महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 312)
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
द्रोणाचार्यके द्वारा अभिमन्युके पराक्रमकी प्रशंसा तथा दुर्योधनके आदेशसे दुःशासनका अभिमन्युके साथ युद्ध आरम्भ करना
धृतराष्ट्र उवाच
द्वैधीभवति मे चित्तं ह्रिया तुष्ट्या च संजय ।
मम पुत्रस्य यत् सैन्यं सौभद्रः समवारयत् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले— संजय! सुभद्राकुमारने मेरे पुत्रकी सेनाको जो आगे बढ़नेसे रोक दिया, इसे सुनकर लज्जा और प्रसन्नतासे मेरे चित्तकी दो अवस्थाएँ हो रही हैं ॥ १ ॥
विस्तरेणैव मे शंस सर्वं गावलगणे पुनः ।
विक्रीडितं कुमारस्य स्कन्दस्येवासुरैः सह ॥ २ ॥
गवलगणनन्दन! जैसे कुमार कार्तिकेयने असुरोंके साथ रणक्रीड़ा की थी, उसी प्रकार कुमार अभिमन्युने जो युद्धका खेल किया था, वह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहो ॥ २ ॥
संजय उवाच
हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि विमर्दमतिदारुणम् ।
एकस्य च बहूनां च यथाऽऽसीत् तुमुलो रणः ॥ ३ ॥
संजयने कहा— महाराज! मैं अत्यन्त खेदके साथ आपको उस अत्यन्त भयंकर नरसंहारका वृत्तान्त बता रहा हूँ, जिसके लिये एक वीरका बहुत-से महारथियोंके साथ तुमुल युद्ध हुआ था ॥ ३ ॥
अभिमन्युः कृतोत्साहः कृतोत्साहानरिंदमान् ।
रथस्थो रथिनः सर्वांस्तावकानभ्यवर्षयत् ॥ ४ ॥
अभिमन्यु युद्धके लिये उत्साहसे भरा था। वह रथपर बैठकर आपके उत्साहभरे शत्रुदमन समस्त रथारोहियोंपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ४ ॥
द्रोणं कर्णं कृपं शल्यं द्रौणिं भोजं बृहद्बलम् ।
दुर्योधनं सौमदत्तिं शकुनिं च महाबलम् ॥ ५ ॥
नानानृपान् नृपसुतान् सैन्यानि विविधानि च ।
अलातचक्रवत् सर्वांश्चरन् बाणैः समर्पयत् ॥ ६ ॥
द्रोण, कर्ण, कृप, शल्य, अश्वत्थामा, भोजवंशी कृतवर्मा, बृहद्बल, दुर्योधन, भूरिश्रवा, महाबली शकुनि, अनेकानेक नरेश, राजकुमार तथा उनकी विविध प्रकारकी सेनाओंपर अभिमन्यु अलातचक्रकी भाँति चारों ओर घूमकर बाणोंका प्रहार कर रहा था ॥ ५-६ ॥
निघ्नन्नमित्रान् सौभद्रः परमास्त्रैः प्रतापवान् ।
अदर्शयत तेजस्वी दिक्षु सर्वासु भारत ॥ ७ ॥
भारत! प्रतापी एवं तेजस्वी वीर सुभद्राकुमार अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा शत्रुओंका नाश करता हुआ सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिगोचर हो रहा था ॥ ७ ॥
तद् दृष्ट्वा चरितं तस्य सौभद्रस्यामितौजसः ।
समकम्पन्त सैन्यानि त्वदीयानि सहस्रशः ॥ ८ ॥
अमिततेजस्वी अभिमन्युका वह चरित्र देखकर आपके सहस्रों सैनिक भयसे काँपने लगे ॥ ८ ॥
अथाब्रवीन्महाप्राज्ञो भारद्वाजः प्रतापवान् ।
हर्षेणोत्फुल्लनयनः कृपमाभाष्य सत्वरम् ॥ ९ ॥
घट्टयन्निव मर्माणि पुत्रस्य तव भारत ।
अभिमन्युं रणे दृष्ट्वा तदा रणविशारदम् ॥ १० ॥
तदनन्तर परम बुद्धिमान् और प्रतापी वीर द्रोणाचार्यके नेत्र हर्षसे खिल उठे। भारत! उन्होंने युद्धविशारद अभिमन्युको युद्धमें स्थित देखकर आपके पुत्रके मर्मस्थलपर चोट करते हुए-से उस समय तुरंत ही कृपाचार्यको सम्बोधित करके कहा— ॥ ९-१० ॥
एष गच्छति सौभद्रः पार्थानां प्रथितो युवा ।
नन्दयन् सुहृदः सर्वान् राजानं च युधिष्ठिरम् ॥ ११ ॥
नकुलं सहदेवं च भीमसेनं च पाण्डवम् ।
बन्धून् सम्बन्धिनश्चान्यान् मध्यस्थान् सुहृदस्तथा ॥ १२ ॥
'यह पार्थकुलका प्रसिद्ध तरुण वीर सुभद्राकुमार अभिमन्यु अपने समस्त सुहृदोंको, राजा युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा पाण्डुपुत्र भीमसेनको, अन्यान्य भाई-बन्धुओं, सम्बन्धियों तथा मध्यस्थ सुहृदोंको भी आनन्द प्रदान करता हुआ जा रहा है ॥ ११-१२ ॥
नास्य युद्धे समं मन्ये कंचिदन्यं धनुर्धरम् ।
इच्छन् हन्यादिमां सेनां किमर्थमपि नेच्छति ॥ १३ ॥
'मैं दूसरे किसी धनुर्धर वीरको युद्धभूमिमें इसके समान नहीं मानता। यदि यह चाहे तो इस सारी सेनाको नष्ट कर सकता है; परंतु न जाने यह क्यों ऐसा चाहता नहीं है' ॥ १३ ॥
द्रोणस्य प्रीतिसंयुक्तं श्रुत्वा वाक्यं तवात्मजः ।
आर्जुनिं प्रति संक्रुद्धो द्रोणं दृष्ट्वा स्मयन्निव ॥ १४ ॥
अथ दुर्योधनः कर्णमब्रवीद् बाह्लिकं नृपः ।
दुःशासनं मद्रराजं तांस्तथान्यान् महारथान् ॥ १५ ॥
अभिमन्युके सम्बन्धमें द्रोणाचार्यका यह प्रीतियुक्त वचन सुनकर आपका पुत्र राजा दुर्योधन क्रोधमें भर गया और द्रोणाचार्यकी ओर देखकर मुसकराता हुआ-सा कर्ण, बाह्लिक, दुःशासन, मद्रराज शल्य तथा अन्य महारथियोंसे बोला— ॥ १४-१५ ॥
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामाचार्यो ब्रह्मवित्तमः ।
अर्जुनस्य सुतं मूढं नायं हन्तुमिहेच्छति ॥ १६ ॥
ये सम्पूर्ण मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आचार्य तथा सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता द्रोण अर्जुनके इस मूढ़ पुत्रको मारना नहीं चाहते हैं ॥ १६ ॥
न ह्यस्य समरे युद्ध्येदन्तकोऽप्यातातयिनः ।
किमङ्ग पुनरेवान्यो मर्त्यः सत्यं ब्रवीमि वः ॥ १७ ॥
‘प्रिय सैनिको! मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कहता हूँ। यदि ये युद्धमें मारनेके लिये उद्यत हो जायँ तो इनके सामने यमराज भी युद्ध नहीं कर सकता; फिर दूसरा कोई मनुष्य तो इनके सामने टिक ही कैसे सकता है? ॥
अर्जुनस्य सुतं त्वेष शिष्यत्वादभिरक्षति ।
शिष्याः पुत्राश्च दयितास्तदपत्यं च धर्मिणाम् ॥ १८ ॥
‘परंतु ये अर्जुनके पुत्रकी रक्षा करते हैं; क्योंकि अर्जुन इनके शिष्य हैं। शिष्य और पुत्र तो प्रिय होते ही हैं। उनकी संतानें भी धर्मात्मा पुरुषोंको प्रिय जान पड़ती हैं ॥ १८ ॥
संरक्ष्यमाणो द्रोणेन मन्यते वीर्यमात्मनः ।
आत्मसम्भावितो मूढस्तं प्रमथ्नीत मा चिरम् ॥ १९ ॥
‘यह द्रोणाचार्यसे रक्षित होनेके कारण अपने बल और पराक्रमपर अभिमान कर रहा है। यह मूर्ख अभिमन्यु आत्मश्लाघा करनेवाला है। तुम सब लोग मिलकर इसे शीघ्र ही मथ डालो’ ॥ १९ ॥
एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सात्वतीपुत्रमभ्ययुः ।
संरब्धास्ते जिघांसन्तो भारद्वाजस्य पश्यतः ॥ २० ॥
राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर सब वीर अत्यन्त कुपित हो सुभद्राकुमार अभिमन्युको मार डालनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यके देखते-देखते उसपर टूट पड़े ॥ २० ॥
दुःशासनस्तु तच्छ्रुत्वा दुर्योधनवचस्तदा ।
अब्रवीत् कुरुशार्दूल दुर्योधनमिदं वचः ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! उस समय दुर्योधनके उपर्युक्त वचनको सुनकर दुःशासनने उससे यह बात कही— ॥ २१ ॥
अहमेनं हनिष्यामि महाराज ब्रवीमि ते ।
मिषतां पाण्डुपुत्राणां पञ्चालानां च पश्यताम् ॥ २२ ॥
‘महाराज! मैं आपसे (प्रतिज्ञापूर्वक) कहता हूँ। मैं पांचालों और पाण्डवोंके देखते-देखते इस अभिमन्युको मार डालूँगा ॥ २२ ॥
ग्रसिष्याम्यद्य सौभद्रं यथा राहुर्दिवाकरम् ।
उत्क्रुश्य चाब्रवीद् वाक्यं कुरुराजमिदं पुनः ॥ २३ ॥
'जैसे राहु सूर्यपर ग्रहण लगाता है, उसी प्रकार आज मैं सुभद्रकुमार अभिमन्युको ग्रस लूँगा।' इतना कहकर उसने जोर-जोरसे गर्जना करके पुनः कुरुराज दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ २३ ॥
श्रुत्वा कृष्णौ मया ग्रस्तं सौभद्रमतिमानिनौ ।
गमिष्यतः प्रेतलोकं जीवलोकान्न संशयः ॥ २४ ॥
'सुभद्रकुमार अभिमन्युको मेरे द्वारा कालकवलित हुआ सुनकर अत्यन्त अभिमानी श्रीकृष्ण और अर्जुन इस जीवलोकसे प्रेतलोकको चले जायँगे—इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
तौ च श्रुत्वा मृतौ व्यक्तं पाण्डोः क्षेत्रोद्भवाः सुताः ।
एकाह्ना ससुहृद्वर्गाः क्लैब्याद्दास्यन्ति जीवितम् ॥ २५ ॥
'उन दोनोंको मरा हुआ सुनकर पाण्डुके क्षेत्रमें उत्पन्न हुए ये चारों पाण्डव कायरतावश अपने सुहृद्वर्गके साथ एक ही दिन प्राण त्याग देंगे ॥ २५ ॥
तस्मादस्मिन् हते शत्रौ हताः सर्वेऽहितास्तव ।
शिवेन मां ध्याहि राजन्नेष हन्मि रिपूंस्तव ॥ २६ ॥
'अतः इस अपने शत्रु अभिमन्युके मारे जानेपर आपके सारे दुश्मन स्वतः नष्ट हो जायँगे। राजन्! आप मेरा कल्याण मनाइये। मैं अभी आपके शत्रुओंका नाश किये देता हूँ' ॥ २६ ॥
एवमुक्त्वानदद् राजन् पुत्रो दुःशासनस्तव ।
सौभद्रमभ्ययात् क्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ॥ २७ ॥
महाराज! ऐसा कहकर आपका पुत्र दुःशासन जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। वह क्रोधमें भरकर सुभद्रकुमारपर बाणोंकी वर्षा करता हुआ उसके सामने गया ॥ २७ ॥
तमतिक्रुद्धमायान्तं तव पुत्रमरिंदमः ।
अभिमन्युः शरैस्तीक्ष्णैः षड्विंशत्या समर्पयत् ॥ २८ ॥
आपके पुत्रको अत्यन्त कुपित हो आते देख शत्रुसूदन अभिमन्युने छब्बीस पैने बाणोंद्वारा उसे घायल कर दिया ॥ २८ ॥
दुःशासनस्तु संक्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ।
अयोधयत सौभद्रमभिमन्युश्च तं रणे ॥ २९ ॥
मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान क्रोधमें भरा हुआ दुःशासन उस रणक्षेत्रमें अभिमन्युसे और अभिमन्यु दुःशासनसे युद्ध करने लगे ॥ २९ ॥
तौ मण्डलानि चित्राणि रथाभ्यां सव्यदक्षिणम् ।
चरमाणावयुध्येतां रथशिक्षाविशारदौ ॥ ३० ॥
रथयुद्धकी शिक्षामें निपुण वे दोनों योद्धा अपने रथोंद्वारा दायें-बायें विचित्र मण्डलाकार गतिसे विचरते हुए युद्ध करने लगे ॥ ३० ॥
अथ पणवमृदङ्गदुन्दुभीनां
क्रकचमहानकभेरिझर्झराणाम् ।
निनदमतिभृशं नराः प्रचक्रु-
र्लवणजलोद्भवसिंहनादमिश्रम् ।। ३१ ।।
उस समय बाजे बजानेवाले लोग ढोल, मृदंग, दुन्दुभि, क्रकच, बड़ी ढोल, भेरी और झाँझके अत्यन्त भयंकर शब्द करने लगे। उसमें शंख और सिंहनादकी भी ध्वनि मिली हुई थी ।। ३१ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि दुःशासनयुद्धे
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ३९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें दुःशासनयुद्धविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३९ ।।