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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2597)

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एकविंशोऽध्यायः

सात्यकिद्वारा क्षेमधूर्तिका वध, कृतवर्माका युद्ध और उसकी पराजय एवं कौरवसेनाका पलायन

संजय उवाच

तस्मिंस्तु निहते शूरे शाल्वे समितिशोभने ।
तवाभज्यद् बलं वेगाद् वातेनेव महाद्रुमः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! युद्धमें शोभा पानेवाले शूरवीर शाल्वके मारे जानेपर आपकी सेनाके पाँव उखड़ गये। जैसे वेगपूर्वक चली हुई वायुके झोंकेसे कोई विशाल वृक्ष उखड़ गया हो ॥ १ ॥

तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा कृतवर्मा महारथः ।
दधार समरे शूरः शत्रुसैन्यं महाबलः ॥ २ ॥
अपनी सेनाका व्यूह भंग हुआ देखकर महाबलवान् महारथी शूरवीर कृतवर्माने समरांगणमें शत्रुके सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २ ॥

सनिवृत्तास्तु ते शूरा दृष्ट्वा सात्वतमाहवे ।
शैलोपमं स्थिरं राजन् कीर्यमाणं शरैर्युधि ॥ ३ ॥
राजन्! कृतवर्माको युद्धस्थलमें डटा हुआ देख वे भागे हुए शूरमा भी लौट आये। युद्धस्थलमें बाणोंकी वर्षासे आच्छादित होनेपर भी वह सात्वतवंशी वीर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़ा था ॥ ३ ॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरूणां पाण्डवैः सह ।
निवृत्तानां महाराज मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ४ ॥
महाराज! तदनन्तर लौटे हुए कौरवोंका पाण्डवोंके साथ मृत्युको ही युद्धसे निवृत्तिकी सीमा नियत करके घोर संग्राम होने लगा ॥ ४ ॥

तत्राश्चर्यमभूद् युद्धं सात्वतस्य परैः सह ।
यदेको वारयामास पाण्डुसेनां दुरासदाम् ॥ ५ ॥
वहाँ कृतवर्माका शत्रुओंके साथ होनेवाला युद्ध अत्यन्त आश्चर्यजनक प्रतीत होता था; क्योंकि उसने अकेले ही दुर्जय पाण्डव-सेनाकी प्रगति रोक दी थी ॥

तेषामन्योन्यसुहृदां कृते कर्मणि दुष्करे ।
सिंहनादः प्रहृष्टानां दिविस्पृक् सुमहानभूत् ॥ ६ ॥
एक-दूसरेका हित चाहनेवाले कौरवसैनिक कृतवर्माके द्वारा यह दुष्कर पराक्रम किये जानेपर अत्यन्त हर्षमें भर गये। उनका महान् सिंहनाद आकाशमें गूँज उठा ॥ ६ ॥

तेन शब्देन वित्रस्ताः पञ्चाला भरतर्षभ ।
शिनेर्नप्ता महाबाहुरन्वपद्यत सात्यकिः ॥ ७ ॥
भरतश्रेष्ठ! उनकी उस गर्जनासे पांचाल-सैनिक थर्रा उठे। उस समय शिनिपौत्र महाबाहु सात्यकि उन शत्रुओंका सामना करनेके लिये आये ॥ ७ ॥
स समासाद्य राजानं क्षेमधूर्तिं महाबलम् ।
सप्तभिर्निशितैर्बाणैरनयद् यमसादनम् ॥ ८ ॥
उन्होंने आते ही महाबली राजा क्षेमधूर्तिंको सात पैने बाणोंसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ ८ ॥
तमायान्तं महाबाहुं प्रवपन्तं शितान् शरान् ।
जवेनाभ्यपतद् धीमान् हार्दिक्यः शिनिपुङ्गवम् ॥ ९ ॥
तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए शिनिपौत्र महाबाहु सात्यकिको आते देख बुद्धिमान् कृतवर्मा बड़े वेगसे उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ॥ ९ ॥
सात्वतौ च महावीर्यौ धन्विनौ रथिनां वरौ ।
अन्योन्यमभ्यधावेतां शस्त्रप्रवरधारिणौ ॥ १० ॥
फिर तो उत्तम अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले, रथियोंमें श्रेष्ठ, महापराक्रमी, धनुर्धर वीर सात्वतवंशी सात्यकि और कृतवर्मा एक-दूसरेपर धावा करने लगे ॥
पाण्डवाः सहपञ्चाला योधाश्चान्ये नृपोत्तमाः ।
प्रेक्षकाः समपद्यन्त तयोर्घोरे समागमे ॥ ११ ॥
उन दोनोंके घोर संग्राममें पांचालोंसहित पाण्डव और दूसरे नृपश्रेष्ठ योद्धा दर्शक होकर तमाशा देखने लगे ॥
नाराचैर्वत्सदन्तैश्च वृष्ण्यन्धकमहारथौ ।
अभिजघ्नतुरन्योन्यं प्रहृष्टाविव कुञ्जरौ ॥ १२ ॥
वृष्णि और अन्धकवंशके वे दोनों वीर महारथी हर्षमें भरकर लड़ते हुए दो हाथियोंके समान एक-दूसरेपर नाराचों और वत्सदन्तोंका प्रहार करने लगे ॥
चरन्तौ विविधान् मार्गान् हार्दिक्यशिनिपुङ्गवौ ।
मुहुरन्तर्दधाते तौ बाणवृष्ट्या परस्परम् ॥ १३ ॥
कृतवर्मा और सात्यकि दोनों नाना प्रकारके पैंतरे दिखाते हुए विचरते थे और बारंबार बाणोंकी वर्षा करके वे एक-दूसरेको अदृश्य कर देते थे ॥ १३ ॥
चापवेगबलोद्भूतान् मार्गणान् वृष्णिसिंहयोः ।
आकाशे समपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान् ॥ १४ ॥
वृष्णिवंशके उन दोनों सिंहोंके धनुषके वेग और बलसे चलाये हुए शीघ्रगामी बाणोंको हम आकाशमें छाये हुए टिड्डीदलोंके समान देखते थे ॥ १४ ॥
तमेकं सत्यकर्माणमासाद्य हृदिकात्मजः ।

अविध्यन्निशितैर्बाणैश्चतुर्भिंश्चतुरो हयान् ।। १५ ।।
कृतवर्माने अद्वितीय वीर सत्यपराक्रमी सात्यकिके पास पहुँचकर चार पैने बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको घायल कर दिया ।। १५ ।।
स दीर्घबाहुः संक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।
अष्टभिः कृतवर्माणमविध्यत् परमेषुभिः ।। १६ ।।
तब महाबाहु सात्यकिने अंकुशोंकी चोट खाये हुए गजराजके समान अत्यन्त क्रोधमें भरकर आठ उत्तम बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल कर दिया ।। १६ ।।
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः कृतवर्मा शिलाशितैः ।
सात्यकिं त्रिभिराहत्य धनुरेकेन चिच्छिदे ।। १७ ।।
यह देख कृतवर्माने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये और शिलापर तेज किये हुए तीन बाणोंसे सात्यकिको घायल करके एकसे उनके धनुषको काट डाला ।। १७ ।।
निकृत्तं तद् धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः ।
अन्यदादत्त वेगेन शैनेयः सशरं धनुः ।। १८ ।।
उस कटे हुए श्रेष्ठ धनुषको फेंककर शिनिप्रवर सात्यकिने बाणसहित दूसरे धनुषको वेगपूर्वक हाथमें ले लिया ।। १८ ।।
तदादाय धनुः श्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् ।
आरोप्य च धनुः शीघ्रं महावीर्यो महाबलः ।। १९ ।।
अमृष्यमाणो धनुषश्छेदनं कृतवर्मणा ।
कुपितोऽतिरथः शीघ्रं कृतवर्माणमभ्ययात् ।। २० ।।
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महाबली एवं महापराक्रमी युयुधानने उस उत्तम धनुषको लेकर शीघ्र ही उसपर बाण चढ़ाया और कृतवर्माके द्वारा अपने धनुषका काटा जाना सहन न करके उन अतिरथी वीरने कुपित हो शीघ्रतापूर्वक उसपर आक्रमण किया ।। १९-२० ।।
ततः सुनिशितैर्बाणैर्दशभिः शिनिपुङ्गवः ।
जघान सूतं चाश्वांश्च ध्वजं च कृतवर्मणः ।। २१ ।।
तत्पश्चात् शिनिप्रवर सात्यकिने अत्यन्त तीखे दस बाणोंके द्वारा कृतवर्माके ध्वज, सारथि और घोड़ोंको नष्ट कर दिया ।। २१ ।।
ततो राजन् महेष्वासः कृतवर्मा महारथः ।
हताश्वसूतं सम्प्रेक्ष्य रथं हेमपरिष्कृतम् ।। २२ ।।
रोषेण महताऽऽविष्टः शूलमुद्यम्य मारिष ।
चिक्षेप भुजवेगेन जिघांसुः शिनिपुङ्गवम् ।। २३ ।।
राजन्! महाधनुर्धर महारथी कृतवर्मा अपने सुवर्ण-भूषित रथको घोड़े और सारथिसे रहित देख महान् रोषसे भर गया। मान्यवर! फिर उसने शिनिप्रवर सात्यकिको मार

डालनेकी इच्छासे एक शूल उठाकर उसे अपनी भुजाओंके सम्पूर्ण वेगसे चला दिया ॥ २२-२३ ॥
तच्छूलं सात्वतो ह्याजाै निर्भिद्य निशितैः शरैः ।
चूर्णितं पातयामास मोहयन्निव माधवम् ॥ २४ ॥
परंतु सात्यकिने युद्धस्थलमें अपने पैने बाणोंद्वारा उस शूलको काटकर चकनाचूर कर दिया और कृतवर्माको मोहमें डालते हुए-से उस चूर-चूर हुए शूलको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २४ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन हृद्येनं समताडयत् ।
स युद्धे युयुधानेन हताश्वो हतसारथिः ॥ २५ ॥
कृतवर्मा कृतस्तेन धरणीमन्वपद्यत ।
इसके बाद उन्होंने कृतवर्माकी छातीमें एक भल्लद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। तब वह युयुधानद्वारा घोड़ों और सारथिसे रहित किया हुआ कृतवर्मा रथ छोड़कर युद्धस्थलमें पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ २५ १/२ ॥
तस्मिन् सात्यकिना वीरे द्वैरथे विरथीकृते ॥ २६ ॥
समपद्यत सर्वेषां सैन्यानां सुमहद् भयम् ।
उस द्वैरथ युद्धमें सात्यकिद्वारा वीर कृतवर्माके रथहीन हो जानेपर आपके सारे सैनिकोंके मनमें महान् भय समा गया ॥ २६ १/२ ॥
पुत्रस्य तव चात्यर्थं विषादः समजायत ॥ २७ ॥
हतसूते हताश्वे तु विरथे कृतवर्मणि ।
जब कृतवर्माके घोड़े और सारथि मारे गये तथा वह रथहीन हो गया, तब आपके पुत्र दुर्योधनके मनमें बड़ा खेद हुआ ॥ २७ १/२ ॥
हताश्वं च समालक्ष्य हतसूतमरिंदम ॥ २८ ॥
अभ्यधावत् कृपो राजन् जिघांसुः शिनिपुङ्गवम् ।
शत्रुदमन नरेश! कृतवर्माके घोड़ों और सारथिको मारा गया देख कृपाचार्य सात्यकिको मार डालनेकी इच्छासे वहाँ दौड़े हुए आये ॥ २८ १/२ ॥
तमारोप्य रथोपस्थे मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ २९ ॥
अपोवाह महाबाहुं तूर्णमायोधनादपि ।
फिर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते महाबाहु कृतवर्माको अपने रथपर बिठाकर वे उसे तुरंत ही युद्धस्थलसे दूर हटा ले गये ॥ २९ १/२ ॥
शैनेयेऽधिष्ठिते राजन् विरथे कृतवर्मणि ॥ ३० ॥
दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् ।

राजन्! जब सात्यकि युद्धके लिये डटे रहे और कृतवर्मा रथहीन होकर भाग गया, तब दुर्योधनकी सारी सेना पुनः युद्धसे विमुख हो वहाँसे पलायन करने लगी ।। ३० १/२ ।।
तत् परे नान्वाबुध्यन्त सैन्येन रजसा वृताः ।। ३१ ।।
तावकाः प्रद्रुता राजन् दुर्योधनमृते नृपम् ।
परंतु सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे आच्छादित होनेके कारण शत्रुओंके सैनिक कौरव-सेनाके भागनेकी बात न जान सके। राजन्! राजा दुर्योधनके सिवा, आपके सभी योद्धा वहाँसे भाग गये ।। ३१ १/२ ।।
दुर्योधनस्तु सम्प्रेक्ष्य भग्नं स्वबलमन्तिकात् ।। ३२ ।।
जवेनाभ्यपतत् तूर्णं सर्वांश्चैको न्यवारयत् ।
दुर्योधन अपनी सेनाको निकटसे भागती देख बड़े वेगसे शत्रुओंपर टूट पड़ा और उन सबको अकेले ही शीघ्रतापूर्वक रोकने लगा ।। ३२ १/२ ।।
पाण्डूंश्च सर्वान् संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ।। ३३ ।।
शिखण्डिनं द्रौपदेयान् पञ्चालानां च ये गणाः ।
केकयान् सोमकांश्चैव सृञ्जयांश्चैव मारिष ।। ३४ ।।
असम्भ्रमं दुराधर्षः शितैर्बाणैरवाकिरत् ।
अतिष्ठदाहवे यत्तः पुत्रस्तव महाबलः ।। ३५ ।।
माननीय नरेश! उस समय क्रोधमें भरा हुआ आपका महाबली पुत्र दुर्धर्ष दुर्योधन सावधान हो बिना किसी घबराहटके समस्त पाण्डवों, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्रों, पांचालों, केकयों, सोमकों और सृंजयोंपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगा तथा निर्भय होकर युद्धभूमिमें डटा रहा ।। ३३—३५ ।।
यथा यज्ञे महानग्निर्मन्त्रपूतः प्रकाशवान् ।
तथा दुर्योधनो राजा संग्रामे सर्वतोऽभवत् ।। ३६ ।।
जैसे यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा पवित्र हुए महान् अग्निदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार संग्राममें राजा दुर्योधन सब ओरसे देदीप्यमान हो रहा था ।। ३६ ।।
तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवाहवे ।
अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्यः समपद्यत ।। ३७ ।।
जैसे मरणधर्मा मनुष्य अपनी मृत्युका उल्लंघन नहीं कर सकते, उसी प्रकार युद्धभूमिमें शत्रुसैनिक राजा दुर्योधनका सामना न कर सके। इतनेहीमें कृतवर्मा दूसरे रथपर आरूढ़ होकर वहाँ आ पहुँचा ।। ३७ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि सात्यकिकृतवर्मयुद्धे एकविंशोऽध्यायः ।। २१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें सात्यकि और कृतवर्माका युद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१ ।।