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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2164)

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द्विसप्ततितमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना

संजय उवाच

प्रसाद्य धर्मराजानं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
पार्थः प्रोवाच गोविन्दं सूतपुत्रवधोद्यतः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करके अर्जुन सूतपुत्र कर्णका वध करनेके लिये उद्यत हो प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णसे बोले— ॥ १ ॥

कल्पतां मे रथो भूयो युज्यन्तां च हयोत्तमाः ।
आयुधानि च सर्वाणि सज्जन्तां मे महारथे ॥ २ ॥
उपावृत्ताश्च तुरगाः शिक्षिताश्चाश्वसादिभिः ।
रथोपकरणैः सज्जा उपायान्तु त्वरान्विताः ॥ ३ ॥
प्रयाहि शीघ्रं गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया ।
‘गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायँ। अश्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये’ ॥ २-३ ½ ॥

एवमुक्तो महाराज फाल्गुनेन महात्मना ॥ ४ ॥
उवाच दारुकं कृष्णः कुरु सर्वं यथाब्रवीत् ।
अर्जुनो भरतश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ ५ ॥
महाराज! महात्मा अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकसे कहा—‘सारथे! समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ भरतभूषण अर्जुनने जैसा कहा है, उसके अनुसार सारी तैयारी करो’ ॥ ४-५ ॥

आज्ञप्तस्त्वथ कृष्णेन दारुको राजसत्तम ।
योजयामास स रथं वैयाघ्रं शत्रुतापनम् ॥ ६ ॥
सज्जं निवेदयामास पाण्डवस्य महात्मनः ।
नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्णके इस प्रकार आदेश देनेपर दारुकने व्याघ्र-चर्मसे आच्छादित तथा शत्रुओंको तपानेवाले रथको जोतकर तैयार कर दिया और महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आकर निवेदन किया कि ‘आपका रथ सब सामग्रियोंसे सुसज्जित है’ ॥ ६ ½ ॥

युक्तं तु तं रथं दृष्ट्वा दारुकेण महात्मना ॥ ७ ॥

आपृच्छ्य धर्मराजानं ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ।
सुमङ्गलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ॥ ८ ॥
महामना दारुकके द्वारा जोतकर लाये हुए उस रथको देखकर अर्जुन धर्मराजसे आज्ञा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कल्याणके आश्रयभूत उस परम मंगलमय उत्तम रथपर आरूढ हुए ॥ ७-८ ॥

तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
आशिषोऽयुङ्क्त स ततः प्रायात् कर्णरथं प्रति ॥ ९ ॥
उस समय महाबुद्धिमान् धर्मराज राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको आशीर्वाद दिये। तत्पश्चात् उन्होंने कर्णके रथकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ ॥

तमायान्तं महेष्वासं दृष्ट्वा भूतानि भारत ।
निहतं मेनिरे कर्णं पाण्डवेन महात्मना ॥ १० ॥
भारत! महाधनुर्धर अर्जुनको आते देख समस्त प्राणियोंको यह विश्वास हो गया कि अब कर्ण महामनस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे अवश्य मारा जायगा ॥ १० ॥

बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशो राजन् समन्ततः ।
चाषाश्च शतपत्राश्च क्रौञ्चाश्चैव जनेश्वर ॥ ११ ॥
प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् ।
राजन्! सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे निर्मल हो गयी थीं। नरेश्वर! नीलकण्ठ, सारस और क्रौंच पक्षी पाण्डुनन्दन अर्जुनको दाहिने रखते हुए जाने लगे ॥ ११ १/२ ॥

बहवः पक्षिणो राजन् पुन्नामानः शुभाः शिवाः ॥ १२ ॥
त्वरयन्तोऽर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे ।
राजन्! पुरुष जातिवाले बहुत-से शुभकारक मंगलदायक पक्षी अर्जुनको युद्धके लिये उतावले करते हुए बड़े हर्षमें भरकर चहचहा रहे थे ॥ १२ १/२ ॥

कङ्का गृध्रा बकाः श्येना वायसाश्च विशाम्पते ॥ १३ ॥
अग्रतस्तस्य गच्छन्ति मांसहेतोर्भयानकाः ।
प्रजानाथ! कंक, गृध्र, बक, बाज और कौए आदि भयानक पक्षी मांसके लिये उनके आगे-आगे जा रहे थे ॥

निमित्तानि च धन्यानि पाण्डवस्य शशंसिरे ॥ १४ ॥
विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वधं प्रति ।
इस प्रकार बहुत-से शुभ शकुन पाण्डुपुत्र अर्जुनको उनके शत्रुओंके विनाश तथा कर्णके वधकी सूचना दे रहे थे ॥ १४ १/२ ॥

प्रयातस्याथ पार्थस्य महान् स्वेदो व्यजायत ॥ १५ ॥
चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं चेदं भविष्यति ।

युद्धके लिये प्रस्थान करनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनके शरीरमें बड़े जोरसे पसीना छूटने लगा तथा मन-ही-मन भारी चिन्ता होने लगी कि 'यह सब कैसे होगा?' ॥ १५½ ॥
ततो गाण्डीवधन्वानमब्रवीन्मधुसूदनः ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा पार्थं तथा यान्तं चिन्तापरिगतं तदा ।
रथमें बैठकर चलते समय गाण्डीवधारी अर्जुनको चिन्तामग्न देख भगवान् श्रीकृष्णने उनसे इस प्रकार कहा ।।

वासुदेव उवाच
गाण्डीवधन्वन् संग्रामे ये त्वया धनुषा जिताः ॥ १७ ॥
न तेषां मानुषो जेता त्वदन्य इह विद्यते ।
श्रीकृष्ण बोले—गाण्डीवधारी अर्जुन! तुमने अपने धनुषसे जिन-जिन वीरोंपर विजय पायी है, उन्हें जीतनेवाला इस संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य नहीं है ॥ १७½ ॥
दृष्ट्वा हि बहवः शूराः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ १८ ॥
त्वां प्राप्य समरे शूरं ते गताः परमां गतिम् ।
मैंने देखा है इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर समरांगणमें तुझ शौर्यसम्पन्न वीरके पास आकर परम गतिको प्राप्त हो गये ॥ १८½ ॥
को हि द्रोणं च भीष्मं च भगदत्तं च मारिष ॥ १९ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजं च सुदक्षिणम् ।
श्रुतायुषं महावीर्यमच्युतायुषमेव च ।
प्रत्युद्गम्य भवेत् क्षेमी यो न स्यात् त्वमिव प्रभो ॥ २० ॥
प्रभो! आर्य! जो तुम्हारे-जैसा वीर न हो, ऐसा कौन पुरुष द्रोणाचार्य, भीष्म, भगदत्त, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण, महापराक्रमी श्रुतायु तथा अच्युतायुका सामना करके सकुशल रह सकता था ।।
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि लाघवं बलमेव च ।
असंमोहश्च युद्धेषु विज्ञानस्य च संततिः ॥ २१ ॥
वेधः पातश्च लक्ष्येषु योगश्चैव तथार्जुन ।
भवान् देवान् सगन्धर्वान् हन्यात् सह चराचरान् ॥ २२ ॥
तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, तुममें फुर्ती है, बल है, युद्धके समय तुम्हें घबराहट नहीं होती, तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका विस्तृत ज्ञान है तथा लक्ष्यको वेधने तथा गिरानेकी कला ज्ञात है। अर्जुन! लक्ष्यको वेधते समय तुम्हारा चित्त एकाग्र रहता है। गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा चराचर प्राणियोंको तुम एक साथ मार सकते हो ॥ २१-२२ ॥
पृथिव्यां तु रणे पार्थ न योद्धा त्वत्समः पुमान् ।
धनुर्ग्राहा हि ये केचित् क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ २३ ॥

आ देवात् त्वत्समं तेषां न पश्यामि शृणोमि च ।
कुन्तीकुमार! इस भूमण्डलपर दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान योद्धा नहीं है। यहाँसे देवलोकतक धनुष धारण करनेवाले जो कोई भी रणदुर्मद क्षत्रिय हैं, उनमेंसे किसीको भी मैं तुम्हारे समान न तो देखता हूँ और न सुनता ही हूँ ॥
ब्रह्मणा च प्रजाः सृष्ट्वा गाण्डीवं च महत् धनुः ॥ २४ ॥
येन त्वं युध्यसे पार्थ तस्मान्नास्ति त्वया समः ।
पार्थ! ब्रह्माजीने सम्पूर्ण प्रजाकी सृष्टि की है और उन्होंने ही उस विशाल धनुष गाण्डीवकी भी रचना की है, जिसके द्वारा तुम युद्ध करते हो; अतः तुम्हारी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २४ १/२ ॥
अवश्यं तु मया वाच्यं यत् पथ्यं तव पाण्डव ॥ २५ ॥
मावमंस्था महाबाहो कर्णमाहवशोभिनम् ।
पाण्डुनन्दन! तो भी जो बात तुम्हारे लिये हितकर हो, उसे बता देना मैं आवश्यक समझता हूँ। महाबाहो! संग्राममें शोभा पानेवाले कर्णकी अवहेलना न करना ॥
कर्णो हि बलवान् दृप्तः कृतास्त्रश्च महारथः ॥ २६ ॥
कृती च चित्रयोधी च देशकालस्य कोविदः ।
क्योंकि कर्ण बलवान्, अभिमानी, अस्त्रविद्याका विद्वान्, महारथी, युद्धकुशल, विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाला तथा देशकालको समझनेवाला है ॥ २६ १/२ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपाच्छृणु पाण्डव ॥ २७ ॥
त्वत्समं त्वद्विशिष्टं वा कर्णं मन्ये महारथम् ।
परमं यत्नमास्थाय त्वया वध्यो महाहवे ॥ २८ ॥
पाण्डुनन्दन! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, संक्षेपसे ही सुन लो। मैं महारथी कर्णको तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर मानता हूँ। अतः महासमरमें महान् प्रयत्न करके तुम्हें उसका वध करना होगा ॥ २७-२८ ॥
तेजसा वह्निसदृशो वायुवेगसमो जवे ।
अन्तकप्रतिमः क्रोधे सिंहसंहननो बली ॥ २९ ॥
कर्ण तेजमें अग्निके सदृश, वेगमें वायुके समान, क्रोधमें यमराजके तुल्य, सुदृढ़ शरीरमें सिंहके सदृश तथा बलवान् है ॥ २९ ॥
अष्टरत्निर्महाबाहुर्व्यूढोरस्कः सुदुर्जयः ।
अभिमानी च शूरश्च प्रवीरः प्रियदर्शनः ॥ ३० ॥
उसके शरीरकी ऊँचाई आठ रत्नि* (एक सौ अड़सठ अंगुल) है। उसकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। उसे जीतना अत्यन्त कठिन है। वह अभिमानी, शौर्यसम्पन्न, प्रमुख वीर और प्रियदर्शन (सुन्दर) है ॥

सर्वयोधगुणैर्युक्तो मित्राणामभयंकरः ।
सततं पाण्डवद्वेषी धार्तराष्ट्रहिते रतः ॥ ३१ ॥
उसमें योद्धाओंके सभी गुण हैं। वह अपने मित्रोंको अभय देनेवाला है तथा दुर्योधनके हितमें तत्पर रहकर पाण्डवोंसे सदा द्वेष रखता है ॥ ३१ ॥
सर्वैरवध्यो राधेयो देवैरपि सवासवैः ।
ऋते त्वामिति मे बुद्धिस्तदद्य जहि सूतजम् ॥ ३२ ॥
मेरा तो ऐसा विचार है कि राधापुत्र कर्ण तुम्हें छोड़कर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अवध्य है; अतः तुम आज सूतपुत्रका वध करो ॥ ३२ ॥
देवैरपि हि संयत्तैर्बिभ्रद्भिर्मांसशोणितम् ।
अशक्यः स रथो जेतुं सर्वैरपि युयुत्सभिः ॥ ३३ ॥
समस्त देवता भी यदि रक्त-मांसयुक्त शरीरको धारण करके युद्धकी अभिलाषा लेकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो रणभूमिमें आ जायँ तो उनके लिये रथसहित कर्णको जीतना असम्भव है ॥ ३३ ॥
दुरात्मानं पापवृत्तं नृशंसं
दुष्टप्रज्ञं पाण्डवेयेषु नित्यम् ।
हीनस्वार्थं पाण्डवेयैर्विरोधे
हत्वा कर्णं निश्चितार्थो भवाद्य ॥ ३४ ॥
अतः आज तुम दुरात्मा, पापाचारी, क्रूर, पाण्डवोंके प्रति सदा दुर्भावना रखनेवाले और किसी स्वार्थके बिना ही पाण्डव-विरोधमें तत्पर हुए कर्णका वध करके सफलमनोरथ हो जाओ ॥ ३४ ॥
तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं
निष्कालिकं कालवशं नयाद्य ।
तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं
हत्वा प्रीतिं धर्मराजे कुरुष्व ॥ ३५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र अपनेको कालके वशमें नहीं समझता है। तुम उसे आज ही कालके अधीन कर दो। रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णको मारकर धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करो ॥ ३५ ॥
जानामि ते पार्थ वीर्यं यथावद्
दुर्वारणीयं च सुरासुरैश्च ।
सदावजानाति हि पाण्डुपुत्रा-
नसौ दर्पात् सूतपुत्रो दुरात्मा ॥ ३६ ॥
पार्थ! मैं तुम्हारे उस बल-पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ, जिसका निवारण करना देवताओं और असुरोंके लिये भी कठिन है। दुरात्मा सूतपुत्र कर्ण घमंडमें आकर सदा

पाण्डवोंका अपमान करता है ॥ ३६ ॥
आत्मानं मन्यते वीरं येन पापः सुयोधनः ।
तमद्य मूलं पापानां जहि सौतिं धनंजय ॥ ३७ ॥
धनंजय! जिसके साथ होनेसे पापी दुर्योधन अपनेको वीर मानता है, वह सूतपुत्र कर्ण ही सारे पापोंकी जड़ है; अतः आज तुम उसे मार डालो ॥ ३७ ॥
खड्गजिह्वं धनुरास्यं शरदंष्ट्रं तरस्विनम् ।
दृप्तं पुरुषशार्दूलं जहि कर्णं धनंजय ॥ ३८ ॥
अर्जुन! कर्ण पुरुषोंमें सिंहके समान है, तलवार ही उसकी जिह्वा है, धनुष ही उसका फैला हुआ मुख है, बाण उसकी दाढ़ें हैं, वह अत्यन्त वेगशाली और अभिमानी है। तुम उसका वध करो ॥ ३८ ॥
अहं त्वामनुजानामि वीर्येण च बलेन च ।
जहि कर्णं रणे शूर मातङ्गमिव केसरी ॥ ३९ ॥
जैसे सिंह मतवाले हाथीको मार डालता है, उसी प्रकार तुम भी अपने बल और पराक्रमसे रणभूमिमें शूरवीर कर्णको मार डालो। इसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ ॥ ३९ ॥
यस्य वीर्येण वीर्यं ते धार्तराष्ट्रोऽवमन्यते ।
तमद्य पार्थ संग्रामे कर्णं वैकर्तनं जहि ॥ ४० ॥
पार्थ! जिसके बलसे दुर्योधन तुम्हारे बल-पराक्रमकी अवहेलना करता है, उस वैकर्तन कर्णको आज तुम युद्धमें मार डालो ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कृष्णार्जुनसंवादे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवादविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥


* मुट्ठी बँधे हुए हाथके मापको रत्नि कहते हैं।