महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
अध्याय (पृष्ठ 2780)
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता
जनमेजय उवाच
वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ भीमवेगः कथं नु सः ।
किमर्थं च सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत् ॥ १ ॥
कथमस्याभवद् वैरं कारणं किं च तत् प्रभो ।
शंस पृष्टो महाप्राज्ञ न हि तृप्यामि ते वचः ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा—प्रभो! वसिष्ठापवाह तीर्थमें सरस्वतीके जलका भयंकर वेग कैसे हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने उन महर्षिको किस लिये बहाया? उनके साथ उसका वैर कैसे हुआ? उस वैरका कारण क्या है? महामते! मैंने जो पूछा है, वह बताइये। मैं आपके वचनोंको सुनते-सुनते तृप्त नहीं होता हूँ ॥
वैशम्पायन उवाच
विश्वामित्रस्य विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य च भारत ।
भृशं वैरमभूद् राजंस्तपःस्पर्धाकृतं महत् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—भारत! तपस्यामें होड़ लग जानेके कारण विश्वामित्र तथा ब्रह्मर्षि वसिष्ठमें बड़ा भारी वैर हो गया था ॥ ३ ॥
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थेऽभवन्महान् ।
पूर्वतः पार्श्वतश्चासीद् विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ४ ॥
सरस्वतीके स्थाणुतीर्थमें पूर्वतटपर वसिष्ठका बहुत बड़ा आश्रम था और पश्चिमतटपर बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिका आश्रम बना हुआ था ॥ ४ ॥
यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान् परमं तपः ।
तत्रास्य कर्म तद् घोरं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५ ॥
महाराज! जहाँ भगवान् स्थाणुने बड़ी भारी तपस्या की थी, वहाँ मनीषी पुरुष उनके घोर तपका वर्णन करते हैं ॥ ५ ॥
यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम् ।
स्थापयामास तत् तीर्थं स्थाणुतीर्थमिति प्रभो ॥ ६ ॥
प्रभो! जहाँ भगवान् स्थाणु (शिव)-ने सरस्वतीका पूजन और यज्ञ करके तीर्थकी स्थापना की थी, वहाँ वह तीर्थ स्थाणुतीर्थके नामसे विख्यात हुआ ॥ ६ ॥
तत्र तीर्थे सुराः स्कन्दमभ्यषिञ्चन्नराधिप ।
सैनापत्येन महता सुरारिविनिबर्हणम् ॥ ७ ॥
नरेश्वर! उसी तीर्थमें देवताओंने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले स्कन्दको महान् सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया था ॥ ७ ॥
तस्मिन् सारस्वते तीर्थे विश्वामित्रो महामुनिः ।
वसिष्ठं चालयामास तपसोग्रेण तच्छृणु ॥ ८ ॥
उसी सारस्वततीर्थमें महामुनि विश्वामित्रने अपनी उग्र तपस्यासे वसिष्ठमुनिको विचलित कर दिया था। वह प्रसंग सुनाता हूँ, सुनो ॥ ८ ॥
विश्वामित्रवसिष्ठौ तावहन्यहनि भारत ।
स्पर्धां तपःकृतां तीव्रां चक्रतुस्तौ तपोधनौ ॥ ९ ॥
भारत! विश्वामित्र और वसिष्ठ दोनों ही तपस्याके धनी थे, वे प्रतिदिन होड़ लगाकर अत्यन्त कठोर तप किया करते थे ॥ ९ ॥
तत्राप्याधिकसंतापो विश्वामित्रो महामुनिः ।
दृष्ट्वा तेजो वसिष्ठस्य चिन्तामभिजगाम ह ॥ १० ॥
उनमें भी महामुनि विश्वामित्रको ही अधिक संताप होता था, वे वसिष्ठका तेज देखकर चिन्तामग्न हो गये थे ॥ १० ॥
तस्य बुद्धिरियं ह्यासीद् धर्मनित्यस्य भारत ।
इयं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् ॥ ११ ॥
आनयिष्यति वेगेन वसिष्ठं तपतां वरम् ।
इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥
भरतनन्दन! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले विश्वामित्र मुनिके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह सरस्वती तपोधन वसिष्ठको अपने जलके वेगसे तुरंत ही मेरे समीप ला देगी और यहाँ आ जानेपर तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसिष्ठका मैं वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥
एवं निश्चित्य भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः ।
सस्मार सरितां श्रेष्ठां क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
ऐसा निश्चय करके पूज्य महामुनि विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे रक्तवर्ण हो गये। उन्होंने सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका स्मरण किया ॥ १३ ॥
सा ध्याता मुनिना तेन व्याकुलत्वं जगाम ह ।
जज्ञे चैनं महावीर्यं महाकोपं च भाविनी ॥ १४ ॥
उन मुनिके चिन्तन करनेपर विचारशीला सरस्वती व्याकुल हो उठी। उसे ज्ञात हो गया कि ये महान् शक्तिशाली महर्षि इस समय बड़े भारी क्रोधसे भरे हुए हैं ॥ १४ ॥
तत एनं वेपमाना विवर्णा प्राञ्जलिस्तदा ।
उपतस्थे मुनिवरं विश्वामित्रं सरस्वती ॥ १५ ॥
इससे सरस्वतीकी कान्ति फीकी पड़ गयी और वह हाथ जोड़ थर-थर काँपती हुई मुनिवर विश्वामित्रकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ १५ ॥
हतवीरा यथा नारी साभवद् दुःखिता भृशम् ।
ब्रूहि किं करवाणीति प्रोवाच मुनिसत्तमम् ॥ १६ ॥
जिसका पति मारा गया हो उस विधवा नारीके समान वह अत्यन्त दुःखी हो गयी और उन मुनिश्रेष्ठसे बोली—'प्रभो! बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?' ॥ १६ ॥
तामुवाच मुनिः क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय ।
यावदेनं निहन्म्यद्य तच्छ्रुत्वा व्यथिता नदी ॥ १७ ॥
तब कुपित हुए मुनिने उससे कहा—'वसिष्ठको शीघ्र यहाँ बहाकर ले आओ, जिससे आज मैं इनका वध कर डालूँ।' यह सुनकर सरस्वती नदी व्यथित हो उठी ॥
प्राञ्जलिं तु ततः कृत्वा पुण्डरीकनिभेक्षणा ।
प्राकम्पत भृशं भीता वायुनेवाहता लता ॥ १८ ॥
वह कमलनयना अबला हाथ जोड़कर वायुके झकोरेसे हिलायी गयी लताके समान अत्यन्त भयभीत हो जोर-जोरसे काँपने लगी ॥ १८ ॥
तथारूपां तु तां दृष्ट्वा मुनिराह महानदीम् ।
अविचारं वसिष्ठं त्वमानयस्वान्तिकं मम ॥ १९ ॥
उसकी ऐसी अवस्था देखकर मुनिने उस महानदीसे कहा—'तुम बिना कोई विचार किये वसिष्ठको मेरे पास ले आओ' ॥ १९ ॥
सा तस्य वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा पापं चिकीर्षितम् ।
वसिष्ठस्य प्रभावं च जानन्त्यप्रतिमं भुवि ॥ २० ॥
साभिगम्य वसिष्ठं च इदमर्थमचोदयत् ।
यदुक्ता सरितां श्रेष्ठा विश्वामित्रेण धीमता ॥ २१ ॥
विश्वामित्रकी बात सुनकर और उनकी पापपूर्ण चेष्टा जानकर वसिष्ठके भूतलपर विख्यात अनुपम प्रभावको जानती हुई उस नदीने उनके पास जाकर बुद्धिमान् विश्वामित्रने जो कुछ कहा था, वह सब उनसे कह सुनाया ॥
उभयोः शापयोर्भीता वेपमाना पुनः पुनः ।
चिन्तयित्वा महाशापमृषिवित्रासिता भृशम् ॥ २२ ॥
वह दोनोंके शापसे भयभीत हो बारंबार काँप रही थी। महान् शापका चिन्तन करके विश्वामित्र ऋषिके डरसे बहुत डर गयी थी ॥ २२ ॥
तां कृशां च विवर्णां च दृष्ट्वा चिन्तासमन्विताम् ।
उवाच राजन् धर्मात्मा वसिष्ठो द्विपदां वरः ॥ २३ ॥
राजन्! उसे दुर्बल, उदास और चिन्तामग्न देख मनुष्योंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा वसिष्ठने कहा ॥ २३ ॥
वसिष्ठ उवाच
पाह्यात्मानं सरिच्छ्रेष्ठे वह मां शीघ्रगामिनी ।
विश्वामित्रः शपेद्धि त्वां मा कृथास्त्वं विचारणाम् ॥ २४ ॥
वसिष्ठ बोले—सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! तुम शीघ्र गतिसे प्रवाहित होकर मुझे बहा ले चलो और अपनी रक्षा करो, अन्यथा विश्वामित्र तुम्हें शाप दे देंगे; इसलिये तुम कोई दूसरा विचार मनमें न लाओ ॥ २४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् ।
चिन्तयामास कौरव्य किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन कृपाशील महर्षिका वह वचन सुनकर सरस्वती सोचने लगी, ‘क्या करनेसे शुभ होगा?’ ॥ २५ ॥
तस्याश्चिन्ता समुत्पन्ना वसिष्ठो मय्यतीव हि ।
कृतवान् हि दयां नित्यं तस्य कार्यं हितं मया ॥ २६ ॥
उसके मनमें यह विचार उठा कि ‘वसिष्ठने मुझपर बड़ी भारी दया की है। अतः सदा मुझे इनका हित-साधन करना चाहिये’ ॥ २६ ॥
अथ कूले स्वके राजन् जपन्तमृषिसत्तमम् ।
जुह्वानं कौशिकं प्रेक्ष्य सरस्वत्यभ्यचिन्तयत् ॥ २७ ॥
इदमन्तरमित्येवं ततः सा सरितां वरा ।
कूलापहारमकरोत् स्वेन वेगेन सा सरित् ॥ २८ ॥
राजन्! तदनन्तर ऋषिश्रेष्ठ विश्वामित्रको अपने तटपर जप और होम करते देख सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने सोचा, यही अच्छा अवसर है, फिर तो उस नदीने पूर्व-तटको तोड़कर उसे अपने वेगसे बहाना आरम्भ किया ॥
तेन कूलापहारेण मैत्रावरुणिरीह्यत ।
उह्यमानः स तुष्टाव तदा राजन् सरस्वतीम् ॥ २९ ॥
उस बहते हुए किनारेके साथ मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजी भी बहने लगे। राजन्! बहते समय वसिष्ठजी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे— ॥ २९ ॥
पितामहस्य सरसः प्रवृत्तासि सरस्वति ।
व्याप्तं चेदं जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः ॥ ३० ॥
‘सरस्वती! तुम पितामह ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो, इसीलिये तुम्हारा नाम सरस्वती है। तुम्हारे उत्तम जलसे ही यह सारा जगत् व्याप्त है ॥ ३० ॥
त्वमेवाकाशगा देवि मेघेषु सृजसे पयः ।
सर्वाश्चापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहि ॥ ३१ ॥
‘देवि! तुम्हीं आकाशमें जाकर मेघोंमें जलकी सृष्टि करती हो, तुम्हीं सम्पूर्ण जल हो; तुमसे ही हम ऋषिगण वेदोंका अध्ययन करते हैं ॥ ३१ ॥
पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिर्बुद्धिरुमा तथा ।
त्वमेव वाणी स्वाहा त्वं तवायत्तमिदं जगत् ।। ३२ ।।
त्वमेव सर्वभूतेषु वससीह चतुर्विधा ।
‘तुम्हीं पुष्टि, कीर्ति, धृति, सिद्धि, बुद्धि, उमा, वाणी और स्वाहा हो। यह सारा जगत्
तुम्हारे अधीन है। तुम्हीं समस्त प्राणियोंमें चार* प्रकारके रूप धारण करके निवास करती
हो' ।। ३२ ।।
एवं सरस्वती राजन् स्तूयमाना महर्षिणा ।। ३३ ।।
वेगेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ।
न्यवेदयत चाभीक्ष्णं विश्वामित्राय तं मुनिम् ।। ३४ ।।
राजन्! महर्षिके मुखसे इस प्रकार स्तुति सुनती हुई सरस्वतीने उन ब्रह्मर्षिको अपने
वेगद्वारा विश्वामित्रके आश्रमपर पहुँचा दिया और विश्वामित्रसे बारंबार निवेदन किया कि
‘वसिष्ठ मुनि उपस्थित हैं' ।। ३३-३४ ।।
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः ।
अथान्वेषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ।। ३५ ।।
सरस्वतीद्वारा लाये हुए वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र कुपित हो उठे और उनके
जीवनका अन्त कर देनेके लिये कोई हथियार ढूँढ़ने लगे ।। ३५ ।।
तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्मवध्याभयान्नदी ।
अपोवाह वसिष्ठं तु प्राचीं दिशमतन्द्रिता ।। ३६ ।।
उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ।
उन्हें कुपित देख सरस्वती नदी ब्रह्महत्याके भयसे आलस्य छोड़ दोनोंकी आज्ञाका
पालन करती हुई विश्वामित्रको धोखा देकर वसिष्ठ मुनिको पुनः पूर्व-दिशाकी ओर बहा ले
गयी ।। ३६ ।।
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।। ३७ ।।
अब्रवीद् दुःखसंक्रुद्धो विश्वामित्रो ह्यमर्षणः ।
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता ।। ३८ ।।
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसम्मतम् ।
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुनः अपनेसे दूर बहाया गया देख अमर्षशील विश्वामित्र दुःखसे
अत्यन्त कुपित हो बोले—‘सरिताओंमें श्रेष्ठ कल्याणमयी सरस्वती! तुम मुझे धोखा देकर
फिर चली गयी, इसलिये अब जलकी जगह रक्त बहाओ, जो राक्षसोंके समूहको अधिक
प्रिय है' ।। ३७-३८ ।।
ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता ।। ३९ ।।
अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ।
बुद्धिमान् विश्वामित्रके इस प्रकार शाप देनेपर सरस्वती नदी एक सालतक रक्तमिश्रित जल बहाती रही ॥
अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा ॥ ४० ॥
सरस्वतीं तथा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ।
तदनन्तर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सरा सरस्वतीको उस अवस्थामें देखकर अत्यन्त दुःखी हो गये ॥ ४० १/२ ॥
एवं वसिष्ठापवाहो लोके ख्यातो जनाधिप ॥ ४१ ॥
आगच्छच्च पुनर्मार्गं स्वमेव सरितां वरा ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार वह स्थान जगत्में वसिष्ठापवाहके नामसे विख्यात हुआ। वसिष्ठजीको बहानेके पश्चात् सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती फिर अपने पूर्व मार्गपर ही बहने लग गयी ॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
* परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—यह चार प्रकारकी वाणी ही सरस्वतीका चतुर्विध रूप है।