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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2281)

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चतुरशीतितमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रके दस पुत्रोंका वध, कर्णका भय और शल्यका समझाना तथा नकुल और वृषसेनका युद्ध

संजय उवाच

दुःशासने तु निहते तव पुत्रा महारथाः ।
महाक्रोधविषा वीराः समरेष्वपलायिनः ॥ १ ॥
दश राजन् महावीर्या भीमं प्राच्छादयन् शरैः ।
संजय कहते हैं— राजन्! दुःशासनके मारे जानेपर युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले और महान् क्रोधरूपी विषसे भरे हुए आपके दस महारथी महापराक्रमी वीर पुत्रोंने आकर भीमसेनको अपने बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥

निषङ्गी कवची पाशी दण्डधारो धनुर्ग्रहः ॥ २ ॥
अलोलुपः शलः सन्धो वातवेगसुवर्चसौ ।
एते समेत्य सहिता भ्रातृव्यसनकर्शिताः ॥ ३ ॥
भीमसेनं महाबाहुं मार्गणैः समवारयन् ।
निषंगी, कवची, पाशी, दण्डधार, धनुर्ग्रह (धनुग्रह), अलोलुप, शल, सन्ध (सत्यसन्ध), वातवेग और सुवर्चा (सुवर्चस्)—ये एक साथ आकर भाईकी मृत्युसे दुःखी हो महाबाहु भीमसेनको अपने बाणोंद्वारा रोकने लगे ॥

स वार्यमाणो विशिखैः समन्तात् तैर्महारथैः ॥ ४ ॥
भीमः क्रोधाग्निरक्ताक्षः क्रुद्धः काल इवाबभौ ।
उन महारथियोंके चलाये हुए बाणोंद्वारा चारों ओरसे रोके जानेपर भीमसेनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और वे कुपित हुए कालके समान प्रतीत होने लगे ॥ ४ १/२ ॥

तांस्तु भल्लैर्महावेगैर्दशभिर्दश भारतान् ॥ ५ ॥
रुक्माङ्गदान् रुक्मपुङ्खैः पार्थो निन्ये यमक्षयम् ।
कुन्तीकुमार भीमने सोनेके पंखवाले महान् वेगशाली दस भल्लोंद्वारा सुवर्णमय अंगदोंसे विभूषित उन दसों भरतवंशी राजकुमारोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ ५ १/२ ॥

हतेषु तेषु वीरेषु प्रदुद्राव बलं तव ॥ ६ ॥
पश्यतः सूतपुत्रस्य पाण्डवस्य भयार्दितम् ।
उन वीरोंके मारे जानेपर पाण्डुपुत्र भीमसेनके भयसे पीड़ित हो आपकी सारी सेना सूतपुत्रके देखते-देखते भाग चली ॥ ६ १/२ ॥

ततः कर्णो महाराज प्रविवेश महत् भयम् ॥ ७ ॥

दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तमन्तकस्य प्रजास्विव ।
महाराज! जैसे प्रजावर्गपर यमराजका बल काम करता है, उसी प्रकार भीमसेनका वह पराक्रम देखकर कर्णके मनमें महान् भय समा गया ॥ ७ १/२ ॥
तस्य त्वाकारभावज्ञः शल्यः समितिशोभनः ॥ ८ ॥
उवाच वचनं कर्णं प्राप्तकालमरिंदमम् ।
युद्धमें शोभा पानेवाले शल्य कर्णकी आकृति देखकर ही उसके मनका भाव समझ गये; अतः शत्रुदमन कर्णसे यह समयोचित वचन बोले— ॥ ८ १/२ ॥
मा व्यथां कुरु राधेय नैवं त्वय्युपपद्यते ॥ ९ ॥
एते द्रवन्ति राजानो भीमसेनभयार्दिताः ।
दुर्योधनश्च सम्मूढो भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥ १० ॥
‘राधानन्दन! तुम खेद न करो, तुम्हें यह शोभा नहीं देता है। ये राजालोग भीमसेनके भयसे पीड़ित हो भागे जा रहे हैं। अपने भाइयोंकी मृत्युसे दुःखित हो राजा दुर्योधन भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है ॥ ९-१० ॥
दुःशासनस्य रुधिरे पीयमाने महात्मना ।
व्यापन्नचेतसश्चैव शोकोपहतचेतसः ॥ ११ ॥
दुर्योधनमुपासन्ते परिवार्य समन्ततः ।
कृपप्रभृतयश्चैते हतशेषाः सहोदराः ॥ १२ ॥
‘महामना भीमसेन जब दुःशासनका रक्त पी रहे थे, तभीसे ये कृपाचार्य आदि वीर तथा मरनेसे बचे हुए सब भाई कौरव विपन्न और शोकाकुलचित्त होकर दुर्योधनको सब ओरसे घेरकर उसके पास खड़े हैं ॥
पाण्डवा लब्धलक्ष्याश्च धनंजयपुरोगमाः ।
त्वामेवाभिमुखाः शूरा युद्धाय समुपस्थिताः ॥ १३ ॥
‘अर्जुन आदि पाण्डववीर अपना लक्ष्य सिद्ध कर चुके हैं और अब युद्धके लिये तुम्हारे ही सामने उपस्थित हो रहे हैं ॥ १३ ॥
स त्वं पुरुषशार्दूल पौरुषेण समास्थितः ।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य प्रत्युद्याहि धनंजयम् ॥ १४ ॥
‘पुरुषसिंह! ऐसी अवस्थामें तुम पुरुषार्थका भरोसा करके क्षत्रिय-धर्मको सामने रखते हुए अर्जुनपर चढ़ाई करो ॥
भारो हि धार्तराष्ट्रेण त्वयि सर्वः समाहितः ।
तमुद्वह महाबाहो यथाशक्ति यथाबलम् ॥ १५ ॥
‘महाबाहो! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने सारा भार तुम्हींपर रख छोड़ा है। तुम अपने बल और शक्तिके अनुसार उस भारका वहन करो ॥ १५ ॥
जये स्याद् विपुला कीर्तिर्ध्रुवः स्वर्गः पराजये ।

वृषसेनश्च राधेय संक्रुद्धस्तनयस्तव ॥ १६ ॥
त्वयि मोहं समापन्ने पाण्डवानभिधावति ।
‘यदि विजय हुई तो तुम्हारी बहुत बड़ी कीर्ति फैलेगी और पराजय होनेपर अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति निश्चित है। राधानन्दन! तुम्हारे मोहग्रस्त हो जानेके कारण तुम्हारा पुत्र वृषसेन अत्यन्त कुपित हो पाण्डवोंपर धावा कर रहा है’ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं शल्यस्यामिततेजसः ।
हृदि चावश्यकं भावं चक्रे युद्धाय सुस्थिरम् ॥ १७ ॥
अमिततेजस्वी शल्यकी यह बात सुनकर कर्णने अपने हृदयमें युद्धके लिये आवश्यक भाव (उत्साह, अमर्ष आदि)-को दृढ़ किया ॥ १७ ॥
ततः क्रुद्धो वृषसेनोऽभ्यधाव-
दवस्थितं प्रमुखे पाण्डवं तम् ।
वृकोदरं कालमिवात्तदण्डं
गदाहस्तं योधयन्तं त्वदीयान् ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए वृषसेनने सामने खड़े हुए पाण्डुपुत्र भीमसेनपर धावा किया, जो दण्डधारी कालके समान हाथमें गदा लिये आपके सैनिकोंके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १८ ॥
तमभ्यधावन्नकुलः प्रवीरो
रोषादमित्रं प्रदुदन् पृषत्कैः ।
कर्णस्य पुत्रं समरे प्रहृष्टं
पुरा जिघांसुर्मघवेव जम्भम् ॥ १९ ॥
यह देख प्रमुख वीर नकुलने अपने शत्रु कर्णपुत्र वृषसेनको, जो समरांगणमें बड़े हर्षके साथ युद्ध कर रहा था, बाणोंद्वारा पीड़ित करते हुए उसपर रोषपूर्वक चढ़ाई कर दी। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने ‘जम्भ’ नामक दैत्यपर आक्रमण किया था ॥ १९ ॥
ततो ध्वजं स्फाटिकचित्रकञ्चुकं
चिच्छेद वीरो नकुलः क्षुरेण ।
कर्णात्मजस्येष्वसनं च चित्रं
भल्लेन जाम्बूनदचित्रनद्धम् ॥ २० ॥
तदनन्तर वीर नकुलने एक क्षुरद्वारा कर्णपुत्रके उस ध्वजको काट डाला, जिसे स्फटिकमणिसे जटित विचित्र कंचुक (चोला) पहनाया गया था। साथ ही एक भल्लके द्वारा उसके सुवर्णजटित विचित्र धनुषको भी खण्डित कर दिया ॥ २० ॥
अथान्यदादाय धनुः स शीघ्रं
कर्णात्मजः पाण्डवमभ्यविध्यत् ।
दिव्यैरस्त्रैरभ्यवर्षच्च सोऽपि

कर्णस्य पुत्रो नकुलं कृतास्त्रः ॥ २१ ॥
तब कर्णपुत्र वृषसेनने तुरंत ही दूसरा धनुष हाथमें लेकर पाण्डुकुमार नकुलको बींध डाला। कर्णका पुत्र अस्त्रविद्याका ज्ञाता था, इसलिये वह नकुलपर दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करने लगा ॥ २१ ॥
शराभिघाताच्च रुषा च राजन्
स्वया च भासास्त्रसमीरणाच्च ।
जज्वाल कर्णस्य सुतोऽतिमात्र-
मिद्धो यथाऽऽज्याहुतिभिर्हुताशः ॥ २२ ॥
कर्णस्य पुत्रो नकुलस्य राजन्
सर्वानश्वानक्षिणोदुत्तमास्त्रैः ।
वनायुजान् वै नकुलस्य शुभ्रा-
नुदग्रगान् हेमजालावनद्धान् ॥ २३ ॥
राजन्! जैसे घीकी आहुति पड़नेसे अग्नि अत्यन्त प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार कर्णका पुत्र बाणोंके प्रहारसे अपनी प्रभासे, अस्त्रोंके प्रयोगसे और रोषसे जल उठा। उसने नकुलके सब घोड़ोंको, जो वनायु देशमें उत्पन्न, श्वेतवर्ण, तीव्रगामी और सोनेकी जालीसे आच्छादित थे, अपने अस्त्रोंद्वारा काट डाला ॥ २२-२३ ॥
ततो हताश्वादवरुह्य याना-
दादाय चर्मामलरुक्मचन्द्रम् ।
आकाशसंकाशमसिं प्रगृह्य
दोधूयमानः खगवच्चचार ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् अश्वहीन रथसे उतरकर स्वर्णमय निर्मल चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त ढाल और आकाशके समान स्वच्छ तलवार ले उसे घुमाते हुए नकुल एक पक्षीके समान विचरने लगे ॥ २४ ॥
ततोऽन्तरिक्षे च रथाश्वनागं
चिच्छेद तूर्णं नकुलश्चित्रयोधी ।
ते प्रापतन्नसिना गां विशस्ता
यथाश्वमेधे पशवः शमित्रा ॥ २५ ॥
फिर विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले नकुलने बड़े-बड़े रथियों, सवारोंसहित घोड़ों और हाथियोंको तुरंत ही आकाशमें तलवार घुमाकर काट डाला। वे अश्वमेध-यज्ञमें शामित्र कर्म करनेवाले पुरुषके द्वारा मारे गये पशुओंके समान तलवारसे कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥
द्विसाहस्राः पातिता युद्धशौण्डा
नानादेश्याः सुभृताः सत्यसंधाः ।

एकेन संख्ये नकुलेन कृत्ता
जयेप्सुनानुत्तमचन्दनाङ्गाः ॥ २६ ॥
युद्धस्थलमें विजयकी इच्छा रखनेवाले एकमात्र वीर नकुलके द्वारा उत्तम चन्दनसे चर्चित अंगोंवाले, नाना देशोंमें उत्पन्न, युद्धकुशल, सत्यप्रतिज्ञ और अच्छी तरह पाले-पोसे गये दो हजार योद्धा काट डाले गये ॥

तमापतन्तं नकुलं सोऽभिपत्य
समन्ततः सायकैः प्रत्यविध्यत् ।
स तुद्यमानो नकुलः पृषत्कै-
र्विव्याध वीरं स चुकोप विद्धः ॥ २७ ॥
अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले नकुलके पास पहुँचकर वृषसेनने अपने सायकोंद्वारा उन्हें सब ओरसे बींध डाला। बाणोंसे पीड़ित हुए नकुल अत्यन्त कुपित हो उठे और स्वयं घायल होकर उन्होंने वीर वृषसेनको भी बींध डाला ॥

महाभये रक्ष्यमाणो महात्मा
भ्रात्रा भीमेनाकरोत् तत्र भीमम् ।
तं कर्णपुत्रो विधमन्तमेकं
नराश्वमातङ्गरथाननेकान् ॥ २८ ॥
क्रीडन्तमष्टादशभिः पृषत्कै-
र्विव्याध वीरं नकुलं सरोषः ।
उस महान् भयके अवसरपर अपने भाई भीमसे सुरक्षित हो महामना नकुलने वहाँ भयंकर पराक्रम प्रकट किया। अकेले ही बहुत-से पैदल मनुष्यों, घोड़ों, हाथियों और रथोंका संहार करते एवं खेलते हुए-से वीर नकुलको रोषमें भरे हुए कर्णपुत्रने अठारह बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। २८ १/२ ।।

स तेन विद्धोऽतिभृशं तरस्वी
महाहवे वृषसेनेन राजन् ॥ २९ ॥
क्रुद्धेन धावन् समरे जिघांसुः
कर्णात्मजं पाण्डुसुतो नृवीरः ।
राजन्! उस महासमरमें कुपित हुए वृषसेनके द्वारा अत्यन्त घायल किये गये वेगवान् वीर पाण्डुपुत्र नकुल कर्णके पुत्रको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर दौड़े ॥

वितत्य पक्षौ सहसा पतन्तं
श्येनं यथैवामिषलुब्धमाजौ ॥ ३० ॥
अवाकिरद् वृषसेनस्ततस्तं
शितैः शरैर्नकुलमुदारवीर्यम् ।

जैसे बाज मांसके लोभसे पंख फैलाकर सहसा टूट पड़ता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाले उदार पराक्रमी नकुलको वृषसेनने अपने पैने बाणोंसे ढक दिया॥ ३०१/२॥

स तान् मोघांस्तस्य कुर्वन् शरौघां-
श्चचार मार्गान् नकुलश्चित्ररूपान्॥ ३१॥
अथास्य तूर्णं चरतो नरेन्द्र
खड्गेन चित्रं नकुलस्य तस्य।
महेषुभिर्व्यधमत् कर्णपुत्रो
महाहवे चर्म सहस्रतारम्॥ ३२॥

नकुल उसके उन बाणसमूहोंको व्यर्थ करते हुए विचित्र मार्गोंसे विचरने लगे (युद्धके अद्भुत पैंतरे दिखाने लगे)। नरेन्द्र! तलवारके विचित्र हाथ दिखाते हुए शीघ्रतापूर्वक विचरनेवाले नकुलकी सहस्र तारोंके चिह्नवाली ढालको कर्णके पुत्रने उस महायुद्धमें अपने विशाल बाणोंद्वारा नष्ट कर दिया॥ ३१-३२॥

तं चायसं निशितं तीक्ष्णधारं
विकोशमुग्रं गुरुभारसाहम्।
द्विषच्छरीरान्तकरं सुघोर-
माधुन्वतः सर्पमिवोग्ररूपम्॥ ३३॥
क्षिप्रं शरैः षड्भिरमित्रसाह-
श्चकर्त खड्गं निशितैः सुवेगैः।
पुनश्च दीप्तैर्निशितैः पृषत्कैः
स्तनान्तरे गाढमथाभ्यविध्यत्॥ ३४॥

इसके बाद शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ वृषसेनने अत्यन्त वेगशाली और तीखी धारवाले छः बाणोंद्वारा तलवार घुमाते हुए नकुलकी उस तलवारके भी शीघ्रतापूर्वक टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वह तलवार लोहेकी बनी हुई, तेजधारवाली तीखी, भारी भार सहन करनेमें समर्थ, म्यानसे बाहर निकली हुई, भयंकर, सर्पके समान उग्र रूपधारी, अत्यन्त घोर और शत्रुओंके शरीरोंका अन्त कर देनेवाली थी। तलवार काटनेके पश्चात् उसने पुनः प्रज्वलित एवं पैने बाणोंद्वारा नकुलकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी॥ ३३-३४॥

कृत्वा तु तद् दुष्करमार्यजुष्ट-
मन्यैनरैः कर्म रणे महात्मा।
ययौ रथं भीमसेनस्य राजन्
शराभितप्तो नकुलस्त्वरावान्॥ ३५॥

राजन्! महामना नकुल रणभूमिमें अन्य मनुष्योंके लिये दुष्कर तथा सज्जन पुरुषोंद्वारा सेवित उत्तम कर्म करके वृषसेनके बाणोंसे संतप्त हो बड़ी उतावलीके साथ भीमसेनके

रथपर जा चढ़े ॥ ३५ ॥
स भीमसेनस्य रथं हताश्वो
माद्रीसुतः कर्णसुताभितप्तः ।
आपुप्लुवे सिंह इवाचलाग्रं
सम्प्रेक्षमाणस्य धनंजयस्य ॥ ३६ ॥
अपने घोड़ोंके मारे जानेपर कर्णपुत्रके बाणोंसे पीड़ित हुए माद्रीकुमार नकुल अर्जुनके देखते-देखते पर्वतके शिखरपर उछलकर चढ़नेवाले सिंहके समान छलाँग मारकर भीमसेनके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ ३६ ॥
ततः क्रुद्धो वृषसेनो महात्मा
ववर्ष ताविषुजालेन वीरः ।
महारथावेकरथे समेतौ
शरैः प्रभिन्दन्निव पाण्डवेयौ ॥ ३७ ॥
इससे महामनस्वी वीर वृषसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वह एक रथपर एकत्र हुए उन महारथी पाण्डुकुमारोंको बाणोंद्वारा विदीर्ण करता हुआ उन दोनोंपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा ॥ ३७ ॥
तस्मिन् रथे निहते पाण्डवस्य
क्षिप्रं च खड्गे विशिखैर्निकृत्ते ।
अन्ये च संहत्य कुरुप्रवीरा-
स्ततो न्यघ्नन् शरवर्षैरुपैत्य ॥ ३८ ॥
जब पाण्डुपुत्र नकुलका वह रथ नष्ट हो गया और बाणोंद्वारा उनकी तलवार शीघ्रतापूर्वक काट दी गयी, तब दूसरे कौरववीर भी संगठित हो निकट आकर उन दोनोंको बाणोंकी वर्षासे चोट पहुँचाने लगे ॥ ३८ ॥
तौ पाण्डवेयौ परितः समेतान्
संहूयमानाविव हव्यवाहौ ।
भीमार्जुनौ वृषसेनाय क्रुद्धौ
ववर्षतुः शरवर्षं सुघोरम् ॥ ३९ ॥
तब वृषसेनपर कुपित हुए पाण्डुपुत्र भीमसेन और अर्जुन घीकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुए दो अग्नियोंके समान प्रकाशित होने लगे। उन दोनोंने अपने आस-पास एकत्र हुए कौरव-सैनिकोंपर अत्यन्त घोर बाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ३९ ॥
अथाब्रवीन्मारुतिः फाल्गुनं च
पश्यस्वैनं नकुलं पीड्यमानम् ।
अयं च नो बाधते कर्णपुत्र-
स्तस्माद् भवान् प्रत्युपयातु कार्णिम् ॥ ४० ॥

तदनन्तर वायुपुत्र भीमसेनने अर्जुनसे कहा—‘देखो, यह नकुल वृषसेनसे पीड़ित हो गया है। कर्णका यह पुत्र हमें बहुत सता रहा है, अतः तुम इस कर्णपुत्रपर आक्रमण करो’ ॥ ४० ॥

स तन्निशम्यैव वचः किरीटी
रथं समासाद्य वृकोदरस्य ।
अथाब्रवीन्नकुलो वीक्ष्य वीर-
मुपागतं शातय शीघ्रमेनम् ॥ ४१ ॥

भीमसेनके रथके समीप आकर जब किरीटधारी अर्जुन उनकी बात सुनकर जाने लगे, तब नकुलने भी पास आये हुए वीर अर्जुनकी ओर देखकर उनसे कहा—‘भैया! आप इस वृषसेनको शीघ्र मार डालिये’ ॥

इत्येवमुक्तः सहसा किरीटी
भ्रात्रा समक्षं नकुलेन संख्ये ।
कपिध्वजं केशवसंगृहीतं
प्रैषीदुदग्रो वृषसेनाय वाहम् ॥ ४२ ॥

युद्धमें सामने आये हुए भाई नकुलके ऐसा कहनेपर किरीटधारी अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा काबूमें किये हुए कपिध्वज रथको सहसा वृषसेनकी ओर तीव्र वेगसे हाँक दिया ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि वृषसेनयुद्धे नकुलपराजयो चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें वृषसेनका युद्ध और नकुलकी पराजयविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥