महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2417)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
कौरव-सेनाका शिविरकी ओर पलायन और शिविरोंमें प्रवेश
संजय उवाच
हते वैकर्तने राजन् कुरवो भयपीडिताः ।
वीक्षमाणा दिशः सर्वाः पर्यापेतुः सहस्रशः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! वैकर्तन कर्णके मारे जानेपर भयसे पीड़ित हुए सहस्रों कौरव योद्धा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए भाग निकले ॥ १ ॥
कर्णं तु निहतं दृष्ट्वा शत्रुभिः परमाहवे ।
भीता दिशो व्यकीर्यन्त तावकाः क्षतविक्षताः ॥ २ ॥
शत्रुओंने उस महायुद्धमें वैकर्तन कर्णको मार डाला है, यह देखकर आपके सैनिक भयभीत हो उठे थे। उनका सारा शरीर घावोंसे भर गया था। इसलिये वे भागकर सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गये ॥ २ ॥
ततोऽवहारं चक्रुस्ते योधाः सर्वे समन्ततः ।
निवार्यमाणाश्चोद्विग्नास्तावका भृशदुःखिताः ॥ ३ ॥
तब आपके समस्त योद्धा जो अत्यन्त दुःखी और उद्विग्न हो रहे थे, मना करनेपर सब ओरसे युद्ध बंद करके लौटने लगे ॥ ३ ॥
तेषां तन्मतमाज्ञाय पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
अवहारं ततश्चक्रे शल्यस्यानुमते नृप ॥ ४ ॥
नरेश्वर! उन सबका अभिप्राय जानकर राजा शल्यकी अनुमति ले आपके पुत्र दुर्योधनने सेनाको लौटनेकी आज्ञा दी ॥
कृतवर्मा रथैस्तूर्णं वृतो भारत तावकैः ।
नारायणावशेषैश्च शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ५ ॥
भारत! नारायणी-सेनाके जो वीर शेष रह गये थे, उनसे तथा आपके अन्य रथी योद्धाओंसे घिरा हुआ कृतवर्मा भी तुरंत शिविरकी ओर ही भाग चला ॥ ५ ॥
गान्धाराणां सहस्रेण शकुनिः परिवारितः ।
हतमाधिरथिं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ६ ॥
सहस्रों गान्धार योद्धाओंसे घिरा हुआ शकुनि भी अधिरथपुत्र कर्णको मारा गया देख छावनीकी ओर ही भागा ॥
कृपः शारद्वतो राजन् नागानीकेन भारत ।
महामेघनिभेनाशु शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ७ ॥
भरतवंशी नरेश! शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य मेघोंकी घटाके समान अपनी गजसेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक शिविरकी ओर ही भाग चले ॥ ७ ॥
अश्वत्थामा ततः शूरो विनिःश्वस्य पुनः पुनः ।
पाण्डवानां जयं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ८ ॥
तदनन्तर शूरवीर अश्वत्थामा पाण्डवोंकी विजय देख बारंबार उच्छ्वास लेता हुआ छावनीकी ओर ही भागने लगा ॥ ८ ॥
संशप्तकावशिष्टेन बलेन महता वृतः ।
सुशर्मापि ययौ राजन् वीक्षमाणो भयार्दितः ॥ ९ ॥
राजन्! संशप्तकोंकी बची हुई विशाल सेनासे घिरा हुआ सुशर्मा भी भयसे पीड़ित हो इधर-उधर देखता हुआ छावनीकी ओर चल दिया ॥ ९ ॥
दुर्योधनोऽपि नृपतिर्हतसर्वस्वबान्धवः ।
ययौ शोकसमाविष्टश्चिन्तयन् विमना बहु ॥ १० ॥
जिसके भाई नष्ट हो गये थे और सर्वस्व लुट गया था, वह राजा दुर्योधन भी शोकमग्न, उदास और विशेष चिन्तित होकर शिविरकी ओर चल पड़ा ॥ १० ॥
छिन्नध्वजेन शल्यस्तु रथेन रथिनां वरः ।
प्रययौ शिबिरायैव वीक्षमाणो दिशो दश ॥ ११ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ राजा शल्यने भी जिसकी ध्वजा कट गयी थी, उस रथके द्वारा दसों दिशाओंकी ओर देखते हुए छावनीकी ओर ही प्रस्थान किया ॥ ११ ॥
ततोऽपरे सुबहवो भरतानां महारथाः ।
प्राद्रवन्त भयत्रस्ता ह्रियाविष्टा विचेतसः ॥ १२ ॥
भरतवंशियोंके दूसरे-दूसरे बहुसंख्यक महारथी भी भयभीत, लज्जित और अचेत होकर शिविरकी ओर दौड़े ॥ १२ ॥
असृक् क्षरन्तः सोद्विग्ना वेपमानास्तथातुराः ।
कुरवो दुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् ॥ १३ ॥
कर्णको मारा गया देख सभी कौरव-सैनिक खून बहाते और काँपते हुए उद्विग्न तथा आतुर होकर छावनीकी ओर भागने लगे ॥ १३ ॥
प्रशंसन्तोऽर्जुनं केचित् केचित् कर्णं महारथाः ।
व्यद्रवन्त दिशो भीताः कुरवः कुरुसत्तम ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कौरव-महारथियोंमेंसे कुछ लोग अर्जुनकी प्रशंसा करते थे और कुछ कर्णकी। वे सब-के-सब भयभीत होकर चारों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ १४ ॥
तेषां योधसहस्राणां तावकानां महामृधे ।
नासीत्तत्र पुमान् कश्चिद् यो युद्धाय मनो दधे ॥ १५ ॥
आपके उन हजारों योद्धाओंमें वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो अपने मनमें उस महासमरमें युद्धके लिये उत्साह रखता हो ॥ १५ ॥
हते कर्णे महाराज निराशाः कुरवोऽभवन् ।
जीवितेष्वपि राज्येषु दारेषु च धनेषु च ॥ १६ ॥
महाराज! कर्णके मारे जानेपर कौरव अपने राज्यसे, धनसे, स्त्रियोंसे और जीवनसे भी निराश हो गये ॥ १६ ॥
तान् समानीय पुत्रस्ते यत्नेन महता विभुः ।
निवेशाय मनो दध्रे दुःखशोकसमन्वितः ॥ १७ ॥
दुःख और शोकमें डूबे हुए आपके पुत्र राजा दुर्योधनने बड़े यत्नसे उन सबको साथ ले आकर छावनीमें विश्राम करनेका विचार किया ॥ १७ ॥
तस्याज्ञां शिरसा योधाः परिगृह्य विशाम्पते ।
विवर्णवदना राजन् न्यविशन्त महारथाः ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! वे सब महारथी योद्धा दुर्योधनकी आज्ञा शिरोधार्य करके शिविरमें प्रविष्ट हुए। उन सबके मुखोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शिविरप्रयाणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरव-सेनाका शिविरकी ओर प्रस्थानविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥