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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 449)

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः

राजा भरतका चरित्र

नारद उवाच

दौष्यन्तिं भरतं चापि मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
कर्माण्यसुकराण्यन्यैः कृतवान् यः शिशुर्वने ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**सृंजय! दुष्मन्तपुत्र राजा भरतकी भी मृत्यु हुई सुनी गयी है, जिन्होंने शैशवावस्थामें ही वनमें ऐसे-ऐसे कर्म किये थे, जो दूसरोंके लिये सर्वथा दुष्कर हैं ॥ १ ॥
हिमावदातान् यः सिंहान् नखदंष्ट्रायुधान् बली ।
निर्वीर्यांस्तरसा कृत्वा विचकर्ष बबन्ध च ॥ २ ॥
बलवान् भरत बाल्यावस्थामें ही नखों और दाढ़ोंसे प्रहार करनेवाले बरफके समान सफेद रंगके सिंहोंको अपने बाहुबलके वेगसे पराजित एवं निर्बल करके उन्हें खींच लाते और बाँध देते थे ॥ २ ॥

क्रूरांश्चोग्रतरान् व्याघ्रान् दमयित्वा चाकरोद् वशे ।

मनःशिला इव शिलाः संयुक्ता जतुराशिभिः ॥ ३ ॥
वे अत्यन्त भयंकर और क्रूर स्वभाववाले व्याघ्रोंका दमन करके उन्हें अपने वशमें कर लेते थे। मैनसिलके समान पीली और लाक्षाराशिसे संयुक्त लाल रंगकी बड़ी-बड़ी शिलाओंको वे सुगमतापूर्वक हाथसे उठा लेते थे ॥ ३ ॥

व्यालादींश्चातिबलवान् सुप्रतीकान् गजानपि ।
दंष्ट्रासु गृह्य विमुखान् शुष्कास्यानकरोद् वशे ॥ ४ ॥
अत्यन्त बलवान् भरत सर्प आदि जन्तुओंको और सुप्रतीक जातिके गजराजोंके भी दाँत पकड़ लेते और उनके मुख सुखाकर उन्हें विमुख करके अपने अधीन कर लेते थे ॥ ४ ॥

महिषानप्यतिबलो बलिनो विचकर्ष ह ।
सिंहानां च सुदृप्तानां शतान्याकर्षयद् बलात् ॥ ५ ॥
भरतका बल असीम था। वे बलवान् भैंसों और सौ-सौ गर्वीले सिंहोंको भी बलपूर्वक घसीट लाते थे ॥ ५ ॥

बलिनः सृमरान् खड्गान् नानासत्त्वानि चाप्युत ।
कृच्छ्रप्राणं वने बद्ध्वा दमयित्वाप्यवासृजत् ॥ ६ ॥
बलवान् सामरों, गैंडों तथा अन्य नाना प्रकारके हिंसक जन्तुओंको वे वनमें बाँध लेते और उनका दमन करते-करते उन्हें अधमरा करके छोड़ते थे ॥ ६ ॥

तं सर्वदमनेत्याहुर्द्विजास्तेनास्य कर्मणा ।
तं प्रत्यषेधज्जननी मा सत्त्वानि विजीजहि ॥ ७ ॥
उनके इस कर्मसे ब्राह्मणोंने उनका नाम सर्वदमन रख दिया। माता शकुन्तलाने भरतको मना किया कि तू जंगली जीवोंको सताया न कर ॥ ७ ॥

सोऽश्वमेधशतेनेष्ट्वा यमुनामनु वीर्यवान् ।
त्रिशताश्वान् सरस्वत्यां गङ्गामनु चतुःशतान् ॥ ८ ॥
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।
पुनरीजे महायज्ञैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ९ ॥
पराक्रमी महाराज भरत जब बड़े हुए, तब उन्होंने यमुनाके तटपर सौ, सरस्वतीके तटपर तीन सौ और गङ्गाजीके किनारे चार सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके पुनः उत्तम दक्षिणाओंसे सम्पन्न एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय महायज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया ॥ ८-९ ॥

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यामिष्ट्वा विश्वजिता अपि ।
वाजपेयसहस्राणां सहस्रैश्च सुसंवृतैः ॥ १० ॥
इष्ट्वा शाकुन्तलो राजा तर्पयित्वा द्विजान् धनैः ।
सहस्रं यत्र पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥ ११ ॥

जाम्बूनदस्य शुद्धस्य कनकस्य महायशाः ।
इसके बाद भरतने अग्निष्टोम और अतिरात्र याग करके विश्वजित् नामक यज्ञ किया। तत्पश्चात् सर्वथा सुरक्षित दस लाख वाजपेय यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करके महायशस्वी शकुन्तलाकुमार राजा भरतने धनद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते हुए आचार्य कण्वको विशुद्ध जम्बूनद सुवर्णके बने हुए एक हजार कमल भेंट किये ।। १०-११ १/२ ।।

यस्य यूपः शतव्यामः परिणाहेन काञ्चनः ।। १२ ।।
समागम्य द्विजैः सार्धं सेन्द्रैर्देवैः समुच्छ्रितः ।
इन्द्र आदि देवताओंने वहाँ ब्राह्मणोंके साथ मिलकर राजा भरतके यज्ञमें सोनेके बने हुए सौ व्याम (चार सौ हाथ) लंबे सुवर्णमय यूपका आरोपण किया ।। १२ १/२ ।।

अलंकृतान् राजमानान् सर्वरत्नैर्मनोहरैः ।। १३ ।।
हैरण्यानश्वान् द्विरदान् रथानुष्ट्रानजाविकम् ।
दासीदासं धनं धान्यं गाः सवत्साः पयस्विनीः ।। १४ ।।
ग्रामान् गृहांश्च क्षेत्राणि विविधांश्च परिच्छदान् ।
कोटीशतायुतांश्चैव ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।। १५ ।।
चक्रवर्ती ह्यदीनात्मा जितारिर्ह्यजितः परैः ।
शत्रुविजयी, दूसरोंसे पराजित न होनेवाले अदीनचित्त चक्रवर्ती सम्राट् भरतने ब्राह्मणोंको सम्पूर्ण मनोहर रत्नोंसे विभूषित, कान्तिमान् एवं सुवर्णशोभित घोड़े, हाथी, रथ, ऊँट, बकरी, भेड़, दास, दासी, धन-धान्य, दूध देनेवाली सवत्सा गायें, गाँव, घर, खेत तथा वस्त्राभूषण आदि नाना प्रकारकी सामग्री एवं दस लाख कोटि स्वर्णमुद्राएँ दी थीं ।। १३—१५ १/२ ।।

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।। १६ ।।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ।। १७ ।।
श्वैत्य संजय! चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मृत्युसे बच न सके, तब दूसरे कैसे बच सकते हैं? अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।