बातें आपके पुत्रने नहीं मानी ॥ २८–३० ॥

न धर्मः सत्कृतः कश्चिन्नित्यं युद्धमभीप्सता।
अल्पबुद्धिरहंकारी नित्यं युद्धमिति ब्रुवन्।
क्रूरो दुर्मर्षणो नित्यमसंतुष्टश्च वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
'वह सदा युद्धकी ही इच्छा रखता था; इसलिये उसने कभी किसी धर्मका आदरपूर्वक अनुष्ठान नहीं किया। वह मन्दबुद्धि और अहंकारी था; अतः नित्य युद्ध-युद्ध ही चिल्लाया करता था। उसके हृदयमें क्रूरता भरी थी। वह सदा अमर्षमें भरा रहनेवाला, पराक्रमी और असंतोषी था (इसीलिये उसकी दुर्गति हुई है) ॥

श्रुतवानसि मेधावी सत्यवांश्चैव नित्यदा।
न मुह्यन्तीदृशाः सन्तो बुद्धिमन्तो भवादृशाः ॥ ३२ ॥
'आप तो शास्त्रोंके विद्वान्, मेधावी और सदा सत्यमें तत्पर रहनेवाले हैं। आप-जैसे बुद्धिमान् एवं साधु पुरुष मोहके वशीभूत नहीं होते हैं ॥ ३२ ॥

न धर्मः सत्कृतः कश्चित् तव पुत्रेण मारिष।

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क्षपिताः क्षत्रियाः सर्वे शत्रूणां वर्धितं यशः ॥ ३३ ॥
‘मान्यवर नरेश! आपके उस पुत्रने किसी भी धर्मका सत्कार नहीं किया। उसने सारे क्षत्रियोंका संहार करा डाला और शत्रुओंका यश बढ़ाया ॥ ३३ ॥
मध्यस्थो हि त्वमप्यासीनं क्षमं किञ्चिदुक्तवान् ।
दुर्धरेण त्वया भारस्तुलया न समं धृतः ॥ ३४ ॥
‘आप भी मध्यस्थ बनकर बैठे रहे, उसे कोई उचित सलाह नहीं दी। आप दुर्धर्ष वीर थे—आपकी बात कोई टाल नहीं सकता था, तो भी आपने दोनों ओरके बोझको समभावसे तराजूपर रखकर नहीं तौला ॥ ३४ ॥
आदावेव मनुष्येण वर्तितव्यं यथाक्षमम् ।
यथा नातीतमर्थं वै पश्चात्तापेन युज्यते ॥ ३५ ॥
‘मनुष्यको पहले ही यथायोग्य बर्ताव करना चाहिये, जिससे आगे चलकर उसे बीती हुई बातके लिये पश्चात्ताप न करना पड़े ॥ ३५ ॥
पुत्रगृद्ध्या त्वया राजन् प्रियं तस्य चिकीर्षितम् ।
पश्चात्तापमिमं प्राप्तो न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३६ ॥
‘राजन्! आपने पुत्रके प्रति आसक्ति रखनेके कारण सदा उसीका प्रिय करना चाहा, इसीलिये इस समय आपको यह पश्चात्तापका अवसर प्राप्त हुआ है; अतः अब आप शोक न करें ॥ ३६ ॥
मधु यः केवलं दृष्ट्वा प्रपातं नानुपश्यति ।
स भ्रष्टो मधुलोभेन शोचत्येवं यथा भवान् ॥ ३७ ॥
‘जो केवल ऊँचे स्थानपर लगे हुए मधुको देखकर वहाँसे गिरनेकी सम्भावनाकी ओरसे आँख बंद कर लेता है, वह उस मधुके लालचसे नीचे गिरकर इसी तरह शोक करता है, जैसे आप कर रहे हैं ॥ ३७ ॥
अर्थान्न शोचन् प्राप्नोति न शोचन् विन्दते फलम् ।
न शोचन् श्रियमाप्नोति न शोचन् विन्दते परम् ॥ ३८ ॥
‘शोक करनेवाला मनुष्य अपने अभीष्ट पदार्थोंको नहीं पाता है, शोकपरायण पुरुष किसी फलको नहीं हस्तगत कर पाता है। शोक करनेवालेको न तो लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और न उसे परमात्मा ही मिलता है ॥ ३८ ॥
स्वयमुत्पादयित्वाग्निं वस्त्रेण परिवेष्टयन् ।
दह्यमानो मनस्तापं भजते न स पण्डितः ॥ ३९ ॥
‘जो मनुष्य स्वयं आग जलाकर उसे कपड़ेमें लपेट लेता है और जलनेपर मन-ही-मन संतापका अनुभव करता है, वह बुद्धिमान् नहीं कहा जा सकता है ॥ ३९ ॥
त्वयैव ससुतेनायं वाक्यवायुसमीरितः ।
लोभाज्येन च संसिक्तो ज्वलितः पार्थपावकः ॥ ४० ॥

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‘पुत्रसहित आपने ही अपने लोभरूपी घीसे सींचकर और वचनरूपी वायुसे प्रेरित करके पार्थरूपी अग्निको प्रज्वलित किया था॥ ४०॥
तस्मिन् समिद्धे पतिताः शलभा इव ते सुताः ।
तान् वै शराग्निनिर्दग्धान्न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ४१ ॥
‘उसी प्रज्वलित अग्निमें आपके सारे पुत्र पतंगोंके समान पड़ गये हैं। बाणोंकी आगमें जलकर भस्म हुए उन पुत्रोंके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥ ४१॥
यच्चाश्रुपातात् कलिलं वदनं वहसे नृप ।
अशास्त्रदृष्टमेतद्धि न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥ ४२ ॥
‘नरेश्वर! आप जो आँसुओंकी धारासे भीगा हुआ मुँह लिये फिरते हैं, यह अशास्त्रीय कार्य है। विद्वान् पुरुष इसकी प्रशंसा नहीं करते हैं॥ ४२॥
विस्फुलिङ्गा इव ह्येतान् दहन्ति किल मानवान् ।
जहीहि मन्युं बुद्ध्या वै धारयात्मानमात्मना ॥ ४३ ॥
‘ये शोकके आँसू आगकी चिनगारियोंके समान इन मनुष्योंको निःसंदेह जलाया करते हैं; अतः आप शोक छोड़िये और बुद्धिके द्वारा अपने मनको स्वयं ही सुस्थिर कीजिये’॥ ४३॥

वैशम्पायन उवाच

एवमाश्वासितस्तेन संजयेन महात्मना ।
विदुरो भूय एवाह बुद्धिपूर्वं परंतप ॥ ४४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! महात्मा संजयने जब इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रको आश्वासन दिया, तब विदुरजीने भी पुनः सान्त्वना देते हुए उनसे यह विचारपूर्ण वचन कहा॥ ४४॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3107)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वितीयोऽध्यायः

विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना

वैशम्पायन उवाच

ततोऽमृतसमैर्वाक्यैर्ह्लादयन् पुरुषर्षभम् ।
वैचित्रवीर्यं विदुरो यदुवाच निबोध तत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर विदुरजीने पुरुषप्रवर धृतराष्ट्रको अपने अमृतसमान मधुर वचनोंद्वारा आह्लाद प्रदान करते हुए वहाँ जो कुछ कहा, उसे सुनो ॥ १ ॥

विदुर उवाच

उत्तिष्ठ राजन् किं शेषे धारयात्मानमात्मना ।
एषा वै सर्वसत्त्वानां लोकेश्वर परा गतिः ॥ २ ॥
**विदुरजी बोले—**राजन्! आप धरतीपर क्यों पड़े हैं? उठकर बैठ जाइये और बुद्धिके द्वारा अपने मनको स्थिर कीजिये। लोकेश्वर! समस्त प्राणियोंकी यही अन्तिम गति है ॥ २ ॥

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ ३ ॥
सारे संग्रहोंका अन्त उनके क्षयमें ही है। भौतिक उन्नतियोंका अन्त पतनमें ही है। सारे संयोगोंका अन्त वियोगमें ही है। इसी प्रकार सम्पूर्ण जीवनका अन्त मृत्युमें ही होनेवाला है ॥ ३ ॥

यदा शूरं च भीरुं च यमः कर्षति भारत ।
तत् किं न योत्स्यन्ति हि ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! क्षत्रियशिरोमणे! जब शूरवीर और डरपोक दोनोंको ही यमराज खींच ले जाते हैं, तब वे क्षत्रियलोग युद्ध क्यों न करते! ॥ ४ ॥

अयुध्यमानो म्रियते युध्यमानश्च जीवति ।
कालं प्राप्य महाराज न कश्चिदतिवर्तते ॥ ५ ॥
महाराज! जो युद्ध नहीं करता, वह भी मर जाता है और जो संग्राममें जूझता है, वह भी जीवित बच जाता है। कालको पाकर कोई भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ ५ ॥

अभावादीनि भूतानि भावमध्यानि भारत ।
अभावनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ६ ॥

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जितने प्राणी हैं, वे जन्मसे पहले यहाँ व्यक्त नहीं थे। वे बीचमें ही व्यक्त होकर दिखायी देते हैं और अन्तमें पुनः उनका अभाव (अव्यक्तरूपसे अवस्थान) हो जायगा। ऐसी अवस्थामें उनके लिये रोने-धोनेकी क्या आवश्यकता है? ।। ६ ।।

न शोचन् मृतमन्वेति न शोचन् म्रियते नरः ।
एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुशोचसि ।। ७ ।।
शोक करनेवाला मनुष्य न तो मरनेवालेके साथ जा सकता है और न मर ही सकता है। जब लोककी ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है, तब आप किसलिये शोक कर रहे हैं? ।। ७ ।।

कालः कर्षति भूतानि सर्वाणि विविधान्युत ।
न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम ।। ८ ।।
कुरुश्रेष्ठ! काल नाना प्रकारके समस्त प्राणियोंको खींच लेता है। कालको न तो कोई प्रिय है और न उसके द्वेषका ही पात्र है ।। ८ ।।

यथा वायुस्तृणाग्राणि संवर्तयति सर्वशः ।
तथा कालवशं यान्ति भूतानि भरतर्षभ ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! जैसे हवा तिनकोंको सब ओर उड़ाती और डालती रहती है, उसी प्रकार समस्त प्राणी कालके अधीन होकर आते-जाते हैं ।। ९ ।।

एकसार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गमिनाम् ।
यस्य कालः प्रयात्यग्रे तत्र का परिदेवना ।। १० ।।
जो एक साथ संसारकी यात्रामें आये हैं, उन सबको एक दिन वहीं (परलोकमें) जाना है। उनमेंसे जिसका काल पहले उपस्थित हो गया, वह आगे चला जाता है। ऐसी दशामें किसीके लिये शोक क्या करना है? ।। १० ।।

न चाप्येतान् हतान् युद्धे राजन् शोचितुमर्हसि ।
प्रमाणं यदि शास्त्राणि गतास्ते परमां गतिम् ।। ११ ।।
राजन्! युद्धमें मारे गये इन वीरोंके लिये तो आपको शोक करना ही नहीं चाहिये। यदि आप शास्त्रोंका प्रमाण मानते हैं तो वे निश्चय ही परम गतिको प्राप्त हुए हैं ।। ११ ।।

सर्वे स्वाध्यायवन्तो हि सर्वे च चरितव्रताः ।
सर्वे चाभिमुखाः क्षीणास्तत्र का परिदेवना ।। १२ ।।
वे सभी वीर वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले थे। सबने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था तथा वे सभी युद्धमें शत्रुका सामना करते हुए वीरगतिको प्राप्त हुए हैं; अतः उनके लिये शोक करनेकी क्या बात है? ।। १२ ।।

अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः ।
नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना ।। १३ ।।
ये अदृश्य जगत्‌से आये थे और पुनः अदृश्य जगत्‌में ही चले गये हैं। ये न तो आपके थे और न आप ही इनके हैं। फिर यहाँ शोक करनेका क्या कारण है? ।। १३ ।।

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हतोऽपि लभते स्वर्गं हत्वा च लभते यशः ।
उभयं नो बहुगुणं नास्ति निष्फलता रणे ॥ १४ ॥
युद्धमें जो मारा जाता है, वह स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है और जो शत्रुको मारता है, उसे यशकी प्राप्ति होती है। ये दोनों ही अवस्थाएँ हमलोगोंके लिये बहुत लाभदायक हैं। युद्धमें निष्फलता तो है ही नहीं ॥ १४ ॥

तेषां कामदुघाँल्लोकानिन्द्रः संकल्पयिष्यति ।
इन्द्रस्यातिथयो ह्येते भवन्ति भरतर्षभ ॥ १५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इन्द्र उन वीरोंके लिये इच्छानुसार भोग प्रदान करनेवाले लोकोंकी व्यवस्था करेंगे। वे सब-के-सब इन्द्रके अतिथि होंगे ॥ १५ ॥

न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्न तपोभिर्न विद्यया ।
स्वर्गं यान्ति तथा मर्त्या यथा शूरा रणे हताः ॥ १६ ॥
युद्धमें मारे गये शूरवीर जितनी सुगमतासे स्वर्गलोकमें जाते हैं, उतनी सुविधासे मनुष्य प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ, तपस्या और विद्याद्वारा भी नहीं जा सकते ॥ १६ ॥

शरीराग्निषु शूराणां जुहुवुस्ते शराहुतीः ।
हूयमानान् शराँश्चैव सेहुस्तेजस्विनो मिथः ॥ १७ ॥
शूरवीरोंके शरीररूपी अग्नियोंमें उन्होंने बाणोंकी आहुतियाँ दी हैं और उन तेजस्वी वीरोंने एक-दूसरेकी शरीराग्नियोंमें होम किये जानेवाले बाणोंको सहन किया है ॥ १७ ॥

एवं राजंस्तवाचक्षे स्वर्ग्यं पन्थानमुत्तमम् ।
न युद्धादधिकं किंचित् क्षत्रियस्येह विद्यते ॥ १८ ॥
राजन्! इसलिये मैं आपसे कहता हूँ कि क्षत्रियके लिये इस जगत्में धर्मयुद्धसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्ग-प्राप्तिका उत्तम मार्ग नहीं है ॥ १८ ॥

क्षत्रियास्ते महात्मानः शूराः समितिशोभनाः ।
आशिषः परमाः प्राप्ता न शोच्याः सर्व एव हि ॥ १९ ॥
वे महामनस्वी वीर क्षत्रिय युद्धमें शोभा पानेवाले थे, अतः उन्होंने अपनी कामनाओंके अनुरूप उत्तम लोक प्राप्त किये हैं। उन सबके लिये शोक करना तो किसी प्रकार उचित ही नहीं है ॥ १९ ॥

आत्मानमात्मनाऽऽश्वास्य मा शुचः पुरुषर्षभ ।
नाद्य शोकाभिभूतस्त्वं कायमुत्स्रष्टुमर्हसि ॥ २० ॥
पुरुषप्रवर! आप स्वयं ही अपने मनको सान्त्वना देकर शोकका परित्याग कीजिये। आज शोकसे व्याकुल होकर आपको अपने शरीरका त्याग नहीं करना चाहिये ॥

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ॥ २१ ॥

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हमलोगोंने बारंबार संसारमें जन्म लेकर सहस्रों माता-पिता तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके सुखका अनुभव किया है; परंतु आज वे किसके हैं अथवा हम उनमेंसे किसके हैं? ॥ २१ ॥

शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ २२ ॥
शोकके हजारों स्थान हैं और भयके भी सैकड़ों स्थान हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही अपना प्रभाव डालते हैं, विद्वान् पुरुषपर नहीं ॥ २२ ॥

न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम ।
न मध्यस्थः क्वचित्कालः सर्वं कालः प्रकर्षति ॥ २३ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कालका न किसीसे प्रेम है और न किसीसे द्वेष, उसका कहीं उदासीनभाव भी नहीं है। काल सभीको अपने पास खींच लेता है ॥ २३ ॥

कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २४ ॥
काल ही प्राणियोंको पकाता है, काल ही प्रजाओंका संहार करता है और काल ही सबके सो जानेपर भी जागता रहता है। कालका उल्लंघन करना बहुत ही कठिन है ॥ २४ ॥

अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृद्ध्येदेषु न पण्डितः ॥ २५ ॥
रूप, जवानी, जीवन, धनका संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोंका एक साथ निवास—ये सभी अनित्य हैं, अतः विद्वान् पुरुष इनमें कभी आसक्त न हो ॥ २५ ॥

न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हसि ।
अप्यभावेन युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ॥ २६ ॥
जो दुःख सारे देशपर पड़ा है, उसके लिये अकेले आपको ही शोक करना उचित नहीं है। शोक करते-करते कोई मर जाय तो भी उसका वह शोक दूर नहीं होता है ॥ २६ ॥

अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येत् पराक्रमम् ।
भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् ॥ २७ ॥
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ।
यदि अपनेमें पराक्रम देखे तो शोक न करते हुए शोकके कारणका निवारण करनेकी चेष्टा करे। दुःखको दूर करनेके लिये सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका चिन्तन छोड़ दिया जाय, चिन्तन करनेसे दुःख कम नहीं होता बल्कि और भी बढ़ जाता है ॥ २७ १/२ ॥

अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च ॥ २८ ॥
मानुषा मानसैर्दुःखैर्दह्यन्ते चाल्पबुद्धयः ।

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मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग होनेपर मानसिक दुःखोंसे दग्ध होने लगते हैं ॥ २८ १/२ ॥
नार्थो न धर्मो न सुखं यदेतदनुशोचसि ॥ २९ ॥
न च नापैति कार्यार्थात्तिवर्गाच्चैव हीयते ।
जो आप यह शोक कर रहे हैं, यह न अर्थका साधक है, न धर्मका और न सुखका ही। इसके द्वारा मनुष्य अपने कर्तव्यपथसे तो भ्रष्ट होता ही है, धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गसे भी वंचित हो जाता है ॥ २९ १/२ ॥
अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिकीं नराः ॥ ३० ॥
असंतुष्टाः प्रमुह्यन्ति संतोषं यान्ति पण्डिताः ।
धनकी भिन्न-भिन्न अवस्थाविशेषको पाकर असंतोषी मनुष्य तो मोहित हो जाते हैं; परंतु विद्वान् पुरुष सदा संतुष्ट ही रहते हैं ॥ ३० १/२ ॥
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः ।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ ३१ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह मानसिक दुःखको बुद्धि एवं विचारधारा और शारीरिक कष्टको ओषधियोंद्वारा दूर करे, यही विज्ञानकी शक्ति है। उसे बालकोंके समान अविवेकपूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहिये ॥ ३१ ॥
शयानं चानुशेते हि तिष्ठन्तं चानुतिष्ठति ।
अनुधावति धावन्तं कर्म पूर्वकृतं नरम् ॥ ३२ ॥
मनुष्यका पूर्वकृत कर्म उसके सोनेपर साथ ही सोता है, उठनेपर साथ ही उठता है और दौड़नेपर भी साथ-ही-साथ दौड़ता है ॥ ३२ ॥
यस्यां यस्यामवस्थायां यत् करोति शुभाशुभम् ।
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्फलं समुपाश्नुते ॥ ३३ ॥
मनुष्य जिस-जिस अवस्थामें जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी-उसी अवस्थामें उसका फल भी पा लेता है ॥ ३३ ॥
येन येन शरीरेण यद्यत् कर्म करोति यः ।
तेन तेन शरीरेण तत्फलं समुपाश्नुते ॥ ३४ ॥
जो जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, दूसरे जन्ममें वह उसी-उसी शरीरसे उसका फल भोगता है ॥ ३४ ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्यापकृतस्य च ॥ ३५ ॥
मनुष्य आप ही अपना बन्धु है, आप ही अपना शत्रु है और आप ही अपने शुभ या अशुभ कर्मका साक्षी है ॥ ३५ ॥
शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा ।

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कृतं भवति सर्वत्र नाकृतं विद्यते क्वचित् ॥ ३६ ॥
शुभकर्मसे सुख मिलता है और पापकर्मसे दुःख, सर्वत्र किये हुए कर्मका ही फल प्राप्त होता है, कहीं भी बिना कियेका नहीं ॥ ३६ ॥
न हि ज्ञानविरुद्धेषु बह्वपायेषु कर्मसु ।
मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ ३७ ॥
आप-जैसे बुद्धिमान् पुरुष अनेक विनाशकारी दोषोंसे युक्त तथा मूलभूत शरीरका भी नाश करनेवाले बुद्धिविरुद्ध कर्मोंमें नहीं आसक्त होते हैं ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोककरणे
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3113)

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तृतीयोऽध्यायः

विदुरजीका शरीरकी अनित्यता बताते हुए धृतराष्ट्रको शोक त्यागनेके लिये कहना

धृतराष्ट्र उवाच

सुभाषितैर्महाप्राज्ञ शोकोऽयं विगतो मम ।
भूय एव तु वाक्यानि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**परम बुद्धिमान् विदुर! तुम्हारा उत्तम भाषण सुनकर मेरा यह शोक दूर हो गया, तथापि तुम्हारे इन तात्त्विक वचनोंको मैं अभी और सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
अनिष्टानां च संसर्गादिष्टानां च विसर्जनात् ।
कथं हि मानसैर्दुःखैः प्रमुच्यन्ते तु पण्डिताः ॥ २ ॥
विद्वान् पुरुष अनिष्टके संयोग और इष्टके वियोगसे होनेवाले मानसिक दुःखोंसे किस प्रकार छुटकारा पाते हैं? ॥ २ ॥

विदुर उवाच

यतो यतो मनो दुःखात् सुखाद् वा विप्रमुच्यते ।
ततस्ततो नियम्यैतच्छान्तिं विन्देत वै बुधः ॥ ३ ॥
**विदुरजीने कहा—**महाराज! विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिन-जिन साधनोंमें लगनेसे मन दुःख अथवा सुखसे मुक्त होता हो, उन्हींमें इसे नियमपूर्वक लगाकर शान्ति प्राप्त करे ॥ ३ ॥
अशाश्वतमिदं सर्वं चिन्त्यमानं नरर्षभ ।
कदलीसन्निभो लोकः सारो ह्यस्य न विद्यते ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! विचार करनेपर यह सारा जगत् अनित्य ही जान पड़ता है। सम्पूर्ण विश्व केलेके समान सारहीन है; इसमें सार कुछ भी नहीं है ॥ ४ ॥
यदा प्राज्ञाश्च मूढाश्च धनवन्तोऽथ निर्धनाः ।
सर्वे पितृवनं प्राप्य स्वपन्ति विगतज्वराः ॥ ५ ॥
निर्मांसैरस्थिभूयिष्ठैर्गात्रैः स्नायुनिबन्धनैः ।
किं विशेषं प्रपश्यन्ति तत्र तेषां परे जनाः ॥ ६ ॥
येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् ।
कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति विप्रलब्धधियो नराः ॥ ७ ॥
जब विद्वान्-मूर्ख, धनवान् और निर्धन सभी श्मशान-भूमिमें जाकर निश्चिन्त सो जाते हैं, उस समय उनके मांसरहित नाड़ियोंसे बँधे हुए तथा अस्थिबहुल अंगोंको देखकर क्या

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दूसरे लोग वहाँ उनमें कोई ऐसा अन्तर देख पाते हैं, जिससे वे उनके कुल और रूपकी विशेषताको समझ सकें; फिर भी वे मनुष्य एक-दूसरेको क्यों चाहते हैं? इसलिये कि उनकी बुद्धि ठगी गयी है ॥ ५—७ ॥
गृहाणीव हि मर्त्यानामाहुर्देहानि पण्डिताः ।
कालेन विनियुज्यन्ते सत्त्वमेकं तु शाश्वतम् ॥ ८ ॥
पण्डितलोग मरणधर्मा प्राणियोंके शरीरोंको घरके तुल्य बतलाते हैं; क्योंकि सारे शरीर समयपर नष्ट हो जाते हैं, किंतु उसके भीतर जो एकमात्र सत्त्वस्वरूप आत्मा है, वह नित्य है ॥ ८ ॥
यथा जीर्णमजीर्णं वा वस्त्रं त्यक्त्वा तु पूरुषः ।
अन्यद् रोचयते वस्त्रमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥ ९ ॥
जैसे मनुष्य नये अथवा पुराने वस्त्रको उतारकर दूसरे नूतन वस्त्रको पहननेकी रुचि रखता है, उसी प्रकार देहधारियोंके शरीर उनके द्वारा समय-समयपर त्यागे और ग्रहण किये जाते हैं ॥ ९ ॥
वैचित्रवीर्य प्राप्यं हि दुःखं वा यदि वा सुखम् ।
प्राप्नुवन्तीह भूतानि स्वकृतेनैव कर्मणा ॥ १० ॥
विचित्रवीर्यनन्दन! यदि दुःख या सुख प्राप्त होनेवाला है तो प्राणी उसे अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही पाते हैं ॥ १० ॥
कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः सुखं दुःखं च भारत ।
ततो वहति तं भारमवशः स्ववशोऽपि वा ॥ ११ ॥
भरतनन्दन! कर्मके अनुसार ही परलोकमें स्वर्ग या नरक तथा इहलोकमें सुख और दुःख प्राप्त होते हैं; फिर मनुष्य सुख या दुःखके उस भारको स्वाधीन या पराधीन होकर ढोता रहता है ॥ ११ ॥
यथा च मृण्मयं भाण्डं चक्रारूढं विपद्यते ।
किंचित् प्रक्रियमाणं वा कृतमात्रमथापि वा ॥ १२ ॥
छिन्नं वाप्यवरोप्यन्तमवतीर्णमथापि वा ।
आर्द्रं वाप्यथवा शुष्कं पच्यमानमथापि वा ॥ १३ ॥
उत्तार्यमाणमापाकादुद्धृतं चापि भारत ।
अथवा परिभुज्यन्तमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥ १४ ॥
जैसे मिट्टीका बर्तन बनाये जानेके समय कभी चाकपर चढ़ाते ही नष्ट हो जाता है, कभी कुछ-कुछ बननेपर, कभी पूरा बन जानेपर, कभी सूतसे काट देनेपर, कभी चाकसे उतारते समय, कभी उतर जानेपर, कभी गीली या सूखी अवस्थामें, कभी पकाये जाते समय, कभी आवाँसे उतारते समय, कभी पाकस्थानसे उठाकर ले जाते समय अथवा कभी उसे उपयोगमें लाते समय फूट जाता है; ऐसी ही दशा देहधारियोंके शरीरोंकी भी होती है ॥

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गर्भस्थो वा प्रसूतो वाप्यथ वा दिवसान्तरः ।
अर्धमासगतो वापि मासमात्रगतोऽपि वा ॥ १५ ॥
संवत्सरगतो वापि द्विसंवत्सर एव वा ।
यौवनस्थोऽथ मध्यस्थो वृद्धो वापि विपद्यते ॥ १६ ॥
कोई गर्भमें रहते समय, कोई पैदा हो जानेपर, कोई कई दिनोंका होनेपर, कोई पंद्रह दिनका, कोई एक मासका तथा कोई एक या दो सालका होनेपर, कोई युवावस्थामें, कोई मध्यावस्थामें अथवा कोई वृद्धावस्थामें पहुँचनेपर मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥ १५-१६ ॥

प्राक्कर्मभिस्तु भूतानि भवन्ति न भवन्ति च ।
एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुतप्यसे ॥ १७ ॥
प्राणी पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही इस जगत्में रहते और नहीं रहते हैं। जब लोककी ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है, तब आप किसलिये शोक कर रहे हैं? ॥ १७ ॥

यथा तु सलिलं राजन् क्रीडार्थमनुसंतरेत् ।
उन्मज्जेच्च निमज्जेच्च किंचित् सत्त्वं नराधिप ॥ १८ ॥
एवं संसारगहने उन्मज्जननिमज्जने ।
कर्मभोगेन बध्यन्ते क्लिश्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥ १९ ॥
राजन्! नरेश्वर! जैसे क्रीडाके लिये पानीमें तैरता हुआ कोई प्राणी कभी डूबता है और कभी ऊपर आ जाता है, इसी प्रकार इस अगाध संसार-समुद्रमें जीवोंका डूबना और उतराना (मरना और जन्म लेना) लगा रहता है, मन्दबुद्धि मनुष्य ही यहाँ कर्मभोगसे बँधते और कष्ट पाते हैं ॥

ये तु प्राज्ञाः स्थिताः सत्त्वे संसारेऽस्मिन् हितैषिणः ।
समागमज्ञा भूतानां ते यान्ति परमां गतिम् ॥ २० ॥
जो बुद्धिमान् मानव इस संसारमें सत्त्वगुणसे युक्त, सबका हित चाहनेवाले और प्राणियोंके समागमको कर्मानुसार समझनेवाले हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोककरणे
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

दुःखमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय

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चतुर्थोऽध्यायः

दुःखमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय

धृतराष्ट्र उवाच

कथं संसारगहनं विज्ञेयं वदतां वर ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ॥ १ ॥

**धृतराष्ट्रने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ विदुर! इस गहन संसारके स्वरूपका ज्ञान कैसे हो? यह मैं सुनना चाहता हूँ। मेरे प्रश्नके अनुसार तुम इस विषयका यथार्थरूपसे वर्णन करो ॥ १ ॥

विदुर उवाच

जन्मप्रभृति भूतानां क्रिया सर्वोपलक्ष्यते ।
पूर्वमेवेह कलिले वसते किंचिदन्तरम् ॥ २ ॥
ततः स पञ्चमेऽतीते मासे वासमकल्पयत् ।
ततः सर्वाङ्गसम्पूर्णो गर्भो वै स तु जायते ॥ ३ ॥

**विदुरजीने कहा—**महाराज! जब गर्भाशयमें वीर्य और रजका संयोग होता है तभीसे जीवोंकी गर्भवृद्धिरूप सारी क्रिया शास्त्रके अनुसार देखी जाती हैं।* आरम्भमें जीव कलिल (वीर्य और रजके संयोग)-के रूपमें रहता है, फिर कुछ दिन बाद पाँचवाँ महीना बीतनेपर वह चैतन्यरूपसे प्रकट होकर पिण्डमें निवास करने लगता है। इसके बाद वह गर्भस्थ पिण्ड सर्वांगपूर्ण हो जाता है ॥ २-३ ॥

अमेध्यमध्ये वसति मांसशोणितलेपने ।
ततस्तु वायुवेगेन ऊर्ध्वपादो ह्यधःशिराः ॥ ४ ॥

इस समय उसे मांस और रुधिरसे लिपे हुए अत्यन्त अपवित्र गर्भाशयमें रहना पड़ता है। फिर वायुके वेगसे उसके पैर ऊपरकी ओर हो जाते हैं और सिर नीचेकी ओर ॥

योनिद्वारमुपागम्य बहून् क्लेशान् समृच्छति ।
योनिसम्पीडनाच्चैव पूर्वकर्मभिरन्वितः ॥ ५ ॥
तस्मान्मुक्तः स संसारादन्यान् पश्यत्युपद्रवान् ।
ग्राहास्तमनुगच्छन्ति सारमेया इवामिषम् ॥ ६ ॥

इस स्थितिमें योनिद्वारके समीप आ जानेसे उसे बड़े दुःख सहने पड़ते हैं। फिर पूर्व कर्मोंसे संयुक्त हुआ वह जीव योनिमार्गसे पीड़ित हो उससे छुटकारा पाकर बाहर आ जाता

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है और संसारमें आकर अन्यान्य प्रकारके उपद्रवोंका सामना करता है। जैसे कुत्ते मांसकी ओर झपटते हैं, उसी प्रकार बालग्रह उस शिशुके पीछे लगे रहते हैं ॥

ततः प्राप्तोत्तरे काले व्याधयश्चापि तं तथा ।
उपसर्पन्ति जीवन्तं बध्यमानं स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥
तदनन्तर ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, त्यों-ही-त्यों अपने कर्मोंसे बँधे हुए उस जीवको जीवित अवस्थामें नयी-नयी व्याधियाँ प्राप्त होने लगती हैं ॥ ७ ॥

तं बद्धमिन्द्रियैः पाशैः संगस्वादुभिरावृतम् ।
व्यसनान्यपि वर्तन्ते विविधानि नराधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! फिर आसक्तिके कारण जिनमें रसकी प्रतीति होती है, उन विषयोंसे घिरे और इन्द्रियरूपी पाशोंसे बँधे हुए उस संसारी जीवको नाना प्रकारके संकट घेर लेते हैं ॥

बध्यमानश्च तैर्भूयो नैव तृप्तिमुपैति सः ।
तदा नावैति चैवायं प्रकुर्वन् साध्वसाधु वा ॥ ९ ॥
उनसे बँध जानेपर पुनः इसे कभी तृप्ति ही नहीं होती है। उस अवस्थामें वह भले-बुरे कर्म करता हुआ भी उनके विषयमें कुछ समझ नहीं पाता ॥ ९ ॥

तथैव परिरक्षन्ति ये ध्यानपरिनिष्ठिताः ।
अयं न बुध्यते तावद् यमलोकमथागतम् ॥ १० ॥
जो लोग भगवान्‌के ध्यानमें लगे रहनेवाले हैं, वे ही शास्त्रके अनुसार चलकर अपनी रक्षा कर पाते हैं। साधारण जीव तो अपने सामने आये हुए यमलोकको भी नहीं समझ पाता है ॥ १० ॥

यमदूतैर्विकृष्यंश्च मृत्युं कालेन गच्छति ।
वाग्विहीनस्य च यन्मात्रमिष्टानिष्टं कृतं मुखे ।
भूय एवात्मनाऽऽत्मानं बध्यमानमुपेक्षते ॥ ११ ॥
तदनन्तर कालसे प्रेरित हो यमदूत उसे शरीरसे बाहर खींच लेते हैं और वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। उस समय उसमें बोलनेकी भी शक्ति नहीं रहती। उसके जितने भी शुभ या अशुभ कर्म हैं वे सामने प्रकट होते हैं। उनके अनुसार पुनः अपने-आपको देहबन्धनमें बँधता हुआ देखकर भी वह उपेक्षा कर देता है—अपने उद्धारका प्रयत्न नहीं करता ॥ ११ ॥

अहो विनिकृतो लोको लोभेन च वशीकृतः ।
लोभक्रोधभयोन्मत्तो नात्मानमवबुध्यते ॥ १२ ॥
अहो! लोभके वशीभूत होकर यह सारा संसार ठगा जा रहा है। लोभ, क्रोध और भयसे यह इतना पागल हो गया है कि अपने-आपको भी नहीं जानता ॥ १२ ॥

कुलीनत्वे च रमते दुष्कुलीनान् विकुत्सयन् ।
धनदर्पेण दृप्तश्च दरिद्रान् परिकुत्सयन् ॥ १३ ॥

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जो लोग हीन कुलमें उत्पन्न हुए हैं, उनकी निन्दा करता हुआ कुलीन मनुष्य अपनी कुलीनतामें ही मस्त रहता है और धनी धनके घमंडसे चूर होकर दरिद्रोंके प्रति अपनी घृणा प्रकट करता है ।। १३ ।।
मूर्खानिति परानाह नात्मानं समवेक्षते ।
दोषान् क्षिपति चान्येषां नात्मानं शास्तुमिच्छति ।। १४ ।।
वह दूसरोंको तो मूर्ख बताता है, पर अपनी ओर कभी नहीं देखता। दूसरोंके दोषोंके लिये उनपर आक्षेप करता है, परंतु उन्हीं दोषोंसे स्वयंको बचानेके लिये अपने मनको काबूमें नहीं रखना चाहता ।। १४ ।।
यदा प्राज्ञाश्च मूर्खाश्च धनवन्तश्च निर्धनाः ।
कुलीनाश्चाकुलीनाश्च मानिनोऽथाप्यमानिनः ।। १५ ।।
सर्वे पितृवनं प्राप्ताः स्वपन्ति विगतत्वचः ।
निर्मांसैरस्थिभूयिष्ठैर्गात्रैः स्नायुनिबन्धनैः ।। १६ ।।
विशेषं न प्रपश्यन्ति तत्र तेषां परे जनाः ।
येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् ।। १७ ।।
जब ज्ञानी और मूर्ख, धनवान् और निर्धन, कुलीन और अकुलीन तथा मानी और मानरहित सभी मरघटमें जाकर सो जाते हैं, उनकी चमड़ी भी नष्ट हो जाती है और नाड़ियोंसे बँधे हुए मांसरहित हड्डियोंके ढेररूप उनके नग्न शरीर सामने आते हैं, तब वहाँ खड़े हुए दूसरे लोग उनमें कोई ऐसा अन्तर नहीं देख पाते हैं, जिससे एककी अपेक्षा दूसरेके कुल और रूपकी विशेषताको जान सकें ।।
यदा सर्वे समं न्यस्ताः स्वपन्ति धरणीतले ।
कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति प्रलब्धुमिह दुर्बुधाः ।। १८ ।।
जब मरनेके बाद श्मशानमें डाल दिये जानेपर सभी लोग समानरूपसे पृथ्वीकी गोदमें सोते हैं, तब वे मूर्ख मानव इस संसारमें क्यों एक-दूसरेको ठगनेकी इच्छा करते हैं? ।। १८ ।।
प्रत्यक्षं च परोक्षं च यो निशम्य श्रुतिं त्विमाम् ।
अध्रुवे जीवलोकेऽस्मिन् यो धर्ममनुपालयन् ।
जन्मप्रभृति वर्तेत प्राप्नुयात् परमां गतिम् ।। १९ ।।
इस क्षणभंगुर जगत्में जो पुरुष इस वेदोक्त उपदेशको साक्षात् जानकर या किसीके द्वारा सुनकर जन्मसे ही निरन्तर धर्मका पालन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। १९ ।।
एवं सर्वं विदित्वा वै यस्तत्त्वमनुवर्तते ।
स प्रमोक्षाय लभते पन्थानं मनुजेश्वर ।। २० ।।