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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

[द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक और स्त्रीपर्व]

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॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत

महाभारत

(चतुर्थ खण्ड)

[द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक और स्त्रीपर्व]

(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवादसहित)


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥


अनुवादक—
(साहित्याचार्य पण्डित रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय ‘राम’)

सं० २०७२ पंद्रहवाँ पुनर्मुद्रण ३,०००
कुल मुद्रण ७८,६००

प्रकाशक—
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
(गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान)
फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स : (०५५१) २३३६९९७

web : gitapress.org e-mail : [email protected]
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श्रीकृष्णकी शरण

सर्वारिष्टहरं सुखैकरमणं शान्त्यास्पदं भक्तिदं
स्मृत्या ब्रह्मपदप्रदं स्वरसदं प्रेमास्पदं शाश्वतम्।
मेघश्यामशरीरमच्युतपदं पीताम्बरं सुन्दरं
श्रीकृष्णं सततं व्रजामि शरणं कायेन वाचा धिया ॥

जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको हर लेनेवाले, एकमात्र सुखस्वरूप अपने आत्मामें रमण करनेवाले, शान्तिके अधिष्ठान, अपनी भक्ति देनेवाले, चिन्तन करनेसे ब्रह्मपद प्रदान करनेमें समर्थ, अपना रस प्रदान करनेवाले, प्रेमके अधिष्ठान, सनातन पुरुष, मेघके समान श्यामसुन्दर विग्रहवाले, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले, पीताम्बरधारी और सुन्दर हैं, उन श्रीकृष्णकी मैं सदा मन, वाणी और शरीरसे शरण लेता हूँ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

महाभारत

श्रीकृष्ण ही परमार्थपद हैं

श्रीकृष्ण एव परमार्थपदं न चान्यत्
तज्ज्ञास्त एव जगतामिह कीर्तनीयाः ।
तद्ध्यानतः परममङ्गलमस्ति पुंसां
तज्ज्ञानमेव परमार्थपदैकलाभः ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ही परमार्थपद हैं, उनके सिवा दूसरी कोई वस्तु परमार्थ नहीं है। जो उनके तत्त्वको जाननेवाले हैं, वे ही यहाँ सम्पूर्ण जगत्के लिये कीर्तनीय हैं—सब लोग उन्हींकी महिमाका बखान करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके ध्यानसे ही मनुष्योंका परम मंगल होता है तथा उनका ज्ञान ही एकमात्र परमार्थपदकी प्राप्ति है।