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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2648)

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‘श्रीकृष्ण! भीष्म मारे जा चुके, द्रोणका भी अन्त हो गया, वैकर्तन कर्ण भी मार डाला गया, मद्रराज शल्यका भी वध हो गया और जयद्रथ भी यमलोक पहुँच गया ।।

श्रीकृष्ण दुर्योधनकी ओर संकेत करते हुए उसे मारनेके लिये अर्जुनको प्रेरित कर रहे हैं

हयाः पञ्चशताः शिष्टाः शकुनेः सौबलस्य च ।। १५ ।।
रथानां तु शते शिष्टे द्वे एव तु जनार्दन ।
दन्तिनां च शतं साग्रं त्रिसाहस्राः पदातयः ।। १६ ।।

‘सुबलपुत्र शकुनिके पास पाँच सौ घुड़सवारोंकी सेना अभी शेष है। जनार्दन! उसके पास दो सौ रथ, सौसे कुछ अधिक हाथी और तीन हजार पैदल सैनिक भी शेष रह गये हैं ।। १५-१६ ।।

अश्वत्थामा कृपश्चैव त्रिगर्ताधिपतिस्तथा ।
उलूकः शकुनिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।। १७ ।।
एतद् बलमभूच्छेषं धार्तराष्ट्रस्य माधव ।

‘माधव! दुर्योधनकी सेनामें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रिगर्तराज सुशर्मा, उलूक, शकुनि और सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये थोड़े-से ही वीर सैनिक शेष रह गये हैं ।।
मोक्षो न नूनं कालात् तु विद्यते भुवि कस्यचित् ।। १८ ।।
तथा विनिहते सैन्ये पश्य दुर्योधनं स्थितम् ।
अद्याह्ना हि महाराजो हतामित्रो भविष्यति ।। १९ ।।
‘निश्चय ही इस पृथ्वीपर किसीको भी कालसे छुटकारा नहीं मिलता, तभी तो इस प्रकार अपनी सेनाका संहार होनेपर भी दुर्योधन युद्धके लिये खड़ा है, उसे देखिये। आजके दिन महाराज युधिष्ठिर शत्रुहीन हो जायेंगे ।।
न हि मे मोक्ष्यते कश्चित् परेषामिह चिन्तये ।
ये त्वद्य समरं कृष्ण न हास्यन्ति मदोत्कटाः ।। २० ।।
तान् वै सर्वान् हनिष्यामि यद्यपि स्युर्न मानुषाः ।
‘श्रीकृष्ण! मैं सोचता हूँ कि आज शत्रुदलका कोई भी योद्धा यहाँ मेरे हाथसे बचकर नहीं जा सकेगा। जो मदोन्मत्त वीर आज युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायँगे, उन सबको, वे मनुष्य न होकर देवता या दैत्य ही क्यों न हों, मैं मार डालूँगा ।। २० १/२ ।।
अद्य युद्धे सुसंक्रुद्धो दीर्घं राज्ञा प्रजागरम् ।। २१ ।।
अपनेष्यामि गान्धारं घातयित्वा शितैः शरैः ।
‘आज मैं अत्यन्त कुपित हो गान्धारराज शकुनिको पैने बाणोंसे मरवाकर राजा युधिष्ठिरके दीर्घकालीन जागरणरूपी रोगको दूर कर दूँगा ।। २१ १/२ ।।
निकृत्या वै दुराचारो यानि रत्नानि सौबलः ।। २२ ।।
सभायामहरद् द्यूते पुनस्तान्याहराम्यहम् ।
‘दुराचारी सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें छल करके जिन रत्नोंको हर लिया था, उन सबको मैं वापस ले लूँगा ।।
अद्य ता अपि रोत्स्यन्ति सर्वा नागपुरे स्त्रियः ।। २३ ।।
श्रुत्वा पतींश्च पुत्रांश्च पाण्डवैर्निहतान् युधि ।
‘आज हस्तिनापुरकी वे सारी स्त्रियाँ भी युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे अपने पतियों और पुत्रोंको मारा गया सुनकर फूट-फूटकर रोयेंगी ।। २३ १/२ ।।
समाप्तमद्य वै कर्म सर्वं कृष्ण भविष्यति ।। २४ ।।
अद्य दुर्योधनो दीप्तां श्रियं प्राणांश्च मोक्ष्यति ।
‘श्रीकृष्ण! आज हमलोगोंका सारा कार्य समाप्त हो जायगा। आज दुर्योधन अपनी उज्ज्वल राजलक्ष्मी और प्राणोंको भी खो बैठेगा ।। २४ १/२ ।।
नापयाति भयात् कृष्ण संग्रामाद् यदि चेन्मम ।। २५ ।।
निहतं विद्धि वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रं सुबालिशम् ।

‘वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! यदि वह मेरे भयसे युद्धसे भाग न जाय, तो मेरे द्वारा उस मूढ़ दुर्योधनको आप मारा गया ही समझें।। २५ १/२ ।।
मम ह्येतदशक्तं वै वाजिवृन्दमरिंदम ।। २६ ।।
सोढुं ज्यातलनिर्घोषं याहि यावन्निहन्म्यहम् ।
‘शत्रुदमन! यह घुड़सवारोंकी सेना मेरे गाण्डीव धनुषकी टंकारको नहीं सह सकेगी। आप घोड़े बढ़ाइये, मैं अभी इन सबको मारे डालता हूँ’ ।। २६ १/२ ।।
एवमुक्तस्तु दाशार्हः पाण्डवेन यशस्विना ।। २७ ।।
अचोदयद्धयान् राजन् दुर्योधनबलं प्रति ।
राजन्! यशस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके ऐसा कहनेपर दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णने दुर्योधनकी सेनाकी ओर घोड़े बढ़ा दिये ।। २७ १/२ ।।
तदनीकमभिप्रेक्ष्य त्रयः सज्जा महारथाः ।। २८ ।।
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव सहदेवश्च मारिष ।
प्रययुः सिंहनादेन दुर्योधनजिघांसया ।। २९ ।।
मान्यवर! उस सेनाको देखकर तीन महारथी भीमसेन, अर्जुन और सहदेव युद्ध-सामग्रीसे सुसज्जित हो दुर्योधनके वधकी इच्छासे सिंहनाद करते हुए आगे बढ़े ।। २८-२९ ।।
तान् प्रेक्ष्य सहितान् सर्वान् जवेनोद्यतकार्मुकान् ।
सौबलोऽभ्यद्रवद् युद्धे पाण्डवानातातयिनः ।। ३० ।।
उन सबको बड़े वेगसे धनुष उठाये एक साथ आक्रमण करते देख सुबलपुत्र शकुनि रणभूमिमें आततायी पाण्डवोंकी ओर दौड़ा ।। ३० ।।
सुदर्शनस्तव सुतो भीमसेनं समभ्ययात् ।
सुशर्मा शकुनिश्चैव युयुधाते किरीटिना ।। ३१ ।।
आपका पुत्र सुदर्शन भीमका सामना करने लगा। सुशर्मा और शकुनिने किरीटधारी अर्जुनके साथ युद्ध छेड़ दिया ।।
सहदेवं तव सुतो हयपृष्ठगतोऽभ्ययात् ।
ततो हि यत्नतः क्षिप्रं तव पुत्रो जनाधिप ।। ३२ ।।
प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद् भृशम् ।
नरेश्वर! घोड़ेकी पीठपर बैठा हुआ आपका पुत्र दुर्योधन सहदेवके सामने आया। उसने बड़े यत्नसे सहदेवके मस्तकपर शीघ्रतापूर्वक प्रासका प्रहार किया ।।
सोपाविशद् रथोपस्थे तव पुत्रेण ताडितः ।। ३३ ।।
रुधिराप्लुतसर्वाङ्ग आशीविष इव श्वसन् ।
आपके पुत्रद्वारा ताड़ित होकर सहदेव फुफकारते हुए विषधर सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए रथके पिछले भागमें बैठ गये। उनका सारा शरीर लहूलुहान हो गया ।। ३३ १/२ ।।

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां सहदेवो विशाम्पते ॥ ३४ ॥
दुर्योधनं शरैस्तीक्ष्णैः संक्रुद्धः समवाकिरत् ।
प्रजानाथ! थोड़ी देरमें सचेत होनेपर क्रोधमें भरे हुए सहदेव दुर्योधनपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३४ १/२ ॥

पार्थोऽपि युधि विक्रम्य कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ३५ ॥
शूराणामश्वपृष्ठेभ्यः शिरांसि निचकर्त ह ।
कुन्तीपुत्र अर्जुनने भी युद्धमें पराक्रम करके घोड़ोंकी पीठोंसे शूरवीरोंके मस्तक काट गिराये ॥ ३५ १/२ ॥

तदनीकं तदा पार्थो व्यधमद् बहुभिः शरैः ॥ ३६ ॥
पातयित्वा हयान् सर्वांस्त्रिगर्तानां रथान् ययौ ।
पार्थने अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घुड़सवारोंकी उस सेनाको छिन्न-भिन्न कर डाला तथा समस्त घोड़ोंको धराशायी करके त्रिगर्तदेशीय रथियोंपर चढ़ाई कर दी ॥

ततस्ते सहिता भूत्वा त्रिगर्तानां महारथाः ॥ ३७ ॥
अर्जुनं वासुदेवं च शरवर्षैरवाकिरन् ।
तब वे त्रिगर्तदेशीय महारथी एक साथ होकर अर्जुन और श्रीकृष्णको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित करने लगे ॥

सत्यकर्माणमाक्षिप्य क्षुरप्रेण महायशाः ॥ ३८ ॥
ततोऽस्य स्यन्दनस्येषां चिच्छिदे पाण्डुनन्दनः ।
शिलाशितेन च विभो क्षुरप्रेण महायशाः ॥ ३९ ॥
शिरश्चिच्छेद सहसा तप्तकुण्डलभूषणम् ।
प्रभो! उस समय महायशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुनने क्षुरप्रद्वारा सत्यकर्मापर प्रहार करके उसके रथकी ईषा (हरसा) काट डाली। तत्पश्चात् उन महायशस्वी वीरने शिलापर तेज किये हुए क्षुरप्रद्वारा उसके तपाये हुए सुवर्णके कुण्डलोंसे विभूषित मस्तकको सहसा काट लिया ॥ ३८-३९ १/२ ॥

सत्येषुमथ चादत्त योधानां मिषतां ततः ॥ ४० ॥
यथा सिंहो वने राजन् मृगं परिबुभुक्षितः ।
राजन्! जैसे वनमें भूखा सिंह किसी मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार अर्जुनने समस्त योद्धाओंके देखते-देखते सत्येषुके भी प्राण हर लिये ॥ ४० १/२ ॥

तं निहत्य ततः पार्थः सुशर्माणं त्रिभिः शरैः ॥ ४१ ॥
विद्ध्वा तानहनत् सर्वान् रथान् रुक्मविभूषितान् ।
सत्येषुका वध करके अर्जुनने सुशर्माको तीन बाणोंसे घायल कर दिया और उन समस्त स्वर्णभूषित रथोंका विध्वंस कर डाला ॥ ४१ १/२ ॥

ततः प्रायात् त्वरन् पार्थो दीर्घकालं सुसंवृतम् ॥ ४२ ॥
मुञ्चन् क्रोधविषं तीक्ष्णं प्रस्थलाधिपतिं प्रति ।
तत्पश्चात् पार्थ अपने दीर्घकालसे संचित किये हुए तीखे क्रोधरूपी विषको प्रस्थलेश्वर सुशर्मापर छोड़नेके लिये तीव्र गतिसे आगे बढ़े ॥ ४२ ½ ॥
तमर्जुनः पृषत्कानां शतेन भरतर्षभ ॥ ४३ ॥
पूरयित्वा ततो बाहान् प्राहरत् तस्य धन्विनः ।
भरतश्रेष्ठ! अर्जुनने सौ बाणोंद्वारा उसे आच्छादित करके उस धनुर्धर वीरके घोड़ोंपर घातक प्रहार किया ॥
ततः शरं समादाय यमदण्डोपमं तदा ॥ ४४ ॥
सुशर्माणं समुद्दिश्य चिक्षेपाशु हसन्निव ।
इसके बाद यमदण्डके समान भयंकर बाण हाथमें लेकर सुशर्माको लक्ष्य करके हँसते हुए-से शीघ्र ही छोड़ दिया ॥
स शरः प्रेषितस्तेन क्रोधदीप्तेन धन्विना ॥ ४५ ॥
सुशर्माणं समासाद्य बिभेद हृदयं रणे ।
क्रोधसे तमतमाये हुए धनुर्धर अर्जुनके द्वारा चलाये गये उस बाणने सुशर्मापर चोट करके उसकी छाती छेद डाली ॥
स गतासुर्महाराज पपात धरणीतले ॥ ४६ ॥
नन्दयन् पाण्डवान् सर्वान् व्यथयंश्चापि तावकान् ।
महाराज! सुशर्मा आपके पुत्रोंको व्यथित और समस्त पाण्डवोंको आनन्दित करता हुआ प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४६ ½ ॥
सुशर्माणं रणे हत्वा पुत्रानस्य महारथान् ॥ ४७ ॥
सप्त चाष्टौ च त्रिंशच्च सायकैरनयत् क्षयम् ।
रणभूमिमें सुशर्माका वध करके अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा उसके पैंतालीस महारथी पुत्रोंको भी यमलोक पहुँचा दिया ॥ ४७ ½ ॥
ततोऽस्य निशितैर्बाणैः सर्वान् हत्वा पदानुगान् ॥ ४८ ॥
अभ्यगाद् भारतीं सेनां हतशेषां महारथः ।
तदनन्तर पैने बाणोंद्वारा उसके सारे सेवकोंका संहार करके महारथी अर्जुनने मरनेसे बची हुई कौरवी सेनापर आक्रमण किया ॥ ४८ ½ ॥
भीमस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रं तव जनाधिप ॥ ४९ ॥
सुदर्शनमदृश्यं तं शरैश्चक्रे हसन्निव ।
ततोऽस्य प्रहसन् क्रुद्धः शिरः कायादपाहरत् ॥ ५० ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतः प्रापतद् भुवि ।

जनेश्वर! दूसरी ओर कुपित हुए भीमसेनने हँसते-हँसते बाणोंकी वर्षा करके सुदर्शनको ढक दिया। फिर क्रोधपूर्वक अट्टहास करते हुए उन्होंने उसके मस्तकको तीखे क्षुरप्रद्वारा धड़से काट लिया। सुदर्शन मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा।। ४९-५० १/२ ।।
तस्मिंस्तु निहते वीरे ततस्तस्य पदानुगाः ।। ५१ ।।
परिवव्रू रणे भीमं किरन्तो विविधान् शरान्।
उस वीरके मारे जानेपर उसके सेवकोंने नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए रणभूमिमें भीमसेनको सब ओरसे घेर लिया।। ५१ १/२ ।।
ततस्तु निशितैर्बाणैस्त्वानीकं वृकोदरः ।। ५२ ।।
इन्द्राशनिसमस्पर्शैः समन्तात् पर्यवाकिरत्।
तत्पश्चात् भीमसेनने इन्द्रके वज्रकी भाँति कठोर स्पर्शवाले तीखे बाणोंद्वारा आपकी सेनाको चारों ओरसे ढक दिया।। ५२ १/२ ।।
ततः क्षणेन तद् भीमो न्यहनद् भरतर्षभ ।। ५३ ।।
तेषु तूत्साद्यमानेषु सेनाध्यक्षा महारथाः।
भीमसेनं समासाद्य ततोऽयुध्यन्त भारत ।। ५४ ।।
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद भीमसेनने क्षणभरमें आपकी सेनाका संहार कर डाला। भारत! जब उन कौरव-सैनिकोंका संहार होने लगा, तब महारथी सेनापतिगण भीमसेनपर आक्रमण करके उनके साथ युद्ध करने लगे।। ५३-५४ ।।
स तान् सर्वान् शरैर्घोरैरवाकिरत पाण्डवः।
तथैव तावका राजन् पाण्डवेयान् महारथान् ।। ५५ ।।
शरवर्षेण महता समन्तात् पर्यवारयन्।
राजन्! पाण्डुपुत्र भीमने उन सबपर भयंकर बाणोंकी वृष्टि की। इसी प्रकार आपके सैनिकोंने भी बड़ी भारी बाण-वर्षा करके पाण्डव महारथियोंको सब ओरसे आच्छादित कर दिया।। ५५ १/२ ।।
व्याकुलं तदभूत् सर्वं पाण्डवानां परैः सह ।। ५६ ।।
तावकानां च समरे पाण्डवेयैर्युयुत्सताम्।
शत्रुओंके साथ जूझनेवाले पाण्डवोंका और पाण्डवोंके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाले आपके सैनिकोंका सारा सैन्यदल समरांगणमें परस्पर मिलकर एक-सा हो गया।।
तत्र योधास्तदा पेतुः परस्परसमाहताः।
उभयोः सेनयो राजन् संशोचन्तः स्म बान्धवान् ।। ५७ ।।
राजन्! उस समय वहाँ एक-दूसरेकी मार खाकर दोनों दलोंके योद्धा अपने भाई-बन्धुओंके लिये शोक करते हुए धराशायी हो जाते थे।। ५७ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि सुशर्मवधे सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें सुशर्माका वधविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा
हुआ ।। २७ ।।