महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1512)
अश्वत्थामाके द्वारा पाण्डव-सेनापर नारायणास्त्रका प्रयोग
जनेश्वर! पाण्डव-महारथी जैसे-जैसे युद्ध करते थे, वैसे-ही-वैसे उस अस्त्रका वेग बढ़ता जाता था ।।
वध्यमानास्तदास्त्रेण तेन नारायणेन वै ।
दह्यमानानलेनेव सर्वतोऽभ्यर्दिता रणे ।। २२ ।।
उस नारायणास्त्रसे घायल हुए सैनिक रणभूमिमें ऐसे पीड़ित हुए मानो सब ओरसे आगमें झुलस रहे हों ।। २२ ।।
यथा हि शिशिरापाये दहेत् कक्षं हुताशनः ।
तथा तदस्त्रं पाण्डूनां ददाह ध्वजिनीं प्रभो ।। २३ ।।
प्रभो! जैसे सर्दी बीतनेपर गरमीमें लगी हुई आग सूखे काठ या जंगलको जला डाले, उसी प्रकार वह अस्त्र पाण्डव-सेनाको भस्म करने लगा ।। २३ ।।
आपूर्यमाणेनास्त्रेण सैन्ये क्षीयति च प्रभो ।
जगाम परं त्रासं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। २४ ।।
राजन्! जब वह अस्त्र सब ओर व्याप्त हो गया और उसके द्वारा पाण्डव-सेना क्षीण होने लगी, तब धर्मपुत्र युधिष्ठिरको बड़ा भय हुआ ।। २४ ।।
द्रवमाणं तु तत् सैन्यं दृष्ट्वा विगतचेतनम् ।
मध्यस्थतां च पार्थस्य धर्मपुत्रोऽब्रवीदिदम् ।। २५ ।।
उन्होंने अपनी उस सेनाको जब अचेत होकर भागती और कुन्तीपुत्र अर्जुनको तटस्थभावसे खड़ा देखा, तब इस प्रकार कहा— ।। २५ ।।
धृष्टद्युम्न पलायस्व सह पाञ्चालसेनया ।
सात्यके त्वं च गच्छस्व वृष्ण्यन्धकवृतो गृहान् ।। २६ ।।
'धृष्टद्युम्न! तुम पांचालोंकी सेनाके साथ भाग जाओ। सात्यके! तुम भी वृष्णिवंशी और अन्धकवंशी वीरोंको साथ लेकर घर चले जाओ ।। २६ ।।
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् ।
श्रेयो ह्यपदिशत्येष लोकस्य किमुतात्मनः ।। २७ ।।
'धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने लिये जो उचित समझेंगे, करेंगे। ये सारे जगत्को कल्याणका उपदेश देते हैं, फिर अपना भला क्यों नहीं करेंगे? ।। २७ ।।
संग्रामस्तु न कर्तव्यः सर्वसैन्यान् ब्रवीमि वः ।
अहं हि सह सोदर्यैः प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ।। २८ ।।
'मैं तुम सभी सैनिकोंसे कह रहा हूँ, कोई भी युद्ध न करे। अब मैं भाइयोंके साथ अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ।। २८ ।।
भीष्मद्रोणार्णवं तीर्त्वा संग्रामे भीरुदुस्तरे ।
विमज्जिष्यामि सलिले सगणो द्रौणिगोष्पदे ।। २९ ।।
'कायरोंके लिये दुस्तर संग्राममें भीष्म और द्रोणाचार्यरूपी महासागरको पार करके मैं सगे-सम्बन्धियोंके साथ अश्वत्थामारूपी गायकी खुरीके जलमें डूब जाऊँगा ॥ २९ ॥
कामः सम्पद्यतामस्य बीभत्सोराशु मां प्रति ।
कल्याणवृत्तराचार्यो मया युधि निपातितः ॥ ३० ॥
'अर्जुनकी मेरे प्रति जो शुभ कामना है, वह शीघ्र पूरी हो जानी चाहिये; क्योंकि सदा अपने कल्याणमें संलग्न रहनेवाले आचार्यको मैंने युद्धमें मरवा दिया है ॥
येन बालः स सौभद्रो युद्धानामविशारदः ।
समर्थैर्बहुभिः क्रूरैर्घातितो नाभिपालितः ॥ ३१ ॥
'जिन्होंने युद्धकौशलसे रहित बालक सुभद्राकुमारको क्रूर स्वभाववाले बहुसंख्यक शक्तिशाली महारथियोंद्वारा मरवा दिया और उसकी रक्षा नहीं की ॥ ३१ ॥
येनाविब्रुवता प्रश्नं तथा कृष्णा सभां गता ।
उपेक्षिता सपुत्रेण दासभावं नियच्छती ॥ ३२ ॥
'पुत्रसहित जिन्होंने सभामें लायी गयी द्रौपदीके प्रश्नका उत्तर न देकर उसके प्रति उपेक्षा दिखायी, उस समय वह बेचारी हमारे दासभावके निवारणका प्रयत्न कर रही थी ॥ ३२ ॥
(रक्षणे च महान् यत्नः सैन्धवस्य कृतो युधि ।
अर्जुनस्य विघातार्थं प्रतिज्ञा येन रक्षिता ॥
'जिन्होंने अर्जुनके विनाशके लिये युद्धमें सिंधुराजकी रक्षाके निमित्त महान् प्रयत्न किया और अपनी प्रतिज्ञा रखी।
व्यूहद्वारि वयं चैव धृता येन जिगीषवः ।
वारितं च महत् सैन्यं प्रविशत् तद् यथाबलम् ॥)
'हमलोग विजयकी अभिलाषासे आगे बढ़ना चाहते थे; किंतु जिन्होंने हमें व्यूहके दरवाजेपर रोक रखा था, यथाशक्ति उसके भीतर प्रवेश करनेकी चेष्टामें लगी हुई हमारी विशाल सेनाको भी जिन्होंने रोक ही दिया था।
जिघांसुर्धार्तराष्ट्रश्च श्रान्तेष्वश्वेषु फाल्गुनम् ।
कवचेन तथा गुप्तो रक्षार्थं सैन्धवस्य च ॥ ३३ ॥
'अर्जुनके घोड़े जब थक गये थे और धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जब अर्जुनके वधकी इच्छासे उनपर आक्रमण कर रहा था, उस समय जिन्होंने उसकी तथा सिंधुराजकी रक्षाके लिये उसे दिव्य कवचद्वारा सुरक्षित कर दिया था ॥ ३३ ॥
येन ब्रह्मास्त्रविदुषा पञ्चालाः सत्यजिन्मुखाः ।
कुर्वाणा मज्जये यत्नं समूला विनिपातिताः ॥ ३४ ॥
'ब्रह्मास्त्रको जाननेवाले जिन आचार्यदेवने मेरी विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले सत्यजित् आदि पांचालवीरोंको समूल नष्ट कर दिया ॥ ३४ ॥
येन प्रव्राज्यमानाश्च राज्याद् वयमधर्मतः ।
निवार्यमाणा नु वयं नानुयातास्तदैषिणः ॥ ३५ ॥
‘जब कौरव अधर्मपूर्वक हमें राज्यसे निर्वासित कर रहे थे, तब जिन्होंने हमें रोकने (शान्त करने)-की ही चेष्टा की थी; किंतु उनका हित चाहनेवाले हमलोगोंका उस समय उन्होंने साथ नहीं दिया था ॥
योऽसावत्यन्तमस्मासु कुर्वाणः सौहृदं परम् ।
हतस्तदर्थे मरणं गमिष्यामि सबान्धवः ॥ ३६ ॥
‘जो (इस प्रकार) हमलोगोंपर अत्यन्त स्नेह करनेवाले थे वे द्रोणाचार्य मारे गये हैं; अतः उनके लिये अपने भाइयोंसहित मैं भी मर जाऊँगा’ ॥ ३६ ॥
एवं ब्रुवति कौन्तेये दाशार्हस्त्वरितस्ततः ।
निवार्य सैन्यं बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
जब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय दशार्हकुलभूषण भगवान् श्रीकृष्णने तुरंत ही अपनी दोनों भुजाओंके संकेतसे सारी सेनाको रोककर इस प्रकार कहा — ॥ ३७ ॥
शीघ्रं न्यस्यत शस्त्राणि वाहेभ्यश्चावरोहत ।
एष योगोऽत्र विहितः प्रतिषेधे महात्मना ॥ ३८ ॥
‘योद्धाओ! अपने अस्त्र-शस्त्र शीघ्र नीचे डाल दो और सवारियोंसे उतर जाओ। परमात्मा नारायणने इस अस्त्रके निवारणके लिये यही उपाय निश्चित किया है ॥
द्विपाश्वस्यन्दनेभ्यश्च क्षितिं सर्वेऽवरोहत ।
एवमेतन्न वो हन्यादस्त्रं भूमौ निरायुधान् ॥ ३९ ॥
‘तुम सब लोग हाथी, घोड़े और रथोंसे उतरकर पृथ्वीपर आ जाओ। इस प्रकार भूमिपर निहत्थे खड़े हुए तुमलोगोंको यह अस्त्र नहीं मार सकेगा ॥ ३९ ॥
यथा यथा हि युध्यन्ते योधा ह्यस्त्रमिदं प्रति ।
तथा तथा भवन्त्येते कौरवा बलवत्तराः ॥ ४० ॥
‘हमारे योद्धा जैसे-जैसे इस अस्त्रके विरुद्ध युद्ध करते हैं, वैसे-ही-वैसे ये कौरव अत्यन्त प्रबल होते जा रहे हैं’ ॥ ४० ॥
निक्षेप्स्यन्ति च शस्त्राणि वाहनेभ्योऽवरुह्य ये ।
(येऽञ्जलिं कुर्वते वीरा नमन्ति च विवाहनाः ।)
तान्नैतदस्त्रं संग्रामे निहनिष्यति मानवान् ॥ ४१ ॥
‘जो लोग अपने वाहनोंसे उतरकर हथियार नीचे डाल देंगे और जो वीर वाहनरहित हो इसके सामने हाथ जोड़कर नमस्कार करेंगे, उन मनुष्योंको संग्रामभूमिमें यह अस्त्र नहीं मारेगा ॥ ४१ ॥
ये त्वेतत्प्रतियोत्स्यन्ति मनसापीह केचन ।
निहनिष्यति तान् सर्वान् रसातलगतानपि ॥ ४२ ॥
'जो कोई मनसे भी इस अस्त्रका सामना करेंगे, वे रसातलमें चले गये हों तो भी यह अस्त्र वहाँ पहुँचकर उन सबको मार डालेगा' ॥ ४२ ॥
ते वचस्तस्य तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य भारत ।
ईषुः सर्वे समुत्स्रष्टुं मनोभिः करणेन च ॥ ४३ ॥
भारत! भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर सब योद्धाओंने अन्यान्य इन्द्रियों तथा मनसे भी अस्त्रको त्याग देनेका विचार कर लिया ॥ ४३ ॥
तत उत्स्रष्टुकामांस्तानस्त्राण्यालक्ष्य पाण्डवः ।
भीमसेनोऽब्रवीद् राजन्निदं संहर्षयन् वचः ॥ ४४ ॥
राजन्! तब उन सबको अस्त्र त्यागनेके लिये उद्यत हुआ देख पाण्डुनन्दन भीमसेनने उनमें हर्ष और उत्साह पैदा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ४४ ॥
न कथंचन शस्त्राणि मोक्तव्यानीह केनचित् ।
अहमावारयिष्यामि द्रोणपुत्रास्त्रमाशुगैः ॥ ४५ ॥
'किसी भी वीरको किसी तरह भी अपने हथियार नहीं डालने चाहिये। मैं अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा द्रोणपुत्रके अस्त्रका निवारण करूँगा ॥ ४५ ॥
गदयाप्यनया गुर्व्या हेमविग्रहया रणे ।
कालवत् प्रहरिष्यामि द्रौणेरस्त्रं विशातयन् ॥ ४६ ॥
'इस सुवर्णमयी भारी गदासे रणभूमिमें द्रोणपुत्रके अस्त्रोंको चूर-चूर करनेके लिये मैं कालके समान प्रहार करूँगा ॥ ४६ ॥
न हि मे विक्रमे तुल्यः कश्चिदस्ति पुमानिह ।
यथैव सवितुस्तुल्यं ज्योतिरन्यन्न विद्यते ॥ ४७ ॥
'इस संसारमें मेरे पराक्रमकी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है। ठीक वैसे ही, जैसे सूर्यके समान दूसरा कोई ज्योतिर्मय ग्रह नहीं है ॥ ४७ ॥
पश्यतेमौ हि मे बाहू नागराजकरोपमौ ।
समर्थौ पर्वतस्यापि शैशिरस्य निपातने ॥ ४८ ॥
'गजराजके शुण्डोंके समान मोटी मेरी इन भुजाओंको देखो तो सही, ये हिमालयपर्वतको भी धराशायी करनेमें समर्थ हैं ॥ ४८ ॥
नागायुतसमप्राणो ह्यहमेको नरेष्विह ।
शक्रो यथाप्रतिद्वन्द्वो दिवि देवेषु विश्रुतः ॥ ४९ ॥
'यहाँके मनुष्योंमें एक मैं ही ऐसा हूँ, जिसमें दस हजार हाथियोंके समान बल है। जैसे स्वर्गलोक और देवताओंमें केवल इन्द्र ही ऐसे हैं, जिनका दूसरा कोई प्रतिद्वन्द्वी योद्धा नहीं है ॥ ४९ ॥
अद्य पश्यत मे वीर्यं बाह्वोः पीनांसयोर्युधि ।
ज्वलमानस्य दीप्तस्य द्रौणेरस्त्रस्य वारणे ॥ ५० ॥
‘आज युद्धस्थलमें मोटे कंधेवाली मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखो कि ये किस प्रकार अश्वत्थामाके प्रज्वलित एवं दीप्तिमान् अस्त्रके निवारणमें समर्थ होती हैं ॥ ५० ॥
यदि नारायणास्त्रस्य प्रतियोद्धा न विद्यते ।
अद्यैतत् प्रतियोत्स्यामि पश्यत्सु कुरुपाण्डुषु ॥ ५१ ॥
‘यदि इस नारायणास्त्रका सामना करनेवाला दूसरा कोई योद्धा अबतक नहीं हुआ है, तो आज मैं कौरवों और पाण्डवोंके देखते-देखते इसका सामना करूँगा ॥ ५१ ॥
अर्जुनार्जुन बीभत्सो न न्यस्यं गाण्डिवं त्वया ।
शशाङ्कस्येव ते पङ्को नैर्मल्यं पातयिष्यति ॥ ५२ ॥
‘अर्जुन! अर्जुन! वीभत्सो! कहीं तुम भी न अपने गाण्डीव धनुषको नीचे डाल देना; नहीं तो तुममें भी चन्द्रमाके समान कलंक लग जायगा और वह तुम्हारी निर्मलताको नष्ट कर देगा’ ॥ ५२ ॥
अर्जुन उवाच
भीम नारायणास्त्रे मे गोषु च ब्राह्मणेषु च ।
एतेषु गाण्डिवं न्यस्यमेतद्धि व्रतमुत्तमम् ॥ ५३ ॥
**अर्जुन बोले—**भैया भीमसेन! नारायणास्त्र, गौ और ब्राह्मण—इनके समक्ष गाण्डीव धनुषको नीचे डाल दिया जाय; यही मेरा उत्तम व्रत है ॥ ५३ ॥
एवमुक्तस्ततो भीमो द्रोणपुत्रमरिंदमम् ।
अभ्ययान्मेघघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ॥ ५४ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर भीमसेन अकेले ही सूर्यके समान तेजस्वी तथा मेघगर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा शत्रुदमन द्रोणपुत्रका सामना करनेके लिये चल दिये ॥ ५४ ॥
(कम्पयन् मेदिनीं सर्वां त्रासयंश्च चमूं तव ।
शङ्खशब्दं महत् कृत्वा भुजशब्दं च पाण्डवः ॥
पाण्डुपुत्र भीम बड़े जोरसे शंख बजाकर और भुजाओंद्वारा ताल ठोंककर सारी पृथ्वीको कँपाते और आपकी सेनाको भयभीत करते हुए चले।
तस्य शङ्खस्वनं श्रुत्वा बाहुशब्दं च तावकाः ।
समन्तात् कोष्ठकीकृत्य शरव्रातैरवाकिरन् ॥)
उनकी शंखध्वनि तथा भुजाओंद्वारा ताल ठोंकनेका शब्द सुनकर आपके सैनिकोंने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी।
स एनमिषुजालेन लघुत्वाच्छीघ्रविक्रमः ।
निमेषमात्रेणासाद्य कुन्तीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् ॥ ५५ ॥
शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले कुन्तीकुमार भीमसेनने पलक मारते-मारते अश्वत्थामाके पास पहुँचकर बड़ी फुर्तीसे अपने बाणोंका जाल-सा बिछाते हुए उसे ढक दिया ।। ५५ ।।
ततो द्रौणिः प्रहस्यैनं द्रवन्तमभिभाष्य च ।
अवाकिरत् प्रदीप्ताग्रैः शरैस्तैरभिमन्त्रितैः ॥ ५६ ॥
तब अश्वत्थामाने धावा करनेवाले भीमसेनसे हँसकर बात की और उनपर नारायणास्त्रसे अभिमन्त्रित प्रज्वलित अग्रभागवाले बाणोंकी झड़ी लगा दी ।। ५६ ।।
पन्नगैरिव दीप्तास्यैर्वमद्भिज्वलनं रणे ।
अवकीर्णोऽभवत् पार्थः स्फुलिङ्गैरिव काञ्चनैः ॥ ५७ ॥
रणभूमिमें वे बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान आग उगल रहे थे; कुन्तीकुमार भीम उनसे ढक गये, मानो उनके ऊपर स्वर्णमयी चिनगारियाँ पड़ रही हों ।। ५७ ।।
तस्य रूपमभूद् राजन् भीमसेनस्य संयुगे ।
खद्योतैरावृतस्येव पर्वतस्य दिनक्षये ॥ ५८ ॥
राजन्! उस समय युद्धस्थलमें भीमसेनका रूप संध्याके समय जुगुनुओंसे भरे हुए पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था ।। ५८ ।।
तदस्त्रं द्रोणपुत्रस्य तस्मिन् प्रतिसमस्यति ।
अवर्धत महाराज यथाग्निरनिलोद्भूतः ॥ ५९ ॥
महाराज! भीमसेन जब द्रोणपुत्रके उस अस्त्रके सामने बाण मारने लगे, तब वह हवाका सहारा पाकर धधक उठनेवाली आगके समान प्रचण्ड वेगसे बढ़ने लगा ।। ५९ ।।
विवर्धमानमालक्ष्य तदस्त्रं भीमविक्रमम् ।
पाण्डुसैन्यमृते भीमं सुमहद् भयमाविशत् ॥ ६० ॥
उस अस्त्रको बढ़ते देख भयंकर पराक्रमी भीमसेनको छोड़कर शेष सारी पाण्डव-सेनापर महान् भय छा गया ।। ६० ।।
ततः शस्त्राणि ते सर्वे समुत्सृज्य महीतले ।
अवारोहन् रथेभ्यश्च हस्त्यश्वेभ्यश्च सर्वशः ॥ ६१ ॥
तब वे समस्त सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्रोंको धरतीपर डालकर रथ, हाथी और घोड़े आदि सभी वाहनोंसे उतर गये ।। ६१ ।।
तेषु निक्षिप्तशस्त्रेषु वाहनेभ्यश्च्युतेषु च ।
तदस्त्रवीर्यं विपुलं भीममूर्धन्यथापतत् ॥ ६२ ॥
उनके हथियार डाल देने और वाहनोंसे उतर जानेपर उस अस्त्रकी विशाल शक्ति केवल भीमसेनके माथेपर आ पड़ी ।। ६२ ।।
हाहाकृतानि भूतानि पाण्डवाश्च विशेषतः ।
भीमसेनमपश्यन्त तेजसा संवृतं तथा ॥ ६३ ॥
तब सभी प्राणी विशेषतः पाण्डव हाहाकार कर उठे। उन्होंने देखा, भीमसेन उस अस्त्रके तेजसे आच्छादित हो गये हैं।। ६३ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि पाण्डवसैन्यास्त्रत्यागे नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें पाण्डव-सेनाका अस्त्र-त्यागविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६७ १/३ श्लोक हैं।)