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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 302)

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

अभिमन्युका पराक्रम, उसके द्वारा अश्मकपुत्रका वध, शल्यका मूर्च्छित होना और कौरव-सेनाका पलायन

संजय उवाच

तां प्रभग्नां चमूं दृष्ट्वा सौभद्रेणामितौजसा ।
दुर्योधनो भृशं क्रुद्धः स्वयं सौभद्रमभ्ययात् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! अमिततेजस्वी सुभद्राकुमार अभिमन्युने कौरव-सेनाको मार भगाया है, यह देखकर अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ दुर्योधन स्वयं सुभद्राकुमारका सामना करनेके लिये आया ॥ १ ॥

ततो राजानमावृत्तं सौभद्रं प्रति संयुगे ।
दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् योधान् परीप्सध्वं नराधिपम् ॥ २ ॥
उस युद्धस्थलमें राजा दुर्योधनको अभिमन्युकी ओर लौटते देख द्रोणाचार्यने समस्त योद्धाओंसे कहा—‘वीरो! कौरव-नरेशकी सब ओरसे रक्षा करो ॥ २ ॥

पुराभिमन्युर्लक्ष्यं नः पश्यतां हन्ति वीर्यवान् ।
तमाद्रवत मा भैष्ट क्षिप्रं रक्षत कौरवम् ॥ ३ ॥
‘बलवान् अभिमन्यु हमारे देखते-देखते अपने लक्ष्यभूत राजा दुर्योधनको पहले ही मार डालेगा; अतः तुम सब लोग दौड़ो, भय न करो, शीघ्र ही कुरुवंशी दुर्योधनकी रक्षा करो’ ॥ ३ ॥

ततः कृतज्ञा बलिनः सुहृदो जितकाशिनः ।
त्रास्यमाना भयाद् वीरं परिवव्रुस्तवात्मजम् ॥ ४ ॥
महाराज! तदनन्तर अस्त्र-शिक्षामें निपुण, बलवान्, हितैषी और विजयशाली योद्धाओंने (रक्षाके लिये) आपके वीर पुत्रको चारों ओरसे घेर लिया; यद्यपि वे अभिमन्युके भयसे बहुत डरते थे ॥ ४ ॥

द्रोणो द्रौणिः कृपः कर्णः कृतवर्मा च सौबलः ।
बृहद्वलो मद्रराजो भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ॥ ५ ॥
पौरवो वृषसेनश्च विसृजन्तः शिताञ्छरान् ।
सौभद्रं शरवर्षेण महता समवाकिरन् ॥ ६ ॥
द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, कृतवर्मा, सुबलपुत्र शकुनि, बृहद्वल, मद्रराज शल्य, भूरि, भूरिश्रवा, शल, पौरव तथा वृषसेन—ये अभिमन्युपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। इन्होंने महान् बाण-वर्षाद्वारा अभिमन्युको आच्छादित कर दिया ॥ ५-६ ॥

सम्मोहयित्वा तमथ दुर्योधनममोचयन् ।
आस्याद् ग्रासमिवाक्षिप्तं ममृषे नार्जुनात्मजः ॥ ७ ॥
इस प्रकार उसे मोहित करके इन वीरोंने दुर्योधनको छुड़ा लिया। तब मानो मुँहसे ग्रास छिन गया हो, यह मानकर अर्जुनकुमार अभिमन्यु इसे सहन न कर सका ॥ ७ ॥
ताञ्छरौघेण महता साश्वसूतान् महारथान् ।
विमुखीकृत्य सौभद्रः सिंहनादमथानदत् ॥ ८ ॥
अतः अपनी भारी बाण-वर्षासे उन महारथियोंको उनके सारथि और घोड़ोंसहित युद्धसे विमुख करके सुभद्राकुमारने सिंहके समान गर्जना की ॥ ८ ॥
तस्य नादं ततः श्रुत्वा सिंहस्येवामिषैषिणः ।
नामृष्यन्त सुसंरब्धाः पुनद्रोणमुखा रथाः ॥ ९ ॥
मांस चाहनेवाले सिंहके समान अभिमन्युकी वह गर्जना सुनकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोण आदि महारथी न सह सके ॥ ९ ॥
त एनं कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष ।
व्यसृजन्निषुजालानि नानालिङ्गानि सङ्घशः ॥ १० ॥
आर्य! तब उन महारथियोंने रथसेनाद्वारा उसे कोष्ठमें आबद्ध-सा करके उसके ऊपर नाना प्रकारके चिह्नवाले समूह-के-समूह बाण बरसाने आरम्भ किये ॥ १० ॥
तान्यन्तरिक्षे चिच्छेद पौत्रस्ते निशितैः शरैः ।
तांश्चैव प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ११ ॥
परंतु आपके उस वीर पौत्रने अपने पैने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सायकसमूहोंको आकाशमें ही काट दिया और उन सभी महारथियोंको घायल भी कर डाला—यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ११ ॥
ततस्ते कोपितास्तेन शरैराशीविषोपमैः ।
परिवव्रुर्जिघांसन्तः सौभद्रमपराजितम् ॥ १२ ॥
तब अभिमन्युसे चिढ़े हुए उन योद्धाओंने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा किसीसे परास्त न होनेवाले सुभद्राकुमारको मार डालनेकी इच्छा रखकर उसे घेर लिया ॥ १२ ॥
समुद्रमिव पर्यस्तं त्वदीयं तं बलार्णवम् ।
दधारैकोऽर्जुनिर्बाणैर्वेलेव भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय जैसे सब ओरसे उछलते हुए समुद्रको तटभूमि रोक लेती है, उसी प्रकार आपके सैन्य-सागरको एकमात्र अर्जुनकुमारने आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १३ ॥
शूराणां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् ।
अभिमन्योः परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः ॥ १४ ॥

उस समय एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए युद्धपरायण विपक्षी वीरों तथा अभिमन्युमें कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ १४ ॥
तस्मिंस्तु घोरे संग्रामे वर्तमाने भयंकरे ।
दुःसहो नवभिर्बाणैरभिमन्युमविध्यत ॥ १५ ॥
दुःशासनो द्वादशभिः कृपः शारद्वतस्त्रिभिः ।
द्रोणस्तु सप्तदशभिः शरैराशीविषोपमैः ॥ १६ ॥
इस प्रकार वह भयंकर एवं घोर संग्राम चल रहा था। उसमें आपके पुत्र दुःसहने नौ, दुःशासनने बारह, शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने तीन और द्रोणाचार्यने विषधर सर्पके समान भयंकर सत्रह बाणोंसे अभिमन्युको बींध डाला ॥
विविंशतिस्तु सप्तत्या कृतवर्मा च सप्तभिः ।
बृहद्बलस्तथाष्टाभिरश्वत्थामा च सप्तभिः ॥ १७ ॥
भूरिश्रवास्त्रिभिर्बाणैर्मद्रेशः षड्भिराशुगैः ।
द्वाभ्यां शराभ्यां शकुनिस्त्रिभिर्दुर्योधनो नृपः ॥ १८ ॥
इसी प्रकार विविंशतिने सत्तर, कृतवर्माने सात, बृहद्बलने आठ, अश्वत्थामाने सात, भूरिश्रवाने तीन, मद्रराज शल्यने छः, शकुनिने दो और राजा दुर्योधनने तीन बाणोंसे अभिमन्युको घायल कर दिया ॥ १७-१८ ॥
स तु तान् प्रतिविव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
नृत्यन्निव महाराज चापहस्तः प्रतापवान् ॥ १९ ॥
महाराज! उस समय धनुष हाथमें लिये प्रतापी अभिमन्युने जैसे नाच रहा हो, इस प्रकार सब ओर घूम-घूमकर उन सब महारथियोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १९ ॥
ततोऽभिमन्युः संक्रुद्धस्त्रास्यमानस्तवात्मजैः ।
विदर्शयन् वै सुमहच्छिक्षौरसकृतं बलम् ॥ २० ॥
तब आपके सभी पुत्रोंने मिलकर अभिमन्युको त्रास देना आरम्भ किया, फिर तो वह क्रोधसे जल उठा और अपनी अस्त्र-शिक्षा तथा हृदयका महान् बल दिखाने लगा ॥
गरुडानिलरंहोभिर्यन्तुर्वाक्यकरैर्हयैः ।
दान्तैरश्मकदायादस्त्वरमाणो ह्यवारयत् ॥ २१ ॥
विव्याध दशभिर्बाणैस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
इतनेमें ही अश्मकके पुत्रने सारथिके आदेशका पालन करनेवाले, गरुड और वायुके समान वेगशाली सुशिक्षित घोड़ोंद्वारा बड़ी तेजीसे वहाँ आकर अभिमन्युको रोका और दस बाण मारकर उसे घायल कर दिया, साथ ही इस प्रकार कहा—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ २१ ½ ॥
तस्याभिमन्युर्दशभिर्हयान् सूतं ध्वजं शरैः ॥ २२ ॥

बाहु धनुः शिरश्चोर्व्यां स्मयमानोऽभ्यपातयत् ।
तब अभिमन्युने मुसकराकर अश्मकपुत्रके घोड़ों, सारथि, ध्वज, भुजाओं, धनुष तथा मस्तकको भी दस बाणोंसे पृथ्वीपर काट गिराया ।। २२ ½ ।।
ततस्तस्मिन् हते वीरे सौभद्रेणाश्मकेश्वरे ।। २३ ।।
संचचाल बलं सर्वं पलायनपरायणम् ।
सुभद्राकुमार अभिमन्युके द्वारा वीर अश्मक-राजकुमारके मारे जानेपर सारी सेना विचलित हो भागने लगी ।।
ततः कर्णः कृपो द्रोणो द्रौणिर्गान्धारराट्शलः ।। २४ ।।
शल्यो भूरिश्रवाः क्राथः सोमदत्तो विविंशतिः ।
वृषसेनः सुषेणश्च कुण्डभेदी प्रतर्दनः ।। २५ ।।
वृन्दारको ललित्थश्च प्रबाहुर्दीर्घलोचनः ।
दुर्योधनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ।। २६ ।।
तदनन्तर कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, गान्धारराज शकुनि, शल, शल्य, भूरिश्रवा, क्राथ, सोमदत्त, विविंशति, वृषसेन, सुषेण, कुण्डभेदी, प्रतर्दन, वृन्दारक, ललित्थ, प्रबाहु, दीर्घलोचन तथा अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनने अभिमन्युपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।
सोऽतिविद्धो महेष्वासैरभिमन्युरजिह्मगैः ।
शरमादत्त कर्णाय वर्मकायावभेदिनम् ।। २७ ।।
इन महाधनुर्धर वीरोंके चलाये हुए बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर अभिमन्युने कर्णको लक्ष्य करके एक ऐसा बाण हाथमें लिया, जो उसके कवच और कायाको विदीर्ण कर डालनेवाला था ।। २७ ।।
तस्य भित्त्वा तनुत्राणं देहं निर्भिद्य चाशुगः ।
प्राविशद् धरणीं वेगाद् वल्मीकमिव पन्नगः ।। २८ ।।
जैसे सर्प बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार अभिमन्युका छोड़ा हुआ वह बाण कर्णके शरीर और कवचको विदीर्ण करके बड़े वेगसे धरतीमें समा गया ।। २८ ।।
स तेनातिप्रहारेण व्यथितो विह्वलन्निव ।
संचचाल रणे कर्णः क्षितिकम्पे यथाचलः ।। २९ ।।
जैसे भूकम्प होनेपर पर्वत भी हिलने लगता है, उसी प्रकार उस अत्यन्त गहरे आघातसे व्यथित एवं विह्वल-सा होकर कर्ण उस रणभूमिमें विचलित हो उठा ।। २९ ।।
तथान्यैर्निशितैर्बाणैः सुषेणं दीर्घलोचनम् ।
कुण्डभेदिं च संक्रुद्धस्त्रिभिस्त्रीनवधीद् बली ।। ३० ।।
फिर बलवान् अभिमन्युने अत्यन्त कुपित होकर दूसरे तीन पैने बाणोंद्वारा सुषेण, दीर्घलोचन तथा कुण्डभेदी—इन तीन वीरोंको घायल कर दिया ।। ३० ।।

कर्णस्तं पञ्चविंशत्या नाराचानां समर्पयत् ।
अश्वत्थामा च विंशत्या कृतवर्मा च सप्तभिः ॥ ३१ ॥
तब कर्णने पचीस, अश्वत्थामाने बीस तथा कृतवर्माने सात नाराचोंद्वारा अभिमन्युको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३१ ॥

स शराचितसर्वाङ्गः क्रुद्धः शक्रात्मजात्मजः ।
विचरन् ददृशे सैन्ये पाशहस्त इवान्तकः ॥ ३२ ॥
उस समय इन्द्रकुमार अर्जुनके पुत्र अभिमन्युके सम्पूर्ण अंगोंमें बाण-ही-बाण व्याप्त हो रहे थे, वह क्रोधमें भरे हुए पाशधारी यमराजके समान शत्रुसेनामें विचरता दिखायी देता था ॥ ३२ ॥

शल्यं च शरवर्षेण समीपस्थमवाकिरत् ।
उदक्रोशन्महाबाहुस्तव सैन्यानि भीषयन् ॥ ३३ ॥
राजा शल्य अभिमन्युके पास ही खड़े थे, अतः वह महाबाहु वीर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसने आपकी सेनाको भयभीत करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ३३ ॥

ततः स विद्धोऽस्त्रविदा मर्मभिद्भिरजिह्मगैः ।
शल्यो राजन् रथोपस्थे निषसाद मुमोह च ॥ ३४ ॥
राजन्! अस्त्रवेत्ता अभिमन्युके चलाये हुए मर्मभेदी बाणोंद्वारा घायल होकर राजा शल्य रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गये और मूर्च्छित हो गये ॥ ३४ ॥

तं हि दृष्ट्वा तथा विद्धं सौभद्रेण यशस्विना ।
सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा भारद्वाजस्य पश्यतः ॥ ३५ ॥
यशस्वी सुभद्राकुमारके द्वारा घायल किये हुए शल्यको इस प्रकार भय हुआ देख द्रोणाचार्यके देखते-देखते उनकी सारी सेना रणभूमिसे भाग चली ॥ ३५ ॥

सम्प्रेक्ष्य तं महाबाहुं रुक्मपुङ्खैः समावृतम् ।
त्वदीयाः प्रपलायन्ते मृगाः सिंहार्दिता इव ॥ ३६ ॥

महाबाहु शल्यको अभिमन्युके सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे व्याप्त हुआ देख आपके सभी सैनिक सिंहके सताये हुए मृगोंकी भाँति जोर-जोरसे भागने लगे ॥ ३६ ॥

स तु रणयशसाभिपूज्यमानः
पितृसुरचारणसिद्धयक्षसंघैः ।
अवनितलगतैश्च भूतसङ्घै-
रतिविबभौ हुतभुग्यथाऽऽज्यसिक्तः ॥ ३७ ॥

देवताओं, पितरों, चारणों, सिद्धों तथा यक्षसमूहों एवं भूतलवर्ती भूतसमुदायोंसे प्रशंसित होकर युद्धविषयक सुयशसे प्रकाशित होनेवाला अभिमन्यु घृतकी धारासे अभिषिक्त हुए अग्निदेवके समान अत्यन्त शोभा पाने लगा ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युपराक्रमविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥