महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
संजय कहते हैं—राजन्! अपने सारथिको गिरा हुआ देख मद्रराज शल्य वेगपूर्वक लोहेकी गदा हाथमें लेकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १ ॥
द्वादशोऽध्यायः
भीमसेन और शल्यका भयानक गदायुद्ध तथा युधिष्ठिरके साथ शल्यका युद्ध, दुर्योधनद्वारा चेकितानका और युधिष्ठिरद्वारा चन्द्रसेन एवं द्रुमसेनका वध, पुनः युधिष्ठिर और माद्रीपुत्रोंके साथ शल्यका युद्ध
संजय उवाच
पतितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्यः सर्वायसीं गदाम् ।
आदाय तरसा राजंस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! अपने सारथिको गिरा हुआ देख मद्रराज शल्य वेगपूर्वक लोहेकी गदा हाथमें लेकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १ ॥
तं दीप्तमिव कालाग्निं पाशहस्तमिवान्तकम् ।
सशृङ्गमिव कैलासं सवज्रमिव वासवम् ॥ २ ॥
सशूलमिव हर्यक्षं वने मत्तमिव द्विपम् ।
जवेनाभ्यपतद् भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ३ ॥
वे प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्नि, पाशधारी यमराज, शिखरयुक्त कैलास, वज्रधारी इन्द्र, त्रिशूलधारी रुद्र तथा जंगलके मतवाले हाथीके समान भयंकर जान पड़ते थे। भीमसेन बहुत बड़ी गदा हाथमें लेकर वेगपूर्वक उनके ऊपर टूट पड़े ॥ २-३ ॥
ततः शङ्खप्रणादश्च तूर्याणां च सहस्रशः ।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणां हर्षवर्धनः ॥ ४ ॥
फिर तो शंखनाद, सहस्रों वाद्योंका गम्भीर घोष तथा शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाला सिंहनाद सब ओर होने लगा ॥
प्रेक्षन्तः सर्वतस्तौ हि योधा योधमहाद्विपौ ।
तावकाश्चापरे चैव साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ ५ ॥
योद्धाओंमें महान् गजराजके समान पराक्रमी उन दोनों वीरोंको देखकर आपके और शत्रुपक्षके योद्धा सब ओरसे 'वाह-वाह' कहकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे — ॥ ५ ॥
न हि मद्राधिपादन्यो रामाद् वा यदुनन्दनात् ।
सोढुमुत्सहते वेगं भीमसेनस्य संयुगे ॥ ६ ॥
'संसारमें मद्रराज शल्य अथवा यदुनन्दन बलरामजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो युद्धमें भीमसेनका वेग सह सके ॥ ६ ॥
तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः ।
सोढुमुत्सहते नान्यो योधो युधि वृकोदरात् ॥ ७ ॥
'इसी प्रकार महामना मद्रराज शल्यकी गदाका वेग भी रणभूमिमें भीमसेनके सिवा दूसरा कोई योद्धा नहीं सह सकता' ॥ ७ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतुः ।
आवर्तितौ गदाहस्तौ मद्रराजवृकोदरौ ॥ ८ ॥
शल्य और भीमसेन दोनों वीर हाथमें गदा लिये साँड़ोंकी तरह गर्जते हुए चक्कर लगाने और पैंतरे देने लगे ॥ ८ ॥
मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च ।
निर्विशेषमभूद् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९ ॥
मण्डलाकार गतिसे घूमनेमें, भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखानेकी कलामें तथा गदाका प्रहार करनेमें उन दोनों पुरुषसिंहोंमें कोई भी अन्तर नहीं दिखायी देता था, दोनों एक-से जान पड़ते थे ॥ ९ ॥
तप्तहेममयैः शुभ्रैर्बभूव भयवर्धिनी ।
अग्निज्वालैरिवाबद्धा पट्टैः शल्यस्य सा गदा ॥ १० ॥
तपाये हुए उज्ज्वल सुवर्णमय पत्रोंसे जड़ी हुई शल्यकी वह भयंकर गदा आगकी ज्वालाओंसे लिपटी हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ १० ॥
तथैव चरतो मार्गान् मण्डलेषु महात्मनः ।
विद्युदभ्रप्रतीकाशा भीमस्य शुशुभे गदा ॥ ११ ॥
इसी प्रकार मण्डलाकार गतिसे विचित्र पैंतरोंके साथ विचरते हुए महामनस्वी भीमसेनकी गदा बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होती थी ॥ ११ ॥
ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदया गदा ।
दह्यमानेव खे राजन् सासृजत् पावकार्चिषः ॥ १२ ॥
राजन्! मद्रराजने अपनी गदासे जब भीमसेनकी गदापर चोट की, तब वह प्रज्वलित-सी हो उठी और उससे आगकी लपटें निकलने लगीं ॥ १२ ॥
तथा भीमेन शल्यस्य ताडिता गदया गदा ।
अङ्गारवर्षं मुमुचे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १३ ॥
इसी प्रकार भीमसेनकी गदासे ताड़ित होकर शल्यकी गदा भी अंगारे बरसाने लगी। वह अद्भुत-सा दृश्य हुआ ॥ १३ ॥
दन्तैरिव महानागौ शृङ्गैरिव महर्षभौ ।
तोत्रैरिव तदान्योन्यं गदाग्राभ्यां निजघ्नतुः ॥ १४ ॥
जैसे दो विशाल हाथी दाँतोंसे और दो बड़े-बड़े साँड़ सींगोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अंकुशों-जैसी उन श्रेष्ठ गदाओं़द्वारा वे दोनों वीर एक-दूसरेपर आघात करने
लगे ।। १४ ।।
तौ गदाभिहतैर्गात्रैः क्षणेन रुधिरोक्षितौ ।
प्रेक्षणीयतरावास्तां पुष्पिताविव किंशुकौ ।। १५ ।।
उन दोनोंके अंगोंमें गदाकी गहरी चोटोंसे घाव हो गये थे। अतः दोनों ही क्षणभरमें खूनसे नहा गये। उस समय खिले हुए दो पलाशवृक्षोंके समान वे दोनों वीर देखने ही योग्य जान पड़ते थे ।। १५ ।।
गदया मद्रराजस्य सव्यदक्षिणमाहतः ।
भीमसेनो महाबाहुर्न चचालाचलो तथा ।। १६ ।।
मद्रराजकी गदासे दायें-बायें अच्छी तरह चोट खाकर भी महाबाहु भीमसेन विचलित नहीं हुए। वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे ।। १६ ।।
तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः ।
शल्यो न विव्यथे राजन् दन्तिनेव महागिरिः ।। १७ ।।
इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे बारंबार आहत होनेपर भी शल्यको उसी प्रकार व्यथा नहीं हुई, जैसे दन्तार हाथीके आघातसे महान् पर्वत पीड़ित नहीं होता ।। १७ ।।
शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः ।
गदानिपातसंहादो वज्रयोरिव निःस्वनः ।। १८ ।।
उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेकी आवाज सम्पूर्ण दिशाओंमें दो वज्रोंके आघातके समान सुनायी देती थी ।। १८ ।।
निवृत्य तु महावीर्यौ समुच्छ्रितमहागदौ ।
पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ।। १९ ।।
महापराक्रमी भीमसेन और शल्य दोनों वीर अपनी विशाल गदाओंको ऊपर उठाये कभी पीछे लौट पड़ते, कभी मध्यम मार्गमें स्थित होते और कभी मण्डलाकार घूमने लगते थे ।। १९ ।।
अथाभ्येत्य पदान्यष्टौ संनिपातोऽभवत् तयोः ।
उद्यम्य लोहदण्डाभ्यामतिमानुषकर्मणोः ।। २० ।।
वे युद्ध करते-करते आठ कदम आगे बढ़ आये और लोहेके डंडे उठाकर एक-दूसरेको मारने लगे। उनका पराक्रम अलौकिक था। उन दोनोंमें उस समय भयानक संघर्ष होने लगा ।। २० ।।
पोथयन्तौ तदान्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः ।
क्रियाविशेषं कृतिनौ दर्शयामासतुस्तदा ।। २१ ।।
वे दोनों युद्धकलाके विद्वान् वीर, एक-दूसरेको कुचलते हुए मण्डलाकार विचरते और अपना-अपना विशेष कार्य-कौशल प्रदर्शित करते थे ।। २१ ।।
अथोद्यम्य गदे घोरे सशृङ्गाविव पर्वतौ ।
तावाजघ्नतुरन्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः ॥ २२ ॥
तदनन्तर वे पुनः अपनी भयंकर गदाएँ उठाकर शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान परस्पर आघात करने और मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे ॥ २२ ॥
क्रियाविशेषकृतिनौ रणभूमितलेऽचलौ ।
तौ परस्परसंरम्भाद् गदाभ्यां सुभृशाहतौ ॥ २३ ॥
युगपत् पेततुर्वीरावुभाविन्द्रध्वजाविव ।
उभयोः सेनयोर्वीरास्तदा हाहाकृतोऽभवन् ॥ २४ ॥
युद्धविषयक कार्यविशेषके ज्ञाता वे दोनों वीर अविचलभावसे रणभूमिमें डटे हुए थे। वे एक-दूसरेपर क्रोधपूर्वक गदाओंका प्रहार करके अत्यन्त घायल हो गये और दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही साथ पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय दोनों सेनाओंके वीर हाहाकार करने लगे ॥
भृशं मर्माण्यभिहतावुभावास्तां सुविह्वलौ ।
ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामृषभं रणे ॥ २५ ॥
अपोवाह कृपः शल्यं तूर्णमायोधनादथ ।
भीम और शल्य दोनोंके मर्मस्थानोंमें गहरी चोटें लगी थीं; इसलिये दोनों ही अत्यन्त व्याकुल हो गये थे। इतनेहीमें कृपाचार्य मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही युद्धभूमिसे दूर हटा ले गये ॥ २५ १/२ ॥
क्षीणवद् विह्वलत्वात् तु निमेषात् पुनरुत्थितः ॥ २६ ॥
भीमसेनो गदापाणिः समाह्वयत मद्रपम् ।
इधर गदाधारी भीमसेन पलक मारते-मारते पुनः होशमें आकर उठ खड़े हुए और विह्वलताके कारण मतवाले पुरुषके समान मद्रराजको युद्धके लिये ललकारने लगे ॥
ततस्तु तावकाः शूरा नानाशस्त्रसमायुताः ॥ २७ ॥
नानावादित्रशब्देन पाण्डुसेनामयोधयन् ।
तब आपके सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर भाँति-भाँतिके रणवाद्योंकी गम्भीर ध्वनिके साथ पाण्डव-सेनासे युद्ध करने लगे ॥ २७ १/२ ॥
भुजावुच्छ्रित्य शस्त्रं च शब्देन महता ततः ॥ २८ ॥
अभ्यद्रवन् महाराज दुर्योधनपुरोगमाः ।
महाराज! दुर्योधन आदि कौरववीर दोनों हाथ और शस्त्र उठाकर महान् कोलाहल एवं सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ २८ १/२ ॥
तदनीकमभिप्रेक्ष्य ततस्ते पाण्डुनन्दनाः ॥ २९ ॥
प्रययुः सिंहनादेन दुर्योधनपुरोगमान् ।
उस कौरवदलको धावा करते देख पाण्डव-वीर सिंहके समान गर्जना करके दुर्योधन आदिकी ओर बढ़ चले ॥ २९ १/२ ॥
तेषामापततां तूर्णं पुत्रस्ते भरतर्षभ ।। ३० ।।
प्रासेन चेकितानं वै विव्याध हृदये भृशम् ।
भरतश्रेष्ठ! आपके पुत्रने तुरंत ही एक प्रासका प्रहार करके उन आक्रमणकारी पाण्डव-योद्धाओंमेंसे चेकितानकी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी ।। ३० १/२ ।।
स पपात रथोपस्थे तव पुत्रेण ताडितः ।। ३१ ।।
रुधिरौघपरिक्लिन्नः प्रविश्य विपुलं तमः ।
आपके पुत्रद्वारा ताड़ित होकर चेकितान अत्यन्त मूर्च्छित हो रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उस समय उसका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो गया था ।। ३१ १/२ ।।
चेकितानं हतं दृष्ट्वा पाण्डवेया महारथाः ।। ३२ ।।
असक्तमभ्यवर्षन्त शरवर्षाणि भागशः ।
चेकितानको मारा गया देख पाण्डव महारथी पृथक्-पृथक् बाणोंकी लगातार वर्षा करने लगे ।। ३२ १/२ ।।
तावकानामनीकेषु पाण्डवा जितकाशिनः ।। ३३ ।।
व्यचरन्त महाराज प्रेक्षणीयाः समन्ततः ।
महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव आपकी सेनाओंमें सब ओर निर्भय विचरते थे। उस समय वे देखने ही योग्य थे ।। ३३ १/२ ।।
कृपश्च कृतवर्मा च सौबलश्च महारथः ।। ३४ ।।
अयोधयन् धर्मराजं मद्रराजपुरस्कृताः ।
तत्पश्चात् कृपाचार्य, कृतवर्मा और महारथी शकुनि मद्रराज शल्यको आगे करके धर्मराज युधिष्ठिरसे युद्ध करने लगे ।। ३४ १/२ ।।
भारद्वाजस्य हन्तारं भूरिवीर्यपराक्रमम् ।। ३५ ।।
दुर्योधनो महाराज धृष्टद्युम्नमयोधयत् ।
राजाधिराज! आपका पुत्र दुर्योधन अत्यन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न द्रोणहन्ता धृष्टद्युम्नके साथ जूझने लगा ।।
त्रिसाहस्रास्तथा राजंस्तव पुत्रेण चोदिताः ।। ३६ ।।
अयोधयन्त विजयं द्रोणपुत्रपुरस्कृताः ।
राजन्! आपके पुत्रसे प्रेरित हो तीन हजार योद्धा अश्वत्थामाको अगुआ बनाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगे ।। ३६ १/२ ।।
विजये धृतसंकल्पाः समरे त्यक्तजीविताः ।। ३७ ।।
प्राविशंस्तावका राजन् हंसा इव महत् सरः ।
नरेश्वर! जैसे हंस महान् सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार आपके सैनिक समरांगणमें विजयका दृढ़ संकल्प ले प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुओंकी सेनामें जा घुसे ।।
ततो युद्धमभूद् घोरं परस्परवधैषिणाम् ॥ ३८ ॥
अन्योन्यवधसंयुक्तमन्योन्यप्रीतिवर्धनम् ।
फिर तो एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले उभयपक्षके सैनिकोंमें घोर युद्ध होने लगा। सभी एक-दूसरेके संहारके लिये सचेष्ट थे और वह युद्ध उनकी पारस्परिक प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ ३८ १/२ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे राजन् वीरवरक्षये ॥ ३९ ॥
अनिलेनेरितं घोरमुत्तस्थौ पार्थिवं रजः ।
राजन्! बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस घोर संग्रामके आरम्भ होते ही वायुकी प्रेरणासे धरतीकी भयंकर धूल ऊपरको उठने लगी ॥ ३९ १/२ ॥
श्रवणान्नामधेयानां पाण्डवानां च कीर्तनात् ॥ ४० ॥
परस्परं विजानीमो यदयुध्यन्नभीतवत् ।
उस समय उस धूलके अन्धकारमें समस्त योद्धा निर्भय-से होकर युद्ध कर रहे थे। पाण्डव तथा कौरव-योद्धा जो अपना नाम लेकर परिचय देते थे, उसे ही सुनकर हमलोग एक-दूसरेको पहचान पाते थे ॥ ४० १/२ ॥
तद्रजः पुरुषव्याघ्र शोणितेन प्रशामितम् ॥ ४१ ॥
दिशश्च विमला जातास्तस्मिंस्तमसि नाशिते ।
पुरुषसिंह! उस समय इतना खून बहा कि उससे वहाँ छायी हुई सारी धूल बैठ गयी। उस धूलजनित अन्धकारका नाश होनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥
तथा प्रवृत्ते संग्रामे घोररूपे भयानके ॥ ४२ ॥
तावकानां परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः ।
इस प्रकार वह घोर एवं भयानक संग्राम चलने लगा। उस समय आपके और शत्रुपक्षके योद्धाओंमेंसे कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ ४२ १/२ ॥
ब्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थयन्तो जयं युधि ॥ ४३ ॥
सुयुद्धेन पराक्रान्ता नसः स्वर्गमभीप्सवः ।
सबका लक्ष्य था ब्रह्मलोककी प्राप्ति। वे सभी सैनिक युद्धमें विजय चाहते और उत्तम युद्धके द्वारा पराक्रम दिखाते हुए स्वर्गलोक पानेकी अभिलाषा रखते थे ॥
भर्तृपिण्डविमोक्षार्थं भर्तृकार्यविनिश्चिताः ॥ ४४ ॥
स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युयुधिरे तदा ।
सभी योद्धा स्वामीके दिये हुए अन्नके ऋणसे उऋण होनेके लिये उनके कार्यको सिद्ध करनेका दृढ़ निश्चय किये मनमें स्वर्गकी अभिलाषा रखकर उस समय उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे ॥ ४४ १/२ ॥
नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥ ४५ ॥
अथ भूयो महाराज शरेणानतपर्व
अन्योन्यमभिगर्जन्तः प्रहरन्तः परस्परम् ।
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके परस्पर प्रहार करनेवाले महारथी एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करते थे ॥ ४५ १/२ ॥
हत विध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत ॥ ४६ ॥
इति स्म वाचः श्रूयन्ते तव तेषां च वै बले ।
आपकी और पाण्डवोंकी सेनामें ‘मारो, बींध डालो, पकड़ो, प्रहार करो और टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ ये ही बातें सुनायी देती थीं ॥ ४६ १/२ ॥
ततः शल्यो महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ४७ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैर्हन्तुकामो महारथम् ।
महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने महारथी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ४७ १/२ ॥
तस्य पार्थो महाराज नाराचान् वै चतुर्दश ॥ ४८ ॥
मर्माण्युद्दिश्य मर्मज्ञो निचखान हसन्निव ।
महाराज! मर्मज्ञ कुन्तीकुमारने शल्यके मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके हँसते हुए-से चौदह नाराच चलाये और उनके अंगोंमें धँसा दिये ॥ ४८ १/२ ॥
आवार्य पाण्डवं बाणैर्हन्तुकामो महाबलः ॥ ४९ ॥
विव्याध समरे क्रुद्धो बहुभिः कङ्कपत्रिभिः ।
महाबली शल्य पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको रोककर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे समरांगणमें कंकपत्रयुक्त अनेक बाणोंद्वारा उनपर क्रोधपूर्वक प्रहार करने लगे ॥
अथ भूयो महाराज शरेणानतपर्वणा ॥ ५० ॥
युधिष्ठिरं समाजघ्ने सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।
राजाधिराज! फिर उन्होंने सारी सेनाके देखते-देखते झुकी हुई गाँठवाले बाणसे युधिष्ठिरको घायल कर दिया ॥
धर्मराजोऽपि संक्रुद्धो मद्रराजं महायशाः ॥ ५१ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ।
तब महायशस्वी धर्मराजने भी अत्यन्त कुपित हो कंक और मोरकी पाँखोंवाले पैने बाणोंसे मद्रराज शल्यको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५१ १/२ ॥
चन्द्रसेनं च सप्तत्या सूतं च नवभिः शरैः ॥ ५२ ॥
द्रुमसेनं चतुःषष्ट्या निजघान महारथः ।
इसके बाद महारथी युधिष्ठिरने सत्तर बाणोंसे चन्द्रसेनको, नौ बाणोंसे शल्यके सारथिको और चौंसठ बाणोंसे द्रुमसेनको मार डाला ॥ ५२ १/२ ॥
चक्ररक्षे हते शल्यः पाण्डवेन महात्मना ॥ ५३ ॥
निजघान ततो राजंश्चेदीन् वै पञ्चविंशतिम् ।
महात्मा पाण्डवके द्वारा अपने चक्ररक्षकके मारे जानेपर राजा शल्यने पचीस चेदि-योद्धाओंका संहार कर डाला ॥ ५३ १/२ ॥
सात्यकिं पञ्चविंशत्या भीमसेनं च पञ्चभिः ॥ ५४ ॥
माद्रीपुत्रौ शतेनाजौ विव्याध निशितैः शरैः ।
फिर सात्यकिको पचीस, भीमसेनको पाँच तथा माद्रीके पुत्रोंको सौ तीखे बाणोंसे रणभूमिमें घायल कर दिया ॥
एवं विचरतस्तस्य संग्रामे राजसत्तम ॥ ५५ ॥
सम्प्रेषयच्छितान् पार्थः शरानाशीविषोपमान् ।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए राजा शल्यको लक्ष्य करके कुन्तीकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं तीखे बाण चलाये ॥ ५५ १/२ ॥
ध्वजाग्रं चास्य समरे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ५६ ॥
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरद् रथात् ।
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने समरांगणमें सामने खड़े हुए शल्यकी ध्वजाके अग्रभागको एक भल्लके द्वारा रथसे काट गिराया ॥ ५६ १/२ ॥
पाण्डुपुत्रेण वै तस्य केतुं छिन्नं महात्मना ॥ ५७ ॥
निपतन्तमपश्याम गिरिशृङ्गमिवहतम् ।
महात्मा पाण्डुपुत्रके द्वारा कटकर गिरते हुए उस ध्वजको हमलोगोंने वज्रके आघातसे टूटकर नीचे गिरनेवाले पर्वत-शिखरके समान देखा था ॥ ५७ १/२ ॥
ध्वजं निपतितं दृष्ट्वा पाण्डवं च व्यवस्थितम् ॥ ५८ ॥
संक्रुद्धो मद्रराजोऽभूच्छरवर्षं मुमोच ह ।
ध्वज नीचे गिर पड़ा और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर सामने खड़े हैं; यह देखकर मद्रराज शल्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५८ १/२ ॥
शल्यः सायकवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ५९ ॥
अभ्यवर्षदमेयात्मा क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः ।
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न क्षत्रियशिरोमणि शल्य वृष्टिकारी मेघके समान क्षत्रियोंपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ५९ १/२ ॥
सात्यकिं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ६० ॥
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा युधिष्ठिरमपीडयत् ।
सात्यकि, भीमसेन और माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव—इनमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाणोंसे घायल करके वे युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगे ॥ ६० १/२ ॥
ततो बाणमयं जालं विततं पाण्डवोरसि ॥ ६१ ॥
अपश्याम महाराज मेघजालमिवोद्गतम् ।
महाराज! तदनन्तर हमलोगोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी छातीपर बाणोंका जाल-सा बिछा हुआ देखा, मानो आकाशमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो ।। ६१ १/२ ।।
तस्य शल्यो रणे क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ।। ६२ ।।
दिशः संछादयामास प्रदिशश्च महारथः ।
रणभूमिमें कुपित हुए महारथी शल्यने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युधिष्ठिरकी सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको ढक दिया ।। ६२ १/२ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा बाणजालेन पीडितः ।
बभूवाद्भुतविक्रान्तो जम्भो वृत्रहणा यथा ।। ६३ ।।
उस समय अद्भुत पराक्रमी राजा युधिष्ठिर उस बाणसमूहसे वैसे ही पीड़ित हो गये, जैसे इन्द्रने जम्भासुरको संतप्त किया था ।। ६३ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।