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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

यत्रेजिवानुडुपती राजसूयेन भारत ।
तस्मिंस्तीर्थे महानासीत् संग्रामस्तारकामयः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! वही सोम-तीर्थ है, जहाँ नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाने राजसूययज्ञ किया था। उसी तीर्थमें महान् तारकामय संग्राम हुआ था ।। १ ।।

तत्राप्युपस्पृश्य बले दत्त्वा दानानि चात्मवान् ।
सारस्वतस्य धर्मात्मा मुनेस्तीर्थं जगाम ह ।। २ ।।
धर्मात्मा एवं मनस्वी बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान एवं दान करके सारस्वत मुनिके तीर्थमें गये ।। २ ।।

तत्र द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
वेदानध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ।। ३ ।।
प्राचीनकालमें जब बारह वर्षोंतक अनावृष्टि हो गयी थी, सारस्वत मुनिने वहीं उत्तम ब्राह्मणोंको वेदाध्ययन कराया था ।। ३ ।।

जनमेजय उवाच

कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
ऋषीनध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ।। ४ ।।
जनमेजयने पूछा—मुने! प्राचीनकालमें सारस्वत मुनिने बारह वर्षोंकी अनावृष्टिके समय उत्तम ब्राह्मणोंको किस प्रकार वेदोंका अध्ययन कराया था? ।। ४ ।।

वैशम्पायन उवाच

आसीत् पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान् महातपाः ।
दधीच इति विख्यातो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।। ५ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—महाराज! पूर्वकालमें एक बुद्धिमान् महातपस्वी मुनि रहते थे, जो ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय थे। उनका नाम था दधीच ।। ५ ।।

तस्यातितपसः शक्रो बिभेति सततं विभो ।
न स लोभयितुं शक्यः फलैर्बहुविधैरपि ।। ६ ।।
प्रभो! उनकी भारी तपस्यासे इन्द्र सदा डरते रहते थे। नाना प्रकारके फलोंका प्रलोभन देनेपर भी उन्हें लुभाया नहीं जा सकता था ।। ६ ।।

प्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत् पाकशासनः ।
दिव्यामप्सरसं पुण्यां दर्शनीयामलम्बुषाम् ॥ ७ ॥
तब इन्द्रने मुनिको लुभानेके लिये एक पवित्र दर्शनीय एवं दिव्य अप्सरा भेजी, जिसका नाम था अलम्बुषा ॥ ७ ॥
तस्य तर्पयतो देवान् सरस्वत्यां महात्मनः ।
समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भाविनी ॥ ८ ॥
महाराज! एक दिन, जब महात्मा दधीच सरस्वती नदीमें देवताओंका तर्पण कर रहे थे, वह माननीय अप्सरा उनके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥ ८ ॥
तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः ।
रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत् सा जग्राह निम्नगा ॥ ९ ॥
उस दिव्यरूपधारिणी अप्सराको देखकर उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका वीर्य सरस्वतीके जलमें गिर पड़ा। उस वीर्यको सरस्वती नदीने स्वयं ग्रहण कर लिया ॥ ९ ॥
कुक्षौ चाप्यदधाद् हृष्टा तद् रेतः पुरुषर्षभ ।
सा दधार च तं गर्भं पुत्रहेतोर्महानदी ॥ १० ॥
पुरुषप्रवर! उस महानदीने हर्षमें भरकर पुत्रके लिये उस वीर्यको अपनी कुक्षिमें रख लिया और इस प्रकार वह गर्भवती हो गयी ॥ १० ॥
सुषुवे चापि समये पुत्रं सा सरितां वरा ।
जगाम पुत्रमादाय तमृषिं प्रति च प्रभो ॥ ११ ॥
प्रभो! समय आनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने एक पुत्रको जन्म दिया और उसे लेकर वह ऋषिके पास गयी ॥ ११ ॥
ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् ।
ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् ॥ १२ ॥
राजेन्द्र! ऋषियोंकी सभामें बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ दधीचको देखकर उन्हें उनका वह पुत्र सौंपती हुई सरस्वती नदी इस प्रकार बोली— ॥ १२ ॥
ब्रह्मर्षे तव पुत्रोऽयं त्वद्भक्त्या धारितो मया ।
दृष्ट्वा तेऽप्सरसं रेतो यत् स्कन्नं प्रागलम्बुषाम् ॥ १३ ॥
तत् कुक्षिणा वै ब्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् ।
न विनाशमिदं गच्छेत् त्वत्तेज इति निश्चयात् ॥ १४ ॥
प्रतिगृहीष्व पुत्रं स्वं मया दत्तमनिन्दितम् ।

‘ब्रह्मर्षे! यह आपका पुत्र है। इसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण किया था। ब्रह्मर्षे! पहले अलम्बुषा नामक अप्सराको देखकर जो आपका वीर्य स्खलित हुआ था, उसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण कर लिया था; क्योंकि मेरे मनमें यह विचार हुआ था कि आपका यह तेज नष्ट न होने पावे। अतः आप मेरे दिये हुए अपने इस अनिन्दनीय पुत्रको ग्रहण कीजिये’ ।। १३-१४ १/२ ।।

इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् ।। १५ ।।
स्वसुतं चाप्यजिघ्रत् तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ।
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम ।। १६ ।।
सरस्वत्यै वरं प्रादात् प्रीयमाणो महामुनिः ।
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। १७ ।।
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ।
उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस पुत्रको ग्रहण कर लिया और वे बड़े प्रसन्न हुए। भरतभूषण! उन द्विजश्रेष्ठने बड़े प्रेमसे अपने उस पुत्रका मस्तक सूँघा और दीर्घ-कालतक छातीसे लगाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महामुनिने सरस्वतीको वर दिया—‘सुभगे! तुम्हारे जलसे तर्पण करनेपर विश्वेदेव, पितृगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय सभी तृप्ति-लाभ करेंगे’ ।। १५-१७ १/२ ।।

इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् ।। १८ ।।
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ।
राजन्! ऐसा कहकर अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल हृदयसे मुनिने प्रेमपूर्वक उत्तम वाणीद्वारा सरस्वती देवीका स्तवन किया। उस स्तुतिको तुम यथार्थरूपसे सुनो ।। १८ १/२ ।।

प्रसुतासि महाभागे सरसो ब्रह्मणः पुरा ।। १९ ।।
जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनयः संशितव्रताः ।
मम प्रियकरी चापि सततं प्रियदर्शने ।। २० ।।
तस्मात् सारस्वतः पुत्रो महांस्ते वरवर्णिनि ।
तवैव नाम्ना प्रथितः पुत्रस्ते लोकभावनः ।। २१ ।।
‘महाभागे! तुम पूर्वकालमें ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो। सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि तुम्हारी महिमाको जानते हैं। प्रियदर्शने! तुम सदा मेरा भी प्रिय करती रही हो; अतः वरवर्णिनि! तुम्हारा यह लोकभावन महान् पुत्र तुम्हारे ही नामपर ‘सारस्वत’ कहलायेगा ।। १९—२१ ।।

सारस्वत इति ख्यातो भविष्यति महातपाः ।
एष द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजर्षभान् ।। २२ ।।
सारस्वतो महाभागे वेदानध्यापयिष्यति ।

'यह सारस्वत नामसे विख्यात महातपस्वी होगा। महाभागे! इस संसारमें बारह वर्षोंतक जब वर्षा बंद हो जायगी, उस समय यह सारस्वत ही श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वेद पढ़ायेगा ।। २२ १/२ ।।
पुण्याभ्यश्च सरिद्भ्यस्त्वं सदा पुण्यतमा शुभे ।। २३ ।।
भविष्यसि महाभागे मत्प्रसादात् सरस्वति ।
'शुभे! महासौभाग्यशालिनी सरस्वति! तुम मेरे प्रसादसे अन्य पवित्र सरिताओंकी अपेक्षा सदा ही अधिक पवित्र बनी रहोगी' ।। २३ १/२ ।।
एवं सा संस्तुतानेन वरं लब्ध्वा महानदी ।। २४ ।।
पुत्रमादाय मुदिता जगाम भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उनके द्वारा प्रशंसित हो वर पाकर वह महानदी पुत्रको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चली गयी ।। २४ १/२ ।।
एतस्मिन्नेव काले तु विरोधे देवदानवैः ।। २५ ।।
शक्रः प्रहरणान्वेषी लोकांस्त्रीन् विचचार ह ।
इसी समय देवताओं और दानवोंमें विरोध होने-पर इन्द्र अस्त्र-शस्त्रोंकी खोजके लिये तीनों लोकोंमें विचरण करने लगे ।। २५ १/२ ।।
न चोपलेभे भगवान् शक्रः प्रहरणं तदा ।। २६ ।।
यद्धैतेषां भवेद् योग्यं वधाय विबुधद्विषाम् ।
परंतु भगवान् शक्र उस समय ऐसा कोई हथियार न पा सके, जो उन देवद्रोहियोंके वधके लिये उपयोगी हो सके ।। २६ १/२ ।।
ततोऽब्रवीत् सुरान् शक्रो न मे शक्या महासुराः ।। २७ ।।
ऋतेऽस्थिभिर्दधीचस्य निहन्तुं त्रिदशद्विषः ।
तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा—'दधीच मुनिकी अस्थियोंके सिवा और किसी अस्त्र-शस्त्रसे मेरे द्वारा देवद्रोही महान् असुर नहीं मारे जा सकते ।। २७ १/२ ।।
तस्माद् गत्वा ऋषिश्रेष्ठो याच्यतां सुरसत्तमाः ।। २८ ।।
दधीचास्थीनि देहीति तैर्वधिष्यामहे रिपून् ।
'अतः सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग जाकर मुनिवर दधीचसे याचना करो कि आप अपनी हड्डियाँ हमें दे दें। हम उन्हींके द्वारा अपने शत्रुओंका वध करेंगे' ।। २८ १/२ ।।
स च तैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा ।। २९ ।।
प्राणत्यागं कुरुश्रेष्ठ चकारैवाविचारयन् ।
स लोकानक्षयान् प्राप्तो देवप्रियकरस्तदा ।। ३० ।।
कुरुश्रेष्ठ! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अस्थियोंके लिये याचना की जानेपर मुनिवर दधीचने बिना कोई विचार किये अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। उस समय देवताओंका

प्रिय करनेके कारण वे अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ २९-३० ॥
तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा ।
कारयामास दिव्यानि नानाप्रहरणानि च ॥ ३१ ॥
गदावज्राणि चक्राणि गुरून् दण्डांश्च पुष्कलान् ।
तब इन्द्रने प्रसन्नचित्त होकर दधीचकी हड्डियोंसे गदा, वज्र, चक्र और बहुसंख्यक भारी दण्ड आदि नाना प्रकारके दिव्य आयुध तैयार कराये ॥ ३१ १/२ ॥
स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा ॥ ३२ ॥
प्रजापतिसुतेनाथ भृगुणा लोकभावनः ।
अतिकायः स तेजस्वी लोकसारो विनिर्मितः ॥ ३३ ॥
ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि भृगुने तीव्र तपस्यासे भरे हुए लोकमंगलकारी विशालकाय एवं तेजस्वी दधीचको उत्पन्न किया था। ऐसा जान पड़ता था, मानो सम्पूर्ण जगत्के सारतत्त्वसे उनका निर्माण किया गया हो ॥ ३२-३३ ॥
जज्ञे शैलगुरुः प्रांशुर्महिम्ना प्रथितः प्रभुः ।
नित्यमुद्विजते चास्य तेजसः पाकशासनः ॥ ३४ ॥
वे पर्वतके समान भारी और ऊँचे थे। अपनी महत्ताके लिये वे सामर्थ्यशाली मुनि सर्वत्र विख्यात थे। पाकशासन इन्द्र उनके तेजसे सदा उद्विग्न रहते थे ॥ ३४ ॥
तेन वज्रेण भगवान् मन्त्रयुक्तेन भारत ।
भृशं क्रोधविसृष्टेन ब्रह्मतेजोद्भवेन च ॥ ३५ ॥
दैत्यदानववीराणां जघान नवतीर्नव ।
भरतनन्दन! ब्रह्मतेजसे प्रकट हुए उस वज्रको मन्त्रोच्चारणके साथ अत्यन्त क्रोधपूर्वक छोड़कर भगवान् इन्द्रने आठ सौ दस दैत्य-दानव वीरोंका वध कर डाला ॥ ३५ १/२ ॥
अथ काले व्यतिक्रान्ते महत्यतिभयंकरे ॥ ३६ ॥
अनावृष्टिरनुप्राप्ता राजन् द्वादशवार्षिकी ।
राजन्! तदनन्तर सुदीर्घ काल व्यतीत होनेपर जगत्में बारह वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अत्यन्त भयंकर अनावृष्टि प्राप्त हुई ॥ ३६ १/२ ॥
तस्यां द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महर्षयः ॥ ३७ ॥
वृत्त्यर्थं प्राद्रवन् राजन् क्षुधार्ताः सर्वतोदिशम् ।
नरेश्वर! बारह वर्षोंकी उस अनावृष्टिमें सब महर्षि भूखसे पीड़ित हो जीविकाके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ने लगे ॥ ३७ १/२ ॥
दिग्भ्यस्तान् प्रद्रुतान् दृष्ट्वा मुनिः सारस्वतस्तदा ॥ ३८ ॥
गमनाय मतिं चक्रे तं प्रोवाच सरस्वती ।
सम्पूर्ण दिशाओंसे भागकर इधर-उधर जाते हुए उन महर्षियोंको देखकर सारस्वत मुनिने भी वहाँसे अन्यत्र जानेका विचार किया। तब सरस्वतीदेवीने उनसे कहा ।।

न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदा ॥ ३९ ॥
दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत।
भरतनन्दन! सरस्वती इस प्रकार बोलीं—‘बेटा! तुम्हें यहाँसे कहीं नहीं जाना चाहिये। मैं सदा तुम्हें भोजनके लिये उत्तमोत्तम मछलियाँ दूँगी; अतः तुम यहीं रहो’॥

इत्युक्तस्तर्पयामास स पितॄन् देवतास्तथा ॥ ४० ॥
आहारमकरोन्नित्यं प्राणान् वेदांश्च धारयन्।
सरस्वतीके ऐसा कहनेपर सारस्वत मुनि वहीं रहकर देवताओं और पितरोंको तृप्त करने लगे। वे प्रतिदिन भोजन करते और अपने प्राणों तथा वेदोंकी रक्षा करते थे॥ ४० १/२ ॥

अथ तस्यामनावृष्ट्यामतीतायां महर्षयः ॥ ४१ ॥
अन्योन्यं परिपप्रच्छुः पुनः स्वाध्यायकारणात्।
जब बारह वर्षोंकी वह अनावृष्टि प्रायः बीत गयी, तब महर्षि पुनः स्वाध्यायके लिये एक-दूसरेसे पूछने लगे॥ ४१ १/२ ॥

तेषां क्षुधापरीतानां नष्टा वेदाभिधावताम् ॥ ४२ ॥
सर्वेषामेव राजेन्द्र न कश्चित् प्रतिभानवान्।
राजेन्द्र! उस समय भूखसे पीड़ित होकर इधर-उधर दौड़नेवाले सभी महर्षि वेद भूल गये थे। कोई भी ऐसा प्रतिभाशाली नहीं था, जिसे वेदोंका स्मरण रह गया हो॥ ४२ १/२ ॥

अथ कश्चिदृषिस्तेषां सारस्वतमुपेयिवान् ॥ ४३ ॥
कुर्वाणं संशितात्मानं स्वाध्यायमृषिसत्तमम्।
तदनन्तर उनमेंसे कोई ऋषि प्रतिदिन स्वाध्याय करनेवाले शुद्धात्मा मुनिवर सारस्वतके पास आये॥

स गत्वाऽऽचष्ट तेभ्यश्च सारस्वतमतिप्रभम् ॥ ४४ ॥
स्वाध्यायममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने वने।
फिर वहाँसे जाकर उन्होंने सब महर्षियोंको बताया कि ‘देवताओंके समान अत्यन्त कान्तिमान् एक सारस्वत मुनि हैं, जो निर्जन वनमें रहकर सदा स्वाध्याय करते हैं’॥

ततः सर्वे समाजग्मुस्तत्र राजन् महर्षयः ॥ ४५ ॥
सारस्वतं मुनिश्रेष्ठमिदमूचुः समागताः।
अस्मानध्यापयस्वेति तानुवाच ततो मुनिः ॥ ४६ ॥
शिष्यत्वमुपगच्छध्वं विधिवद्द्वि ममेत्युत।
राजन्! यह सुनकर वे सब महर्षि वहाँ आये और आकर मुनिश्रेष्ठ सारस्वतसे इस प्रकार बोले—‘मुने! आप हम लोगोंको वेद पढ़ाइये।’ तब सारस्वतने उनसे कहा—‘आपलोग विधिपूर्वक मेरी शिष्यता ग्रहण करें’॥

तत्राब्रुवन् मुनिगणा बालस्त्वमसि पुत्रक ॥ ४७ ॥

स तानाह न मे धर्मो नश्येदिति पुनर्मुनीन् ।
यो ह्यधर्मेण वै ब्रूयाद् गृह्णीयाद् योऽप्यधर्मतः ॥ ४८ ॥
हीयेतां तावुभौ क्षिप्रं स्यातां वा वैरिणावुभौ ।
तब वहाँ उन मुनियोंने कहा—'बेटा! तुम तो अभी बालक हो' (हम तुम्हारे शिष्य कैसे हो सकते हैं?) तब सारस्वतने पुनः उन मुनियोंसे कहा—'मेरा धर्म नष्ट न हो, इसलिये मैं आपलोगोंको शिष्य बनाना चाहता हूँ; क्योंकि जो अधर्मपूर्वक वेदोंका प्रवचन करता है तथा जो अधर्मपूर्वक उन वेदमन्त्रोंको ग्रहण करता है, वे दोनों शीघ्र ही हीनावस्थाको प्राप्त होते हैं अथवा दोनों एक-दूसरेके वैरी हो जाते हैं ।। ४७-४८१/२ ।।
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ॥ ४९ ॥
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ।
'न बहुत वर्षोंकी अवस्था होनेसे, न बाल पकनेसे, न धनसे और न अधिक भाई-बन्धुओंसे कोई बड़ा होता है। ऋषियोंने हमारे लिये यही धर्म निश्चित किया है कि हममेंसे जो वेदोंका प्रवचन कर सके, वही महान् है' ।।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य मुनयस्ते विधानतः ॥ ५० ॥
तस्माद् वेदाननुप्राप्य पुनर्धर्मं प्रचक्रिरे ।
सारस्वतकी यह बात सुनकर वे मुनि उनसे विधिपूर्वक वेदोंका उपदेश पाकर पुनः धर्मका अनुष्ठान करने लगे ।। ५०१/२ ।।
षष्टिर्मुनिसहस्राणि शिष्यत्वं प्रतिपेदिरे ॥ ५१ ॥
सारस्वतस्य विप्रर्षेर्वेदस्वाध्यायकारणात् ।
साठ हजार मुनियोंने स्वाध्यायके निमित्त ब्रह्मर्षि सारस्वतकी शिष्यता ग्रहण की थी ।। ५११/२ ।।
मुष्टिं मुष्टिं ततः सर्वे दर्भाणां ते ह्युपाहरन् ।
तस्यासनार्थं विप्रर्षेर्बालस्यापि वशे स्थिताः ॥ ५२ ॥
वे ब्रह्मर्षि यद्यपि बालक थे तो भी वे सभी बड़े-बड़े महर्षि उनकी आज्ञाके अधीन रहकर उनके आसनके लिये एक-एक मुट्ठी कुश ले आया करते थे ।।
तत्रापि दत्त्वा वसु रौहिणेयो
महाबलः केशवपूर्वजोऽथ ।
जगाम तीर्थं मुदितः क्रमेण
ख्यातं महद् वृद्धकन्या स्म यत्र ॥ ५३ ॥
श्रीकृष्णके बड़े भाई महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजी वहाँ भी स्नान और धन दान करके प्रसन्नतापूर्वक क्रमशः सब तीर्थोंमें विचरते हुए उस विख्यात महातीर्थमें गये, जहाँ कभी वृद्धा कुमारी कन्या निवास करती थी ।। ५३ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥