महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 3096)
अष्टादशोऽध्यायः
महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना
श्रीभगवानुवाच
ततो देवयुगेऽतीते देवा वै समकल्पयन् ।
यज्ञं वेदप्रमाणेण विधिवद् यष्टुमीप्सवः ॥ १ ॥
**श्रीभगवान् बोले—**तदनन्तर सत्ययुग बीत जाने-पर देवताओंने विधिपूर्वक भगवान्का यजन करनेकी इच्छासे वैदिक प्रमाणके अनुसार यज्ञकी कल्पना की ॥ १ ॥
कल्पयामासुरथ ते साधनानि हवींषि च ।
भागार्हा देवताश्चैव यज्ञियं द्रव्यमेव च ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञके साधनों, हविष्यों, यज्ञभागके अधिकारी देवताओं और यज्ञोपयोगी द्रव्योंकी कल्पना की ॥ २ ॥
ता वै रुद्रमजानन्त्यो याथातथ्येन देवताः ।
नाकल्पयन्त देवस्य स्थाणोर्भागं नराधिप ॥ ३ ॥
नरेश्वर! उस समय देवता भगवान् रुद्रको यथार्थ-रूपसे नहीं जानते थे; इसलिये उन्होंने 'स्थाणु' नामधारी भगवान् शिवके भागकी कल्पना नहीं की ॥ ३ ॥
सोऽकल्प्यमाने भागे तु कृत्तिवासा मखेऽमरैः ।
ततः साधनमन्विच्छन् धनुरादौ ससर्ज ह ॥ ४ ॥
जब देवताओंने यज्ञमें उनका कोई भाग नियत नहीं किया, तब व्याघ्रचर्मधारी भगवान् शिवने उनके दमनके लिये साधन जुटानेकी इच्छा रखकर सबसे पहले धनुषकी सृष्टि की ॥ ४ ॥
लोकयज्ञः क्रियायज्ञो गृहयज्ञः सनातनः ।
पञ्चभूतनृयज्ञश्च जज्ञे सर्वमिदं जगत् ॥ ५ ॥
लोकयज्ञ, क्रियायज्ञ, सनातन गृहयज्ञ, पंचभूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ—ये पाँच प्रकारके यज्ञ हैं। इन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है ॥ ५ ॥
लोकयज्ञैर्नृयज्ञैश्च कपर्दी विदधे धनुः ।
धनुः सृष्टमभूत् तस्य पञ्चकिष्कुप्रमाणतः ॥ ६ ॥
मस्तकपर जटाजूट धारण करनेवाले भगवान् शिवने लोकयज्ञ और मनुष्ययज्ञोंसे एक धनुषका निर्माण किया। उनका वह धनुष पाँच हाथ लंबा बनाया गया था ॥ ६ ॥
वषट्कारोऽभवज्ज्या तु धनुषस्तस्य भारत ।
यज्ञाङ्गानि च चत्वारि तस्य संहननेऽभवन् ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! वषट्कार उस धनुषकी प्रत्यंचा था। यज्ञके चारों अंग स्नान, दान, होम और जप उन भगवान् शिवके लिये कवच हो गये ॥ ७ ॥
ततः क्रुद्धो महादेवस्तदुपादाय कार्मुकम् ।
आजगामाथ तत्रैव यत्र देवाः समीजिरे ॥ ८ ॥
तदनन्तर कुपित हुए महादेवजी उस धनुषको लेकर उसी स्थानपर आये, जहाँ देवतालोग यज्ञ कर रहे थे ॥ ८ ॥
तमात्तकार्मुकं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमव्ययम् ।
विव्यथे पृथिवी देवी पर्वताश्च चकम्पिरे ॥ ९ ॥
उन ब्रह्मचारी एवं अविनाशी रुद्रको हाथमें धनुष उठाये देख पृथिवीदेवीको बड़ी व्यथा हुई और पर्वत भी काँपने लगे ॥ ९ ॥
न ववौ पवनश्चैव नाग्निर्जज्वाल वैधितः ।
व्यभ्रमच्चापि संविग्नं दिवि नक्षत्रमण्डलम् ॥ १० ॥
हवाकी गति रुक गयी, आग समिधा और घी आदिसे जलानेकी चेष्टा की जानेपर भी प्रज्वलित नहीं होती थी और आकाशमें नक्षत्रोंका समूह उद्विग्न होकर घूमने लगा ॥ १० ॥
न बभौ भास्करश्चापि सोमः श्रीमुक्तमण्डलः ।
तिमिरेणाकुलं सर्वमाकाशं चाभवद् वृतम् ॥ ११ ॥
सूर्य भी पूर्णतः प्रकाशित नहीं हो रहे थे, चन्द्रमण्डल भी श्रीहीन हो गया था तथा सारा आकाश अन्धकारसे व्याप्त हो रहा था ॥ ११ ॥
अभिभूतास्ततो देवा विषयान्न प्रजज्ञिरे ।
न प्रत्यभाच्च यज्ञः स देवतास्त्रेसिरे तथा ॥ १२ ॥
उससे अभिभूत होकर देवता किसी विषयको पहचान नहीं पाते थे, वह यज्ञ भी अच्छी तरह प्रतीत नहीं होता था। इससे सारे देवता भयसे थर्रा उठे ॥ १२ ॥
ततः स यज्ञं विव्याध रौद्रेण हृदि पत्रिणा ।
अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावकः ॥ १३ ॥
तदनन्तर रुद्रदेवने भयंकर बाणके द्वारा उस यज्ञके हृदयमें आघात किया। तब अग्निसहित यज्ञ मृगका रूप धारण करके वहाँसे भाग निकला ॥ १३ ॥
स तु तेनैव रूपेण दिवं प्राप्य व्यराजत ।
अन्वीयमानो रुद्रेण युधिष्ठिर नभस्तले ॥ १४ ॥
वह उसी रूपसे आकाशमें पहुँचकर (मृगशिरा नक्षत्रके रूपमें) प्रकाशित होने लगा। युधिष्ठिर! आकाश-मण्डलमें रुद्रदेव उस दशामें भी (आर्द्रा नक्षत्रके रूपमें) उसके पीछे लगे रहते हैं ॥ १४ ॥
अपक्रान्ते ततो यज्ञे संज्ञा न प्रत्यभात् सुरान् ।
नष्टसंज्ञेषु देवेषु न प्राज्ञायत किंचन ॥ १५ ॥
यज्ञके वहाँसे हट जानेपर देवताओंकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। चेतना लुप्त होनेसे देवताओंको कुछ भी प्रतीत नहीं होता था॥ १५॥
त्र्यम्बकः सवितुर्बाहू भगस्य नयने तथा।
पूष्णश्च दशनान् क्रुद्धो धनुष्कोट्या व्यशातयत्॥ १६॥
उस समय कुपित हुए त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवने अपने धनुषकी कोटिसे सविताकी दोनों बाँहें काट डालीं, भगकी आँखें फोड़ दीं और पूषाके सारे दाँत तोड़ डाले॥ १६॥
प्राद्रवन्त ततो देवा यज्ञाङ्गानि च सर्वशः।
केचित् तत्रैव घूर्णन्तो गतासव इवाभवन्॥ १७॥
तदनन्तर सम्पूर्ण देवता और यज्ञके सारे अंग वहाँसे पलायन कर गये। कुछ वहीं चक्कर काटते हुए प्राणहीन-से हो गये॥ १७॥
स तु विद्राव्य तत् सर्वं शितिकण्ठोऽवहस्य च।
अवष्टभ्य धनुष्कोटिं रुरोध विबुधांस्ततः॥ १८॥
वह सब कुछ दूर हटाकर भगवान् नीलकण्ठने देवताओंका उपहास करते हुए धनुषकी कोटिका सहारा ले उन सबको रोक दिया॥ १८॥
ततो वागमवैरूक्ता ज्यां तस्य धनुषोऽच्छिनत्।
अथ तत् सहसा राजंश्छिन्नज्यं व्यस्फुरद् धनुः॥ १९॥
तत्पश्चात् देवताओंद्वारा प्रेरित हुई वाणीने महादेवजीके धनुषकी प्रत्यंचा काट डाली। राजन्! सहसा प्रत्यंचा कट जानेपर वह धनुष उछलकर गिर पड़ा॥ १९॥
ततो विधनुषं देवा देवश्रेष्ठमुपागमन्।
शरणं सह यज्ञेन प्रसादं चाकरोत् प्रभुः॥ २०॥
तब देवता यज्ञको साथ लेकर धनुर्रहित देवश्रेष्ठ महादेवजीकी शरणमें गये। उस समय भगवान् शिवने उन सबपर कृपा की॥ २०॥
ततः प्रसन्नो भगवान् स्थाप्य कोपं जलाशये।
स जलं पावको भूत्वा शोषयत्यनिशं प्रभो॥ २१॥
इसके बाद प्रसन्न हुए भगवान्ने अपने क्रोधको समुद्रमें स्थापित कर दिया। प्रभो! वह क्रोध वडवानल बनकर निरन्तर उसके जलको सोखता रहता है॥ २१॥
भगस्य नयने चैव बाहू च सवितुस्तथा।
प्रादात् पूष्णश्च दशनान् पुनर्यज्ञांश्च पाण्डव॥ २२॥
पाण्डुनन्दन! फिर भगवान् शिवने भगको आँखें, सविताको दोनों बाँहें, पूषाको दाँत और देवताओंको यज्ञ प्रदान किये॥ २२॥
ततः सुस्थमिदं सर्वं बभूव पुनरेव हि।
सर्वाणि च हवींष्यस्य देवा भागमकल्पयन्॥ २३॥
॥ सौप्तिकपर्व सम्पूर्णम् ॥
तदनन्तर यह सारा जगत् पुनः सुस्थिर हो गया। देवताओंने सारे हविष्यो॑मेंसे महादेवजीके लिये भाग नियत किया॥ २३॥
तस्मिन् क्रुद्धेऽभवत् सर्वमसुस्थं भुवनं प्रभो।
प्रसन्ने च पुनः सुस्थं प्रसन्नोऽस्य च वीर्यवान्॥ २४॥
राजन्! भगवान् शंकरके कुपित होनेपर सारा जगत् डाँवाडोल हो गया था और उनके प्रसन्न होनेपर वह पुनः सुस्थिर हो गया। वे ही शक्तिशाली भगवान् शिव अश्वत्थामापर प्रसन्न हो गये थे॥ २४॥
ततस्ते निहताः सर्वे तव पुत्रा महारथाः।
अन्ये च बहवः शूराः पाञ्चालस्य पदानुगाः॥ २५॥
इसीलिये उसने आपके सभी महारथी पुत्रों तथा पांचालराजका अनुसरण करनेवाले अन्य बहुत-से शूरवीरोंका वध किया है॥ २५॥
न तन्मनसि कर्तव्यं न च तद् द्रौणिना कृतम्।
महादेवप्रसादेन कुरु कार्यमनन्तरम्॥ २६॥
अतः इस बातको आप मनमें न लावें। अश्वत्थामाने यह कार्य अपने बलसे नहीं, महादेवजीकी कृपासे सम्पन्न किया है। अब आप आगे जो कुछ करना हो, वही कीजिये॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥
॥ सौप्तिकपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् | बड़े श्लोक | बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | ७९०॥ | (१४) | १९। | ८०९॥। |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | १ | ....... | ...... | १ |
| सौप्तिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या | ८१०॥। |