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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 568)

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

कौरव-सैनिकोंका उत्साह तथा आचार्य द्रोणके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण

संजय उवाच

तस्यां निशायां व्युष्टायां द्रोणः शस्त्रभृतां वरः।
स्वान्यनीकानि सर्वाणि प्राक्रामद् व्यूहितुं ततः॥ १॥
संजय कहते हैं— राजन्! वह रात बीतनेपर प्रातःकाल शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने अपनी सारी सेनाओंका व्यूह बनाना आरम्भ किया॥ १॥

शूराणां गर्जतां राजन् संक्रुद्धानाममर्षिणाम्।
श्रूयन्ते स्म गिरश्चित्राः परस्परवधैषिणाम्॥ २॥
राजन्! उस समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके वधकी इच्छासे गर्जना करनेवाले अमर्षशील शूरवीरोंकी विचित्र बातें सुनायी देती थीं॥ २॥

विस्फार्य च धनूंष्यन्ये ज्याः परे परिमृज्य च।
विनिःश्वसन्तः प्राक्रोशन् क्वेदानीं स धनंजयः॥ ३॥
कोई धनुष खींचकर और कोई प्रत्यंचापर हाथ फेरकर रोषपूर्ण उच्छ्वास लेते हुए चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे कि इस समय वह अर्जुन कहाँ है?॥ ३॥

विकोशान् सुत्सरूनन्ये कृतधारान् समाहितान्।
पीतानाकाशसंकाशानसीन् केचिच्च चिक्षिपुः॥ ४॥
कितने ही योद्धा आकाशके समान निर्मल पानीदार, सँभालकर रखी हुई, सुन्दर मूठ और तेजधारवाली तलवारोंको म्यानसे निकालकर चलाने लगे॥ ४॥

चरन्तस्त्वसिमार्गांश्च धनुर्मागांश्च शिक्षया।
संग्राममनसः शूरा दृश्यन्ते स्म सहस्रशः॥ ५॥
मनमें संग्रामके लिये पूर्ण उत्साह रखनेवाले सहस्रों शूरवीर अपनी शिक्षाके अनुसार खड्गयुद्ध और धनुर्युद्धके मार्गों (पैतरों)-का प्रदर्शन करते दिखायी देते थे॥ ५॥

सघण्टाश्चन्दनादिग्धाः स्वर्णवज्रविभूषिताः।
समुत्क्षिप्य गदाश्चान्ये पर्यपृच्छन्त पाण्डवम्॥ ६॥
दूसरे बहुत-से योद्धा घण्टानादसे युक्त, चन्दनचर्चित तथा सुवर्ण एवं हीरोंसे विभूषित गदाएँ ऊपर उठाकर पूछते थे कि पाण्डुपुत्र अर्जुन कहाँ है?॥ ६॥

अन्ये बलमदोन्मत्ताः परिघैर्बाहुशालिनः।
चक्रुः सम्बाधमाकाशमुच्छ्रितेन्द्रध्वजोपमैः॥ ७॥

अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले कितने ही योद्धा अपने बलके मदसे उन्मत्त हो ऊँचे फहराते हुए इन्द्र-ध्वजके समान उठे हुए परिघोंसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त कर रहे थे॥ ७॥

नानाप्रहरणैश्चान्ये विचित्रस्रगलङ्कृताः ।
संग्राममनसः शूरास्तत्र तत्र व्यवस्थिताः ॥ ८ ॥
दूसरे शूरवीर योद्धा विचित्र मालाओंसे अलंकृत हो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये मनमें युद्धके लिये उत्साहित होकर जहाँ-तहाँ खड़े थे॥ ८॥

क्वार्जुनः क्व स गोविन्दः क्व च मानी वृकोदरः ।
क्व च ते सुहृदस्तेषामान्हयन्ते रणे तदा ॥ ९ ॥
वे उस समय रणक्षेत्रमें शत्रुओंको ललकारते हुए इस प्रकार कहते थे, कहाँ है अर्जुन? कहाँ हैं श्रीकृष्ण? कहाँ है घमंडी भीमसेन? और कहाँ हैं उनके सारे सुहृद् ॥ ९ ॥

ततः शङ्खमुपाध्माय त्वरयन् वाजिनः स्वयम् ।
इतस्ततस्तान् रचयन् द्रोणश्चरति वेगितः ॥ १० ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्य शंख बजाकर स्वयं ही अपने घोड़ोंको उतावलीके साथ हाँकते और उन सैनिकोंका व्यूह-निर्माण करते हुए इधर-उधर बड़े वेगसे विचर रहे थे॥ १० ॥

तेष्वनीकेषु सर्वेषु स्थितेष्वाहवनन्दिषु ।
भारद्वाजो महाराज जयद्रथमथाब्रवीत् ॥ ११ ॥
महाराज! युद्धसे प्रसन्न होनेवाले उन समस्त सैनिकोंके व्यूहबद्ध हो जानेपर द्रोणाचार्यने जयद्रथसे कहा— ॥ ११ ॥

त्वं चैव सौमदत्तिश्च कर्णश्चैव महारथः ।
अश्वत्थामा च शल्यश्च वृषसेनः कृपस्तथा ॥ १२ ॥
शतं चाश्वसहस्राणां रथानामयुतानि षट् ।
द्विरदानां प्रभिन्नानां सहस्राणि चतुर्दश ॥ १३ ॥
पदातीनां सहस्राणि दंशितान्येकविंशतिः ।
गव्यूतिषु त्रिमात्रासु मामनासाद्य तिष्ठत ॥ १४ ॥
'राजन्! तुम, भूरिश्रवा, महारथी कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य, वृषसेन तथा कृपाचार्य, एक लाख घुड़सवार, साठ हजार रथ, चौदह हजार मदस्रावी गजराज तथा इक्कीस हजार कवचधारी पैदल सैनिकोंको साथ लेकर मुझसे छः कोसकी दूरीपर जाकर डटे रहो ॥ १२—१४ ॥

तत्रस्थं त्वां न संसोढुं शक्ता देवाः सवासवाः ।
किं पुनः पाण्डवाः सर्वे समाश्वसिहि सैन्धव ॥ १५ ॥
'सिंधुराज! वहाँ रहनेपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता भी तुम्हारा सामना नहीं कर सकते; फिर समस्त पाण्डव तो कर ही कैसे सकते हैं? अतः तुम धैर्य धारण करो' ॥ १५ ॥

एवमुक्तः समाश्वस्तः सिन्धुराजो जयद्रथः ।
सम्प्रायात् सह गान्धारैर्वृतस्तैश्च महारथैः ॥ १६ ॥
वर्मिभिः सादिभिर्यत्तैः प्रासपाणिभिरास्थितैः ।
उनके ऐसा कहनेपर सिंधुराज जयद्रथको बड़ा आश्वासन मिला। वह गान्धार महारथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये चल दिया। कवचधारी घुड़सवार हाथोंमें प्रास लिये पूरी सावधानीके साथ उन्हें घेरे हुए चल रहे थे ॥ १६ १/२ ॥
चामरापीडिनः सर्वे जाम्बूनदविभूषिताः ॥ १७ ॥
जयद्रथस्य राजेन्द्र हयाः साधुप्रवाहिनः ।
ते चैव सप्तसाहस्रास्त्रिसाहस्राश्च सैन्धवाः ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! जयद्रथके घोड़े सवारीमें बहुत अच्छा काम देते थे। वे सब-के-सब चवँरकी कलँगीसे सुशोभित और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उन सिंधुदेशीय अश्वोंकी संख्या दस हजार थी ॥ १७-१८ ॥
मत्तानां सुविरूढानां हस्त्यारोहैर्विशारदैः ।
नागानां भीमरूपाणां वर्मिणां रौद्रकर्मणाम् ॥ १९ ॥
अध्यर्धेन सहस्रेण पुत्रो दुर्मर्षणस्तव ।
अग्रतः सर्वसैन्यानां युध्यमानो व्यवस्थितः ॥ २० ॥
जिनपर युद्धकुशल हाथीसवार आरूढ थे, ऐसे भयंकर रूप तथा पराक्रमवाले डेढ़ हजार कवचधारी मतवाले गजराजोंके साथ आकर आपका पुत्र दुर्मर्षण युद्धके लिये उद्यत हो सम्पूर्ण सेनाओंके आगे खड़ा हुआ ॥ १९-२० ॥
ततो दुःशासनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजौ ।
सिन्धुराजार्थसिद्धयर्थमग्रानीके व्यवस्थितौ ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् आपके दो पुत्र दुःशासन और विकर्ण सिन्धुराज जयद्रथके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए ॥ २१ ॥
दीर्घो द्वादश गव्यूतिः पश्चार्धे पञ्च विस्तृतः ।
व्यूहस्तु चक्रशकटो भारद्वाजेन निर्मितः ॥ २२ ॥
आचार्य द्रोणने चक्रगर्भ शकटव्यूहका निर्माण किया था, जिसकी लम्बाई बारह गव्यूति (चौबीस कोस) थी और पिछले भागकी चौड़ाई पाँच गव्यूति (दस कोस) थी ॥
नानानृपतिभिर्वीरैस्तत्र तत्र व्यवस्थितैः ।
रथाश्वगजपत्त्योधैर्द्रोणेन विहितः स्वयम् ॥ २३ ॥
यत्र-तत्र खड़े हुए अनेक नरपतियों तथा हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल सैनिकोंद्वारा द्रोणाचार्यने स्वयं उस व्यूहकी रचना की थी ॥ २३ ॥
पश्चार्धे तस्य पद्मस्तु गर्भव्यूहः सुदुर्भिदः ।
सूची पद्मस्य गर्भस्थो गूढो व्यूहः कृतः पुनः ॥ २४ ॥

उस चक्रशकटव्यूहके पिछले भागमें पद्म नामक एक गर्भव्यूह बनाया गया था, जो अत्यन्त दुर्भेद्य था। उस पद्मव्यूहके मध्यभागमें सूची नामक एक गूढ़ व्यूह और बनाया गया था॥ २४ ॥
एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य द्रोणो व्यवस्थितः।
सूचीमुखे महेष्वासः कृतवर्मा व्यवस्थितः॥ २५ ॥
इस प्रकार इस महाव्यूहकी रचना करके द्रोणाचार्य युद्धके लिये तैयार खड़े थे। सूचीमुख व्यूहके प्रमुख भागमें महाधनुर्धर कृतवर्मा खड़ा किया गया था॥ २५ ॥
अनन्तरं च काम्बोजो जलसंधश्च मारिष।
दुर्योधनश्च कर्णश्च तदनन्तरमेव च॥ २६ ॥
आर्य! कृतवर्माके पीछे काम्बोजराज और जलसंध खड़े हुए, तदनन्तर दुर्योधन और कर्ण स्थित हुए॥ २६ ॥
ततः शतसहस्राणि योधानामनिवर्तिनाम्।
व्यवस्थितानि सर्वाणि शकटे मुखरक्षिणाम्॥ २७ ॥
तत्पश्चात् युद्धमें पीठ न दिखानेवाले एक लाख योद्धा खड़े हुए थे। वे सबके सब शकटव्यूहके प्रमुख भागकी रक्षाके लिये नियुक्त थे॥ २७ ॥
तेषां च पृष्ठतो राजा बलेन महता वृतः।
जयद्रथस्ततो राजा सूचीपार्श्वे व्यवस्थितः॥ २८ ॥
उनके पीछे विशाल सेनाके साथ स्वयं राजा जयद्रथ सूचीव्यूहके पार्श्वभागमें खड़ा था॥ २८ ॥
शकटस्य तु राजेन्द्र भारद्वाजो मुखे स्थितः।
अनु तस्याभवद् भोजो जुगोपैनं ततः स्वयम्॥ २९ ॥
राजेन्द्र! उस शकटव्यूहके मुहानेपर भारद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य थे और उनके पीछे भोज था, जो स्वयं आचार्यकी रक्षा करता था॥ २९ ॥
श्वेतवर्माम्बरोष्णीषो व्यूढोरस्को महाभुजः।
धनुर्विस्फारयन् द्रोणस्तस्थौ क्रुद्ध इवान्तकः॥ ३० ॥
द्रोणाचार्यका कवच श्वेत रंगका था। उनके वस्त्र और उष्णीष (पगड़ी) भी श्वेत ही थे। छाती चौड़ी और भुजाएँ विशाल थीं। उस समय धनुष खींचते हुए द्रोणाचार्य वहाँ क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान खड़े थे॥ ३० ॥
पताकिनं शोणहयं वेदिकृष्णाजिनध्वजम्।
द्रोणस्य रथमालोक्य प्रहृष्टाः कुरवोऽभवन्॥ ३१ ॥
उस समय वेदी और काले मृगचर्मके चिह्नसे युक्त ध्वजवाले, पताकासे सुशोभित और लाल घोड़ोंसे जुते हुए द्रोणाचार्यके रथको देखकर समस्त कौरव बड़े प्रसन्न हुए॥ ३१ ॥
सिद्धचारणसंघानां विस्मयः सुमहानभूत्।

द्रोणेन विहितं दृष्ट्वा व्यूहं क्षुब्धार्णवोपमम् ॥ ३२ ॥
द्रोणाचार्यद्वारा रचित वह महाव्यूह क्षुब्ध महासागरके समान जान पड़ता था। उसे देखकर सिद्धों और चारणोंके समुदायोंको महान् विस्मय हुआ ॥ ३२ ॥
सशैलसागरवनां नानाजनपदाकुलाम् ।
ग्रसेद् व्यूहः क्षितिं सर्वामिति भूतानि मेनिरे ॥ ३३ ॥
उस समय समस्त प्राणी ऐसा मानने लगे कि वह व्यूह पर्वत, समुद्र और काननोंसहित अनेकानेक जनपदोंसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीको अपना ग्रास बना लेगा ॥ ३३ ॥
बहुरथमनुजाश्वपत्तिनागं
प्रतिभयनिःस्वनमद्भुतानुरूपम् ।
अहितहृदयभेदनं महद् वै
शकटमवेक्ष्य कृतं ननन्द राजा ॥ ३४ ॥
बहुत-से रथ, पैदल मनुष्य, घोड़े और हाथियोंसे परिपूर्ण, भयंकर कोलाहलसे युक्त एवं शत्रुओंके हृदयको विदीर्ण करनेमें समर्थ, अद्भुत और समयके अनुरूप बने हुए उस महान् शकटव्यूहको देखकर राजा दुर्योधन बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कौरवव्यूहनिर्माणे
सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कौरव-सेनाके व्यूहका
निर्माणविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥