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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2438)

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द्वितीयोऽध्यायः

राजा धृतराष्ट्रका विलाप करना और संजयसे युद्धका वृत्तान्त पूछना

वैशम्पायन उवाच

विसृष्टास्वथ नारीषु धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
विललाप महाराज दुःखाद् दुःखान्तरं गतः ॥ १ ॥
सधूममिव निःश्वस्य करौ धुन्वन् पुनः पुनः ।
विचिन्त्य च महाराज वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! स्त्रियोंके बिदा हो जानेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र एक दुःखसे दूसरे दुःखमें पड़कर गरम-गरम उच्छ्वास लेते और बारंबार दोनों हाथ हिलाते हुए विलाप करने लगे और बड़ी देरतक चिन्तामग्न रहकर इस प्रकार बोले ॥ १-२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

अहो बत महद्दुःखं यदहं पाण्डवान् रणे ।
क्षेमिणश्चाव्ययांश्चैव त्वत्तः सूत शृणोमि वै ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—सूत! मेरे लिये महान् दुःखकी बात है कि मैं तुम्हारे मुखसे रणभूमिमें पाण्डवोंको सकुशल और विनाशरहित सुन रहा हूँ ॥ ३ ॥
वज्रसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ।
यच्छ्रुत्वा निहतान् पुत्रान् दीर्यते न सहस्रधा ॥ ४ ॥
निश्चय ही मेरा यह सुदृढ़ हृदय वज्रके सारतत्त्वका बना हुआ है; क्योंकि अपने पुत्रोंको मारा गया सुनकर भी इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं ॥ ४ ॥
चिन्तयित्वा वयस्तेषां बालक्रीडां च संजय ।
हतान् पुत्रानशेषेण दीर्यते मे भृशं मनः ॥ ५ ॥
संजय! मैं उनकी अवस्था और बाल-क्रीड़ाका चिन्तन करके जब उन सबके मारे जानेकी बात सोचता हूँ, तब मेरा हृदय अत्यन्त विदीर्ण होने लगता है ॥ ५ ॥
अनेत्रत्वाद् यदेतेषां न मे रूपनिदर्शनम् ।
पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता ॥ ६ ॥
यद्यपि नेत्रहीन होनेके कारण मैंने उनका रूप कभी नहीं देखा था, तथापि इन सबके प्रति पुत्रस्नेह-जनित प्रेमका भाव सदा ही रखा है ॥ ६ ॥
बालभावमतिक्रम्य यौवनस्थांश्च तानहम् ।

मध्यप्राप्तांस्तथा श्रुत्वा हृष्ट आसं तदानघ ॥ ७ ॥
निष्पाप संजय! जब मैं यह सुनता था कि मेरे बच्चे बाल्यावस्थाको लाँघकर युवावस्थामें प्रविष्ट हुए हैं और धीरे-धीरे मध्य अवस्थातक पहुँच गये हैं, तब हर्षसे फूल उठता था ॥ ७ ॥

तानद्य निहतान् श्रुत्वा हतैश्वर्यान् हतौजसः ।
न लभेयं क्वचिच्छान्तिं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥ ८ ॥
आज उन्हीं पुत्रोंको ऐश्वर्य और बलसे हीन एवं मारा गया सुनकर उनकी चिन्तासे व्यथित हो कहीं भी शान्ति नहीं पा रहा हूँ ॥ ८ ॥

एह्येहि पुत्र राजेन्द्र ममानाथास्य साम्प्रतम् ।
त्वया हीनो महाबाहो कां नु यास्याम्यहं गतिम् ॥ ९ ॥
(इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार विलाप करने लगे—) बेटा! राजाधिराज! इस समय मुझ अनाथके पास आओ, आओ। महाबाहो! तुम्हारे बिना न जाने मैं किस दशाको पहुँच जाऊँगा? ॥ ९ ॥

कथं त्वं पृथिवीपालांस्त्यक्त्वा तात समागतान् ।
शेषे विनिहतो भूमौ प्राकृतः कुन्नृपो यथा ॥ १० ॥
तात! तुम यहाँ पधारे हुए समस्त भूमिपालोंको छोड़कर किसी नीच और दुष्ट राजाके समान मारे जाकर पृथ्‌वीपर कैसे सो रहे हो? ॥ १० ॥

गतिर्भूत्वा महाराज ज्ञातीनां सुहृदां तथा ।
अन्धं वृद्धं च मां वीर विहाय क्व नु यास्यसि ॥ ११ ॥
वीर महाराज! तुम भाई-बन्धुओं और सुहृदोंके आश्रय होकर भी मुझ अंधे और बूढ़ेको छोड़कर कहाँ चले जा रहे हो? ॥ ११ ॥

सा कृपा सा च ते प्रीतिः क्व सा राजन् सुमानिता ।
कथं विनिहतः पार्थैः संयुगेष्वपराजितः ॥ १२ ॥
राजन्! तुम्हारी वह कृपा, वह प्रीति और दूसरोंको सम्मान देनेकी वह वृत्ति कहाँ चली गयी? तुम तो किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे; फिर कुन्तीके पुत्रोंके द्वारा युद्धमें कैसे मारे गये? ॥ १२ ॥

को नु मामुत्थितं वीर तात तातेति वक्ष्यति ।
महाराजेति सततं लोकनाथेति चासकृत् ॥ १३ ॥
वीर! अब मेरे उठनेपर मुझे सदा तात, महाराज और लोकनाथ आदि बारंबार कहकर कौन पुकारेगा? ॥ १३ ॥

परिष्वज्य च मां कण्ठे स्नेहेन क्लिन्नलोचनः ।
अनुशाधीति कौरव्य तत् साधु वद मे वचः ॥ १४ ॥

कुरुनन्दन! तुम पहले स्नेहसे नेत्रोंमें आँसू भरकर मेरे गलेसे लग जाते और कहते 'पिताजी! मुझे कर्तव्यका उपदेश दीजिये', वही सुन्दर बात फिर मुझसे कहो ॥ १४ ॥

ननु नामाहमश्रौषं वचनं तव पुत्रक ।
भूयसी मम पृथ्वीयं यथा पार्थस्य नो तथा ॥ १५ ॥
बेटा! मैंने तुम्हारे मुँहसे यह बात सुनी थी कि 'मेरे अधिकारमें बहुत बड़ी पृथ्वी है। इतना विशाल भूभाग कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके अधिकारमें कभी नहीं रहा ॥ १५ ॥

भगदत्तः कृपः शल्य आवन्त्योऽथ जयद्रथः ।
भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजश्च बाह्निकः ॥ १६ ॥
अश्वत्थामा च भोजश्च मागधश्च महाबलः ।
बृहद्बलश्च क्राथश्च शकुनिश्चापि सौबलः ॥ १७ ॥
म्लेच्छाश्च शतसाहस्राः शकाश्च यवनैः सह ।
सुदक्षिणश्च काम्बोजस्त्रिगर्ताधिपतिस्तथा ॥ १८ ॥
भीष्मः पितामहश्चैव भारद्वाजोऽथ गौतमः ।
श्रुतायुश्चायुतायुश्च शतायुश्चापि वीर्यवान् ॥ १९ ॥
जलसन्धोऽथार्ष्यशृङ्गी राक्षसश्चाप्यलायुधः ।
अलम्बुषो महाबाहुः सुबाहुश्च महारथः ॥ २० ॥
एते चान्ये च बहवो राजानो राजसत्तम ।
मदर्थमुद्यताः सर्वे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ २१ ॥
'नृपश्रेष्ठ! भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, अवन्तीके राजकुमार, जयद्रथ, भूरिश्रवा, सोमदत्त, महाराज बाह्निक, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, महाबली मगधनरेश बृहद्वल, क्राथ, सुबलपुत्र शकुनि, लाखों म्लेच्छ, यवन एवं शक, काम्बोजराज सुदक्षिण, त्रिगर्तराज सुशर्मा, पितामह भीष्म, भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य, गौतमगोत्रीय कृपाचार्य, श्रुतायु, अयुतायु, पराक्रमी शतायु, जलसन्ध, ऋष्यशृंगपुत्र राक्षस अलायुध, महाबाहु अलम्बुष और महारथी सुबाहु—ये तथा और भी बहुत-से नरेश मेरे लिये प्राणों और धनका मोह छोड़कर सब-के-सब युद्धके लिये उद्यत हैं ॥

तेषां मध्ये स्थितो युद्धे भ्रातृभिः परिवारितः ।
योधयिष्याम्यहं पार्थान् पञ्चालांश्चैव सर्वशः ॥ २२ ॥
'इन सबके बीचमें रहकर भाइयोंसे घिरा हुआ मैं रणभूमिमें पाण्डवों और पांचालोंके साथ युद्ध करूँगा ॥ २२ ॥

चेदींश्च नृपशार्दूल द्रौपदेयांश्च संयुगे ।
सात्यकिं कुन्तिभोजं च राक्षसं च घटोत्कचम् ॥ २३ ॥
'राजसिंह! मैं युद्धस्थलमें चेदियों, द्रौपदीकुमारों, सात्यकि, कुन्तिभोज तथा राक्षस घटोत्कचका भी सामना करूँगा ॥ २३ ॥

एकोऽप्येषां महाराज समर्थः संनिवारणे ।
समरे पाण्डवेयानां संक्रुद्धो ह्यभिधावताम् ॥ २४ ॥
किं पुनः सहिता वीराः कृतवैराश्च पाण्डवैः ।
‘महाराज! मेरे इन सहयोगियोंमेंसे एक-एक वीर भी समरांगणमें कुपित होकर मुझपर आक्रमण करनेवाले समस्त पाण्डवोंको रोकनेमें समर्थ हैं। फिर यदि पाण्डवोंके साथ वैर रखनेवाले ये सारे वीर एक साथ होकर युद्ध करें तब क्या नहीं कर सकते ॥ २४ १/२ ॥
अथवा सर्व एवैते पाण्डवस्यानुयायिभिः ॥ २५ ॥
योत्स्यन्ते सह राजेन्द्र हनिष्यन्ति च तान् मृधे ।
‘राजेन्द्र! अथवा ये सभी योद्धा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अनुयायियोंके साथ युद्ध करेंगे और उन सबको रणभूमिमें मार गिरायेंगे ॥ २५ १/२ ॥
कर्ण एको मया सार्धं निहनिष्यति पाण्डवान् ॥ २६ ॥
ततो नृपतयो वीराः स्थास्यन्ति मम शासने ।
‘अकेला कर्ण ही मेरे साथ रहकर समस्त पाण्डवोंको मार डालेगा। फिर सारे वीर नरेश मेरी आज्ञाके अधीन हो जायँगे ॥ २६ १/२ ॥
यश्च तेषां प्रणेता वै वासुदेवो महाबलः ॥ २७ ॥
न स संनह्यते राजन्निति मामब्रवीद् वचः ।
‘राजन्! पाण्डवोंके जो नेता हैं, वे महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण युद्धके लिये कवच नहीं धारण करेंगे।' ऐसी बात दुर्योधन मुझसे कहता था ॥ २७ १/२ ॥
तस्याथ वदतः सूत बहुशो मम संनिधौ ॥ २८ ॥
शक्तितो ह्यनुपश्यामि निहतान् पाण्डवान् रणे ।
सूत! मेरे निकट दुर्योधन जब इस तरहकी बहुत-सी बातें कहने लगा तो मैं यह समझ बैठा कि ‘हमारी शक्तिसे समस्त पाण्डव रणभूमिमें मारे जायँगे' ॥ २८ १/२ ॥
तेषां मध्ये स्थिता यत्र हन्यन्ते मम पुत्रकाः ॥ २९ ॥
व्यायच्छमानाः समरे किमन्यद् भागधेयतः ।
जब ऐसे वीरोंके बीचमें रहकर भी प्रयत्नपूर्वक लड़नेवाले मेरे पुत्र समरांगणमें मार डाले गये, तब इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ २९ १/२ ॥
भीष्मश्च निहतो यत्र लोकनाथः प्रतापवान् ॥ ३० ॥
शिखण्डिनं समासाद्य मृगेन्द्र इव जम्बुकम् ।
द्रोणश्च ब्राह्मणो यत्र सर्वशस्त्रास्त्रपारगः ॥ ३१ ॥
निहतः पाण्डवैः संख्ये किमन्यद् भागधेयतः ।

जैसे सिंह सियारसे लड़कर मारा जाय, उसी प्रकार जहाँ लोकरक्षक प्रतापी वीर भीष्म शिखण्डीसे भिड़कर वधको प्राप्त हुए, जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी विद्याके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण द्रोणाचार्य पाण्डवोंद्वारा युद्धस्थलमें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ।। ३०-३१ १/२ ।।

कर्णश्च निहतः संख्ये दिव्यास्त्रज्ञो महाबलः ।। ३२ ।।
भूरिश्रवा हतो यत्र सोमदत्तश्च संयुगे ।
बाह्लिकश्च महाराजः किमन्यद् भागधेयतः ।। ३३ ।।
जहाँ दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाला महाबली कर्ण युद्धमें मारा गया, जहाँ समरांगणमें भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लिकका संहार हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण बताया जा सकता है? ।। ३२-३३ ।।

भगदत्तो हतो यत्र गजयुद्धविशारदः ।
जयद्रथश्च निहतः किमन्यद् भागधेयतः ।। ३४ ।।
जहाँ गजयुद्धविशारद राजा भगदत्त मारे गये और सिंधुराज जयद्रथका वध हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ।। ३४ ।।

सुदक्षिणो हतो यत्र जलसन्धश्च पौरवः ।
श्रुतायुश्चायुतायुश्च किमन्यद् भागधेयतः ।। ३५ ।।
जहाँ काम्बोजराज सुदक्षिण, पौरव, जलसन्ध, श्रुतायु और अयुतायु मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण हो सकता है? ।। ३५ ।।

महाबलस्तथा पाण्ड्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
निहतः पाण्डवैः संख्ये किमन्यद् भागधेयतः ।। ३६ ।।
जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबली पाण्ड्यनरेश युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे मारे गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण है? ।। ३६ ।।

बृहद्वलो हतो यत्र मागधश्च महाबलः ।
उग्रायुधश्च विक्रान्तः प्रतिमानं धनुष्मताम् ।। ३७ ।।
आवन्त्यो निहतो यत्र त्रैगर्तश्च जनाधिपः ।
संशप्तकाश्च निहताः किमन्यद् भागधेयतः ।। ३८ ।।
जहाँ बृहद्वल, महाबली मगधनरेश, धनुर्धरोंके आदर्श एवं पराक्रमी उग्रायुध, अवन्तीके राजकुमार, त्रिगर्तनरेश सुशर्मा तथा सम्पूर्ण संशप्तक योद्धा मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ।। ३७-३८ ।।

अलम्बुषो महाशूरो राक्षसश्चाप्यलायुधः ।
आर्ष्यशृङ्गिश्च निहतः किमन्यद् भागधेयतः ।। ३९ ।।
जहाँ शूरवीर अलम्बुष और ऋष्यशृंगपुत्र राक्षस अलायुध मारे गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जा सकता है? ।। ३९ ।।

नारायणा हता यत्र गोपाला युद्धदुर्मदाः ।
म्लेच्छाश्च बहुसाहस्राः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४० ॥
जहाँ नारायण नामवाले रणदुर्मद ग्वाले और कई हजार म्लेच्छ योद्धा मौतके घाट उतार दिये गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ ४० ॥

शकुनिः सौबलो यत्र कैतव्यश्च महाबलः ।
निहतः सबलो वीरः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४१ ॥
जहाँ सुबलपुत्र महाबली शकुनि और उस जुआरीका पुत्र वीर उलूक दोनों ही सेनासहित मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ४१ ॥

एते चान्ये च बहवः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ।
राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः ॥ ४२ ॥
निहता बहवो यत्र किमन्यद् भागधेयतः ।
ये तथा और भी बहुत-से अस्त्रवेत्ता, रणदुर्मद, शूरवीर और परिघ-जैसी भुजाओंवाले राजा एवं राजकुमार अधिक संख्यामें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जाय? ॥ ४२ १/२ ॥

यत्र शूरा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ ४३ ॥
बहवो निहताः सूत महेन्द्रसमविक्रमाः ।
नानादेशसमावृत्ताः क्षत्रिया यत्र संजय ॥ ४४ ॥
निहताः समरे सर्वे किमन्यद् भागधेयतः ।
सूत संजय! जहाँ समरभूमिमें नाना देशोंसे आये हुए देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर महाधनुर्धर, अस्त्रवेत्ता एवं युद्धदुर्मद क्षत्रिय सारे-के-सारे मार डाले गये, वहाँ भाग्यके अतिरिक्त दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ४३-४४ १/२ ॥

पुत्राश्च मे विनिहताः पौत्राश्चैव महाबलाः ॥ ४५ ॥
वयस्या भ्रातरश्चैव किमन्यद् भागधेयतः ।
हाय! मेरे महाबली पुत्र, पौत्र, मित्र और भाई-बन्धु सभी मार डाले गये, इसे दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहूँ? ॥

भागधेयसमायुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नरः ॥ ४६ ॥
यस्तु भाग्यसमायुक्तः स शुभं प्राप्नुयान्नरः ।
निश्चय ही मनुष्य अपना-अपना भाग्य लेकर उत्पन्न होता है, जो सौभाग्यसे सम्पन्न होता है, उसे ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ ४६ १/२ ॥

अहं वियुक्तस्तैर्भाग्यैः पुत्रैश्चैवेह संजय ॥ ४७ ॥
कथमद्य भविष्यामि वृद्धः शत्रुवशं गतः ।
संजय! मैं उन शुभकारक भाग्योंसे वंचित हूँ और पुत्रोंसे भी हीन हूँ। आज इस वृद्धावस्थामें शत्रुके वशमें पड़कर न जाने मेरी कैसी दशा होगी? ॥ ४७ १/२ ॥

नान्यदत्र परं मन्ये वनवासादृते प्रभो ॥ ४८ ॥
सोऽहं वनं गमिष्यामि निर्बन्धुर्ज्ञातिसंक्षये ।
न हि मेऽन्यद् भवेच्छ्रेयो वनाभ्युपगमादृते ॥ ४९ ॥
इमामवस्थां प्राप्तस्य लूनपक्षस्य संजय ।
सामर्थ्यशाली संजय! मेरे लिये वनवासके सिवा और कोई कार्य श्रेष्ठ नहीं जान पड़ता। अब कुटुम्बीजनोंका विनाश हो जानेपर बन्धु-बान्धवोंसे रहित हो मैं वनमें ही चला जाऊँगा। संजय! पंख कटे हुए पक्षीकी भाँति इस अवस्थाको पहुँचे हुए मेरे लिये वनवास स्वीकार करनेके सिवा दूसरा कोई श्रेयस्कर कार्य नहीं है ॥

दुर्योधनो हतो यत्र शल्यश्च निहतो युधि ॥ ५० ॥
दुःशासनो विविंशश्च विकर्णश्च महाबलः ।
कथं हि भीमसेनस्य श्रोष्येऽहं शब्दमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
एकेन समरे येन हतं पुत्रशतं मम ।
जब दुर्योधन मारा गया, शल्यका युद्धमें संहार हो गया तथा दुःशासन, विविंशति और महाबली विकर्ण भी मार डाले गये, तब मैं उस भीमसेनका उच्चस्वरसे कहा गया वचन कैसे सुनूँगा, जिसने अकेले ही समरांगणमें मेरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला है ॥ ५०-५१ १/२ ॥

असकृद्वदतस्तस्य दुर्योधनवधेन च ॥ ५२ ॥
दुःखशोकाभिसंतप्तो न श्रोष्ये परुषा गिरः ।
दुर्योधनके वधसे दुःख और शोकसे संतप्त हुआ मैं बारंबार बोलनेवाले भीमसेनकी कठोर बातें नहीं सुन सकूँगा ॥ ५२ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं वृद्धश्च संतप्तः पार्थिवो हतबान्धवः ॥ ५३ ॥
मुहुर्मुर्मुह्यमानः पुत्रादिभिरभिप्लुतः ।
विलप्य सुचिरं कालं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ५४ ॥
दीर्घमुष्णं स निःश्वस्य चिन्तयित्वा पराभवम् ।
दुःखेन महता राजन् संतप्तो भरतर्षभः ॥ ५५ ॥
पुनर्गावलगणिं सूतं पर्यपृच्छद् यथातथम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार पुत्रोंकी चिन्तामें डूबकर बारंबार मूर्च्छित होनेवाले, संतप्त एवं बूढ़े भरतश्रेष्ठ राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र, जिनके बन्धु-बान्धव मार डाले गये थे, दीर्घकालतक विलाप करके गरम साँस खींचते और अपने पराभवकी बात सोचते हुए महान् दुःखसे संतप्त हो उठे तथा गवल्गणपुत्र संजयसे पुनः युद्धका यथावत् समाचार पूछने लगे ॥ ५३—५५ १/२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा सूतपुत्रं च घातितम् ।। ५६ ।।
सेनापतिं प्रणेतारं किमकुर्वत मामकाः ।
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! भीष्म और द्रोणाचार्यके वधका तथा युद्ध-संचालक सेनापति सूतपुत्र कर्णके विनाशका समाचार सुनकर मेरे पुत्रोंने क्या किया? ।। ५६ १/२ ।।

यं यं सेनाप्रणेतारं युधि कुर्वन्ति मामकाः ।। ५७ ।।
अचिरेणैव कालेन तं तं निघ्नन्ति पाण्डवाः ।
मेरे पुत्र युद्धस्थलमें जिस-जिस वीरको अपना सेनापति बनाते थे, पाण्डव उस-उसको थोड़े ही समयमें मार गिराते थे ।। ५७ १/२ ।।

रणमूर्ध्नि हतो भीष्मः पश्यतां वः किरीटिना ।। ५८ ।।
एवमेव हतो द्रोणः सर्वेषामेव पश्यताम् ।
युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके देखते-देखते भीष्मजी किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारे गये। इसी प्रकार द्रोणाचार्यका भी तुम सब लोगोंके सामने ही संहार हो गया ।। ५८ १/२ ।।

एवमेव हतः कर्णः सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ५९ ।।
स राजकानां सर्वेषां पश्यतां वः किरीटिना ।
इसी तरह प्रतापी सूतपुत्र कर्ण भी राजाओंसहित तुम सब लोगोंके देखते-देखते किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारा गया ।। ५९ १/२ ।।

पूर्वमेवाहमुक्तो वै विदुरेण महात्मना ।। ६० ।।
दुर्योधनापराधेन प्रजेयं विनशिष्यति ।
महात्मा विदुरने मुझसे पहले ही कहा था कि 'दुर्योधनके अपराधसे इस प्रजाका विनाश हो जायगा' ।। ६० १/२ ।।

केचिन्न सम्यक् पश्यन्ति मूढाः सम्यगवेक्ष्य च ।
तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वचः स्म तत् ।। ६१ ।।
संसारमें कुछ मूढ़ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो अच्छी तरह देखकर भी नहीं देख पाते। मैं भी वैसा ही मूढ़ हूँ। मेरे लिये वह वचन वैसा ही हुआ (मैं उसे सुनकर भी न सुन सका) ।। ६१ ।।

यदब्रवीत् स धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान् ।
तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ।। ६२ ।।
दूरदर्शी धर्मात्मा विदुरने पहले जो कुछ कहा था, वह सब उसी रूपमें सामने आया है। सत्यवादी महात्माका वचन सत्य होकर ही रहा ।। ६२ ।।

दैवोपहतचित्तेन यन्मया न कृतं पुरा ।
अनयस्य फलं तस्य ब्रूहि गावलगणे पुनः ।। ६३ ।।

संजय! पहले दैवसे मेरी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये मैंने जो विदुरजीकी बात नहीं मानी, मेरे उस अन्यायका फल जैसे-जैसे प्रकट हुआ है, उसका वर्णन करो ।। ६३ ।।
को वा मुखमनीकानामासीत् कर्णे निपातिते ।
अर्जुनं वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी ।। ६४ ।।
कर्णके मारे जानेपर सेनाके मुखस्थानपर खड़ा होनेवाला कौन था? कौन रथी अर्जुन और श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा? ।। ६४ ।।
केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं मद्रराजस्य संयुगे ।
वामं च योद्धुकामस्य के वा वीरस्य पृष्ठतः ।। ६५ ।।
युद्धस्थलमें जूझनेकी इच्छावाले मद्रराज शल्यके दाहिने या बायें पहियेकी रक्षा किन लोगोंने की? अथवा उस वीर सेनापतिके पृष्ठ-रक्षक कौन थे? ।। ६५ ।।
कथं च वः समेतानां मद्रराजो महारथः ।
निहतः पाण्डवैः संख्ये पुत्रो वा मम संजय ।। ६६ ।।
संजय! तुम सब लोगोंके एक साथ रहते हुए भी महारथी मद्रराज शल्य अथवा मेरा पुत्र दुर्योधन दोनों ही तुम्हारे सामने पाण्डवोंके हाथसे कैसे मारे गये? ।। ६६ ।।
ब्रूहि सर्वं यथातत्त्वं भरतानां महाक्षयम् ।
यथा च निहतः संख्ये पुत्रो दुर्योधनो मम ।। ६७ ।।
तुम भरतवंशियोंके इस महान् विनाशका सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि युद्धस्थलमें मेरा पुत्र दुर्योधन किस प्रकार मारा गया? ।। ६७ ।।
पञ्चालाश्च यथा सर्वे निहताः सपदानुगाः ।
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।। ६८ ।।
समस्त पांचाल-सैनिक अपने सेवकोंसहित कैसे मारे गये? धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंका वध किस प्रकार हुआ? ।। ६८ ।।
पाण्डवाश्च यथा मुक्तास्तथोभौ माधवौ युधि ।
कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मजः ।। ६९ ।।
पाँचों पाण्डव, दोनों मधुवंशी वीर श्रीकृष्ण और सात्यकि, कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा—ये युद्धस्थलसे किस प्रकार जीवित बच गये? ।। ६९ ।।
यद् यथा यादृशं चैव युद्धं वृत्तं च साम्प्रतम् ।
अखिलं श्रोतुमिच्छामि कुशलो ह्यसि संजय ।। ७० ।।
संजय! जो युद्धका वृत्तान्त जिस प्रकार और जैसे संघटित हुआ हो, वह सब इस समय मैं सुनना चाहता हूँ। तुम वह सब बतानेमें कुशल हो ।। ७० ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका विलापविषयक दूसरा अध्याय पूरा
हुआ ॥ २ ॥