महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2082)
द्विषष्टितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरपर कौरव-सैनिकोंका आक्रमण
संजय उवाच
ततः श्वेताश्वसंयुक्ते नारायणसमाहिते ।
तिष्ठन् रथवरे श्रीमानर्जुनः समपद्यत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सावधानीसे संचालित और श्वेत घोड़ोंसे युक्त उत्तम रथपर खड़े हुए श्रीमान् अर्जुन वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
तद् बलं नृपतिश्रेष्ठ तावकं विजयो रणे ।
व्यक्षोभयदुदीर्णाश्वं महोदधिमिवानिलः ॥ २ ॥
नृपश्रेष्ठ! जैसे प्रचण्ड वायु महासागरको विक्षुब्ध कर देती है, उसी प्रकार रणभूमिमें स्थित प्रचण्ड अश्वोंसे युक्त आपकी सेनामें अर्जुनने हलचल मचा दी ॥ २ ॥
दुर्योधनस्तव सुतः प्रमत्ते श्वेतवाहने ।
अभ्येत्य सहसा क्रुद्धः सैन्यार्धेनाभिसंवृतः ॥ ३ ॥
पर्यवारयदायान्तं युधिष्ठिरममर्षणम् ।
क्षुरप्राणां त्रिसप्तत्या ततोऽविध्यत पाण्डवम् ॥ ४ ॥
जब श्वेतवाहन अर्जुन असावधान थे, उसी समय क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनने सहसा आधी सेनाके साथ आकर अपनी ओर आते हुए अमर्षशील पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेर लिया। साथ ही तिहत्तर क्षुरप्रोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया ॥ ३-४ ॥
अक्रुध्यत भृशं तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
स भल्लांस्त्रिंशतस्तूर्णं तव पुत्रे न्यवेशयत् ॥ ५ ॥
तब वहाँ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अत्यन्त कुपित हो उठे। उन्होंने आपके पुत्रपर तीन भल्लोंका प्रहार किया ॥ ५ ॥
ततोऽधावन्त कौरव्या जिघृक्षन्तो युधिष्ठिरम् ।
दुष्टभावान् पराञ्ज्ञात्वा समवेता महारथाः ॥ ६ ॥
आजग्मुस्तं परीप्सन्तः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
तदनन्तर कौरव-सैनिक युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये दौड़े। शत्रुओंकी यह दुर्भावना जानकर एकत्र हुए पाण्डवमहारथी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये वहाँ आ पहुँचे ॥ ६ १/२ ॥
नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ७ ॥
अक्षौहिण्या परिवृतास्तेऽध्यधावन् युधिष्ठिरम् ।
नकुल, सहदेव और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न—ये एक अक्षौहिणी सेना साथ लेकर युधिष्ठिरके पास दौड़े आये ॥ ७१/२ ॥
भीमसेनश्च समरे मृद्नंस्तव महारथान् ॥ ८ ॥
अभ्यधावदभिप्रेप्सू राजानं शत्रुभिर्वृतम् ।
भीमसेन भी शत्रुओंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरको बचानेके लिये समरांगणमें आपके महारथियोंको रौंदते हुए उनके पास दौड़े आये ॥ ८१/२ ॥
तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् कर्णो वैकर्तनो नृप ॥ ९ ॥
शरवर्षेण महता प्रत्यवारयदागतान् ।
नरेश्वर! वैकर्तन कर्णने वहाँ आये हुए सम्पूर्ण महाधनुर्धरोंको अपने बाणोंकी भारी वर्षासे रोक दिया ॥
शरौघान् विसृजन्तस्ते प्रेरयन्तश्च तोमरान् ॥ १० ॥
न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि राधेयं प्रतिवीक्षितुम् ।
वे सब महारथी प्रयत्नपूर्वक बाणसमूहोंकी वर्षा और तोमरोंका प्रहार करते हुए भी राधापुत्रको देख न सके ॥
तांश्च सर्वान् महेष्वासान् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः ॥ ११ ॥
महता शरवर्षेण राधेयः प्रत्यवारयत् ।
सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके पारंगत विद्वान् राधापुत्र कर्णने बड़ी भारी बाण-वर्षा करके उन समस्त धनुर्धरोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १११/२ ॥
दुर्योधनं च विंशत्या शीघ्रमस्त्रमुदीरयन् ॥ १२ ॥
अविध्यत् तूर्णमभ्येत्य सहदेवः प्रतापवान् ।
इसी समय प्रतापी सहदेवने आकर शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाते हुए तुरंत ही बीस बाणोंसे दुर्योधनको बींध डाला ॥ १२१/२ ॥
स विद्धः सहदेवेन रराजाचलसंनिभः ॥ १३ ॥
प्रभिन्न इव मातङ्गो रुधिरेण परिप्लुतः ।
सहदेवके बाणोंसे विद्ध होकर दुर्योधन अनेक शिखरोंवाले पर्वतके समान सुशोभित हुआ। खूनसे लथपथ होकर वह मदकी धारा बहानेवाले मदमत्त हाथीके समान जान पड़ता था ॥ १३१/२ ॥
दृष्ट्वा तव सुतं तत्र गाढविद्धं सुतेजनैः ॥ १४ ॥
अभ्यधावद् दृढं क्रुद्धो राधेयो रथिनां वरः ।
रथियोंमें श्रेष्ठ राधापुत्र कर्ण आपके पुत्रको तेज बाणोंसे अत्यन्त घायल हुआ देख कुपित होकर दौड़ा ॥
दुर्योधनं तथा दृष्ट्वा शीघ्रमस्त्रमुदैरयत् ॥ १५ ॥
तेन यौधिष्ठिरं सैन्यमवधीत् पार्षतं तथा ।
दुर्योधनकी वैसी अवस्था देख उसने शीघ्र अपना अस्त्र प्रकट किया और उसीके द्वारा युधिष्ठिरकी सेना एवं द्रुपदपुत्रको घायल कर दिया ॥ १५ १/२ ॥
ततो यौधिष्ठिरं सैन्यं वध्यमानं महात्मना ॥ १६ ॥
सहसा प्राद्रवद् राजन् सूतपुत्रशरार्दितम् ।
राजन्! महामना सूतपुत्र कर्णकी मार खाकर उसके बाणोंसे पीड़ित हो युधिष्ठिरकी सेना सहसा भाग चली ॥
विविधा विशिखास्तत्र सम्पतन्तः परस्परम् ॥ १७ ॥
फलैः पुङ्खान् समाजग्मुः सूतपुत्रधनुश्च्युताः ।
सूतपुत्र कर्णके धनुषसे छूटकर परस्पर गिरते हुए नाना प्रकारके बाण अपने फलोंद्वारा पहलेके गिरे हुए बाणोंके पंखोंमें जुड़ जाते थे ॥ १७ १/२ ॥
अन्तरिक्षे शरौघाणां पततां च परस्परम् ॥ १८ ॥
संघर्षेण महाराज पावकः समजायत ।
महाराज! आकाशमें परस्पर टकराते हुए बाणसमूहोंकी रगड़से आग प्रकट हो जाती थी ॥ १८ १/२ ॥
ततो दश दिशः कर्णः शलभैरिव यायिभिः ॥ १९ ॥
अभ्यहंस्तरसा राजञ्शरैः परशरीरगैः ।
राजन्! तदनन्तर कर्णने पतंगोंकी तरह चलकर शत्रुओंके शरीरोंमें घुस जानेवाले बाणोंद्वारा वेगपूर्वक दसों दिशाओंमें प्रहार आरम्भ किया ॥ १९ १/२ ॥
रक्तचन्दनसंदिग्धौ मणिहेमविभूषितौ ॥ २० ॥
बाहू व्यत्यक्षिपत् कर्णः परमास्त्रं विदर्शयन् ।
दिव्यास्त्रोंका प्रदर्शन करता हुआ कर्ण मणि एवं सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित तथा लाल चन्दनसे चर्चित दोनों भुजाओंको बारंबार हिला रहा था ॥ २० १/२ ॥
ततः सर्वा दिशो राजन् सायकैर्विप्रमोहयन् ॥ २१ ॥
अपीडयद् भृशं कर्णो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
राजन्! तत्पश्चात् अपने बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको मोहित करते हुए कर्णने धर्मराज युधिष्ठिरको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ॥ २१ १/२ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥
निशितैरिषुभिः कर्णं पञ्चाशद्भिः समर्पयत् ।
महाराज! इससे कुपित हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिरने कर्णपर पचास पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ २२ १/२ ॥
बाणान्धकारमभवत्तद् युद्धं घोरदर्शनम् ॥ २३ ॥
हाहाकारो महानासीत्तावकानां विशाम्पते ।
वध्यमाने तदा सैन्ये धर्मपुत्रेण मारिष ॥ २४ ॥
उस समय भयंकर दिखायी देनेवाला वह युद्ध बाणोंके अन्धकारसे व्याप्त हो गया। माननीय प्रजानाथ! जब धर्मपुत्र युधिष्ठिर कौरव-सेनाका वध करने लगे, उस समय आपके योद्धाओंका महान् हाहाकार सब ओर गूँज उठा ॥ २३-२४ ॥
सायकैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ।
भल्लैरनेकैर्विविधैः शक्त्यृष्टिमुसलैरपि ॥ २५ ॥
यत्र यत्र स धर्मात्मा दुष्टां दृष्टिं व्यसर्जयात् ।
तत्र तत्र व्यशीर्यन्त तावका भरतर्षभ ॥ २६ ॥
भरतश्रेष्ठ! धर्मात्मा युधिष्ठिर शिलापर तेज किये हुए कंकपत्रयुक्त एवं नाना प्रकारके पैने बाणों, भाँति-भाँतिके बहुसंख्यक भल्लों तथा शक्ति, ऋष्टि एवं मूसलोंद्वारा प्रहार करते हुए जहाँ-जहाँ क्रोधरूपी दोषसे पूर्ण दृष्टि डालते थे, वहीं-वहीं आपके सैनिक छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाते थे ॥ २५-२६ ॥
कर्णोऽपि भृशसंक्रुद्धो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
नाराचैरर्धचन्द्रैश्च वत्सदन्तैश्च संयुगे ॥ २७ ॥
अमर्षी क्रोधनश्चैव रोषप्रस्फुरिताननः ।
सायकैरप्रमेयात्मा युधिष्ठिरमभिद्रवत् ॥ २८ ॥
कर्ण भी अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ था। वह अमर्षशील और क्रोधी तो था ही, रोषसे उसका मुख फड़क रहा था। अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न उस वीरने युद्धस्थलमें नाराचों, अर्धचन्द्रों तथा वत्सदन्तोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ २७-२८ ॥
युधिष्ठिरश्चापि स तं स्वर्णपुङ्खैः शितैः शरैः ।
प्रहसन्निव तं कर्णः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ॥ २९ ॥
उरस्यविध्यद् राजानं त्रिभिर्भल्लैश्च पाण्डवम् ।
इसी प्रकार युधिष्ठिरने भी कर्णको सोनेकी पाँखवाले पैने बाणोंद्वारा घायल कर दिया। तब कर्णने हँसते हुए-से शिलापर तेज किये गये कंकपत्रयुक्त तीन भल्लोंद्वारा पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २९ १/२ ॥
स पीडितो भृशं तेन धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥
उपविश्य रथोपस्थे सूतं याहीत्यचोदयत् ।
उस प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित हो धर्मराज युधिष्ठिर रथके पिछले भागमें बैठ गये और सारथिको आदेश देते हुए बोले—'यहाँसे अन्यत्र रथ ले चलो' ॥ ३० १/२ ॥
अक्रोशन्त ततः सर्वे धार्तराष्ट्राः सराजकाः ॥ ३१ ॥
गृह्लीध्वमिति राजानमभ्यधावन्त सर्वशः ।
उस समय राजा दुर्योधनसहित आपके सभी पुत्र इस प्रकार कोलाहल करने लगे—‘राजा युधिष्ठिरको पकड़ लो’ ऐसा कहकर वे सभी ओरसे उनकी ओर दौड़ पड़े ॥
ततः शताः सप्तदश केकयानां प्रहारिणाम् ॥ ३२ ॥
पञ्चालैः सहिता राजन् धार्तराष्ट्रान् न्यवारयन् ।
राजन्! तब प्रहारकुशल सत्रह सौ केकय योद्धा पांचालोंके साथ आकर आपके पुत्रोंको रोकने लगे ॥
तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने जनक्षये ॥ ३३ ॥
दुर्योधनश्च भीमश्च समेयातां महाबलौ ॥ ३४ ॥
जिस समय वह जनसंहारकारी भयंकर युद्ध चल रहा था, उस समय महाबली दुर्योधन और भीमसेन एक-दूसरेसे जूझने लगे ॥ ३३-३४ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥